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केदारनाथ (कहानी) सुशील शर्मा

सुशील कुमार शर्मा

ब्रजेश बहुत खुश था आज उसने हरिद्वार के लिए रिजर्वेशन करवा लिया था 10 जून को हरिद्वार पहुँच कर फिर वहां से केदारनाथ की यात्रा शुरू करना थी ।

उसकी पत्नी सविता ,माँ मनोरमा, पिता मनोहर एवं पुत्र मयूर और पुत्री सौम्या सभी बहुत उत्सुक थे। ब्रजेश की माँ मनोरमा का उत्साह तो देखते ही बनता था ,वह अपने पति से कह रही थी

"भगवान भोले नाथ की कृपा हो गई इस उम्र में केदारनाथ जाने का सौभाग्य मिल रहा है ,मेरे बेटे ने मेरी मनोकामना पूरी कर दी। "

'सच मनोरमा मेरी भी बहुत इच्छा थी भगवान केदारनाथ के दर्शन की "मनोहर ने पत्नी की और मुस्कुराकर कहा।

"बहु सारी  पेकिंग अच्छे से कर लेना और थोड़े गर्म कपडे जरूर रख लेना केदारनाथ में ठण्ड रहती है "मनोरमा ने सविता से कहा।

"जी अम्मा मैंने सारी तैयारी  कर ली है और एक बार आप देख लो "सविता ने मुस्कुरा कर मनोरमा से कहा।

निर्धारित दिन को सभी ट्रैन से हरिद्वार पहुँच गए ,मौसम बहुत खराब हो रहा था ,ग्यारह और बारह जून को हरिद्वार के सभी दर्शनीय स्थलों का भ्रमण करके केदारनाथ जाने का प्लान बनाया वहां के स्थनीय गाइड ने मना किया

'देखिये साहब यात्रा केंसिल कर दीजिये मौसम बहुत खराब है "

"अरे नहीं हम लोग इतनी दूर से आये हैं बगैर केदारनाथ के दर्शन के कैसे वापिस होंगे "मनोरमा के स्वर में भक्ति की हट स्पष्ट झलक रही थी।

"ऐसा मौसम तो यहाँ अक्सर रहता है,आप लोग जा सकते हैं लेकिन सावधान रहिये " होटल वाले ने थोड़ी हिम्मत दी।

"ठीक है जो होगा देखा जायेगा 'मनोहर ने ब्रजेश से कहा।

ब्रजेश ने  प्रश्नवाचक दृष्टी से सविता को देखा।

"पापा वापिस चलते हैं ऐसे मौसम में जाना ठीक नहीं है "मयूर ने विरोध किया।

"अरे कैसा लड़का है रे तू डरपोक मैं बगैर केदारनाथ के दर्शन किये नहीं जाऊँगी। " मनोरमा ने गुस्से से मयूर को देखा।

माँ बाप की इच्छा को देख कर ब्रजेश ने अंततः केदारनाथ जाने का निर्णय ले लिया।

गौरीकुंड से केदारनाथ धाम तक की 18 किमी पैदल यात्रा पूरी करनी थी इसलिए अगले दिन तड़के रुद्रप्रयाग से गौरीकुंड के लिए गाड़ी से रवाना हो गए । ढाई घंटे सफर के बाद ब्रजेश की गाड़ी  गौरीकुंड पहुंची। यहां खासी चहल-पहल नजर आई। पार्किंग पर गाड़ियों का जमावड़ा था। बड़ी संख्या में श्रद्धालु यात्रा शुरू करने की तैयारी में जुटे थे। कोई घोड़े-खच्चर वालों से बात कर रहा था तो कोई अपना सामान लाद रहा था। कुछ डंडी-कंडी वाले भी यात्रियों को लादकर ले जाने की तैयारी में जुटे तो कुछ रवाना हो रहे थे। दुकानों पर भीड़ थी, लोग खाने-पीने के साथ जरूरी सामान भी खरीद रहे थे। सुबह नौ बजे गौरीकुंड से पैदल यात्रा शुरू की। गौरीकुंड से जंगलचट्टी चार किलोमीटर है। उसके बाद रामबाड़ा जगह पड़ती है। फिर अगला पड़ाव पड़ता है लिनचौली। गौरीकुण्ड से यह जगह 11 किलोमीटर दूर है। लिनचौली से सात किलोमीटर की पैदल दूरी तय करके टीम शाम छह बजे केदारनाथ धाम पहुंची। यहां उस समय हल्की बारिश हो रही थी।

