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आत्मप्रवंचनात्मक कहानियों का दौर है--यह नई सदी (समीक्षा) --डॉ. मनोज मोक्षेंद्र


बीसवी सदी के अवसान के बाद, इक्कीसवी सदी का मुश्किल से पंचांश ही गुजरा है और हम इस नवकाल खंड में कहानियों में आवेष्टित बदलावों को देखते हुए अचंभित हो रहे हैं। क्या एक काल-बिंदु से विपथन ही कुछ नई बातों के सूत्रपात का सबब बन सकता है? कथाकार इतने भी अंतर्मुखी, एकात्म और आत्मप्रवंचनात्मक कैसे हो सकते हैं तथा दीन-दुनिया से विमुख होते हुए अपनी कहानियों में, सिर्फ़ अपने लिए एक ऐसी दुनिया कैसे गढ़ सकते हैं जो केवल उन्हीं की कुंठाओं को मुखरित करती हो? उनकी संवेदनाएँ स्वयं तक सीमाबद्ध होकर अत्यंत व्यक्तिपरक कैसे हो सकती? समीक्षकों, आलोचकों, आचार्यों, शोधार्थियों और कथा-साहित्य के रसिया पाठकों के लिए यह अच्छी ख़बर नहीं है कि कथाकार आम आदमी और आम जनजीवन से विमुख होता जा रहा है। लोकतांत्रिक भाषा को दरकिनार करते हुए और अत्यंत भाव-गुंफ़ित, जटिल और ऊष्ण भाषा का ग्राहकी बनते हुए, इक्कीसवी सदी का कथाशिल्पी हिंदी की समृद्ध कथा-विरासत को अचानक तिलांजलि कैसे दे सकता है और प्रेमचंद्र, प्रसाद, महादेवी वर्मा, जैनेंद्र, रेणु, यशपाल, मनोहर श्याम जोशी, अमृतलाल नागर, भीष्म साहनी, कमलेश्वर आदि जैसे मील के पत्थरों की अनदेखी कैसे कर सकता है? क्या जो हश्र हिंदी कविताओं का हुआ है और हो रहा है, वही हश्र अब कहानियों का होने जा रहा है? क्या वैश्विक आधार पर सोशल मीडिया की देखरेख में आ रहे बाजारवादी परिवर्तनों की सुनामी में बहते हुए कथाकार को केवल अपनी ही हित-साधना दिखाई दे रही है? वर्तमान कथाकारों को पढ़ते हुए यह साफ परिलक्षित हो रहा है कि उनमें आत्ममुग्धता का ज्वार हिलोरें ले रहा है और वे साहित्य के परम लक्ष्य से भटकते जा रहे हैं।

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कथा-साहित्य में बहु-चर्चित मनुवादी, दलितवादी, स्त्रीवादी, दक्षिणपंथी, वामपंथी, मार्क्सवादी आदि-आदि जैसे कहानीकारों को अपना-अपना वर्ग बनाकर सिर्फ़ अपनी और अपने वर्ग-विशेष की भावनाओं को संप्रेषित करते हुए देखकर, यह मन तो पहले से ही बड़ी जुगुप्सा से आप्लावित हो चुका था। इनमें मात्र अपने-अपने वर्ग की कुंठाओं को सार्वजनिक करने और दूसरे वर्गों की भावनाओं की अनदेखी करने की प्रबल इच्छाओं ने हिंदी कथा-साहित्य को केवल उन पाठकों तक ही सीमित कर रखा है जो सिर्फ़ उनके ही वर्गों से संबंध रखते हैं। यह तो कुछ-कुछ वैसा ही है जैसाकि हम सड़क से गुजरते हुए किसी दुर्घटना में घातक रूप से घायल किसी व्यक्ति को देखकर उसकी जाति या उसका वर्ग-संप्रदाय पूछते हैं और यदि वह हमारी जाति, धर्म-संप्रदाय का नहीं हुआ तो हम मुँह फ़ेरकर चलते बनते हैं। अभी कुछ ही दशक तो गुजरे हैं ऐसे वर्गवादी-गुटवादी कथाकारों के पल्लवित-पोषित होते हुए और उन्होंने यह चलन बना लिया है कि वे पीड़ित मानवता और विभीषक सामाजिक समस्याओं के लिए कुछ भी नहीं लिखेंगे; बस, लिखेंगे तो सिर्फ़ अपने समुदाय-संप्रदाय के हितार्थ जिसकी व्यापक तौर पर कोई सामाजिक और मानवीय सार्थकता हो या न हो। निःसंदेह, ऐसे लेखकों की सूची में बड़े-बड़े नामदार और दिग्गज कथाकार भी शुमार होते हैं। वे गोष्ठियाँ भी करते हैं तो सिर्फ़ अपने सीमित स्वार्थों के लिए अपने वर्ग-विशेष से संबंधित किसी ऐसे विषय पर जिसमें मानवीय स्पर्श का लेशांश भी नहीं होता। गोष्ठियों में आमंत्रित भी करते हैं तो केवल उन्हें ही, जो उनकी ज़बान में बोल सकें और उनके ‘माउथपीस’ बन सकें।

