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कहानी - बटेसर की चक्की - आशा शैली

‘‘कहाँ उतरिएगा? टिकट...? कण्डेक्टर के बात पूरी करने से पहले ही सुमित्रा ने एक रुपये का सिक्का उसकी ओर बढ़ा दिया।’’

‘‘मुझे पुलिया के पास उतार देना, चक्की पर।’’

‘‘वो...ऽ...ऽ...? अरे बहन जी, बटेसर की चक्की कहो न? एक रुपया और दो।’’

सुमित्रा दो साल बाद इधर आई थी। माँ के खत से उसे यह भी पता चला था कि चक्की बिक चुकी है इसीलिए उसने पुलिया वाली चक्की कहा था। यूँ भी लम्बे सफ़र के बाद उसका सिर घूम सा रहा था पर यहाँ आ कर उसे लोकल बस तो लेनी ही थी। घर तक जाने का और तो कोई साधन ही नहीं था, न कोई रिक्शा न थ्री व्हीलर न कोई और साधन। मजबूरी में लोकल बस ही लेनी पड़ती थी। दुनिया बदल गई पर इस कस्बे के लोग अभी तक वहीं के वहीं पड़े हैं। इतनी ही गनीमत थी कि सड़क पक्की हो गई थी।

‘हूँ! तो किराया भी दुगना हो गया है।’ सोचा उसने। फिर पर्स से चुपके से निकाल कर एक रुपया और कण्डेक्टर को दे दिया।

माँ का खत मिलते ही वह अम्बाला से चल पड़ी थी। अम्बाला उसका बड़ा बेटा तरुण बैंक में कार्यरत था।

पिता की मृत्यु के बाद जाने क्यों सुमित्रा ने इस छोटे से कस्बे के कई चक्कर लगा लिये थे। चक्की की चर्चा पर उसने माँ को लिखा भी था कि उन्होंने गलत कर दिया है’’ किन्तु माँ भी विवश थी सो....।

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बस एक झटके से रुकी। सुमित्रा विचारों में इतना खो गई थी कि उसे कण्डक्टर की सीटी भी सुनाई न दी, चक्की आ गई।

बस को रुकता देख दोनों भाभियाँ बाहर निकल आईं। उन्होंने बस से सुमित्रा को उतरते देख लिया था। घर के सामने ही खुले आँगन में एक ओर बान की चारपाई पर बैठी माँ ने हाथ में पकड़ी गोभी और छुरी एक तरफ़ रख दी और हाथ से नाक पर झुक आई ऐनक को सही किया। फिर तीनों ही आगे बढ़ आईं। भाभियों ने पाँव छुये, माँ गले मिली और फिर साथ ही बिछी बान की दूसरी खटिया पर सब जम गये। चाय आदि के दौर से निबट कर भाभियाँ अपने-अपने काम में लग गईं तो सुमित्रा टहलते-टहलते माँ को साथ लेकर चक्की की ओर जा निकली।

‘‘माँ! आखिर तुमने चक्की बेची क्यों? यही तो तुम्हारा सहारा थी। चार पैसे हाथ में रहने पर सब ही तो तुम्हें पूछते।’’

‘‘ठीक कहती हो बेटी, लेकिन एक बात भूलती हो।’’ सुमित्रा प्रश्नवाचक दृष्टि से माँ को देखने लगी।

‘‘उमर!’’ माँ का स्वर बेहद ठंडा था।’’ जब उमर बढ़ जाए तो सहारे की आवश्यकता होती है। पैसा दे कर मर्द तो होटल में खा सकता है, कपड़े धोबी से धुला सकता है, लेकिन औरत वह भी नहीं कर सकती, उसे तो उसके लिए भी सहारा चाहिए।’’ माँ ने ठण्डी साँस ली, ‘‘वक्त ही ऐसा आ गया है? एक बेटा चाहता था कि चक्की उसे दे दूँ, तो दूसरा चाहता उसे, तंग आकर बेच ही दी। रोज-रोज का झगड़ा भी तो नहीं न झेला जा सकता। झगड़े से भी तंग आ चुकी थी।

‘‘और पैसा.........?

‘‘वह बाँट दिया दोनों को।’’

‘‘फिर....अब क्या परेशानी है?’’

‘‘फिर? परेशानी यह है कि अब इनके पास रोटी नहीं है मेरे लिए। कहते हैं पैसे तो खतम हो गये। छोटा कहता है बड़े के पास जाकर रहूँ और बड़ा कहता है, छोटे के पास।’’

‘‘तुम क्या चाहती हो?’’

