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पुस्तक समीक्षा : सर्जिकल स्ट्राइक ( उपन्यास)

पुस्तक समीक्षा :

पुस्तक का नाम : सर्जिकल स्ट्राइक ( उपन्यास)

लेखक : ईश कुमार गंगानिया

प्रकाशक : नोशन प्रेस

पृष्ठ : 158 मूल्य : रु.199/-

उपन्यासकार का परिचय :

भारतीय समाज में मौजूद विभिन्‍न प्रकार की कुरीतियों, विषमताओं और साम्‍प्रदायिकता ने ईश कुमार गंगानिया को इस हद तक उद्वेलित किया कि वे एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में इसके खिलाफ वैचारिक जंग के लिए वैचारिक रूप से मुखर हो गए। अलग-अलग मोर्चों पर, बीस वर्षों के संघर्ष ने गंगानिया को पन्‍द्रह पुस्तकों का लेखक बना दिया, जिनमें तीन कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह, दो मूलनिवासी अस्मिता संघर्ष पर आधारित, एक अन्‍ना आंदोलन 2012 और शेष आठ पुस्‍तकें साहित्यिक आलोचना और समसामयिक मुद्दों पर निबंधों का संकलन हैं। लेखक ने आठ वर्षों से अधिक हिन्‍दी आलोचना की त्रैमासिक हिन्‍दी पत्रिका ‘अपेक्षा’ में सह-संपादक के रूप में कार्य किया और एक बाई-लिंग्‍वल मासिक पत्रिका ‘आजीवक विज़न’ का स्‍वतंत्र संपादन किया।

सर्जिकल स्ट्राइक (उपन्यास):समय के साथ सार्थक संवाद

समीक्षक : ‘तेजपाल सिंह तेज’

गंगानिया का सद्य प्रकाशित उपन्‍यास ‘सर्जिकल स्‍ट्राइक’ मेरे सामने हैं। इसमें कुल तेरह अध्याय है। यह उपन्यास पुलवामा के आतंकवादी हमले पर आ‍धारित है। फलत: पुलवामा के शहीदों के बलिदान और उनके परिवारों को ही समर्पित है। इस उपन्यास में खास बात ये है कि उपन्‍यास का नायक आजीवक बाबू इस हमले को केन्द्र में रखकर समाज, राजनीति और देश पर पड़ने वाले दुष्‍प्रभावों को लेकर अलग-अलग मोर्चों पर जैसे सर्जिकल स्‍ट्राइक करता है और उपन्‍यास के कैनवास और जीवंत चित्रण को व्‍यापकता प्रदान करता है। गंगानिया जी सेवानिवृत्ति के बाद के समय को एक मिशन की तरह सामाजिक तानेबाने की सुदृड़ता और देश के गौरव के लिए आजीवन संघर्ष के लिए कृतसंकल्‍प हैं।

साहित्यिक दृष्टिकोण से माना जाता है कि कथा साहित्य का उदय संभवत: कहानी-लेखन से संभव हो सका है। यह भी माना जाता है कि उपन्यास का उदय लम्बी कहानियों के लेखन के प्रादुर्भाव के साथ-साथ हुआ है। किंतु कहानी और उपन्यास के बीच जो खास अंतर है, उसे समझने के लिए ज्यादा उलझन का सामना नहीं करना पड़ता। दरअसल, कहानी जीवन तथा समाज के किसी विशेष भाग को विश्‍लेषित करती है जबकि अर्नेस्ट ए. बेकर ने उपन्यास की परिभाषा देते हुए उसे गद्यबद्ध कथानक के माध्यम द्वारा जीवन तथा समाज की व्याख्या का सर्वोत्तम साधन बताया है। अर्थात विश्वसाहित्य का प्रारंभ ही संभवत: कहानियों से ही हुआ, इस मानने में कोई संदेह शायद नहीं रहता।

