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॥ कालाडी, जगद गुरु का जन्मस्थल॥ [ यात्रा वृतांत ] । कामिनी कामायनी।

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दिल्ली के घरेलू विमान पत्तनन से एक हम दिन के बज कर 50 मिनट पर,अपनी बहुप्रतीक्षित यात्रा पर, सुदूर दक्षिण भारत की, कोच्चि के लिए रवाना हुए थे। तीन घंटा 50 मिनट पर हम कोच्चि पहुँच गए थे। पाँच बजकर 5 मिनट पर कोच्चि एयर पोर्ट पर थे।

यहाँ आते ही लगा, भारत से अलग परिवेश में आ गए। बाहर निकलते देखा। एक लाईन से सोलर पैनल लगे हुए थे। पता चला यह भारत का ही नहीं, दुनिया का पहला सोलर एयर पोर्ट है। यहाँ आने पर मुझे कुछ कुछ कंबोडिया की याद जेहन में कौंध सी गई थी। कुछ वैसे ही भवन निर्माण शैली की।

हमारी गाड़ी एयर पोर्ट के बाहर आ चुकी थी। यहाँ से हमें सीधे कालाडी जाना था। कलाडी केरल में अंगमाली पूर्व में पेरियार नदी के किनारे एरनाकुलम में अवस्थित है। यह कोच्चि अंतर्राष्ट्रीय एयर पोर्ट से नजदीक ही है।

अजीब उत्सुकता थी। यथाशीघ्र वहाँ की मिट्टी को छूने की। शंकर , हमारे महान शंकर की, जिनकी उपस्थिति हिंदुस्तान के तकरीबन प्रत्येक तीर्थ स्थल पर पंडितों, मार्गदर्शकों द्वारा करवा दी जाती है। हमारे जीवन के कण कण में बसे आदि गुरु शंकरचार्य।

हम अधीर थे, बिना क्षण गँवाए हमलोग शंकर के जन्मस्थल पर पहुंचना चाह रहे थे। बीच में कीर्ति स्तम्भ दूर से ही अपना पताका फहराए खड़ी थी।  एक 45मीटर [ 148फीट] ऊंची आदि शंकर स्तम्भ मंडप, यहाँ कांचीमठ के द्वारा चंद्रशेखारेन्द्र सरस्वती की देखरेख में बनाया गया। आदि शंकरचार्य स्तम्भ मंडपम  नौ मंज़िला स्मारक भवन है। प्रवेश द्वार पर दो हाथी प्रतिमा इसकी रखवाली करते हुए से खड़े हैं। पादुका मंडपम जहां  चाँदी के दो पादुका रखे हुए हैं। घुमावदार सी सीढ़ियों से चढ़कर पहुँचने पर  भवन के ऊपरी मंजिल की दीवारों पर आदि शंकर की जीवन गाथाएँ पेंटिग्स के माध्यम से दर्शायी गई है।

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हम लोग शंकर के जन्मस्थल  की ओर जा रहे थे और भीषण बारिश हमारी स्वागत करने में लगी थी।

चारों ओर की अप्रतिम हरियाली का राज बताने के लिए बादल भी बेताब थे जैसे।

कालाडी शायद प्रकृति द्वारा चुनी हुई वह स्थल है, जहां शंकर जैसे महान आत्मा का प्रादुर्भाव होना विधाता ने लिख रखा था।केरल की खूबसूरती भी अपने आप में मनोहर है।  यहाँ पर्वत है, पानी है, और प्रकृति की असीम सादगी है।

कालाडी शब्द का मतलब मलयालम भाषा में चरणचिन्ह होता है। पहले इस गाँव को सासालम के नाम से जाना जाता था। विशाल परिसर में फैला हुआ यह स्थान अत्यंत ही चित्ताकर्षक है। इसके पृष्ट भाग में बहती हुई पवित्र नदी।