कथा-साहित्य में बंटवारे और वर्ग-विभाजन की इस नव-सृजित परंपरा ने ख़ासकर पाठकों को बुरी तरह से हतोत्साहित कर रखा है और साहित्य को उनके लिए अस्पृश्य बना रखा है। साहित्य के लिए चिंताग्रस्त हम जैसे चहेते इस कोशिश में फिर से लगे हुए हैं कि किस तरह से साहित्य को मुख्य धारा में लाया जाए ताकि इसे हर वर्ग के पाठक दत्तचित्त होकर पढ़ सकें और समाज के सौष्ठवीकरण के लिए साहित्य से अभिप्रेरित हो सकें। दलित कथाकार दलित वर्गों की दलितावस्था और उनके लिए ख़ास सुविधा-व्यवस्था निर्धारित करने का रोना रोते हैं जबकि वामपंथी कहानीकार मुस्लिमों की निराधार समस्याओं और नक्सलियों का पक्ष प्रस्तुत करते हुए राष्ट्रीयता को ढकोसला करार देते हैं। दक्षिणपंथी कथाकारों को भी खोखले राष्ट्रवाद की सड़ी हुई सांस्कृतिक विरासत सहेजने की पड़ी होती है और वे आम आदमी की उपस्थिति को एक सिरे से ख़ारिज़ कर देते हैं। ऐसे में, क्या वे, जैसाकि वे सोचते हैं, ‘एक-विश्व, एक-राष्ट्र’ के सपने को साकार करने का दमख़म दिखा सकते हैं। बिल्कुल नहीं, क्योंकि वे अपने निहित स्वार्थों के ग़ुलाम हैं। दकियानूस विचार-प्रवाह में बहते हुए एकांगिक होकर कहानी लिखने की इस धारा ने उनके आनुभविक ज्ञान पर भी पत्थर डाल रखा है। इसे ऐसा भी कहा जा सकता है कि इस प्रकार से उनके विचार-संप्रेषण में भी अत्यंत संकीर्णता आई है। घोर निराशाजनक तथ्य यह है कि कहानियों के समीक्षकों-आलोचकों की दृष्टि भी अपने-अपने खेमे के कहानीकारों पर ही टिकी होती है। उदाहरण के लिए वामपंथी आलोचक उदारवादी लेखकों की बखिया उधेड़ने से बाज़ नहीं आता। उसे कथा-साहित्य के सारे अच्छे लक्षण वामपंथी कथाकारों में ही नज़र आते हैं। इसके अतिरिक्त, वे किन्हीं संकीर्ण विचारधारा वाली लीक पर न चलकर व्यापक सामाजिक परास पर कहानियाँ लिखने वाले कथाकारों को भी घसीटकर अपने खेमे में ले जाने के लिए विवश करते हैं। यह तो बिल्कुल वैसा ही है जैसाकि सातवीं सदी के उत्तरवर्ती काल में अरब देशों के आततायियों ने यहाँ ज़बरन घुसकर यहाँ की बहुसंख्यक जनता का धर्म-परिवर्तन करने के लिए सारे साम-दाम-दंड भेद नीति पर अमल किया था। वामपंथ की आँधी में बहने वाले कथाकारों को यह समझाना कि यह दुनिया प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण है, यहाँ भिन्न-भिन्न जातियों-प्रजातियों तथा वर्गों-संप्रदायों के लोग साथ-साथ रह सकते हैं, मानव समाज स्नेह-सहानुभूति से ही खुशहाल बना रह सकता है, धनी व्यक्ति भी मानवीय भावनाओं से ओतप्रोत होकर समतावादी समाज के सृजन के लिए उत्सुक होता है, ग़रीबी की महामारी का प्रकोप कुछ ख़ास जातियों पर ही नहीं होता है, शोषक-शोषित वर्गों की कोई विशेष जाति नहीं होती है आदि-आदि जैसी बातें नाको चने चबाने जैसी ही है। हम ऐसे दकियानूस ‘बुद्धिजीवियों’ का कभी हृदय-परिवर्तन नहीं कर सकते।

