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भीष्म साहनी : जैसा जिया वैसा लिखा - वीणा भाटिया


विभाजन की त्रासदी पर ‘तमस’ जैसा कालजयी उपन्यास लिखने वाले भीष्म साहनी प्रेमचंद की परंपरा के साहित्यकार हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी भीष्म साहनी ने कथा साहित्य के अलावा नाटक, जीवनी, अनुवाद और बाल साहित्य में भी महत्वपूर्ण योगदान किया। भीष्म साहनी का संपूर्ण लेखन आज के समय के यथार्थ के प्रमुख द्वंद्वों को सामने लाता है और प्रेमचंद ने जिसे साहित्य की कसौटी माना था, उस पर पूरी तरह खरा उतरता है।


प्रेमचंद ने लिखा था – “हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो, जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।“ देश की आजादी के बाद जिन लेखकों ने युगीन यथार्थ और उसकी चुनौतियों को अपनी रचनाओं में सामने रखा, भीष्म साहनी उनमें प्रमुख हैं। भीष्म साहनी उन प्रगतिशील लेखकों में अग्रणी हैं, जिन्होंने अपने साहित्य में आम जन के जीवन और उसके संघर्षों को स्वर दिया।
अपने विपुल और बहुआयामी लेखन से भीष्म साहनी ने न केवल हिंदी, बल्कि विश्व साहित्य को समृद्ध किया है। भीष्म साहनी के लेखन का फलक काफी विस्तृत है। इसे उनकी कहानियों, उपन्यासों और नाटकों को पढ़कर आसानी से महसूस किया जा सकता है। उत्पीड़ित, शोषित और वंचित वर्ग की मुक्ति की आकांक्षा उनके लेखन का मूल स्वर है। अपनी रचनाओं में उन्होंने जहां शोषण और दमन पर आधारित समाज के कड़वे यथार्थ को परत-दर-परत उजागर किया है, वहीं शोषणमुक्त और स्वतंत्र समाज के निर्माण का चिर स्वप्न भी वहां संचित है। भीष्म साहनी ने स्वयं विभाजन के दर्द को झेला और महसूस किया था।

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भारत में ब्रिटिश राज की कुटिल नीतियों को समझने के साथ ही उन्होंने यह महसूस कर लिया था कि वास्तविक आजादी तभी मिल सकती है, जब सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में बुनियादी बदलाव हो। वे आजाद भारत के शासकों के छल-छद्म को भी भली-भांति समझते थे और जनसंघर्षों की दशा और दिशा को भी। आजादी के बाद महानगरों और शहरों में उभरने वाले मध्य वर्ग की औपनिवेशिक मानसिकता और संवेदनहीनता को भी उन्होंने देखा और महसूस किया था, तभी वे उन अमानवीय और विडंबनापूर्ण परिस्थितियों का चित्रण कर सके, जो उनकी कहानियों में दिखाई पड़ती हैं। ‘चीफ़ की दावत’, ‘वांड़्चू’, ‘ओ हरामजादे!’, ‘रामचंदानी’, ‘शोभायात्रा’, ‘मेड इन इटली’, ‘लीला नंदलाल की’, ‘गंगो का जाया’, ‘चीलें’ और न जाने कितनी कहानियों में यही कड़वा सच सामने आया है। सांप्रदायिक दंगों और उनकी त्रासदी, जिसका प्रत्यक्ष अनुभव उन्होंने किया था, ‘अमृतसर आ गया है’ जैसी कहानियों में उभर कर सामने आई है।


सांप्रदायिकता के सवाल पर उन्होंने ‘कबिरा खड़ा बाज़ार में’ जैसा नाटक लिखा। भूलना नहीं होगा कि आज सांप्रदायिकता का सवाल भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गया है और ऐसे हालात बनते जा रहे हैं, जिसमें आम आदमी घुटन, संत्रास और वंचना में जीने को मजबूर है। ऐसे में, भीष्म साहनी का साहित्य बहुत ही प्रासंगिक हो गया है।


