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नींव - लघुकथा - -ज्ञानदेव मुकेश

      

  नींव   
                                
  एक खाली जमीन पड़ी थी। अचानक एक दिन कई मजदूर वहां आ पहुंचे। उनके हाथों में कई तरह के मशीन और औजार थे। वहां पूजा का एक संक्षिप्त कार्य सम्पन्न हुआ और अगले ही दिन से काम शुरू हो गया। कई दिनों तक काम चलता रहा। वहां से गुजरनेवालों को सहज अन्दाजा हो गया कि यहां कोई आलीशान मकान खड़ा होने वाला है। वहां से गुजरनेवाले एक खास राहगीर को भी यही समझ में आया। वह भी मकान के उठ खड़ा होने का बेसब्री से इंतजार करने लगा।


  एक माह बीत गया। मगर मकान की एक भी दीवार खड़ी होती हुई नहीं दिखी। वह राहगीर बड़ा व्यग्र हुआ। एक दिन वह उस जमीन पर खड़े ठीकेदार जैसे दिखनेवाले आदमी से मिला। उसने पूछा, ‘‘भाई, यहां एक माह से क्या हो रहा है ? जमीन पर कुछ उठता हुआ नहीं दिख रहा है।’’


ठीकेदार टाइप आदमी ने कहा, ‘‘अभी जो चल रहा है, वह मकान से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। कल का आलीशान मकान इसी पर टिकेगा और इठलाएगा। मगर विडम्बना यह है कि आज का यह बड़ा काम अभी किसी को दिख नहीं रहा और कभी दिखेगा भी नहीं। इसका योगदान जमीन के गर्त में ही दबा रह जाएगा।’’

                                                      -ज्ञानदेव मुकेश
          
                                                    फ्लैट संख्या-301,
                                                    साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                                    अल्पना मार्केट के पास़, पाटलीपुत्र रोड,
                                                    पटना-800013 (बिहार)

e-mail address - gyandevam@rediffmail.com

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