जैसे तैसे डरते हुए भगवान शिव का नाम रटते हुए सभी केदारनाथ पहुंचे वहां पर बहुत भीड़ थी जैसे तैसे एक होटल में जगह मिली बारिश  ने जोर पकड़ लिया था लेकिन भक्तों के उत्साह में कोई कमी नहीं थी।

"तुम्हें डर तो नहीं लग रहा ?"मनोरमा ने मनोहर से पुछा।

"नहीं साक्षात् शिव के धाम में डर कैसा ?" मनोहर ने मुस्कुराते हुए जबाब दिया।

बारिश ने रौद्र रूप ले लिया अचानक चरों और से भगदड़ मच गई ब्रजेश ने पता किया की पास की मन्दाकिनी नदी में बहुत जोर का जलजला आया है और केदारनाथ में पानी भरना शुरू हो गया था सविता और बच्चों के चेहरे रुंआसे से हो गए।

"देखो सविता अब घबराने से कुछ नहीं होगा यहाँ हज़ारों लोग हैं जो उनका होगा वही हमारा होगा धर्य से काम लो "ब्रजेश ने परिवार को ढाढ़स बंधाया।

"हे भोलेनाथ तू ये क्या कर रहा है हम तो तेरे दर्शनों के लिए आये हैं और तेरे रहते हुए हमारे प्राणों पर संकट "मनोहर ने ईश्वर से प्रार्थना शुरू कर दी।

केदारनाथ में मौजूद हर शख्स सुबह से ही डरा हुआ था। बरसात पिछले 3 दिन से रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। इस इलाके में कई सालों से रह रहे लोगों ने भी आसमान से इतना पानी एक साथ बरसते कभी नहीं देखा था। लगातार हो रही बरसात का असर अब दिखने लगा था। 16 तारीख की सुबह भैंरोनाथ के मंदिर वाली पहाड़ी टूटने लगी। वहां से भूस्खलन शुरू हो गया और केदारनाथ से भैंरो मंदिर जाने वाला मार्ग बंद हो गया।

अंधेरा हो चुका था। पूरे इलाके में बत्ती गुल हो गई थी। बिजली के लिए लगा पावर हाउस फेल हो गया था। कुछ स्थानीय लोगों ने जेनरेटर ऑन किए, लेकिन बुरी तरह से डरे लोगों में भरोसा पैदा करने के लिए ये रोशनी काफी नहीं थी। बहुत सारे लोग तो डर कर पहले ही जंगल की ओर भाग गए थे और बहुत से और लोग भी यहां से जाना चाहते थे, लेकिन अंधेरे में चलना सभी तीर्थयात्रियों के लिए संभव नहीं था। उनमें से कई कमज़ोर थे, कई बुज़ुर्ग थे और कई लोगों के पास छोटे-छोटे बच्चे थे। ये सारे लोग कैसे जंगल के रास्ते निकलते खासतौर से तब जब उन्हें इस इलाके का अता पता ना हो और पहाड़ टूटकर गिर रहा हो।

होटल में ठहरे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने को कहा गया था। उसी होटल में ब्रजेश सपरिवार रुका हुआ था। खबर सुनते ही वह सब वहां  से निकले। होटल के बाहर बाढ़ आ चुकी थी सविता और ब्रजेश बच्चों का हाथ पकडे  सुरक्षित स्थान की तलाश में निकले उनके पीछे मनोरमा और मनोहर चल रहे थे। अचानक पानी और मलबे का बहाव उनकी तरफ आया सविता ने ब्रजेश और अपने बच्चों का  का हाथ कसकर पकड़ लिया।मुद कर देखा तो मनोरमा और मनोहर मलबे के संग बह रहे थे।

