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मैडम जी - लघुकथा - सुशील शर्मा

"मास्साब लेट हो गए स्कूल का टाइम तो साढ़े दस बजे है। "सरपंच गाँव के बाहर बैठा जैसे इंतजार ही कर रहा था।

"जी वो बस लेट हो गई थी पानी भी गिर रहा है। 'मास्टरजी को गुस्सा तो आ रहा था लेकिन समय की नज़ाकत देखते हुए मुस्कुरा कर बोले।

"ये बात तो है इसलिए तो मैंने कलेक्टर साहब को फोन नहीं लगाया वरना गाँव वाले तो शिकायत के लिए तैयार थे। "सरपंच धूर्तता पूर्वक हँसा।

कलेक्टर की बात सुनकर थोड़ा डर मन में लगा फिर चापलूसी भरे स्वर में कहा -
"जी आपका बहुत धन्यवाद। "

"मास्साब कल से समय पर आइयेगा वरना आप जानें। "सरपंच ने चेतावनी भरे लहजे में कहा।

उसी समय स्कूल की मैडम आईं।

"सरपंच जी नमस्ते "मैडम ने मुस्कुरा कर कहा।

"धन्यभाग मैडम जी हमारे ऐसे गिरते पानी में काहे को आईं आप। "सरपंच विनयवत होकर बोला।

"मैंने सोचा एक सप्ताह से ज्यादा हो गया है स्कूल घूम आऊँ वरना सरपंच जी नाराज न हों जाएँ। 'मैडम जी ने मुस्कुराते हुए कहा।

"अरे आप तो हमारे नेताजी की बहु हैं हमारी इतनी औकात नहीं कि आप से कुछ कहें हें हें हें। ....... 'सरपंच ने हँसते हुए कहा।

"जी आपका धन्यवाद। "मैडम जी ने मुस्कुराते हुए कहा।

"मास्टर जी जा कर मैडम जी का हाज़री रजिस्टर ले आओ वो यही से दस्तखत करके वापिस हो जाएँगी पानी का मौसम हो रहा है। "सरपंच चापलूसी भरे स्वर में बोला।
मास्टर जी बुरा सा मुँह बनाये रजिस्टर ले आये मैडम ने हस्ताक्षर किये और से वापिस हो गईं।

"मास्टरजी कल से जरा जल्दी आकर घर पर मेरे बच्चों को पढ़ा दिया करें स्कूल में तो आप पढ़ते नहीं हैं। "सरपंच ने व्यंगात्मक स्वर में मास्टर जी को आदेश दिया।
मास्टरजी सोच रहे थे काश वो मैडम होते।

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