‘‘मैं क्या चाहूँगी अब? अब तो दो रोटी आराम से मिल जाएँ वही बहुत है।’’

‘‘हूँ! चक्की किसे बेची है?’’

‘‘तुम नहीं जानती उसे, नया है शहर में वह।’’ बातों ही बातों में दोनों को पता ही नहीं चला कब वे चक्की के सामने पहुंच गई थीं।

‘‘देखो माँ? पिता जी कितने भले लगते थे, यहाँ बैठे हुए।’’ अनायास ही सुमित्रा की नज़र उस ओर उठी जहाँ एक बड़े से मूढ़े पर उसके पिता बटेसर बैठा करते थे। आज उस मूढ़े पर एक मोटे से आदमी को बैठा देख कर सुमित्रा को न जाने क्या सूझी कि वह माँ के पुकारते रहने पर भी उधर को झपटी। तब तक उस मोटे आदमी को भी खबर लग चुकी थी कि बटेसर सेठ की बड़ी बेटी आई है, पर उसे यह पता नहीं था कि वह इस तरह इधर आ धमकेगी।

‘‘नमस्ते दीदी!’’ उसे देख वह एकदम हकबका कर खड़ा हो गया।

‘‘हूँ। तो तुमने खरीदी है यह चक्की क्यों?’’

‘‘जी दीदी!’’ उसे परिस्थिति समझने में उलझन हो रही थी। सुमित्रा का पूरा चेहरा सुर्ख लाल हो गया था।

‘‘सुनो! तुम्हें क्या चक्की के साथ यह मूढ़ा भी बेचा गया है?’’

‘‘नहीं तो!’’ वह हक्का-बक्का सुमित्रा का मुँह तक रहा था।

‘‘फिर हटो यहाँ से।’’ और सुमित्रा ने झपटकर मूढ़ा उठा लिया। मूढ़े को बरामदे में रखकर वह फर्श पर बैठ गई और सिर उस पर रख कर फूट-फूट कर रो पड़ी। रोती रही-रोती रही। दोनों भाभियाँ दूर खड़ी तमाशा देख रहीं थीं, उन्हें निकट आने का साहस नहीं हुआ। मोटे आदमी की आँखें भी भीग गईं। सुमित्रा को लगा जैसे उसके पिता का वात्सल्य भरा हाथ उसके सर को सहला रहा हो। माँ ने दुपट्टे से आँखें पोंछ मोटे शीशे वाली ऐनक को फिर से आँखों पर जमा लिया।

‘‘दीदी........,’’ सुमित्रा ने सिर उठाया तो वह पास ही खड़ा था। उसने सिर को फिर से मूढ़े पर रख दिया, और सुबकती रही।

‘‘उठिए दीदी। अब मैं कभी इस पर नहीं बैठूँगा। मुझे आज समझ में आया, बेटी कैसे हमेशा बेटी ही रहती है।

चुपचाप उठ कर सुमित्रा अन्दर चली गई। उसे कुछ भी कहने की हिम्मत किसी की न थी। बस औंधी पड़ी बेटी की पीठ को उसकी माँ सहलाती रही।

रात देर तक माँ बेटी बतियाती रहीं। अधिकतर माँ ही बोल रही थी, सुमित्रा तो बस हूँ, हाँ या एकाध छोटा सा प्रश्न दाग देती। अचानक वह बिस्तर पर उठ बैठी।

‘‘क्यों क्या हुआ? ऐसे क्यों चौंक रही है?’’ माँ ने उसे इस तरह उठते देख कर हैरानी से पूछा ।

‘‘माँ! इसे कितनी आमदनी हो जाती है इस चक्की से?’’

‘‘पता नहीं।’’ लग रहा था कि माँ कुछ खीज गई थी, ‘‘अच्छा अब सो जा, सफ़र की थकी है।’’ और माँ करवट बदल कर लेट गई। थोड़ी देर में उनकी नाक बजने लगी, लेकिन सुमित्रा को नींद कहाँ?