अब एक सवाल यह उठता है जो विचारणीय भी है और जिस पर न केवल हम कथाकारों और कथा-साहित्य के आलोचकों-समीक्षकों को गहन चिंतन-मंथन भी करना है—कि हम गुट-निरपेक्ष होकर कहानियाँ क्यों नहीं लिखते? हम जैसा-कुछ मानव-समाज में घटित हो रहा है—उसे उसी रूप में अपनी कहानियों में पेश क्यों नहीं करते? कथाकार इतना आत्मकेंद्रित होकर कहानियों में केवल आत्मप्रवंचना क्यों कर रहा है? प्रेमचंद्र जी की तर्ज़ पर किसी हामिद को पात्र बनाकर, प्रसाद की तरह अरुण और मधूलिका को प्रेमी-प्रेमिका बनाकर, जैनेन्द्र के ‘बहादुर’ की भाँति गरीब-मेहनती बच्चे का सामाजिक हतावस्था का चित्रण और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करके, रेणु के ‘हिरामन की गाड़ी’ को केंद्र में रखकर, महादेवी वर्मा के नाचीज़ जीव ‘गिल्लू’ (गिलहरी) के साथ अपनी समस्त मानवीय संवेदना जोड़कर, अमरकान्त के शकलदीप के रूप में बाप की भूमिका में रखकर, अमृतलाल के राजबहादुर गिर्राज की तरह अक्खड़ मिजाज़ के पात्र जैसा चित्रांकन करके, दूधनाथ की तरह मर्दुमशुमारी कराकर (अम्माएँ), पदुमलाल पन्नालाल बख्शी की तरह वृद्धावस्था की आत्मसंतुष्टि वर्णित करके, भीष्म साहनी की तर्ज़ पर एक गाड़ी के भीतर का और स्टेशन का मार्मिक वर्णन प्रस्तुत करके (अमृतसर आ गया है), मनोहर श्याम जोशी के यशोधर बाबू की तरह सभी से शिकायत रखने वाले पात्र को सामने रखकर, अमृत राय की भाँति व्यथा की सरगम सुनाकर, आचार्य चतुरसेन शास्त्री की तर्ज़ पर भूख को मूर्त बनाकर (फंदा), कमलेश्वर की तरह माँ के मुख से राजा निर्बंसिया की कहानी सुनाकर, रवींद्र कालिया की तरह बे-शादीशुदा और बेफ़िक्र भैंगे की ज़िंदग़ी में कैलिडोस्कोप की तरह झाँककर, काशीनाथ सिंह की तरह अकाल का ब्योरा देकर, राहुल सांकृत्यायन की भाँति विश्वाटन को ज़िंदग़ी बनाकर आदि-आदि जैसे कथानकों की तर्ज़ पर, व्यापक परास में कथाकार कहानियों का ताना-बाना क्यों नहीं बुनना चाहता है जिसके साथ हर वर्ग, हर समाज, हर वय और हर लिंग का पाठक स्वयं को जोड़ सके तथा आत्मीय हो सके। अत्यंत निजता से अपनी ही आपबीतियों को कथानक बनाकर एकांगिक कहानियों को सरासर ख़ारिज़ किया जाना चाहिए।

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आज कहानियों में सामाजिक समस्याएँ मुखर न होकर, व्यक्तिगत समस्याओं का निरूपण धड़ल्ले से हो रहा है। प्रायः ऐसा लगता है कि कथाकार अपनी कहानियों में अपनी रामकहानी बयां कर रहा है। कतिपय नामचीन कथाकारों की भी ऐसी ही मनोवृत्ति है। ध्यातव्य है कि आप किसी वरिष्ठ और ख्यात कथाकार के पास जाएं और उसे अपनी कहानियाँ दिखाएं तो वह मिलते ही आपसे प्रसन्न-मुद्रा में कहेगा कि आपकी कहानियों में आपका जीवन झाँक रहा है और क्या आपकी अमुक कहानी में अमुक समस्या या घटना आपके जीवन से संबंधित है। इतना ही नहीं, यदि उसे लगता है कि आपकी अमुक कहानी आपके जीवन से संबंधित नहीं है तो वह मुँह बिचकाते हुए कहेगा कि यह क्या आपने लिख दिया। अर्थात वह कथाकार की कहानियों में व्यक्तिगत उपस्थिति से कोई गुरेज़ न करते हुए उसकी तारीफ़ करता है तथा अन्यथा लिखी हुई कहानियों से नाखुश होता है। यह स्थिति बड़ी विचित्र है। मैं यह नहीं कहता कि कहानियों में कहानीकार का अक्स नहीं आना चाहिए। आना तो चाहिए; पर, उसी सीमा तक, जहाँ तक वह अपनी आपबीतियों को बड़े परास पर आम ज़िंदग़ी से संबद्ध कर सकता है।

