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पर्यावरण संरक्षण: एक्ट,एक्शन और एजुकेशन की जरुरत - सुदर्शन सिंह

पर्यावरण संरक्षण: एक्ट,एक्शन और एजुकेशन की जरुरत

   पर्यावरण एक व्यापक संप्रत्यय है जल,थल,वायु,पेड़-पौधे, पशु-पक्षी,मानव आदि सब मिलकर पर्यावरण की रचना करते है। प्रकृति में इनका सामंजस्य इस प्रकार बना हुआ है कि धरती पर एक सन्तुलित जीवन गतिमान रहे,पर्यावरण एवं प्रकृति एक ही सिक्के के दो पहलू है। जन सामान्य के लिए जो प्रकृति है उसे विज्ञान में पर्यावरण कहा जाता है।

      गत पाँच शताब्दियों में मनुष्य ने अपनी सुख-सुविधा के लिए पर्यावरण में जिस प्रकार की हलचल मचाई है उसी का परिणाम है कि प्राकृतिक संसाधनों की साम्यावस्था भंग हुई है तथा सामान्य जन जीवन में परिवर्तन दृष्टिगोचर हो रहा है भौतिक विकास की अंधी दौड़ और प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन से पर्यावरण विचलित हुआ है परिणामस्वरूप मनुष्यों को जीने के लिए शुद्ध वायु एवं शुद्ध जल उपलब्ध नहीं है। जिसे दृष्टिगत रखते हुए पूरी दुनिया में पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षण तथा वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के प्रति राजनीतिक और सामाजिक जागृति लाने हेतु प्रत्येक वर्ष 5 जून को एक विशेष थीम (वर्ष 2019 का थीम-वायु प्रदूषण का मुकाबला करना) पर केन्द्रित करते हुए विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है जिसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरणीय समस्याओं को एक मानवीय चेहरा प्रदान करना तथा विभिन्न देशों,उद्योगों,संस्थाओं और व्यक्तियों की साझेदारी को बढ़ावा देना ताकि सभी देश और समुदाय एवं पीढियां सुरक्षित व् उत्पादनशील पर्यावरण का आनन्द उठा सकें ।

     आज ऐसा कोई राष्ट्र नहीं जो पर्यावरण संकट पर चिंतन,मंथन नहीं कर रहा हो,भारत भी अति चिंतित है।पर्यावरण संरक्षण संस्कार भारत भूमि के अतिरिक्त किसी भी देश में देखने को नही मिलता। भारत में जल , हवा , जंगल , जमीन,नदी,पर्वत,पशु-पक्षी,पेड़-पौधों आदि के साथ मानवीय रिश्ते जोड़े गये है।भारतीय दर्शन में एक वृक्ष को मनुष्य के दस पुत्रों से तुलना की गयी है श्री कृष्ण की गोवर्धन पर्वत की पूजा का आरम्भ का लौकिक पक्ष यही है कि जन सामान्य मिट्टी, पर्वत,वृक्ष एवं वनस्पति का आदर व् संरक्षण करना सीखें। भारतीय चिन्तन में पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा उतनी ही पुरानी है जितना यहाँ मानव जाति का ज्ञात इतिहास है।भारत संसार के उन चंद देशों में सुमार है जिनके संविधानों में पर्यावरण का विशेष जिक्र है सरकार ने 1976 में संविधान संशोधन करके दो महत्वपूर्ण अनुच्छेद 48 ए तथा 51 ए (जी) जोड़े जो पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देते है भारत ने पर्यावरण संरक्षण को सर्वोपरि रखते हुए कानूनों का व्यापक निर्माण किया जैसे-रिवर्स बोर्ड्स एक्ट 1956,जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण एक्ट 1974 व् 77,वायु प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण एक्ट 1981,वन्य जीवन संरक्षण एक्ट 1972,वन संरक्षण एक्ट 1980,पर्यावरण संरक्षण एक्ट 1986,जैव विविधता संरक्षण एक्ट 2002,राष्ट्रीय जल नीति 2002,राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2004 व् वन अधिकार एक्ट 2006 देखा जाये तो पर्यावरण सम्बन्धी इतने सारे एक्ट होने के बावजूद भी भारत में पर्यावरण को लेकर स्थिति चिंताजनक बनी हुई है इसका प्रमुख कारण है कि एक्ट का सही से एक्शन में न आना और वर्तमान समय में भारत सहित संसार के लोगों की आधुनिकीकरण व् विकास की लालसा,सुखमय जीवन की प्रत्याशा,तकनीकी का निर्बाध प्रयोग,उद्योगों का अनियंत्रित प्रसार आदि ने पर्यावरण के शोषण को निरन्तर बढ़ावा दिया है। फलस्वरूप हमारी कल्पना की तुलना में पर्यावरण बहुत तेजी से दूषित हो रहा है।

