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काले मेघा पानी दे - एस एन वर्मा

जेठ का महीना था। गेहूं की कूँटी की दँवाई हो चुकी थी। यह खेती का वह काम था, जिसके बाद अगली खरीफ फसल के लिए गोबर खाद खेत में डाल दी जाती थी। गेंहूं की फसल रबी के सीजन की मुख्य फसल थी आज की तरह ही। मँड़ाई का काम बैलों से लिया जाता था, इसलिये अधिक मात्रा में कूँटी निकल जाती थी जिसमें अनाज और भूसा दोनों छिपे होने का अंदेशा हर किसान को होता था। आठ आठ बैलों की दावँर में पास चलाना पौरुष का काम था। गोल घेरे में दिन भर चलना किसान के ही बस में था। रात में उसी ढेर पर सोना चांदनी के तले अब कहाँ मयस्सर है। जेठ की लू और सर्वाधिक तपन में कूँटी की दँवाई का उपयुक्त समय होता था। अलबत्ता तो कुछ बचता नहीं था, बच गया भी बरसात में जानवर के पास से मच्छर भगाने के लिये जलाया जाता था। आधे जेठ के बाद हवा का रुख बदलता और पुरुवा हवा चलने लगती थी। इससे यह अंदाज मिल जाता था कि एक दो सप्ताह में बारिश हो जाएगी।

लेकिन उस साल तीन सप्ताह बीत गए और बारिश नहीं हुई। किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई। राम अवध, केसरी, राधे, महेश, बिरजू , माली आदि इसी चिंता में एकत्र हुए और प्रधान से बोले - "लागत है कि इन्द्र भगवान नाराज है उन्हें मनाने के लिये पूजा करनी पड़ेगी"। प्रधान भी वही सोच रहे थे , इसलिये तुरंत बच्चा टोली को तैयार करने की आज्ञा दे दी। फिर क्या था, राम अवध आगे आगे और बच्चा टोली पीछे पीछे। शुक्रवार का दिन सबसे बढ़िया माना गया। कुछ खरीदने की जरूरत नहीं थी फिर भी बाजार का दिन अच्छा लगा। लोग पूजा के बाद अपने जरूरी काम बाजार से कर सकें। ग्यारह बजे सब एकत्र हो गए और बच्चा टोली एक स्वर से "काले मेघा पानी दे--------"नारा लगाने लगी।

उस्ताद ढोल लेकर दौड़ पड़े। डम डम डम ताक धिंन्न ताक धिंन्न। बच्चे काल कलूटी खेलित हैं, काला मेघा पानी दे' गाते हुए गांव के पश्चिम छोर पर एकत्र होते है। केसरी अनाज इकट्ठा करने की जिम्मेदारी उठाते है। उनके हाथ में एक बड़ा झोला है जिसमे आटा एकत्र होगा। दूसरे हाथ में छोटा झोला है जिसमे दाल नमक खटाई इकठ्ठा होगी। घर से इतनी व्यवस्था करके चले थे कि सेठ के यहां आलू भी मिल गया , सो उन्हीं से आलू इकट्ठा करने के लिए टोकरी भी ले ली। उधर बच्चे जमीन पर लोटकर इन्द्र देवता से पानी की मांग करने लगे। जिसके दरवाजे पर टोली पहुंचती, घर की बड़ी औरत घर में रखा पानी उन बच्चों पर डालती। उसे यह चिंता भी नहीं की दोपहरी में पीने का पानी कहाँ से आएगा। पूरे गाँव में एक ही तो कुआँ था प्रधान वाला। यह भी दो चार दिन का पानी दे सकता था। बरसों से कुएं का उबरौधा नहीं हुआ था। केसरी बिना संकोच मालकिन से टोली के लिए राशन एकत्र कर रहे थे। जैसे जैसे एकत्र अन्न का वजन बढ़ा और लोग भी इस महान काम में सहयोगी बन गए।

अभी यादव टोला में सभी सेहन दरवाजे कीचड़ से सने नहीं थे कि भानु भास्कर की तपती लपटे उठने लगी। लेकिन बच्चा टोली पर कोई प्रभाव नहीं हुआ,   उल्टे और बच्चे शामिल हों गए। एक एक कर कुम्हार पुरवा, चमार पुरवा, बंस्वरिया, कुर्मी टोले में आकर बच्चा टोली का लोटकर किया जा रहा पूजा कार्य सम्पन्न हो गया ।