बहरहाल, क्या कहानियों में कथाकार का जीवन ही रूपायित होना चाहिए? अधिकतर वर्तमान कथाकारों के पात्र आत्ममुग्ध हैं और उन्हें दुनिया में स्वयं के सिवाय अन्यों का हित दिखाई ही नहीं देता। उन्हें अपने जैसा लेखक कहीं दूर-दूर तक नज़र नहीं आता; अपने जैसी सूक्ष्म दृष्टि रखने वाला कोई सामाजिक चितेरा दिखाई नहीं देता; स्वयं जैसा कालजयी रचनाएँ देने वाला रचनाकार उनके पल्ले नहीं पड़ता। ऐसे में, उनके पात्र भी अत्यंत कुंठित, मायोपिक, विषादग्रस्त और आत्मकेंद्रित से लगते हैं और पाठकों को तो वे परग्रही जीव जैसे दुर्लभ लगते हैं; लेकिन, उन्हें पाठक स्वयं से जोड़ पाने में असमर्थ पाता है। निःसंदेह, ये कथाकार ऐसे ही पात्रों का सृजन करने में दत्तचित्त हैं। इसे हम दूसरे शब्दों में उनकी कूपमंडूकता भी कह सकते हैं।

एक वरिष्ठ कथाकार का यह कहना भी मुझे नामुनासिब नहीं लगता है कि आज की कहानियों में हमारे समाज की ज्वलंत समस्याएं ऐसे ग़ायब हैं जैसेकि गधे के सिर से सींग। कहानियों में सामाजिक जीवन के यथार्थपरक विश्लेषण देने की चिंता में बहुत गिरावट आई है। कथाकार का “ईगो” इन समस्याओं के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बनकर आता है। ग़रीबी, बेकारी, जनसंख्या विस्फ़ोट, धर्मांधता, लंपटता, अफ़वाहतंत्र का बढ़ता नेटवर्क, मीडिया का पक्षपातपूर्ण रवैया, फ़ैशन में नग्नता का प्रदर्शन, बौद्धिक छिछलापन, बाज़ारवाद में जकड़ता समाज, सभी मानवीय गतिविधियों का इंटरनेटीकरण, सोशल मीडिया के फुसलाहट और झाँसेपन में उलझता आदमी, इलेक्ट्रॉनिक प्रविधियों में लिप्तता के कारण लुप्तप्राय होते मानवीय संबंध-संसर्ग, आदमी का सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति उदासीनता, राज-प्रदत्त सुविधाओं का अनुचित वितरण, प्रेम का अनैतिक व्यापार, देह-व्यापार, मानव तस्करी, थर्ड जेंडर की सामाजिक स्वीकार्यता में अड़चनें, संस्थाओं एवं निकायों आदि में आम आदमी के पैसे को धुआंधार लूटने-ऐंठने की कुप्रवृत्ति, स्त्रियों की स्वयं के प्रति बदलती सोच और बाजारीकरण के दौड़ में शामिल होने में नैतिकता का अपरदन, सियासतदारी का उद्योगीकरण, जातीय एवं वर्णगत बढ़ता द्वेष, चिकित्सा-व्यवसाय जैसे क्षेत्र में डॉक्टरों और आरोग्य केंद्रों-अस्पतालों का नैतिक पतन, युवाओं में बढ़ता यौन अपराध, अविवाहित जोड़ों की बढ़ती संख्या या दूसरे शब्दों में ‘लिव-इन’ का बढ़ता प्रचलन, पति-पत्नी की साहचर्य के प्रति जुगुप्सा और तलाक़ की बढ़ती घटनाएं, भाषाई द्वेष, संयुक्त परिवार के बजाय न्यूक्लियर परिवारों का बढ़ता फ़ैशन, वृद्धों की उपेक्षा, योग्यता के बजाय धन का बढ़ता वर्चस्व, प्रकृति का अत्यधिक क्षरण, जलाभाव और प्रदूषण, अतीत के प्रति घृणा, अस्मिता और वर्चस्व के लिए लड़ाई आदि-आदि जैसे असंख्य विषय कहानियों में केंद्रीभूत होने चाहिएं।