जहाँ उसके पिता बटेसर मूढ़ा डालकर बैठा करते थे और जहाँ से आज वह उस मूढ़े को उठा लाई थी। यह जगह कभी उसने माँ से अपने लिए माँगी थी लेकिन माँ ने न सिर्फ इनकार किया वरन् उसे बुरी तरह से दुत्कार भी दिया था।

फिर न जाने कहाँ से रात के सन्नाटे में उसे अल्हड़ और खिलन्दड़ी सुमित्रा के कहकहे सुनाई देने लगे। उसकी कमसिन पायल खनकती सुनाई देने लगी। चारपाई से उठ कर वह खिड़की में जा खड़ी हुई।

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सुमित्रा को याद आ रहा था कि इसी कमरे में जहाँ वह आज माँ के साथ सोने का प्रयत्न कर रही है, कभी ढोलक पर गाँव की औरतों ने सुहाग के गीत गाये थे।

सोलह वर्ष की अल्हड़ सुमित्रा के हाथों में लाल-लाल मेंहदी रचायी गई थी।

मामा ने लाल चूड़ा पहनाया था और तीखे गुलाबी रंग का गोटे वाला सूट पहने सुमित्रा अकेले-अनाथ मुरारी के एक कमरे वाले कच्चे घर में चली गई।

मुरारी देखने में भला चंगा था। उसी कस्बे के पैट्रोल पंप पर नौकरी करता था। कभी-कभार वह बटेसर की चक्की के लिए गैलन में दो नम्बर का डीज़ल भी लेकर आता और तब उसे ही मुरारी को खाना देना होता था, इसीलिए मुरारी के साथ जाना उसे बुरा नहीं लगा।

छः मास गुजरते सुमित्रा को पता भी नहीं चला। इसी बीच एक दिन मुरारी जब शाम को घर आया तो बहुत उास था, सुमित्रा के पूछने पर उसने उसे बताया कि ‘दोपहर को जब वह खाना खाने आया था तो पम्प मालिक के आवारा बेटे ने सेफ़ से सारा पैसा निकाल लिया और चोरी पम्प के तीन चौकीदारों के सिर लगा दी गई है।’

रात भर दोनों एक दूसरे को दिलासा देते रहे और ईश्वर पर भरोसा रखने की बात दोहराते रहे लेकिन ईश्वर ने साथ न दिया और मालिक ने उनकी एक न सुनी। सुमित्रा के पास एक सोने की अँगूठी थी और दो जेवर चाँदी के क्योंकि तब बटेसर के साथ सेठ शब्द नहीं जुड़ा था। रहा मुरारी, तो वह तो यूँ भी अनाथ था। कुछ थोड़ा सा जोड़-तोड़ कर गुजारा चल रहा था, सो जब मालिक ने पाँच हजार के गबन का केस बनाया तो बर्तन-भाण्डे के साथ उसका एक कमरे का कच्चा मकान भी जब्त कर लिया। वे दोनों पहनने के कपड़े और बिस्तर लेकर बटेसर की चक्की पर आ गए।

पैट्रोल पम्प की नौकरी में मुरारी की ड्राइवरों से दोस्ती होना एक साधारण सी घटना थी, अपने उन्हीं ड्राइवर दोस्तों से उसने भी गाड़ी चलाने की विद्या भी सीख ली थी, इसलिए इधर-उधर से कुछ न कुछ कमा ही लेता। गबन का आरोप था सो नौकरी मिलने में थोड़ी कठिनाई हो रही थी फिर भी जो लोग मालिक के आवारा बेटे को जानते थे वे मुरारी के निर्दोष होने को भी मानते थे, सो उसे रोटी का जुगाड़ करने में अधिक कठिनाई नहीं हो रही थी। छनन...। बिल्ली ने रसोई में कोई बर्तन गिरा दिया दिया था। सुमित्रा को लगा उसका गला सूख रहा है, सिरहाने रखे गिलास को उठाकर एक ही साँस में सारा पानी पी गई और फिर आकर खिड़की में खड़ी हो गई, खिड़की से अष्टमी का चाँद अपनी पूरी आभा कमरे में बिखेर रहा था। उजली चाँदनी में चक्की का वह भाग भी दिखाई दे रहा था जहाँ से आज वह मूढ़ा उठा लाई थी। वह दिन उसे फिर पैनी सुइयों सा छेद गया था जब उसे इस छोटे से टुकड़े के लिए माँ ने दुत्कार दिया था।

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पिछले कई दिनों से मुरारी के पास कोई काम नहीं था। रात सुमित्रा ने विचार किया कि कहीं से एक भैंस का प्रबन्ध किया जाए, इस पर मुरारी बोला, अपने रहने के लिए तो यह छोटा सा कमरा है इसी में खाना, नहाना, सोना तो सब है भैंस कहाँ बंधेगी?

