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'देवेन्द्र कुमार पाठक' की बावन चौपाइयाँ


बदल रही हैं दिशा हवायें,
साथ चलें या अड़-लड़ जाएँ.

अंधराष्ट्रवादी हुललायें,
रामनाम का शोर मचायें.

जनता तरस रही पानी को,
फ़िकर न राजा-रजधानी को.

ध्येय है युद्धोन्माद जगाना,
बुनियादी सवाल टरकाना.

शस्त्र जुटाएँ समर हम जीतें,
पिटे हुये को फिर से पीटें.

मंहगाई अब कमरतोड़ है,
बाज़ारों में मची होड़ है.

अब है राममन्दिर बनवाना,
अब न कोई सवाल उठाना.

    व्यर्थ न अर्थ भावार्थ निकालो,
शब्दकोश पर माटी डालो.

वही,मंत्र ताबीज और गंडे.
नये चलन के चेले-पण्डे.

अंधों में एक काना राजा;
बेसुर बजा रहा है बाजा.

बिल्ली सौ-सौ चूहे हजमकर,;
हज़ पर जाय उतर कर सागर.

वे ही धनुष,तीर हैं तरकश;
जोकर वही नया है सरकस.

बढ़-चढ़ रही रोज़ बेकारी;
जनता है विपदा की मारी.


लफ़्फ़ाजों की ये हुनरमन्दियाँ;
अवसरवादी मिलाप-संधियाँ;

पानी खोज रहे हैं प्यासे;
राहत देने के  सौ झांसे.

अभी जीत की ख़ुशी मनाओ;
नाम जपो औ कीर्तन गाओ.

और न कोई तारणहारा;
जपते रहना नाम हमारा;


तुम न कोई सवाल उठाना.
क्या खोना है क्या है पाना..

सबके सपने सच कर देंगे;
रुपयों से खाते भर देंगे.

भारत माता की जय बोलो;
गौरव-कथा पुरानी खोलो.

वहाँ ज्ञान है संचित सारा;
वही कर सके भला हमारा.

पुरखों का गौरव था खोया;
दशकों पाप वाम के ढोया.

देशप्रेम ऐसा फैलेगा;
हमसे हर कोई दहलेगा.

जो बोलेगा वन्दे मातरम् ;
उस पर कृपा बरसती हरदम.

गंगा,गोधन,खादी गांधी;
राष्ट्रवाद की अलख जगादी.

रामलला का सबल सहारा;
उनके दम पर सब निर्वारा.

बोल रहे हैं वे अब बढ़-चढ़ ;
नया ककहरा खूब लिया पढ़.

जनमत  हमने हथियाया है;
जुगत-जुगाड़ों की माया है.

पांच साल कर अविचल शासन;
घरघुसुओं का करो निष्कासन.

मोटे धनपशु अति हरषाये;
अपने एजेंडे पर आये.

हड़पो,गड़पो इनका धनदा;
पूंजी का यह खेल है अँधा.

लाखों पेड़ काट हैं डाले;
फोर लेन की सड़क बनाले.

उनको है बाजार बढ़ाना,
बाज़ारों से लाभ कमाना.

छीनेंगे खेती की धरती ;
भूख-प्यास जो सबकी हरती.

खाये-पिये न कभी अघाये;
कुंभकरण के वंशज आये.

अगुये बने गोडसेवादी;
सांसद होइ पहुँचे उन्मादी.

अब विकास  का नया अजेंडा;
भर दे धनपतियों का हंडा.

जबरन अपनी ही  मनवाओ;
सबै विरोधी को लतियाओ. 

चिंता न खेतिहर खेती की;
न ही  निर्वस्त्रा नदी-रेती की.

मुफतखोर कर दो जन-जन को,
आवारा कर दो गोधन को.

लो मुआवजा मरे-अधमरे,
मौज करें जो अंधरे -बहरे.

पता नहीं बीछी का मंतर,
झांके सर्प की बाँवी भीतर.

बरस दिवस बारह मनबतियाँ;
सुने न जन के दुःख-दुर्गतियाँ.

बेच-बेच सरकारी सेक्टर.
भर दो पूंजीपतियों के घर.

कोई बड़ी लकीर न खींचे;
अपने से ही  हारे-हीचे.

देश-धर्म सब कोई निभावा;
और विकल्प न कोई सुहावा.

जनमत से कद में सब कमतर;
हिटलर हो या कोई सिकन्दर.

जड़ है कितनी गहरी किसकी;
धरती पैठ जानती सबकी.

किसकी है कितनी ऊँचाई;
नभ को सब दे रहा दिखाई.


आखिरी जन का लक्ष्य भुलाया;
धनपतियों पर धन बरसाया.


श्रम को अगर सम्मान न मिलता.
राम नहीं रहमान न मिलता.

  जीवन का जो धरम न जाने;
वह क्या ईश्वर को पहचाने.


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