समीक्षा - सुधा ओम ढींगरा की कहानियों में प्रवासी स्त्री विमर्श

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डॉ. प्रियदर्शिनी के शब्दों में - “अपने लेखन व उसके माध्यम से प्रवासी दुनिया के अकेलेपन और ऊब व अन्य समस्याओं पर बड़ी बेबाकी से लिख रहे हैं।...

डॉ. प्रियदर्शिनी के शब्दों में - “अपने लेखन व उसके माध्यम से प्रवासी दुनिया के अकेलेपन और ऊब व अन्य समस्याओं पर बड़ी बेबाकी से लिख रहे हैं। ऐसे ही प्रमुख रचनाकारों में- अखिलेश सिन्हा, इला प्रसाद, धनंजय कुमार, रजनी भार्गव, सुदर्शन पटनायक, सौमित्र सक्सेना, सुधा ओम ढींगरा, हरदीप संधु, डॉ. शैलजा सक्सेना, उषा वर्मा, पुष्पा भार्गव, उषाराजे सक्सेना, अनिल जनविजय, पुष्पिता आदि प्रमुख हैं।”1 भारत के जालंधर में जन्मीं सुधा ओम ढींगरा अमेरिका के मोर्रिस्विल में रहने वालीं एक सामाजिक एक्टिविस्ट के रूप में जानी व पहचानी जातीं हैं। आप कवयित्री, कथाकार, उपन्यासकार, पत्रकार, सम्पादक, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन कलाकार, रंगकर्मी, और हिन्दी के प्रचार-प्रसार की अनथक सिपाही हैं तथा उत्तरी अमेरिका में भारतीय संस्कृति, साहित्य आदि के विकास एवं प्रचार-प्रसार के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनकी प्रमुख रचनाओं में- मेरा दावा है (अमेरिका के हिन्दी कवियों का काव्य संग्रह), तलाश पहचान की (काव्य संग्रह), माँ ने कहा था (काव्य सी.डी. कैसेट), परिक्रमा (पंजाबी से हिन्दी में अनुवादित उपन्यास), वसूली (कहानी-संग्रह हिन्दी एवं पंजाबी), टारनेडो (पंजाबी में कहानी-संग्रह), धूप से रूठी चाँदनी (काव्य-संग्रह), सफ़र यादों का (काव्य-संग्रह), तलाश पहचान की (काव्य-संग्रह), संदली बूआ (पंजाबी में संस्मरण), कौन सी ज़मीन अपनी (कहानी संग्रह)। और आकाश ढूँढती वह .. (उपन्यास), सरकती परछाइयाँ (काव्य संग्रह)। डॉ. रमेश तिवारी कहते हैं – “इतर नामक कहानी-संग्रह में लगभग सभी महत्वपूर्ण प्रवासी महिला कहानीकारों की एक-एक कहानियां संकलित हैं। डॉ. सुधा ओम ढींगरा द्वारा चयनित, संपादित कहानियों का यह संग्रह राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (नेशनल बुक ट्रस्ट), नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया है।” आप हिन्दी चेतना (उत्तरी अमेरिका की त्रैमासिक पत्रिका) की संपादक मण्डली में कार्यरत हैं। हिन्दी विकास मंडल, नार्थ-कैरोलाईना (अमेरिका), हिंदू-सोसईटी, नार्थ कैरोलाईना (अमेरिका), अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति (अमेरिका) द्वारा हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं सामाजिक कार्यों के लिए कई बार सम्मानित किए गए। उन्हें अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं सामाजिक कार्यों के लिए वाशिंगटन डी.सी. में तत्कालीन राजदूत श्री नरेश चंदर द्वारा सम्मानित किया गया। उन्हें ट्राईएंगल इंडियन कम्युनिटी, नार्थ-कैरोलाईना (अमेरिका) द्वारा '2003 नागरिक अभिनन्दन' मिला है। उन्हें चतुर्थ प्रवासी हिन्दी उत्सव 2006 में 'अक्षरम प्रवासी मीडिया सम्मान' और हैरिटेज सोसाइटी नार्थ कैरोलाईना (अमेरिका) द्वारा 'सर्वोतम कवियत्री 2006' से भी सम्मानित किया गया। उन्होंने अनगिनत कवि सम्मेलनों का सफल संयोजन एवं संचालन किया है। उन्होंने इंडिया आर्ट्स ग्रुप की स्थापना कर अमेरिका में बहुत से हिन्दी नाटकों का मंचन किया है। रेडियो सबरंग (डेनमार्क) की संयोजक हैं और टी.वी., रेडियो एवं रंगमंच की प्रतिष्ठित कलाकार हैं। उत्पीड़ित नारियों की सहायक संस्था ‘विभूति’ की आप सलाहकार हैं।