‘‘क्यों? चक्की के बगल में इतनी जगह तो खाली पड़ी है।’’

‘‘अपनी माँ से पूछा है?’’ मुरारी के प्रश्न में व्यंग्य स्पष्ट था।

‘‘मैं सुबह ही पूछ लूँगी, माँ भला क्यों मना करेगी, खाली जगह के लिए?’’ और सुबह जब उसने माँ से बात की तो माँ एकदम बिफर गई, अरे......., बेटी ब्याह कर लोग चैन की साँस लेते हैं। तू तो पहले ही भाइयों के गले पर बैठी है उस पर अब जमीन भी माँग रही है।’’ थोड़ा दम लेकर माँ फिर बोली, ‘‘अपने खसम से कह कर अपना प्रबन्ध करो। मैं कब तक तुम्हें घर पर बैठाकर रखूँगी?’’ माँ के तीखे बोल सुमित्रा के कलेजे तक उतर गए थे, क्यों कहा माँ ने ऐसा? कैसे कह दिया उसने, वह क्या भाइयों से प्यार नहीं करती? सुमित्रा का मन खिन्न हो गया था, उस दिन सुमित्रा ने खाना भी नहीं बनाया। रो-रोकर मुरारी से कहीं और चलने को कहा....लेकिन कहाँं? हालांकि पिता बटेसर एक दम बेलाग रहते थे फिर भी वह माँ से डरते अवश्य थे। इसलिए मुरारी से लगाव होते हुए भी वह कुछ नहीं बोल सके। मुरारी का तो कोई भी नहीं था परन्तु यह भी तो सच है कि जिसका कोई नहीं होता, उसका ईश्वर होता है। यही उक्ति मुरारी के साथ चरितार्थ हुई।

उन्हीं दिनों मुरारी का एक दोस्त, जो जगाधरी किसी सेठ के पास ड्राईवरी करता था, घर आया हुआ था। वह मुरारी से मिलने आया तो सारी बात जानकर वह उन दोनों को अपने साथ जगाधरी ले आया। वह जिस सेठ की कार चलाता था, उनका घर के साथ ही सुन्दर सा बाग भी था। वहीं कुछ क्वार्टस् नौकरों के लिए भी बने हुए थे। मुरारी का वह मित्र भी वहीं रहता था, उसने मुरारी और सुमित्रा को अपने साथ रहने के लिए कहा। सेठ के पारिवारिक मित्र कभी-कभी उधर भी घूमने आ निकलते। वहीं, उसी बाग में हुई सुमित्रा की मुलाकात ठकुराइन दीदी से।

उन्हें अपनी कार के लिए ड्राईवर चाहिए था। शहर के बाहर बाग में महल जैसा मकान और ठकुराइन दीदी के साथ रहती बस एक नौकरानी। ठाकुर साहब बरसों पहले परलोकवासी हो गये थे। उनका इकलौता बेटा उच्च शिक्षा हेतु विदेश जा कर वहीं का हो गया। इस अकेलेपन में सुमित्रा जैसी सलोनी शोड़षी का साथ उन्हें भा गया।

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ठण्डी हवा के झोंके ने सुमित्रा को फिर से वर्तमान में ला पटका। मार्च की पहली तारीखें थीं, शायद कहीं पहाड़ों पर बर्फ गिर रही थी अथवा वर्षा हुई थी। यहाँ हिमालय की तराई से पहाड़ अधिक दूर भी नहीं थे। उसने खिड़की बन्द कर दी और बिस्तर पर आ लेटी। माँ सो रही थी, बेखबर।

कड़ी धूप में ठण्डी बयार का-सा झोंका ही तो थीं ठकुराइन दीदी। हर वक्त पूजा पाठ में मगन। जाने कब सुमित्रा उनके नाक का बाल बन गई। वही ठकुराइन दीदी, जिन्हें किसी के हाथ का बना खाना पसन्द ही नहीं आता था, अब वह सुमित्रा के हाथ के बने सभी पकवान बड़े चाव से खाती थीं, फिर एक दिन उन्होंने विधिवत् उसे गोद ही ले लिया।