यह भी कि साहित्य में गद्य का प्रयोग जीवन के यथार्थ चित्रण का द्योतक रहा है। उपन्यास के जरिए साधारण बोलचाल की भाषा द्वारा लेखक के लिए अपने पात्रों, उनकी समस्याओं, विचारों तथा उनके जीवन की व्यापक पृष्ठभूमि से प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करना आसान होता है। इस संबंध में एक सत्य उजागर कर दूं कि ईश कुमार गंगानिया जी के प्रस्तुत उपन्यास ‘सर्जिकल स्‍ट्राइक’ से पूर्व उनका ‘इंट्यूशन’ शीर्षांकित एक कहानी संग्रह, तीन काव्‍य संग्रह तथा आलोचना की दर्जनभर पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अत: उपन्यास लिखने की उनकी कोशिश अनायास नहीं है। गंगानिया जी ने अपने इस उपन्यास में जीवन की विसंगतियों के व्‍यापक चित्रण प्रस्तुत करने में ही उपन्यास-लेखन की कला को प्राथमिकता प्रदान करते हुए समय के साथ एक सार्थक संवाद करने का साहस किया है।

लेखक का मानना है कि मैं लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था का मुरीद हूं। मुझे देश के लोकतांत्रिक तानेबाने से खिलवाड़ कतई पसंद नहीं है...और किसी भी जिम्‍मेदार शहरी को ऐसा खिलवाड़ पसंद नहीं होना चाहिए। इसलिए राष्‍ट्रहित में प्रत्‍येक जिम्‍मेदार नागरिक को इसके विरुद्ध खड़ा होना चाहिए। मेरा उपन्‍यास ‘सर्जिकल स्‍ट्राइक’ लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्‍यों के समर्थन में एक ज़़ज्‍बाती जंग है। मेरा मानना है कि यह जंग किसी भी लेखक के मनोरंजन का साधन नहीं हो सकती। जाहिर है, किसी पाठक के मनोरंजन का भी साधन नहीं। मेरे लिए इस जंग का हिस्‍सा होना मेरी मजबूरी है...एक जिम्‍मेदारी है। मैंने यह उपन्‍यास इसलिए नहीं लिखा कि मेरे पास उपन्‍यास लेखन की कोई विशेष कला है...या उपन्‍यास की दुनिया में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना मेरा मकसद है। मुझे यह माध्‍यम अपनी बात कहने के लिए उपयुक्त लगा। इसलिए मैंने उपन्‍यास को अपनी बात कहने का माध्‍यम बनाया है।

उपन्‍यास लिखने के पीछे समाज में कुछ ऐसी हिंसक घटनाओं का बढ़ जाना है जो लोकतंत्र को सीधे चुनौती देती नजर आती हैं...शासन-प्रशासन और सरकार की नीयत को संदिग्‍ध बनाती हैं। इसलिए अराजक तत्‍वों में न किसी कानून का खोफ रह गया है...न किसी पुलिस प्रशासन का और न ही किसी न्‍याय प्रक्रिया का। देश की लगभग सभी संवैधानिक संस्‍थाएं जैसे वैंटिलेटर पर आ गई हैं और कृत्रिम ऑक्‍सीजन पर जिंदा हैं। यह गंभीर चिंता की बात है...इलैक्‍ट्रानिक मीडिया ने इस चिंता को और अधिक बचैनी में परिवर्तित कर छोड़ा है। मीडिया मुझे क्रिकेट की आईपीएल की टीम की तर्ज पर ‘इंडियन मीडिया परिमियर लीग’ यानी आई.एम.पी.एल. जैसी भूमिका में नजर आता है जो बराबर मीडिया-मीडिया खेले जा रहा है। या तो यह अपने लिए बैटिंग कर रहा है या अपने आका के लिए...देश और इसकी जनता के लिए इसकी बैटिंग सिरे से नदारद नजर आती है। देश के एक साधारण नागरिक द्वारा ‘सर्जिकल स्‍ट्राइक’ की बहुआयामी तस्‍वीर उपन्‍यास के माध्‍यम से पेपर पर उतारने की एक साधारण-सी कोशिश है...इसके अतिरिक्‍त कुछ ओर नहीं।