कहानियाँ भड़ास निकलने का माध्यम नहीं बननी चाहिएं। अगर किसी व्यक्ति के मन में किसी व्यवस्था, किसी समुदाय या किसी व्यक्ति के प्रति विरोधी विचार हैं तो सोशल मीडिया है ना, इस प्रयोजन को पूरा करने के लिए। भड़ास निकालने के लिए कहानियाँ क्यों लिखी जाएं क्योंकि इस प्रवृत्ति से कहानी का स्वरूप बदरंग होता है, विरूपित होता है। कथा-साहित्य न केवल हिंदी और अन्य सभी भारतीय भाषाओं में, अपितु दुनियाभर की भाषाओं में जनमानस को सकारात्मक दिशा देते हुए सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम है। दुनियाभर में जब-जब कालजयी कहानियाँ लिखी गईं, समाज के निर्माण में सकारात्मक प्रवृत्तियों का योगदान आँका गया। यह तब हुआ जबकि व्यक्तिगत कुंठाओं के बजाय, सामाजिक कुंठाओं को स्वर दिया गया। स्वयं के अंतर्मन में पल रहे अवसादों को सार्वजनिक करने के बजाय, पूरे समाज के जनमानस में सड़ांध पैदा कर रहे अवसादों को कुरेद-कुरेद कर निकालने के लिए कथानक बुना जाए।

(नोट--मैं उन कथाकारों के नामों और रचनाओं का उल्लेख इस आलेख में नहीं कर रहा हूँ, जिनकी कहानियाँ आत्मप्रवंचनात्मक हैं। क्योंकि यह कुछ-कुछ व्यक्तिगत आक्षेप जैसा प्रतीत होगा। कृपया, कथा-साहित्य के संबंध में अगले आलोचनात्मक आलेख का इंतज़ार करें!)

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जीवन-चरित

लेखकीय नाम: डॉ. मनोज मोक्षेंद्र {वर्ष 2014 (अक्तूबर) से इस नाम से लिख रहा हूँ। इसके पूर्व 'डॉ. मनोज श्रीवास्तव' के नाम से लेखन}

वास्तविक नाम (जो अभिलेखों में है) : डॉ. मनोज श्रीवास्तव

पिता: (स्वर्गीय) श्री एल.पी. श्रीवास्तव,

माता: (स्वर्गीया) श्रीमती विद्या श्रीवास्तव

जन्म-स्थान: वाराणसी, (उ.प्र.)

शिक्षा: जौनपुर, बलिया और वाराणसी से (कतिपय अपरिहार्य कारणों से प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित रहे) १) मिडिल हाई स्कूल--जौनपुर से २) हाई स्कूल, इंटर मीडिएट और स्नातक बलिया से ३) स्नातकोत्तर और पीएच.डी. (अंग्रेज़ी साहित्य में) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से; अनुवाद में डिप्लोमा केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो से

पीएच.डी. का विषय: यूजीन ओ' नील्स प्लेज़: अ स्टडी इन दि ओरिएंटल स्ट्रेन

लिखी गईं पुस्तकें: 1-पगडंडियां (काव्य संग्रह), वर्ष 2000, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 2-अक़्ल का फलसफा (व्यंग्य संग्रह), वर्ष 2004, साहित्य प्रकाशन, दिल्ली; 3-अपूर्णा, श्री सुरेंद्र अरोड़ा के संपादन में कहानी का संकलन, 2005; 4- युगकथा, श्री कालीचरण प्रेमी द्वारा संपादित संग्रह में कहानी का संकलन, 2006; चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह), विद्याश्री पब्लिकेशंस, वाराणसी, वर्ष 2010, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 4-धर्मचक्र राजचक्र, (कहानी संग्रह), वर्ष 2008, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 5-पगली का इंक़लाब (कहानी संग्रह), वर्ष 2009, पाण्डुलिपि प्रकाशन, न.दि.; 6.एकांत में भीड़ से मुठभेड़ (काव्य संग्रह--प्रतिलिपि कॉम), 2014; 7-प्रेमदंश, (कहानी संग्रह), वर्ष 2016, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 8. अदमहा (नाटकों का संग्रह) ऑनलाइन गाथा, 2014; 9--मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में राजभाषा (राजभाषा हिंदी पर केंद्रित), शीघ्र प्रकाश्य; 10.-दूसरे अंग्रेज़ (उपन्यास); 11. संतगिरी (कहानी संग्रह), अनीता प्रकाशन, ग़ाज़ियाबाद, 2017; चार पीढ़ियों की यात्रा-उस दौर से इस दौर तक (उपन्यास) पूनम प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, 2018; 12. महापुरुषों का बचपन (बाल नाटिकाओं का संग्रह) पूनम प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, 2018; चलो, रेत निचोड़ी जाए, नमन प्रकाशन, 2018 (साझा काव्य संग्रह) आदि

