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लघुकथा - नई दुनिया - -ज्ञानदेव मुकेश

मैं, मेरे पिताजी और मेरा पुत्र खाना खा रहे थे। खाना खाने के बाद मेरे बेटे ने अपना जूठा बर्तन उठाया और किचेन के वाश बेसिन में रख आया। मगर मैंने अपना और पिता जी के जूठे बर्तन उठाए और वाश बेसिन में रखे। मैंने अपने बेटे से कहा, ‘‘बेटा, तुम्हें अपना ही नहीं, बड़ों के भी जूठे बर्तन उठाने चाहिए। यही हमारा संस्कार है।’’


    इसपर बेटा बिदका और कहा, ‘‘डैडी, सभी को अपना काम खुद करना चाहिए। दादाजी को अपना बर्तन खुद उठाना चाहिए था। अब यही चलता है। सेल्फ सर्विस इज द बेस्ट सर्विस।’’
   मैं चुप रहा। डायनिंग हॉल के वाश बेसिन में हाथ धोने के लिए बेटा पहले आगे बढ़ गया और उसने हाथ धो लिए। मगर मैंने पिताजी को पहले हाथ धोने को कहा। उनके बाद मैंने हाथ धोए। मैं फिर बेटे के पास गया और कहा, ‘‘बेटा, पहले बड़ों को हाथ धोने देते हैं। यही सही तरीका है।’’


   इसपर बेटा फिर बिफरा। उसने कहा, ‘‘डैडी, मैं आगे खड़ा था। इसलिए मैंने पहले हाथ धो लिए। अनावश्यक शिष्टाचार में रहेंगे तो पीछे छूट जाएंगे। अब यही सही है। फर्स्ट कम, फर्स्ट सर्व्ड।’’
    
                                                  -ज्ञानदेव मुकेश                         
                                     पता-
                                                 फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                                 अल्पना मार्केट के पास,
                                                 न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी, 
                                                 पटना-800013 (बिहार)

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