उनके यथोक्त कथन से स्पष्ट हो जाता है कि लेखक का यथार्थ के प्रति उनका आग्रह बिल्कुल नया है, ऐसा नहीं है...यह उनकी कविताओं और निबंधों में बेबाक तेवर के साथ बराबर अभिव्‍यक्‍त होता रहा है। उपन्‍यास का प्‍लाट ऊपरी तौर पर राजनीतिक नजर आता है लेकिन इसमें आम आदमी के जीवन से जुड़ा ऐसा कोई पहलू नही है जो इसकी विषयवस्‍तु से अछूता रह गया हो। कहने की आवश्‍यकता नहीं कि उन्होंने अपने आस-पास के परिदृष्य को ही अपने उपन्यास का विषय बनाया है। कल्पना की दुनिया से परे, उनका यह उपन्यास हवाबाजी की दुनिया से परे जीवन जीने वाले पाठकों को जरूर आकर्षित करेगा, ऐसा मेरा विश्‍वास है। इस उपन्‍यास में पात्रों की संख्‍या सीमित है लेकिन वैचारिक धरातल का कैनवास काफी व्‍यापक है। रोजमर्रा की घटनाओं को अपने उपन्यास का हिस्सा बनाकर उसे यथार्थवादी संवाद के रूप में प्रस्तुत किया है।

माना कि लेखक ने प्रस्तुत उपन्यास ‘सर्जिकल स्‍ट्राइक’ का प्‍लॉट यानी पृष्‍टभूमि यद्यपि पुलवामा के आतंकी हमले की बुनियाद पर खड़ा किया है लेकिन उपन्‍यास में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्‍यों को चुनौ‍ती देने वाले हर मुद्दे की सर्जरी को तरजीह दी गई है। इस सर्जरी में प्रयोग होने वाले औजारों को विशुद्ध रूप से स्‍टेरिलाइज़ यानी कीटाणु-रहित बनाने का भरसक प्रयास किया गया है। यह भी प्रयास किया गया है कि सिर्फ बीमार अंग का उपचार हो...उसी के साथ छेड़-छाड़ हो...काट-छांट हो...अन्‍य अंगों पर किसी भी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। इस सर्जरी के भावी सकारात्‍मक परिणाम के मद्देनजर पोस्‍ट-ऑप्रेटिव उपचार व इम्‍यूनिटी बरकरार रखने के भी खासे प्रयास किए गए हैं। इम्‍यूनिटी बरकरार रखने के लिए सिंधु-घाटी सभ्‍यता से लेकर बुद्ध-कालीन सोशियो-पॉलिटिकल उपचार पद्धति तक और बुद्ध कालीन सोशियो-पॉलिटिकल उपचार पद्धति से वर्तमान सोशियो-पॉलिटिकल उपचार पद्धति का सहारा लिया गया है। शेष पाठक वर्ग को तय करना है कि ये सर्जरी कितनी सार्थक है और कितनी नहीं...इ‍सलिए इस बिंदू और अधिक बात करना उपयुक्‍त नहीं होगा।

उपन्यास की विषयवस्तु से जान पड़ता है कि उपन्यास के पात्र आपस में समाज के प्रत्येक पहलू पर, फिर चाहे वह राजनीतिक मसले हों, सामाजिक विसंगतियों की कुरूपता हो, धार्मिक उठा-पटक की बात हो, सामाजिक अनेकता की बात हो, मूलधारा के साहित्य अथवा दलित लेखक संघों व साहित्‍यकारों की कारगुजारियां हों, बाबा साहेब अम्बेडकर की विचारधारा और उनकी विचारधारा की मान्यता को लेकर उठने वाले सवालों की बात हो, उपन्‍यास में सभी मुद्दों पर गर्मजोशीपूर्ण से चर्चा है...संवाद हैं। उपन्‍यास में पात्रों के स्‍वाभाविक विकास के लिए स्‍पेश की कोई कमी नजर नहीं आती। उपन्‍यासकार पात्रों के स्वाभाविक विकास और उनके चित्रण में कहीं भी हस्‍तक्षेप करता नजर नहीं आता। इसके चलते उपन्‍यासिक परिस्थितियों के साथ भी न्‍याय होता नजर आता है और पात्रों के साथ भी। कहा जा सकता है कि कई परिस्थितियों में उपन्‍यासकार का अलग तरह से सोचने का आग्रह जरूर नजर आता है लेकिन इसके पीछे पूर्वाग्रह न होना, लेखकीय ईमानदारी को रेखांकित करता है।