माँ माँ कहते हुए ब्रजेश मनोरमा और मनोहर की ओर दौड़ा मनोहर ने चिल्ला कर कहा "ब्रजेश इधर मत आओ बहु और बच्चों को बचाओ। "

देखते ही देखते मनोहर और मनोरमा उस मलबे के सैलाब में बह गए।

ब्रजेश सविता और बच्चे चीख रहे थे क्योंकि मलबा का सैलाब उनकी ओर  ही आ रहा था अचानक ब्रजेश को  किसी ने शक्ति दी उसने सविता और बच्चों को लेकर केदारनाथ के मंदिर की ओर  दौड़ लगा दी।  आगे आगे बच्चे उसके पीछे सविता और सबसे पीछे ब्रजेश और उनके पीछे मलबे का सैलाब, सैकड़ों  लोगों को निगलता हुआ वह सैलाब केदारनाथ के मंदिर की और बढ़ रहा था। सविता ,ब्रजेश और बच्चे पूरा दम लगाकर मंदिर की और भाग रहे थे। उन्हें लग रहा था की अब सिर्फ केदारनाथ ही उनकी रक्षा कर सकते हैं अचानक मंदिर और सैलाब के बीच एक बड़ी चट्टान आ गई और सैलाब दूसरी और मुड़ गया।एक बड़ा सैलाब मंदिर के पीछे से आया। लगा कि मंदाकिनी सब कुछ निगल रही है। मलबे के साथ चट्टाननुमा पत्थर लुढ़क कर आने लगे। लोगों ने फिर से इधर-उधर भागना शुरू कर दिया। पानी कई लोगों को बहा ले गया और कई लोगों को बड़े-बड़े भीमकाय पत्थरों ने कुचल दिया। ब्रजेश ,सविता और बच्चे सुरक्षित मंदिर प्रांगण में पहुँच चुके थे। चारों आपस में लिपट कर रोने लगे। चारों एक सुरक्षित कौन में खड़े थे और केदारनाथ की विनाश लीला देख रहे थे। 16 तारीख की कालरात्रि तो गुजर गई, लेकिन अगली सुबह और भी भयानक साबित हुई। एक के बाद एक इमारतों को पानी में डूबते देखा। ब्रजेश जिस होटल में रुका था वह  होटल सामने नदी में बह गया।

ब्रजेश और सविता ने केदारनाथ की  पूजा पाठ करना और मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया, वो और वहां पर जितने लोग थे सभी ने  भगवान शिव की अर्चना की सभी एक दूसरे को ढाढ़स बंधा रहे थे  कुछ ऐसे भी थे जो ये कहकर मन को समझा रहे थे कि अगर मर गए तो ये मौत केदारनाथ के दरवाज़े पर होगी और मोक्ष मिलेगा।

सभी लोग करीब  6 दिन तक वहीं फंसे रहे। भूखे प्यासे , सरकार की तरफ से सुबह शाम नाश्ता और खाना मिलता था। कई बार लगा की शायद घर न पहुंच पाएं। साथ के कई यात्री बहुत डर गए थे, बस भगवान का स्मरण करते रहे। अचानक ब्रजेश ने देखा की ऊपर सेना का हेलीकाप्टर मंडरा रहा है और वो लोग इशारा कर रहे थे अचानक हेलीकाप्टर बहुत नीचे आया और उसमें से सीढ़ी निकली ब्रजेश ने सबसे पहले बच्चों को फिर सविता को हेलीकाप्टर में चढ़ाया और अंत में स्वयं सीढ़ी से ऊपर पहुंचा ।

हेलीकाप्टर जब ऊपर जा रहा था तो उसकी आँखों में आँसू की अविरल धारा अपने माँ बाबूजी के लिए बह रही थी।

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