यह एक छोटा सा, मगर गुंजायमान शहर है। सबरी माला के और संत थौमस अपोस्टले{ मुलापोरे }दोनों धर्मों के लिए विरामस्थल है। यहाँ 50 मिलियन के आसपास देश विदेश के श्रद्धालुओं के अतिरिक्त पर्यटन के प्रेमी लोग प्रतिवर्ष आते हैं। कालाडी शंकर के कारण ही एक बार फिर से जागृत होकर विश्व के मानचित्र पर लहराने लगा।

यहाँ शंकर के नाम से एक उत्कृष्ट संस्कृत विश्वविद्यालय भी चलाया जाता है जहां अन्य अनेक विषयों के साथ, मोहनी अट्टम, भरतनाट्यम, म्यूरल पेंटिग्स और कर्णाटिक संगीत की भी पढ़ाई होती है।

आठवीं सदी में भारत के महान दार्शनिक, हिन्दू धर्म के महान संरक्षक, लेखक और संत आदि शंकरचार्य का जन्म यहीं हुआ था। काल ने इनकी लेखनी, विराट छवि और दिग्दिगंत तक फैली अपार प्रकाशपुंज को मैली चादर से भी ढंकने में सफलता तो नहीं हासिल कर सका हो सका, मगर पर इनका मूल स्थान प्रश्ञ्चिंह के घेरे में अवश्य आ चुका था। इस संबंध में काफी विचार विमर्श होता भी रहा था।

समय और इतिहास के धुएँ में गुम इस स्थान का पुनरखोज उन्नीसवीं सदी में उस समय के शृंगेरी मठ के शंकराचार्य द्वारा किया गया । सन 1910 में यहाँ शंकर की मंदिर बनाई गई थी। इसकी शताब्दी समारोह सन 2010 में मनाई गई थी। इससे संबन्धित अर्थात इस गहन शोध पर एक फिल्म भी  शृंगेरी शारदा मठ द्वारा बनाया गया था।

पुनरखोज के पीछे यह कथा भी  प्रचलित है कि राजशेखर नामक व्यक्ति को स्वप्न में भगवान शिव ने स्वयम आकर इस स्थान का परिचय दिया था। उसने यहाँ एक शिव की मंदिर भी बनाई थी।इस परिसर में राजा द्वारा निर्मित  दो मंदिर है, एक शारदामम्बा का और दूसरा शंकर का दक्षिण मूर्ति के रूप में। मंदिर भीतर से चौकोर है एक दम पुरानी शैली का एक किनारे माँ दुर्गा के नौ रूपों की विग्रह है, अन्य देवी देवता भी वहाँ उपस्थित हैं । चारों तरफ विशाल चौड़ा बरामदा है, एक जगह, बरामदे पर, भगवान की मूर्ति के समक्ष कुछ छोटी  कन्याएँ अपने संगीत शिक्षिका से भक्ति संगीत का अभ्यास कर रही थी।यही नीचे आँगन जैसे स्थान पर वृन्दावन है। दूसरी ओर के बड़े हौल में, भित्ति चित्रों से, विविध प्रसंगों को उजागर करते हुए जगद्गुरू जैसे झांक रहे थे। यहाँ इस मंदिर परिसर में युग जैसे ठहर सी गई हो। पार्श्व में पूर्णा खामोश बहती रही थी।

यहाँ देश के चारों भागों में शंकर द्वारा स्थापित मठों में से दो, शृंगेरीमठ और कांची मठ दोनों की शाखाएँ हैं। इस मठ से 45 मीटर दूर वही नौ मंज़िला कीर्ति स्तम्भ है जिसकी हम चर्चा कर चुके हैं।यहाँ दोनों शाखाओं और वहाँ के राजा ने भी शंकर की अनेक यादगार स्थल बनवाए।

यहाँ  हमें शंकर की जीवनी से बहुत सी बातें वहाँ पर सुनने को मिली थी।

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ऐसी किंवदंती है कि एक दिन आर्यम्बा, जगद्गुरू की माता, अपने घर से तीन किलोमीटर दूर पेरियार[ स्थानीय भाषा में पूर्णा]  नदी स्नान के लिए जाते समय रास्ते में बेहोश होकर गिर पड़ी थी। मातृभक्त बालक शंकर ने, जिनका जन्म भी एक अलौकिक वरदान के फलस्वरूप हुआ बताया जाता है, रो रोकर कृष्ण भगवान से प्रार्थना किया। भगवान बालक की अश्रुमिश्रितकरुण प्रार्थना से द्रवित हो उठे, उन्होने आशीर्वाद देकर कहा कि यह नदी वहाँ तक  आ जाएगी, जहां तुम्हारे नन्हें चरण के चिन्ह बनेंगे।