हिन्दी साहित्य के आँचल में जहाँ एक ओर दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श और आदिवासी विमर्श, दिखाई दे रहे हैं, वहीं प्रवासी विमर्श भी वृहद रूप में उभरा है। इतिहास को ध्यान से परखने से बोध होता है कि 'प्रवासी' शब्द कोई नया या अंजान शब्द नहीं है। भारतीय साहित्य के साथ इस शब्द का संबंध हज़ारों वर्षों के पहले से जोड़ा है। प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति का अध्ययन गहरे रूप से करते समय उल्लेख किया गया था। प्रवास में लिखा गया साहित्य प्रवासी साहित्य है, जिसे मुख्य धारा का साहित्य अपने में कहीं-कहीं से चुन कर सम्मिलित कर लेता है, और प्रायः उसे मुख्यधारा का साहित्य समझ लिया जाता है। भारत से बाहर प्रवासी संस्कृति मॉरिशस, गयाना, त्रिनीडाड, फ़िजी, सूरिनाम, मिस्रदेश, जावा द्वीप, सुमात्रा, कम्बोडिया, बाली और लम्बक द्वीप, अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका देशों में तेज़ी से प्रचार-प्रसार हो रही है।

डॉ. सुधा अमेरिकी संस्कृति से अच्छी तरह से परिचित है और वहाँ वर्षों से अपना बसेरा बनाये हुईं हैं। वहाँ की संस्कृति से अच्छी तरह से परिचित होने के बावजूद भी वे अपनी भारतीय संस्कृति तथा रीति-रिवाज या विश्वास को नहीं भूलीं हैं। आपकी अधिकांशत: कहानियाँ अमरीका में घटित होती हैं या किसी न किसी रूप में वहाँ से संबंधित होती हैं। कहानियाँ भारत आती हैं, तो पंजाब भी आती हैं। कई कहानियों में कथानक जब भारत से जोड़ने का कार्य करती है तब उनके जमीनी दायरे को एक प्रकार से विस्तृत फलक प्रदान होता है। डॉ. सुधा जी की 'टारनेडो' चर्चित और प्रासंगिक कहानी है। टारनेडो की कथा भारत की याद और उस मिट्टी खुशबू की है, वहीं इन सब चीजों से परे एक प्रताड़ित स्त्री के विद्रोह को भी प्रस्तुत किया गया है। यह कहानी भारतीय परंपरा और संस्कृति को स्थापित करने वाली कहानी है जिसकी शुरुआत ही अपने देश की याद से होती है। यह कहानी जहां एक तरफ भावनात्मकता को प्रकट करती है वहीं दूसरी तरफ कड़वाहट भरी यथार्थ की जमीन को भी उजागर करती है। मनजीत सिंह और अपनी पत्नी मनविंदर, दोनो होनहार बच्चों के साथ अमेरिका में रहता है। दो होनहार बच्चे हैं, जो डॉक्टरी और वकालत पढ़कर वहीं विवाह कर लेते हैं। बेटा और मां दोनों ही मनजीतसिंह को समझाते रहते हैं कि पंजाब में अपने भाई को जमीन खरीदने के लिए बार-बार पैसा न भेजा करे, परंतु वह मानता ही नहीं। बच्चों की शादी के बाद जब वह और उसकी पत्नी मनविंदर नवांशहर, पंजाब अपने पैतृक गांव पहुंचते हैं तो उनके साथ मेहमानों की तरह व्यवहार किया जाता है। मनजीत को यह अटपटा लगता है। छोटा भाई ही नहीं, मां और बाप भी बदल जाते हैं। मनजीत जब अपने पैसों से खरीदी हुई जमीनों के हक की बात करता है तो भाई बुरी तरह क्रोध में आ जाता है। रात में मनजीत को भाई की फुसफुसाहटभरी आवाज से पता चलता है कि उसकी योजना दोनों की हत्या कर ठिकाने लगाने की बन चुकी है। इसमें वह पुलिस को भी शामिल होने की बात कहता है। उसका मन छलनी हो जाता है। इसी द्वंद्व में, वह एक रात पानी पीने उठा, तो नीचे के कमरे में कुछ हलचल महसूस की, पता नहीं क्यों शक-सा हो गया। दबे पांव वह नीचे आया, तो दारजी के कमरे से फुसफुसाहट और घुटी-घुटी आवाजें आ रही थीं। लेखिका ने पाश्चात्य जीवन-शैली और भारतीयता को एक साथ कसौटी पर कसा है। उन्मुक्तता और मर्यादा के हानि-लाभों को खोला गया है इस कहानी में। भारतीय की नजर से इस यथार्थ को देखते हुए कहानीकार ने बहुत भी सूक्ष्म घटनाओं और गतिविधियों का ब्योरा दिया है। इसमें वेश्यावृत्ति, शराबखोरी की लत, ड्रग्स पैडलर्स आदि सब शामिल हैं। ये ऐसी कहानी है, जो अपनी संरचनात्मक बुनावट और संवेदनात्मक कारीगरी के लिए याद रखने योग्य है। लेखिका ने अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि दोनों का तुलनात्मक पाठ कहानी में प्रस्तुत किया है।