यह फैसला उन्होंने तब लिया जब उनके इकलौते बेटे ने भारत लौटने से इन्कार कर दिया। न सिर्फ़ इनकार किया बल्कि उसने तो अपने पत्र में माँ को यहाँ तक लिख मारा कि उसे उनकी सम्पत्ति से भी कोई दिलचस्पी नहीं है।’’ वैसे तो सुमित्रा ठकुराइन दीदी को सारा दुख-दर्द सुना आती थी और वह उसे हिम्मत और दिलासा भी देतीं पर जब सुमित्रा ने माँ-बाप की शक्ल ही न देखने का अपना फैसला ठकुराइन दीदी को सुनाया तो उन्हें बहुत दुख हुआ। वह जानती थीं कि संतान की अवज्ञा का माँ-बाप पर कितना गहरा असर होता है। उन्हीं के समझाने-बुझाने पर उसने फिर माँ के पास जाना-आना शुरु किया था। उन्हीं ठकुराइन दीदी की शिक्षा का फल था कि अपने साथ किये गये हर दुर्व्यवहार के अपराधी को वह क्षमा कर देती थीऋ उनकी अपार धन सम्पत्ति के साथ-साथ उनके उदार विचार भी तो उसे विरासत में प्राप्त हुए थे।

रात भर की जगी होने पर भी मुर्गे की बांग के साथ ही सुमित्रा उठ बैठी। ठकुराइन दीदी से सन्ध्या वन्दन का पाठ भी तो पढ़ा था उसने।

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पूजा से निवृत्त होने और चाय नाश्ते के बाद सुमित्रा फिर चक्की के पास जा खड़ी हुई। मोटा आदमी जिसका नाम मदन था उठ खड़ा हुआ। आज वह तख़त पर बैठा था। ‘‘आइये दीदी? कैसी कटी आपकी रात?’’

‘‘ठीक है भइया? सुमित्रा ने स्वयं को संयत रखने का संकल्प रात ही ले लिया था अतः बिना किसी भूमिका के प्रश्न किया, ‘‘क्या तुम्हें इस चक्की से कुछ लाभ है?’’

‘‘नहीं-दीदी? पता नहीं क्यों काम बहुत कम हो गया है, वैसे एक कारण तो यह भी है कि इधर-उधर और चक्कियाँ भी लग गईं हैं। फिर लोग शहर भी अधिक जाने लगे हैं।’’

‘‘कितने में खरीदी थी चक्की तुमने?’’

‘‘पंद्रह हजार में............क्यों?’’

‘‘बेचेंगे क्या?’’

‘‘मैं समझा नहीं।’’

‘‘मैं तुम्हें मुँह माँगी कीमत दूँगी इसकी।’’ सुमित्रा के लिए तो यह चक्की एक फाँस ही थी, जो उसके कलेजे में अटकी हुई थी। कितनी ही उदार होने के बाद भी वह यह बात नहीं भूल सकती थी कि इसी चक्की के पास बची थोड़ी सी ज़मीन के लिए माँ ने उसे कितना लताड़ा था। इन्हीं भइयों के लिए ना? और भाइयों ने क्या किया? चक्की भी बिकवा दी और अब उसे रोटी के दो टुकड़ों के लिए उनकी बीवियों की दस बातें सहनी पड़ती हैं। वे दोनों डरती हैं तो बस सुमित्रा से, क्योंकि अब वह पैसे वाली जो है परन्तु बात बस इतनी ही नहीं है, दरअसल सुमित्रा समय पड़ने पर भइयों की मदद भी तो करती है इसलिए उसका रुतबा घर में बना हुआ है। आखिरकार सुमित्रा ने पचास हजार देकर चक्की तुरन्त खरीद ली। तार देकर मुरारी और छोटे बेटे वरुण को भी उसने सितारगंज ही बुला लिया था। जमीन का वह छोटा सा टुकड़ा जो सुमित्रा के मन में कसक बनकर सालता रहता था, आज उसका था, उसका अपना। अब उसे माँ के सामने हाथ नहीं फैलाने थे, इसके विपरीत बेगाने लोगों के हाथ चली गई पैतृक सम्पत्ति उसने पैसे देकर पुनः प्राप्त कर ली थी अपने बेटे वरुण के नाम से और उसने वरुण के नाम से लोन के लिए भी साथ ही साथ एप्लाई कर दिया था।

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‘‘वरुण फ्लोर मिल’’ का नामपट्ट भी बनकर आ गया था, वरुण बहुत प्रसन्न था। एम.ए. पास करने पर भी नौकरी का कहीं दूर-दूर तक कोई भरोसा न था। अगर माँ ने उसके नाम पर ‘फ्लोर मिल’ की योजना बनाई तो उसे क्योंकर सुख और प्रसन्नता का अनुभव न होता। देखते ही देखते रिश्तेदार और मित्र, मेहमान आने शुरु हो गये थे। सुमित्रा बहुत प्रसन्न थी। अपनी प्रशंसा सुनकर किसे सुख नहीं होता। हर मुख पर एक ही बात थी, ‘‘नालायक बेटों ने तो चक्की बिकवा दी थी, वह तो बेटी ही लायक निकली जिसने सब सँभाल लिया, बेगाने के हाथ गई सम्पत्ति फिर अपने हाथ आ गई थी।’’