वास्तव में नदी अपने स्वाभाविक बहाव से मुड़कर वहाँ तक आ गई थी, जहां उनका गाँव था, वहीं उनके चरणचिन्ह पड़े थे और इस जगह का नाम कालाडी हो गया था।

यहाँ शंकर के माता की समाधि है। इसके संबंध में भी एक कहानी है  शंकर ने अपनी माता को वचन दिया था कि वे उनके जीवन के आखिरी क्षण उनके साथ रहेंगे, चाहे वह कहीं भी रहें। [ शंकर स्वयम नंबुदरी ब्रामहन के घर पैदा हुए थे, मगर सन्यास लेने के कारण उनके समाज के लोगों ने जब उनका बहिष्कार कर उनकी माता के अंतिम संस्कार में बाधा दिया, उस समय मात्र दो नंबुदरी परिवार ने उनका साथ दिया। शंकर ने अपनी हथेली से आग उत्पन्न कर माता को मुखाग्नि दी थी। शंकर के प्रति सहिष्णुता दिखने और उनकी माता के समाधि के पास दीपक जलाने के लिए कृतज्ञ समाज उन दोनों नंबुदरी परिवारों को बहुत सम्मान दिया। यहाँ पूजा भी यही लोग करते हैं।

भगवान कृष्ण को आदि शंकर के परिवार का कुल देवता माना जाता है। प्रबोध सुधाकरम में शंकर ने खुद इस बात का जिक्र किया है। शृंगेरी मठ के पश्चिम में यही कृष्ण मंदिरअवस्थित है। यहाँ के मंदिरों की पूजा तमिल या कन्नड स्मार्त ब्रांहन द्वारा सम्पन्न होता है , नंबुदरियों द्वारा नहीं।

यह मंदिर कालाडी देवस्थानम के अधीन है। इसके ट्रस्टी में दो नंबुदरी परिवार भी है, जिनका संबंध शंकर के जीवन काल से रहा है

कनकधारा स्त्रोत  यहाँ का अत्यंत प्रिय पाठ है। कहा जाता है कि जब जनेऊ के अवसर पर बालक शंकर को भिक्षा मांगने गाँव के एक निर्धन वृद्धा के घर जाना पड़ा तो उस समय उसके पास, भिक्षु को देने के लिए मात्र एक सूखे आंवला के सिवा, कुछ भी नहीं था। इस व्यथा से वह भावुक होकर रो उठी थी। बालक भिक्षु ने उस वृद्धा की उदारता[ जो भी नगण्य उपलब्ध था, उसे समर्पित करने की ] और उसकी दारुण दशा देख कर, वहीं खड़े खड़े कनकधारा की रचना कर डाली। इसके बाद वहाँ उसके बगीचे में कनक की खूब बारिश हुई। अभी भी वह घर, वहाँ मौजूद है।

कालांतर में ,   शंकर की जयंती पर कनक धारा स्त्रोत का 32 पंडितों के द्वारा उनके जीवन के बत्तीस वर्ष की गौरव पूर्ण स्मृति  में गायन शुरू हो गया।

सौन्दर्य लहरी के अनुसार, शंकर के पिता वहाँ से अर्थात अपने गाँव से, एक किलोमीटर दूर के दुर्गा मंदिर में पुजारी थे, एक बार जब उनकी तबीयत खराब थी, उस समय  उन्होने बालक शंकर को, दूध की कटोरी लेकर माता के पूजन के लिए भेजा। बालक ने देखा की समर्पण के बाद भी दूध कटोरा में ज्यों का त्यों है। तब वे इस भय से रोने लगे कि देवी ने दूध क्यों नहीं पिया। इसपर माता ने द्रवित होकर सारा दूध पी लिया था।