गांव के बड़कू भैया भी इस लोट पोट को देख रहे थे। वे दो दिन पहले ही इंजीनियर की पढ़ाई पूरी कर गांव आये थे। उनके मन में विज्ञान और पर्यावरण को लेकर अजब उत्साह था। दस वर्ष शहर में बिता लेने के बाद गांववालों के काम में उन्हें गवंयीपन लग रहा था। यह आयोजन उन्हें पानी की बर्बादी लग रहा था। अंधविश्वास में उलझे लोग क्या क्या करते हैं?यह सोचकर वे अंदर अंदर कुढ़ रहे थे। बस मौका तलाश रहे थे कि कब पूजा खत्म हो और अपने ज्ञान को जनता के सामने रखें। खैर यह अवसर उन्हें तब मिला जब उनके बगल में माझी दादा खड़े थे। माझी दादा थोड़ा आधुनिक ख्याल के थे इसलिये बड़कू भैया को उम्मीद थी कि वे उनकी बात का समर्थन करेंगे। इसे अंधविश्वास और मनोरंजन बताएंगे। लेकिन जैसे ही बड़कू भैया ने पानी की बर्बादी वाली बात कही , माझी दादा बोले कि 'बेटा ! ई पानी कई बर्बादी नाही होय, हम थोड़ क पानी दे देत हैं बदले में ढेर पानी मिली। आखिर खेत खेती किसानी म पहले बीज डालई पड़त है, तबै ढेर क फसल होत है न। ''यह बात सुनते ही बड़कू भैया निरुत्तर हो गए और पर्यावरण का सैद्धांतिक ज्ञान संकुचित हो गया। वे चुपचाप टोली के पीछे चलने लगे। पर उनके मन में अभी भी अंधविश्वास का तर्क जकड़ बनाये हुए था।

बच्चा टोली ने अब बांस के कोठ के पास जाकर आलिंगन और सामूहिक रुदन का कार्य आरम्भ किया। रोकर भी पानी मांगा "काले मेघा पानी दे"।

रोना सुनकर रोना आया , पूरे गांव का दिल भर आया। काले मेघा पानी दे, नहीं तो अपनी नानी दे। । यह वह लम्हा था जिसमें सभी गमगीन हो गए। उस्ताद की ढोल ने माहौल को हल्का किया ----ताक धिंन्न ताक धिंन्न धांय धायं।

उस जेठ की तपती गर्मी में भी स्नान भर के लिये बाउली में पानी था। जो बच्चे कीचड़ से सने थे जिनके रोते रोते आधी कीचड़ सूख गई थी , वे नहाने लगे । राम अवध, केसरी , राधे, महेश उसी गति से एकत्र हुए अन्न को पकाने की व्यवस्था में लग गए। कुम्हार ने बर्तन दिए कुछ मिट्टी के तो अहरा पर दाल चावल पकने लगा। आलू के लिये आग अलग तैयार की गई। मिर्च, नमक , तेल पहले से एकत्र अनाज से अलग रखा जाने लगा। नहाने के बाद बच्चा टोली भी भोजन बनाने में मदद करने लगी। हर आदमी व्यस्त दिख रहा था। अजब उत्साह से भरा। दो बजते बजते भोजन तैयार हो गया। बच्चों ने स्वयं अपने लिए पत्तल बनाई। कुछ अकुशल बच्चे केले के पत्ते काट लाये जिस पर खाना खा सके। सभी लोग जो किसी तरह भी इस अनोखी पूजा में शामिल थे, उन्होंने छककर भोजन किया। इसके बाद भी ढेर सारा भोजन बच गया तो राम अवध ने डयोहार , नाई , धोबी आदि को परोसा भी दिया। इस चहल पहल भरे दिन के बाद बारिश का इंतजार था।

अगले दिन आसमान में बादल दिखे और छिटपुट बारिश भी हो गयी। बड़कू भैया अब भी अंधविश्वास और विज्ञान में उलझे थे। सामुदायिक हित के लिए सामुदायिक पर्यावरण चेतना किसे कहते हैं??.

एस एन वर्मा

सेवापुरी वाराणसी।

1 टिप्पणियाँ

  1. जमीन से जुड़ी हुई रचनात्मक अभिव्यक्ति बेजोड़ है.... लेखक ग्रामीण भारत की परँपरागत समझ को अभिजात्य वर्ग तक ले जाने मे सफल हैं।
    साभार,
    L S Mishra

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