आज की जो समस्‍याएं हैं...चाहे भ्रष्‍टाचार है, साम्‍प्रदायिकता है, जातीय या धार्मिक अंहकार है, किसी प्रकार की मारपीट या कत्लेआम है या मौजूदा लोकतंत्र को चुनौती देने वाली जो कोई भी समस्‍याएं हैं, उनके कारणों की तलाश लेखक द्वारा इतिहास में बहुत पीछे तक जाकर की गई है। इस उपन्‍यास में उपलब्‍ध जानकारी के आधार पर निकाले गए निष्‍कर्ष किसी वर्ग-विशेष, जाति विशेष, सम्‍प्रदाय विशेष को अपटपटे लग सकते हैं...आहत करने वाले लग सकते हैं...लेकिन जैसे जिस्‍म से किसी कांटे को निकालने के लिए सुई या उससे बड़े व मजबूत कांटे का प्रयोग करना पड़ता है...उसी सुई व मजबूत कांटे का उपयोग मैंने भी उपन्‍यास में किया है।

कुल मिलाकर कथाकार कल्पना की दुनिया से दूर...यथार्थ की दुनिया का उल्लेख करता है इसलिए प्रस्तुत उपन्यास की ग्राह्यता और बढ़ जाती है। यथार्थ की परिधि के बाहर जाकर अनावश्‍यक मनचाही उड़ान न कथानक की मांग नजर आती है और न ही कथाकार इसके लिए कोई फालतू प्रयास की करता नजर आता है। उपन्‍यास की विषयवस्‍तु की विश्‍वसनीयता पाठकों को उपन्‍यास से जोड़े रखने में सहायक प्रतीत होती है। उनके इस उपन्यास का आविर्भाव और विकास उनके कहानी-लेखन के बाद का उपक्रम है जो व्यक्ति तथा समाज को व्‍यापक धरातल प्रदान करता है। यह जीवन की समस्याओं के प्रति एक नए दृष्टिकोण का तर्कयुक्‍त व व्‍यवहारिक दस्‍तावेज है। अंत में यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि कथाकार का दृष्टिकोण केवल बौद्धिक ही नहीं है। उपन्यासकार की कला-साधना समाज की समस्याओं को बारीकी से उकेरती है और व्यापक सामाजिक जागरूकता का मार्ग प्रशस्‍त करने की प्रबल क्षमता रखती है। प्रस्तुत उपन्यास में सामाजिक व राजनीतिक चेतना के क्रमिक विकास की कलात्मक प्रस्तुति है...अभिव्यक्ति है।

अधिकतर साहित्यकारों की मान्यता है कि जीवन का जितना व्यापक एवं सर्वांगीण चित्र उपन्यास में मिलता है उतना साहित्य के अन्य किसी भी रूप में उपलब्ध नहीं।...प्रस्तुत उपन्यास इस उक्ति पर खरा उतरता है, यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं। दरअसल, उपन्यासकार के लिए कहानी साधन मात्र है, साध्य नहीं। उसका ध्येय पाठकों का मनोरंजन मात्र भी नहीं...यह पाठक को समाज की समस्याओं की अनेक परतों से रूबरू कराते हुए उनके समाधान हेतु ठहर कर विचार करने को बाध्‍य करता है...व्‍यक्ति को मौजूदा परिस्थितियों के प्रति अपनी जिम्‍मेदारियों के निर्वहन के लिए उकसाता है...झकझोरता है। कथाकार की यही कला लेखन के प्रति ईमानदारी की ओर संकेत करती है।

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