इसके अतिरिक्त अन्य अनेक स्थान शंकर के जीवन काल की घटनाओं को समर्पित है। जहाँ कभी शंकर का घर हुआ करता था, ठीक उसी स्थान पर शृंगेरी मठ अवस्थित है। घड़ियाल घाट, जहां पर शंकर को बड़ा सा एक घड़ियाल ने दबोच लिया था। कहा जाता है कि उनके सन्यास लेने की बात सुनकर माता बेहद दुखी थी और अपनी अनुमति नहीं दे रही थी। मगर उस दारुण दृश्य को देखकर माता ने व्याकुल होकर उन्हें सन्यास के लिए मंजूरी दे दी। उनके हाँ कहते ही घड़ियाल उन्हें छोड़कर वापस पानी में चला गया था।

शंकर अपने को कभी भी मात्र केरल का नहीं माना। वे अपने को भारत वर्ष का अच्छा बेटा मानते थे। सम्पूर्ण भारत उनका अपना था, वसुधेव कुटुंबकम की भांति। इसलिए सम्पूर्ण भारत ने भी उन्हें अपना स्वीकार लिया।

त्रावणकोर के राजा ने वहाँ का सारा शंकर से संबन्धित जमीन अधिग्रहण कर और दो मंदिर भी निर्माण एक शारदा अम्बा का, एक शंकर का कर, शृंगेरी मठ के अधीन कर दिया,, जो मंडपम की देखभाल करता है।  शंकर के माता के देहांत के बाद उनका अंतिम संस्कार करने में शंकर को दो नंबुदरी ब्रांहनों के परिवार ने मदद किया था। शंकर ने माता की समाधि के पास,जिसे वृन्दावन कहा गया है, एक बड़ा सा शिला रख दिया था, जहां निरंतर उन दो में से एक नंबुरदरी परिवार के लोगों ने उस स्थान की गरिमा बनाए रखने के लिए दीपक जलाते रहे थे।

उस समय की विकट राजनीतिक परिस्थिति में सनातन धर्म को पुनः स्थापित करने वाले शंकर की प्रशंसा दूर दूर तक फैल चुकी थी।

उनके जीवन लीला की समाप्ति केदारनाथ में हुई और यह खबर पाँच वर्ष बाद उधर दक्षिण में पहुंची थी। यह खबर सुनते ही कोवलम के तात्कालिक राजा उदय मार्तंड ने सन 825 को कोलम युग की शुरुआत घोषित कर दिया था।

बाद  में जब उनके जन्म स्थल की सही सही जगह निर्धारण करने की खोज हुई, { विवाद था कि कालाडी या चिदम्बरम }तब गाँव के समीप वह मुड़ी हुई नदी, समाधि के पास शिला और वहाँ जलता रोशनी इन साक्ष्यों के आधार पर यह जगह निर्विवाद रूप से  निर्धारित कर लिया गया।उन्नति के वावजूद  आज भी यह जगह उतना ही साधारण सा दिखता है। सीधे सादे अत्यंत धार्मिक लोग, । इसकी प्राकृतिक छटा देखने वालों को सब कुछ विस्मरण करवा देती है। इतने उंचे ऊंचे केले के पेड़ भी हमने अपनी जिंदगी में पहली बार यहीं पर देखे थे। केला के अलावा नारियल आदि के लिए भी यह स्थान मशहूर हैं

कलाडी से तकरीबन एक किलोमीटर की दूरी पर रामकृष्ण अद्वैत आश्रम है, जहां हमारा निवास था। यहाँ राम कृष्ण मठ द्वारा संचालित रामकृष्ण अद्वैत आश्रम मठ की एक शाखा है।यह आश्रम एक गुरुकुल एक चैरिटेबल हॉस्पिटल और एक पुस्तकालय भी चलाती है।

