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अख़बार वाला मूर्ति (लघुकथा) - देवी नागरानी

(देवी नागरानी के लघुकथा संग्रह - और गंगा बहती रही से लघुकथाएँ)


१॰ अख़बार वाला मूर्ति (लघुकथा)

हाँ वही तो है वह! पैंतीस साल पहले मेरे नये घर का दरवाजा खटखटाकर, शिष्टाचार के साथ सवाली आँखों से खड़ा था. दरवाजा खोलते हुए मैंने भी सवाली आँखों से बिना कुछ कहे कुछ पूछा !

"मैडम मैं पूरी कॉलोनी के लिये अख़बार लाता हूँ. आप को भी चाहिए तो बता दीजिए"

"अरे बहुत अच्छा किया! कल इतवार है और हर इतवार को हमारा सिंधी अख़बार 'हिंदवासी' आता है जो हर इतवार ज़रूर मुझे दीजिएगा।"

"अच्छा" कहकर वह यह कहते हुए सीड़ियाँ उतरने लगा "पाँच रुपए का है मैडम" और अपनी तेज़ रफ़्तार से वह दो मज़िल नीचे उतर गया. यह 1972 की बात है, अरसे के बाद लगा जैसे बात आई गई हो गई. हर सुबह, हर घर को, कई साल बीतने के बाद भी बिना नागे वह अख़बार पहुंचाता रहा और मैं भी पढ़ती रही हूँ खबरें यहाँ की, दूर देश की। अख़बार न होता तो हम समाचारों से अनजान रह जाते, और शायद इस ज़माने की भागती जिंदगी से उतना बेहतर न जुड़ पाते. अपने आस-पास के हाल चाल से बखूबी वाकिफ़ कराती है यह अख़बार.

पिछले दो साल में लगातार अपने रसोई घर की खिड़की से सुबह सात बजे चाय बनाते हए देखती हूँ 'मूर्ति' को, हाँ, यही नाम है उसका. बेटी सी॰ ए॰ करके बिदा हो गई है, बेटा बैंक में नौकरी करता है, और मूर्ति साइकल पर अख़बार के बंडल लादे, उसे चलता है, एक घर से दूसरे घर में पहुंचाता है, जाने दिन में कितनी सीड़िया चढ़ता-उतरता है. एक बात है-अब उसकी रफ़्तार पहले सी तेज़ नहीं. एक टाँग भी कुछ लड़खड़ाने लगी है. पैंतीस साल कोई छोटा अरसा तो नहीं, मशीन के पुर्ज़े भी ढीले पढ़ जाते है, बदले जाते है, पर इंसानी मशीन उफ़! एक अनचाही पीड़ा की ल़हर सिहरन बन कर दिल में उतरती है और पूरे वेग से शरीर में फैल जाती है. वही 'मूर्ति' अब अख़बार के साथ, खुद को ढोने का आदी हो गया है. थोड़ी देर से ही, पर अख़बार पहुंचाता ज़रूर है, दरवाजे की कुण्डी में टाँग जाता है. जिस दौर से वह अख़बार वाला गुज़रा है, वह दौर हमने भी उन अख़बारों को पढ़ते-पढ़ते गुज़ारा है. पर पिछले दो साल से उस इन्सान को, उसके चेहरे की झुर्राती लकीरों को, उसकी सुस्त चाल को देखती हूँ, पढ़ती हूँ, तो लगता है यही तो आप बीती है. आईने के सामने रूबरू होते हुए भी हम कहाँ ख़ुद को देख पाते हैं, पहचान पाते हैं? बस वक़्त मुस्कुराता रहता है- हमारी जवानी को जाते हुए और बुढ़ापे को आते हुए देखकर.

और मैं वहीं खड़ी चाय का कप हाथ में लेकर सोच रही हूँ, क्या यही जिंदगी है्? कितनी अजीब है यह जिंदगी, खुद तो जीती है, पर वो हुनर उस अख़बरवाले मूर्ति को नहीं सिखा पाई. उससे आज भी बोझ उठवाती है, उसकी कंपकपाते हड्डियों पर ज़्यादा बोझ डलवाती है, ऊंचे घरों की ऊंची मंज़िलों तक का सफ़र तय करवाती है, और मेरी खिड़की के सामने वाली सीड़ी से धीरे-धीरे उतरता हुआ अख़बार वाला मूर्ति दिखाई देता है, जिसकी जिंदगी को हम शायद पल दो पल रुककर अख़बार के पन्नों की तरह कभी भी पढ़ न पाए. मैने पीछे पलटते हुए देखा तो इन अख़बारों को रद्दी में जाते हुए देखकर एक सच को जाना जी वक़्त रुके नहीं रुकता । सिलसिला जारी है, आदमी वही पुराना फिर भी रोज़ नया अख़बार ले आता है.

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