संपादन: महेंद्रभटनागर की कविता: अन्तर्वस्तु और अभिव्यक्ति”

संपादन: “चलो, रेत निचोड़ी जाए” (साझा काव्य संग्रह)

--अंग्रेज़ी नाटक The Ripples of Ganga, ऑनलाइन गाथा, लखनऊ द्वारा प्रकाशित

--Poetry Along the Footpath अंग्रेज़ी कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य

--इन्टरनेट पर 'कविता कोश' में कविताओं और 'गद्य कोश' में कहानियों का प्रकाशन

--वेब पत्रिकाओं में प्रचुरता से प्रकाशित

--महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल, वर्धा, गुजरात की वेबसाइट 'हिंदी समय' में रचनाओं का संकलन

--सम्मान--'भगवतप्रसाद कथा सम्मान--2002' (प्रथम स्थान); 'रंग-अभियान रजत जयंती सम्मान--2012'; ब्लिज़ द्वारा कई बार 'बेस्ट पोएट आफ़ दि वीक' घोषित; 'गगन स्वर' संस्था द्वारा 'ऋतुराज सम्मान-2014' राजभाषा संस्थान सम्मान; कर्नाटक हिंदी संस्था, बेलगाम-कर्णाटक द्वारा 'साहित्य-भूषण सम्मान'; भारतीय वांग्मय पीठ, कोलकाता द्वारा ‘साहित्यशिरोमणि सारस्वत सम्मान’ (मानद उपाधि); प्रतिलिपि कथा सम्मान-2017 (समीक्षकों की पसंद); प्रेरणा दर्पण संस्था द्वारा ‘साहित्य-रत्न सम्मान’ आदि

"नूतन प्रतिबिंब", राज्य सभा (भारतीय संसद) की पत्रिका के पूर्व संपादक

"वी विटनेस" (वाराणसी) के विशेष परामर्शक, समूह संपादक और दिग्दर्शक

'मृगमरीचिका' नामक लघुकथा पर केंद्रित पत्रिका के सहायक संपादक

हिंदी चेतना, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, कथाक्रम, समकालीन भारतीय साहित्य, भाषा, व्यंग्य यात्रा, उत्तर प्रदेश, आजकल, साहित्य अमृत, हिमप्रस्थ, लमही, विपाशा, गगनांचल, शोध दिशा, दि इंडियन लिटरेचर, अभिव्यंजना, मुहिम, कथा संसार, कुरुक्षेत्र, नंदन, बाल हंस, समाज कल्याण, दि इंडियन होराइजन्स, साप्ताहिक पॉयनियर, साहित्य समीक्षा, सरिता, मुक्ता, रचना संवाद, डेमोक्रेटिक वर्ल्ड, वी-विटनेस, जाह्नवी, जागृति, रंग अभियान, सहकार संचय, मृग मरीचिका, प्राइमरी शिक्षक, साहित्य जनमंच, अनुभूति-अभिव्यक्ति, अपनी माटी, सृजनगाथा, शब्द व्यंजना, साहित्य कुंज, मातृभाषा डॉट कॉम वैचारिक महाकुम्भ, अम्स्टेल-गंगा, इ-कल्पना, अनहदकृति, ब्लिज़, राष्ट्रीय सहारा, आज, जनसत्ता, अमर उजाला, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, कुबेर टाइम्स आदि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, वेब-पत्रिकाओं आदि में प्रचुरता से प्रकाशित

आवासीय पता:--सी-66, विद्या विहार, नई पंचवटी, जी.टी. रोड, (पवन सिनेमा के सामने), जिला: गाज़ियाबाद, उ०प्र०, भारत. सम्प्रति: भारतीय संसद में संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत

ई-मेल पता: drmanojs5@gmail.com

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