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झीने आँचल की छाया में, पीना भी अब क्या पीना है। तेजपाल सिंह 'तेज' की कुछ ग़ज़लें


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-एक-

होना भी अब क्या होना है,
जीना भी अब क्या जीना है।

जख़्म हुए नासूर जो उनको,
सीना भी अब क्या सीना है।

झीने आँचल की छाया में,
पीना भी अब क्या पीना है।

आज न पूछो उम्र ने मुझसे,
छीना भी तो क्या छीना है।

‘तेज' करें क्या जब अपने ही,
सपनों का जख्मी सीना है।
****

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-दो-


साहिबो-रहबर नए—नए,
हैं सारे मंजर नए—नए।

उम्र ढली तो देखे मैंने,
घर के तेवर नए—नए।

मौत मिरी चौखट से लौटी,
पहन के जेवर नए—नए।

सुबह पुरानी रात पुरानी,
लेकिन बिस्तर नए—नए।

अपनों के भी हाथ लगे हैं,
अबकी  खंजर नए—नए।

शीशे का घर वही पुराना,
लेकिन पत्थर नए—नए।

‘तेज' करे अब कहाँ बंदगी,
हैं मंदिर-मस्जिद नए—नए।
*****

-तीन-


मैं सफ़र से ऐसे गुजर गया,
  ज्यूँ दरिया कोई उतर गया।

मिलने वाला मिल नहीं पाया,
मैं इधर गया, वो उधर गया।

दर्पण देखा तो आँखों में,
रुख अपना ही उभर गया।

बासी फूल की पत्ती हूँ मैं,
ठसक लगी कि  बिखर गया।

रात की खामोशी में तनहा,
  न जाने कब संवर गया।

कल तक `तेज' साथ था मेरे,
आज न जाने किधर गया।
*****

-चार-

मुझको अब कोई आस नहीं,
है खुद की कोई तलाश नहीं।

गुजरे कल की बात क्या करना,
उसमें है कुछ खास नहीं।

खुशबूदार हवा का मौसम,
आया मुझको रास नहीं।

रिश्तों में अब पहले जैसी,
जानो तो कोई बात नहीं।

आज पड़ा यूँ कल पर भारी,
कल का कुछ अहसास नहीं।

*****

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-पाँच-

सोचा हुआ अगर हो जाता,
सारा आलम घर हो जाता।

खुल जातीं मंजिल की राहें,
आसां बहुत सफ़र हो जाता।

अश्क तिरी आँखों से गिरते,
आँचल मेरा  तर हो जाता।

हँसने पर तारे खिल उठते,
रोना बड़ी खबर हो जाता।

खुशबूदार बारिशें होतीं,
हरा-भरा बंजर हो जाता।

चलते-चलते मैं भी `तेज'
धरती से अम्बर हो जाता।
*****

-छह-

पाँवों में जो धमाल था,
वो हुस्न था कि जलाल था।

मुझको खयाल था उसका,
इसका ही बस मलाल था।

उसकी अना के सामने,
जीना मगर मुहाल था।

दिया था जो उसने मुझे,
वो मेरा ही तो रुमाल था।

मुर्दा हुआ गो `तेज' पर,
चेहरे पे क्या जमाल था।
******

-सात-

खुद अपने से हार गया मैं,
हर लम्हा लाचार गया मैं।

लेकर खाली जेब न जाने,
क्या करने बाजार गया मैं।

खुद ही मैंने बाजी हारी,
वो समझे कि हार गया मैं।

आँख झुकाकर क्या बैठा कि,
वो समझे कि मान गया मैं।
    
`तेज' मैकदे  की  ज़द से  उठ,
कब  कैसे किस हाल  गया   मैं।
*****

-आठ-

जीवन से अब डरता कब हूँ,
मरने से अब डरता कब हूँ।

आँखों में अब ख्वाब कहां हैं,
नीदों में अब जगता कब हूँ।

शेष कहां सांसों में खुशबू,
अब उनको मैं जँचता कब हूँ।

खुद को ही पढ़ता रहता हूँ,
अब मैं उनको पढ़ता कब हूँ।

सरदी-गरमी  में पानी पर,
चलने से अब डरता कब हूँ।
*****

-नौ-

कौन कब मेरा जवाल समझेगा,
साहिबे-जर का कमाल समझेगा।

कौन हूं, क्या हूं, ख़याल हूँ किसका,
कब वो मिरा, ये सवाल समझेगा।

गमगीन चेहरा देखकर मेरा कोई,
मुझको ही मेरी मिसाल समझेगा।

वो देखकर रुख पे मिरे शाइस्तगी,
मिरी बेचारगी को ही जमाल समझेगा।

जमाने को समझना आंसा तो नहीं `तेज',
वक्त के कमाल को केवल कमाल समझेगा।
*****
जवाल = पतन   
शाइस्तगी = सादगी , शिष्टता
जमाल = शोभा, आभा


-दस-

परियों का  फ़न  जाने अब,  
जुल्फों के ख़म जाने अब।

सारी उम्र निभाए रिश्ते,
रिश्तों का सच जाने अब।

साँसे करने लगीं जुगाली,
उम्र का करतब  जाने अब।

अपनों का अपनापन जाने,
गैरों का रुख जाने अब

उम्र ढली तो `तेज' मुकम्मिल,
जीवन  का सच जाने अब।

*****

  तेजपाल सिंह तेज’(जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार-विमर्श की लगभग दो दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं - दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से, हादसो के शहर में, तूंफ़ाँ की ज़द में ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि,  पुश्तैनी पीड़ा आदि  (कविता संग्रह),  रुन - झुन, खेल - खेल में,  धमाचौकड़ी आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), पांच निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता का साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा का उपसंपादक, आजीवक विजन का प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक का संपादक भी रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।

ग़ज़लें 6287607720071535316

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