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हाथ में ढेर सारे लिफ़ाफ़े लिए सुमित्रा ने घर में कदम रखा तो देखा, माँ मिल के नामपट्ट के पास खड़ी बड़े गौर से उसे देख रही है। सुमित्रा को देखकर माँ ने झट पीठ फेरकर दुपट्टे से आँखें पोछ लीं, जो मोटे चश्में के भीतर से भीगी हुई सुमित्रा को साफ़ नजर आ रही थी। अब माँ के पास कहने को कुछ था ही नहीं, क्या कहती। सुमित्रा हाथ का सामान रखने अन्दर जाती कि तभी सड़क पर बस रुकी, कुछ मेहमान और आये थे। मिल और सड़क का फासला मुश्किल से तीन गज़ का रहा होगा इसीलिए अंदर भी हर प्रकार की आवाज आती थी। भीतर लपकती सुमित्रा के पाँव कण्डक्टर की आवाज ने बाँध लिए। वह सड़क पर खड़ा चिल्ला रहा था, ‘‘कोई और है? बटेसर की चक्की, बटेसर की चक्की। जल्दी उतरो चक्की वालो।’’

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समय गुजरते कितनी देर लगती है? मिल तैयार खड़ी थी। उद्घाटन का दिन आ पहुँचा। सुमित्रा, मुरारी और उनके दोनों बेटे मेहमानों के स्वागत में व्यस्त थे। दोनों भाई-भाभियाँ खिसियाए रहने पर भी भीतर की व्यवस्था को सँभाल रहे थे। बढ़िया भोजनों की सुगन्ध, रंग-बिरंगे परिधानों, टेप रिकार्डर पर बजती अंग्रेजी धुनों के बीच स्थानीय विधायक ने रिबन काटा, नाम पट्ट पर पड़े आवरण की डोर पकड़ कर खींची, तालियाँ बज उठीं। कैमरों की फ्लश गनें चमक उठीं। लोग फोटो की परिधि में आने के लिए एक दूसरे को धकियाने लगे। आखिर ये फोटोग्राफ कल अखबार में आने वाले जो थे। आवरण हटते ही बजती तालियाँ एकदम रुक गईं जैसे चलती गाड़ी में अचानक ब्रेक आ लगे हों, लेकिन अगले ही क्षण तालियाँ दुगने वेग से फिर बज उठीं। माँ की बूढ़ी आँखें मोटे चश्में के भीतर एक बार फिर से छलक आईं। नाम पट्ट पर मोटे अक्षरों में लिखा था,

‘‘बटेसर की चक्की’’

प्रो0 वरुण कुमार सन ऑफ मुरारी लाल

लोग आगे बढ़-बढ़कर सुमित्रा को बधाइयाँ दे रहे थे। शहर के बढ़े-बूढ़े हज़ारों आशीर्वादों से उसे लाद रहे थे। सबका धन्यवाद करती हुई सुमित्रा ने हाथ उठाया। माहौल एकदम शान्त हो गया। सब लोग प्रतीक्षा कर रहे थे कि अब सुमित्रा क्या कहने वाली है, देखें तो सही। मुरारी और उसके दोनों बेटे आँखों में प्रश्न लिए सुमित्रा का चेहरा देख रहे थे कि सुमित्रा ने अपना मुँह खोला, ‘‘यह चक्की क्योंकि मेरे पिताजी की निशानी है और मेरी माँ की रोटी का आधार थी। इसके बिक जाने से मेरी माँ परेशान थी। क्योंकि यह चक्की अब मैंने खरीद ली है इसलिए अब उनकी सारी परेशानी मेरी परेशानी है। आज से माँ के जीवित रहने तक उन्हें इस चक्की अर्थात फ्लोर मिल से 500/- मासिक पेंशन मिला करेगी। वे चाहे जिस बेटे के साथ या चाहें तो मेरे साथ भी रह सकती हैं।

एक बार फिर से होने वाली तालियों की भारी गड़गड़ाहट के बीच कई बुजुर्गों के चेहरे आँसुओं से भीग गए।

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आशा शैली

इन्दिरा नगर-2, लालकुआँ,

जिला नैनीताल-262402 (उत्तराखण्ड)

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asha shailly

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