अभी हाल ही में क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा जारी रिपोर्ट में डब्ल्यू0एच0ओ0 की 15 शहरों की सूची में 14 शहर भारत के है इसमें उत्तर प्रदेश का कानपुर दुनिया में सबसे प्रदूषित शहर है इसके बाद हरियाणा का फरीदाबाद शहर और तीसरे स्थान पर वाराणसी,चौथे व् पाँचवे स्थान पर क्रमशः बिहार के गया और पटना है जबकि छठवें स्थान पर दिल्ली व् सातवें स्थान पर लखनऊ है।स्टेट आफ ग्लोबल एयर-2019 की रिपोर्ट कहती है कि पूरी दुनिया की करीब 95 प्रतिशत आबादी ख़राब हवा में साँस लेती है और वायु प्रदूषण से जितने लोगों की मृत्यु होती है उसकी आधी संख्या भारत व् चीन में है। भारत व् चीन में 2017 में वायु प्रदूषण से क्रमशः 12-12 लाख लोगों की मृत्यु हुई।अभी कुछ दिन पहले डब्ल्यू0एच0ओ0 ने एक सूची जारी की है इस सूची के मुताबिक वायु प्रदूषण और बदलता मौसम 2019 में शीर्ष 10 वैश्विक खतरों में से एक है रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2030 और 2050 में पर्यावरण में हो रहे अचम्भित बदलाव के चलते समय से पहले मौत का आंकड़ा बढ़ सकता है दूसरी ओर पर्यावरणीय स्वास्थ्य श्रेणी में भारत 180 देशों की सूची में 178 वें स्थान पर है जो पर्यावरण सुरक्षा के लिहाज से अत्यन्त खराब है। देखा जाये तो वर्तमान स्थिति कहीं न कहीं हमारे मन,वचन,कर्म में एकरूपता के अभाव व् प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अशिक्षा, निकटदर्शिता और अविवेक का परिणाम है आज सम्पूर्ण विश्व पर्यावरण प्रदूषण जैसी भयंकर समस्या के प्रति गम्भीर है।

अब वह समय आ गया है कि हम पर्यावरण से सम्बंधित एक्टों पर एजुकेशन के माध्यम से सकारात्मक एक्शन लें और पर्यावरण शिक्षा को अपनाते हुए बच्चों,युवकों और प्रौढों को प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और पर्यावरण प्रदूषण के कारणों व् उनके दुष्परिणामो से परिचित कराये साथ ही उन्हें पर्यावरण संरक्षण की विभिन्न विधियों से अवगत कराये।पर्यावरण शिक्षा की उपयोगिता व् सार्थकता स्वतः स्पष्ट है यह एक ऐसी सकारात्मक व् मनोरंजनपूर्ण शिक्षा है जो मानव को एक अलग ढंग का जीवन दर्शन प्रदान करती है यह उस पथ पर चलने की सलाह देती है जिस पर चलकर मनुष्य की विकास यात्रा और प्रकृति की पारितन्त्र के बीच संतुलन व् समन्वय कायम रह सके।वर्तमान में इस बात की महती आवश्यकता है कि शिक्षार्थियों,शिक्षकों व् जन सामान्य को प्रभावशाली शिक्षण व् पाठ्यक्रम, नाटक,लघु फिल्म,रोल मॉडल,जागरूकता रैली,सेमिनार,कांफ्रेंस,वर्कशॉप,वाद-विवाद,निबन्ध प्रतियोगिता,शैक्षिक भ्रमण,प्रोजेक्ट कार्य आदि नवाचारों के द्वारा पर्यावरण संरक्षण एवं प्रबन्धन के प्रति चेतना उत्पन्न की जाये और उनको पर्यावरण संरक्षण की तीन मुख्य बातों -कम उपयोग करना,पुनरावृत्ति करना तथा पुनः उपयोग करना का आत्मसात कराया जाये। यद्यपि पर्यावरण जागरूकता के संदर्भ में समय समय पर सरकार द्वारा सराहनीय कार्य किये जाते रहे है अभी कुछ दिन पूर्व यू0जी0सी0 द्वारा पर्यावरणीय अध्ययन को महत्व प्रदान करते हुए विश्वविद्यालय/महाविद्यालय को निर्देशित किया गया है कि वे अपने यहाँ पर्यावरणीय अध्ययन को अनिवार्य बनाते हुए उनके नियमित शिक्षण की व्यवस्था करें।निःसन्देह शिक्षा ही हर समस्या का समाधान है और पर्यावरण संरक्षण का कार्य निरन्तर गतिमान कार्य है इसके लिए जबरदस्ती, न्यायालय व् डंडों की जरुरत नहीं है जरुरत है तो स्वच्छ हृदय , गूढ़ समझ व् तत्काल एक्शन की।

     जब तक मानव पर्यावरण को अपना प्राण समझते हुए इसके प्रति संवेदनशील होकर अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा और इसकी सुरक्षा का प्रथम पहल नहीं करेगा तब तक पर्यावरण संरक्षण व् सुखमय जीवन हमारे लिए सपना ही साबित होगा।

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सुदर्शन सिंह

असिस्टेन्ट प्रोफेसर

शिक्षाशास्त्र विभाग

डी0एस0एन0कालेज,उन्नाव,उत्तर प्रदेश

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