‘कमरा नंबर 103’ बिल्कुल अलग प्रकार की कहानी है। टैरी और एमी के अलावा जो तीसरा मूक पात्र मिसेज वर्मा कहानी में उपस्थित है, उसकी खामोशी के संवाद लेखिका ने बहुत सुंदर तरीके से लिखे हैं। ये भी अपने ही प्रकार की एक कहानी है, जिसमें एक पात्र भले ही कोमा में है, किंतु संवाद बराबर कर रहा है। उसके संवाद एकालाप की तरह होते हैं। दूसरी तरफ नर्स टैरी और एमी के संवादों के माध्यम से समस्या के मूल तक जाने के प्रयास में कहानी लगी रहती है। ये जो दो समानांतर रूप से चल रही घटनाएँ हैं, ये कहानी को रोचक बनाए रखती हैं। मिसेज वर्मा कोमा में हैं और उस कोमा के पीछे के सच को जानने की कोशिश में लगी हैं टैरी और एमी। कहानी के अंत में मिसेज वर्मा भी इस कोशिश में शामिल होती हैं, मगर अपने ही तरीके से। कहानी मन को छू जाती है। सुदर्शन प्रियदर्शिनी की कहानी ‘अखबारवाला’, सुषम बेदी की ‘अवसान’ अथवा सुधा ओम ढींगरा की ‘कमरा नं. 103’, तीनों ही कहानियों का संदर्भ अलग है पर विषय मृत्यु है। भारत के गाँव-घर में अचानक किसी के घर आटा-दाल माँगने के बहाने पहुँचना और घंटों बैठकर पड़ोसियों के साथ गलचऊर कर लेना अथवा जाड़े की रातों में आग के अलाव के सामने बैठकर बतिकही कर लेना एक सामान्य सी बात है, किंतु विदेश में फ़ोन किए बिना, वह भी उनकी प्राइवेसी को बिना नुकसान पहुँचाए, किसी के घर जाना संभव नहीं। भारत में अपने बेटे से मार खाकर पड़ोसी के घर में जाकर रो आना और सहानुभूति के तौर पर खाना भी खा लेना एक सामान्य सी बात है, परंतु ‘कमरा नं. 103’ की मिसेज वर्मा परदेश में एकदम अकेली हो जाती हैं क्योंकि बेटा-बहु घर में लगे जाले की तरह उन्हें उतार फेंकते हैं, जिससे उनके जीवन का उद्देश्य समाप्त हो गया। भाषा की भीषण परेशानी तो बिना बात किए खत्म हो ही नहीं सकती और बिमारी की हालत में बार्नज अस्पताल में पहुँचा दी जाती हैं। उनकी जिन्दगी की सुरक्षा कोमा जैसी बीमारी करती है, अस्पताल में नर्सें ही उनकी अपनी हैं। बेटा-बहु तो कभी उनकी सलामती जानने भी नहीं आते।

