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'पतित अंधकार' - कविताएँ - ओम प्रकाश अत्रि

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१. कविता- 'पतित अंधकार'

जिस तरह
उल्लू ,
चमगादड़ को
पसन्द है अंधेरा ,
दिन के
प्रकाश से
डरता है बेचारा ।
उसी तरह
पूंजीपति
प्रजातंत्र युग में
उजाले से भयभीत ,
आंखों में
धूल झोंककर
अंधकार का
सुख भोग रहा ।
निगलता है
प्रकाश को
देश की खुशहाली को ,
औनीचता के
काले अंधेरे में
उड़-उड़कर
आनन्द ले रहा।
खुले
आकाश में
जुगनू की तरह
टिमटिमाते श्रमिक जन ,
अंधकार में
चमगादड़ रूपी
पूंजीपति का ग्रास बन रहा ।
उड़ जाते हैं
पंख पखेरू
खद्योत रूपी श्रमिकों के ,
जब
पूंजी के बल पर
पूंजीपति
झपट्टा मार रहा ।
छिपता है
सुविज्ञ
सुविचार के उजाले में ,
अभद्रता के
पतित अंधियारे में
सियासत की आंड़ में
सिर चढ़कर बोल रहा ।

२. कविता-' भिखारी '

जी रहा था
असहाय
पशुवत ज़िंदगी ,
घिर रहा था
जीवन में
मुफ़लिसी के जाल में ।
नहीं
मिटती थी
जठराग्नि ,
सड़कों
हाटों
बस-अड्डों
रेलवे स्टेशनों पर
भीख मांगने से ।
बगल में
झोली लटकाए
हाथ में
कटोरा लिए,
फटे-चिटे वस्त्रों में
अर्धनग्न
दर-दर भटक रहा था ।
नहीं
तरस खाते
आते-जाते लोग,
अनदेखा कर
चले जाते
दरिद्रता को देखकर।
भुखमरी की
उल्का
गिर रही थी
उसके
जर्जर बदन पर,
झर रही थी
भिखारी की
दारुण व्यथा
उसके
आँसुओं से।
गिन
रहा था
कब्र में पैर लटकाए
जीवन के
अन्तिम दिनों को,
होटलों पर
बची जूठन से
जीविका चला रहा था।
जब तक
रही थी
उसके हाथों में
काम करने की शक्ति ,
तब-तक
उससे बेगार
कराया जा रहा था ।
जब
क्षीण हो गया
पौरुष
चली गयी
आँखों की ज्योति ,
तब उसे
दुत्कार कर
भगा दिया गया था ।
सारी
कमाई हड़पकर,
छोड़
दिया गया था
भीख मांगने को
उसे
भिखारी बनाकर ।

३. कविता-- 'भिखारिन'

नहीं
चाहती थी
भिखारिन ,
अपने
बच्चों को
भिखारी बनाना ।
लड़
रही थी
गरीबी से,
पर
बच्चों का
चाहती थी
जीवन संवारना ।
लाचारी थी
बस
इस बात की
कि
लंपट सौहर से
हार वह गयी थी ।
नहीं
मांगता था
वह भीख,
सिर्फ वह
बैठकर
धौंस जामाता था ।
जिस दिन
नहीं
मिलती थी भीख ,
उस दिन
पत्नी को
पीटकर
खूब गरियाता था ।
हार
गयी थी
वह
पति के पतित से ,
टूट गए थे
सपने
बच्चों को
भूख से मरजाने से ।
एक मात्र
इच्छा थी
वह भी
काल कवलित हो गयी थी ,
भीख
मांग-मांग कर
वह
टूट सी गयी थी ।
बेंच
दिया गया था
उसे
देंह के बाजार में,
मिल
गया था
उसे
जीते-जी
पतिव्रता का फल ।
निराधार
हो गया था
उसका जीवन ,
न ही
कोई
आगे का
रास्ता दिख रहा था ।
नहीं
रह गयी थी
अब
कोई इच्छा ,
इसी लिए
जाकर
ट्रेन की पटरी पर
मौत की शरण ली ।

४. कविता-  'शत्रु'

यार
मित्रों की तरह
होती हैं
शत्रुओं की
कोटियाँ भी,
बदलते हैं
मित्रों की भांति
गिरगिट की तरह
रंग शत्रु भी ।
नहीं
बदला है
पुरातन से
शत्रुता में कुछ भी,
बल्कि
ह्रास की जगह
हुई है
वृद्धि उसमें भी ।
है वह
पहला शत्रु ,
जो
मुँह पर
मीठे बोल बोलकर
पीठ पीछे
निंदा करता है ।
दूजा
करता है
पीठ पीछे
बड़ाई प्रशंसा ,
प्रत्यक्ष होने पर
कटु व्यवहार करता है ।
तीसरा
प्रत्यक्ष हो
या
अप्रत्यक्ष  ,
वह
दोनों ही रूपों में
प्राणघातक होता है।
वह
खुलेआम
शत्रु से
शत्रुता करता है,
हमेशा
सीधा घात करने को
मंत्रणा बनाता है ।
चौथा शत्रु
वह है,
जो
अपने ही घर में
अपने ही
आत्मीय से
बैर कर बैठता है ।
स्वार्थ के
वशीभूत होकर,
अपने ही
जन्मदाता को
शत्रु मान लेता है ।
चूसता
रहता है
जीवन पर्यन्त ,
रक्त वह
अपने
बन्धु बान्धवों का ।
आज भी
घरों में
बैठा है सुयोधन ,
जो
किसी
शकुनि के
बहकावे में चल रहा है ।

५. कविता- 'सुन्दर अंग'

कितनी
खूबियां थी ,
उसके
हरेक अंग में ।
चलती थी
ऐसे,
कि
लजा जाती थी
सिंहनी की
चाल भी ।
लालिमा
युक्त
अधरों से,
मानो
मधुरस
टपक रहा हो ।
उसकी
हँसी पर
हजारों
खिलती
कलियों की
छवि
फीकी पड़ जाती थी।
गोरे-गोरे
मुख पर
दीप मण्डल
जगमगाता ,
उठे हुए
यौवन पर
काम भी फिसल जाता ।
बड़ी
मोहक थी,
नोंकदार ठुड्डी
और
पलती
दुबली कमर ।
बड़ी-बड़ी
मृगनयनी आँखे,
कमल की
पंखुड़ी की तरह
लग रही थी।
उड़ रही थी
ओढ़नी
वक्ष पर ,
पैरों में
पड़ी पायल
झंकार कर रही थी ।
नागिन की तरह
लहराते थे
काले-काले बाल,
बिल्कुल
स्वर्ग की
कोई
अप्सरा लग रही थी।


- ओम प्रकाश अत्रि
शिक्षा - नेट/जेआरएफ(हिन्दी प्रतिष्ठा ),शोध छात्र विश्व भारती शान्तिनिकेतन (प.बंगाल )
पता- ग्राम -गुलालपुरवा,पोस्ट-बहादुरगंज, जिला- सीतापुर (उत्तर प्रदेश)
ईमेल आईडी- opji2018@gmail.com

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