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भूख और योग (लघुकथा) - -सुरेश सौरभ

भूख और योग (लघुकथा)

    सुबह का वक्त था। कुछ लोग पार्क में हा हा हा हूं हूं करते हुए कलाबाजी कर रहे थे। जब उनकी कलाबाजी खत्म हुई और तब सब चल पड़ें तभी एक भिखारी उनसे टकरा गया और वह मुंह फाड़कर कातर स्वर में बोला- बाबू लोगों बहुत भूखा हूं। बहुत देर से आप लोगों की कलाबाजी देख रहा था। सोच रहा था, जब कलाबाजी आप लोगों की खत्म हो, तब मैं आप  लोगों से कुछ  मांगूं।

      तब सब बाबू लोग हंसते हुए बोले-अरे! भाई हम लोग अपना स्वास्थ्य सही करने के लिए यहां योगा करने आए थे, यहां पैसे की क्या जरूरत है इसलिए हम लोग  पैसे नहीं लाए।

     तब वह भिखारी आंखों में आंसू भरकर बोला-बाबू लोगों आप लोग बहुत पढ़े लिखे हैं। मैं गरीब अनपढ़ जाहिल हूं। मैं आप लोगों से ये पूछना चाहता हूं कि गरीब लोगों की भूख के लिए कोई  योगा है।

  अब सब खाए-अघाए योगा वाले जीव एक-दूसरे का मुंह ताक रहे थे।

     -सुरेश सौरभ

-निर्मल नगर लखीमपुर-खीरी

पिन-262701


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