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और सवाल चल पड़ा (बसा)...................... डॉ. आभा संजीव सिंह

और सवाल चल पड़ा (बसा)......................

डॉ. आभा संजीव सिंह

सहायक आचार्य एवं विभाग प्रमुख

(हिन्दी विभाग)

वी.एम.वी. कॉमर्स, जे.एम.टी. आर्ट्स एवं

जे.जे.पी. साइन्स कॉलेज, वर्धमान अगर,

नागपुर (महाराष्ट्र), भारत

पूरा का पूरा अखबार देख लिया, कोई विज्ञापन, कोई समाचार, कोई विकल्प-संकल्प कुछ नहीं छोड़ा सब देख लिया यहां तक की गुमशुदा की तलाश जैसे आशाधारी कोने का कोना- कोना चाट (जी हां इस तरह तो अखबार पढ़ा नहीं जाता चाटाही जाता है) लिया पर मुझे ‘सवाल’का कोई पता नहीं चला । आश्चर्य हुआ कि इतने दिनों से सवाल कहीं दिख नहीं रहा फिर भी किसी को उसकी फिक्र नहीं है कि आखिर सवाल गया तो गया कहां । मन में संदेह हुआ कि कहीं उसका पाला भाषा से तो नहीं हो गया और अपने हाल पर वह बेहाल हो गया ।

अरे पहचाना नहीं ? सवाल याने वही अपना प्रश्न जिसे करने पर अध्यापक महोदय बुद्धिमान कहा करते थे ....जी हां पहचान गए .....वही बड़े दिनों से लापता है । मुझे लगता है उसने जरूर कहते सुन लिया होगा कि ‘सोलह आने का सवाल है ‘अब भला बताइए कि सवाल को सोलह आने की कीमत किसने अदा की ,कहीं तभी से तो यह परंपरा नहीं बन गई की सवाल की कीमत अदा की जाए । अब भला बिके हुए सवाल का कोई क्यों जवाब दें तो हो गया न सवाल का हश्र बुरा।

इतना ही नहीं कभी कभी लाजवाब ने भी सवाल के प्राण हर लिए , कैसे ......भई जिसका कोई जवाब ही ना हो उस सवाल को कोई पुझे ही क्यों ,और हो गया सवाल निरस्त । बात इतने पर ही रुकती तब तो कुछ गुंजाइश भी थी पर मैंने अपने एक पड़ोसी के मुख से कई बार झड़ते हुए सुना कि –सवाल ही नहीं उठता ,सवाल ही नहीं उठता (जी हां यह एक बार में नहीं कहते इसे दोहराना होता है) । जरूर यह बात सवाल ने भी सुन ली होगी और मान लिया होगा की वह विकलांग है ,उसे खड़े होना आता ही नहीं ,और वह बैठा ही रहा कभी उठा ही नहीं ।

सिलसिला यहीं खत्म हो जाता तब भी कोई जवाब होता पर बिचारे सवाल ने यह तो पक्का सुन ही लिया होगा कि कहा तो यह भी जाता है की, बेवजह क्यों सवाल करे‘ । अपने होने की कोई वजह ना देखकर चल पड़ा होगा वह भी कहीं झोला उठाकर तभी तो इन दिनों कहीं दिखाई नहीं दे रहा है ......सवाल ............आपको कहीं मिला या दिखा तो नहीं ।

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