यहाँ संध्या के करीब सात बजे हम पहुंचे। रिमझिम बारिश अभी हो ही रही थी। एक दम शांत परिवेश, चारों ओर सन्नाटा । जंगल के मध्य में बंगलेनुमा कुछ स्वतंत्र गेस्ट हाउस  बने हैं[ विशेष रूप से विदेशियों के लिए] , जहां उस दिन हमारे सिवा और कोई नहीं था। एक पल के लिए लगा मेरे पतिदेव ने यह कौन सा स्थान निर्धारित किया है रहने का, भय होना स्वाभाविक था। इनके कहने पर हमारा ड्राईवर भी वही एक कौटेज में ठहरा। थोड़ी जान में जान आई थी। घुप्प अंधेरा, भांति भांति के जीव जंतुओं की आवाजें और अंजान जगह की पहली रात। मोबाईल टॉर्च की रोशनी में हम आगे बढ़ते गए, आगे, कुछ दूर का एक दरवाजा खटखटाया। भीतर से वर्गाकार वह गुरुकुल था, छात्र गण अपने भोजन की तैयारी में लगे थे। भाषा की समस्या थी। हाँ उनमें से एक, आगे बढ़कर हमें दूसरे गेस्ट हाउस और केंटीन का मार्ग दिखाया था।

बड़े बड़े ऊंचे वृक्षों के बीच रात और भी गहरा गई थी। भोजन करने के लिए मिशन के दो चार और भी साधक, स्वामीजी लोग थे। बड़ा सा बरामदा पार कर किचन ;पता नहीं किस युग का, किसी पुराने विशाल घर का हिस्सा हो। छात्रों, अध्यापकों के रहने के लिए ढेर सारे कमरे। कुछ दूर चलकर पीछे के दरवाजे से, राम कृष्ण मंदिर, बाहर छोटी सी रोशनी। लाईट अभी भी कटी हुई थी।

वापस हम अपने कौटेज की ओर जा रहे थे। भांति भांति की वही डरावनी आवाजें  पता नहीं किधर से कौन सा जहरीला जन्तु निकल जाए। अब बारिश की बौछार और भी तेज होकर जंगल के पेड़ पौधों के साथ भीषण जुगल बंदी करने लगी थी। जैसे तैसे हम अपने कमरे के दरवाजे तक पहुंचे। वहाँ कैंटीन में केयर टेकर ने बताया था, माचिस और मोमबत्ती कमरे के दूसरे अलमारी के बगल वाले टेबल पर रखी है। हमारे आने से कुछ बाद तक बिजली थी। हम अंदाज से वहाँ पहुँचने की सोच रहे थे, मगर इसी बीच ड्राईवर ने इनसे कुछ बात करने के लिए आवाज दी और ये रुक गए थे। इनका मोबाईल इन्हीं के पास । मैं, कुछ कुछ हिम्मत कर भीतर आकर घुप्प अंधेरे में माचिस और मोमबत्ती टटोल रही थी, और मनही मन बुदबुदा रही थी, वहाँ मंदिर परिसर में ही रुक जाते तो कितना अच्छा था, काफी लोग रुके थे वहाँ, और काफी कमरे भी खाली थे, अच्छी व्यवस्था है। आखिर माचिस मिली और बत्ती जल गई। मैं सोचती रही आज के जमाने में जब कि विकास के चरम सीमा पर खड़ी दुनिया करतल ध्वनि कर रही है, केरल का यह गाँव, भयानक अंधकार, अपरिचित,रोम रोम कंपाने वाला सन्नाटा,जीव जन्तु, पता नहीं, आठवीं सदी में यह क्या रही होगी। कैसे रहे होंगे लोग यहाँ। बिस्तर के ऊपर किसी तरह मच्छड़ दानी टाँगी और, पूरे दिन के थके, पता नहीं कब सो गए थे। सुबह यहाँ से निकल एरनाकुलम जाना था। जब उन्हीं भांति भांति की आवाजों सोर गुल के बीच सुबह नींद खुली, तो कमरे के बाहर जाकर देखा, उफ क्या नजारा था। क्या सुहानी आध्यात्मिक भोर थी। मन ने मुसकुराते हुए कहा था  वास्तव में शंकर यहीं उत्पन्न हुए होंगे।

॥ कामिनी कामायनी ॥

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