डॉ. सुधा ओम ढींगरा की एक और चर्चित कहानी है ’सूरज क्यों निकलता है’। ये कहानी मनोविज्ञान के अलग धरातल पर लिखी गई है। कहानी उस मानिसकता की बात करती है, जो मानसिकता किसी देश या काल से बँधकर नहीं रहती। हम अपने देश में अपने आसपास भी इस प्रकार के चरित्रों को, पात्रों को देख सकते हैं, देखते रहते हैं। हमें लगता है कि इस प्रकार के लोग केवल हमारे ही देश में होते हैं, किंतु, जब इस प्रकार की कहानियाँ पढ्ने को मिलती हैं, तो हमें पता लगता है कि ये पात्र तो वैश्विक हैं; हर जगह पाये जाने वाले पात्र, जिनका नाम जेम्स-पीटर या घीसू-माधव कुछ भी हो सकता है। नाम बदलने से मानसिकता नहीं बदलने वाली। इस कहानी में लेखिका अपने उद्देश्य में पूरी तरह से सफल रही है। मानव-मन के जिस अंधकार की तरफ कहानी का शीर्षक इशारा कर रहा है, उसको पूरी तरह से जस्टीफाई करती है ये कहानी। ये लेखिका की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से एक कहानी है। डॉ. रमेश तिवारी लिखते हैं – “सुधा ओम ढींगरा की एक महत्वपूर्ण कहानी को इस संग्रह में शामिल किया गया है, जिसका शीर्षक है – ‘बेघर सच’। इस कहानी में स्त्री-पुरुष संबंधों और उन संबंधों में स्त्री के अस्तित्व, अस्मिता और समता की जांच- पड़ताल की गई है।”

सुधा जी का कथा संसार सधी हुई भाषा, वाक्य संरचना का रेखांकन बड़े ही कलात्मक ढंग से शब्दों द्वारा, संवादों द्वारा अपने आप को अभिव्यक्त करता है। उनकी कई कहानियाँ पढ़कर ऐसा आभास होता है कि वे जीवन की बुनियादी चिंताओं को भी अपनी रचनात्मक मनोभूमि में ले आई हैं। नारी पात्र की विवशताओं, विडंबनाओं, व परिस्थितियों की अनुकूलता के साथ करवट बदलती है, ज़िंदगी के हर पहलू से हमें मिलवाती है। कुल मिलाकर सुधा जी की कहानियाँ मानसिक द्वंद्व की उपज है, जहां हर पात्र अपनी ही परिधि से संघर्ष करता रहता है।

संदर्भ-सूची

1. संपादक – डगोरे (डॉ.) अनिता, भाषा (द्वैमासिक), अंक-276, वर्ष - जनवरी-फरवरी 2018, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, भारत सरकार, पृष्ठ संख्या – 128

2. संपादक – डगोरे (डॉ.) अनिता, भाषा (द्वैमासिक), अंक-276, वर्ष - जनवरी-फरवरी 2018, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, भारत सरकार, पृष्ठ संख्या - 129

3. संपादक – डगोरे (डॉ.) अनिता, भाषा (द्वैमासिक), अंक-276, वर्ष - जनवरी-फरवरी 2018, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, भारत सरकार, पृष्ठ संख्या – 131

आनंद दास, सहायक प्राध्यापक, श्री रामकृष्ण बी. टी. कॉलेज (Govt. Spon.), दार्जिलिंग

संपर्क - 4 मुरारी पुकुर लेन, कोलकाता - 700067, ई-मेल - anandpcdas@gmail.com, 7003871776, 9804551685

नाम

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद 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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर 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रचनाकार: समीक्षा - सुधा ओम ढींगरा की कहानियों में प्रवासी स्त्री विमर्श
समीक्षा - सुधा ओम ढींगरा की कहानियों में प्रवासी स्त्री विमर्श
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