भीष्म साहनी का जन्म 8 अगस्त, 1915 को रावलपिंडी में एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। वह अपने पिता हरबंस लाल साहनी तथा माता लक्ष्मी देवी की सातवीं संतान थे। 1935 में लाहौर के गवर्नमेंट कालेज से अंग्रेजी में एम.ए. करने के बाद पारिवारिक व्यवसाय को संभालने के साथ ही वे एक कॉलेज में अवैतनिक प्राध्यापक भी हो गए।
थिएटर में रुचि होने के कारण वे भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) से जुड़कर काम करने लगे। उनके बड़े भाई प्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी भी इप्टा से जुड़े थे। भीष्म साहनी ने विद्यार्थी जीवन से ही लिखना शुरू कर दिया था। उनकी पहली कहानी ‘अबला’ इंटर कालेज की पत्रिका रावी में तथा दूसरी कहानी ‘नीली आंखें’ अमृतराय के सम्पादन में निकलने वाली पत्रिका ‘हंस’ में छपी। आजादी के बाद उनका परिवार भारत आ गया था। यहां इप्टा के साथ वे प्रगतिशील लेखक संघ और अफ्रो-एशियाई लेखक संघ से जुड़े। आगे चल कर वे अफ्रो-एशियाई लेखक संघ के महासचिव भी बने।


भीष्म साहनी ने विदेशी भाषा प्रकाशन गृह, मॉस्को, सोवियत संघ में अनुवादक के रूप में 1957 से 1963 तक काम किया। इसके बाद भारत लौटने पर उन्होंने ऐतिहासिक दिल्ली कॉलेज में लंबे समय तक अध्यापन किया। 1965 से 1967 तक उन्होंने ‘नई कहानियां’ का संपादन भी किया।


उनकी प्रमुख कृतियां हैं – तमस, झरोखे, कड़ियां, बंसती, मैय्यादास की माड़ी, नीलू नीलिमा नीलोफर (उपन्यास), भटकती राख, भाग्यरेखा, पहला पाठ, पटरियां, वाड़्चू, प्रतिनिधि कहानियां (कहानी संग्रह), हानूश, कबिरा खड़ा बाजार में, माधवी, मुआवजे (नाटक)। इसके अलावा उन्होंने ‘मेरे भाई बलराज’, ‘अपनी बात’, ‘मेरे साक्षात्कार’ किताबें लिखीं। दुनिया के प्राय: सभी बड़े साहित्यकारों ने बच्चों के लिए जरूर लिखा है। भीष्म साहनी ने भी बच्चों के लिए ‘वापसी’ और ‘गुलेल का खेल’ जैसी किताबें लिखीं।

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11 जुलाई, 2003 को अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले ‘आज के अतीत’ नाम से उनकी आत्मकथा का प्रकाशन हुआ। 1986 में उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘तमस’ पर टेलीविजन सीरियल बना, जिसमें उन्होंने खुद अभिनय भी किया था। उन्होंने कुछ फिल्मों में भी अभिनय किया, जिनमें ‘मोहन जोशी हाज़िर हो’ प्रमुख है। भीष्म साहनी को 1975 में ‘तमस’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 1980 में उन्हें अफ्रो-एशियाई लेखक संघ का लोटस अवॉर्ड मिला। 1983 में उन्हें सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड और 1998 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।


भीष्म साहनी गहन मानवीय संवेदना से भरपूर साहित्यकार थे। वे बहुत ही विनम्र और मृदुभाषी थे। नए लेखकों से बहुत ही प्रेम और उत्साह से मिला करते थे और हर संभव उनका सहयोग करते थे। भीष्म साहनी की सबसे बड़ी खासियत थी कि उन्होंने जैसा जीवन जिया, जिन संघर्षों को झेला, उसी का चित्रण किया। उनके लिए रचना कर्म और जीवन में कोई भेद नहीं था। भीष्म साहनी हमेशा शोषणविहीन समतावादी समाज की स्थापना के लिए संघर्ष के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध रहे और उनका रचना कर्म भी इसी उद्देश्य से प्रेरित रहा।
ईमेल -  vinabhatia4@gmail.com

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