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श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग - जब अग्नि साक्षी मित्रता शपथ उपरान्त भी सुग्रीव ने श्रीराम की शक्ति परीक्षाएँ ली - डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता

देवभाषा संस्कृत को अधिकांश पाश्चात्य विश्वविद्यालयों में प्रमुख स्थान प्राप्त है। महर्षि वाल्मीकि रामायण कई वर्षों पूर्व से ही विश्व में लोकप्रिय है। इस तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए अपने देश में छात्र-छात्राओं, जिज्ञासुओं, शोधार्थियों एवं विधुजनों के लाभार्थ सुग्रीव-श्रीराम मित्रता प्रसंग महत्व रखता है। वाल्मीकि रामायण में बालि के स्थान पर वाली शब्द का प्रयोग है। वाल्मीकि रामायण के अतिरिक्त यहाँ यह कथा प्रसंग ओडिया श्रीरामकथा एवं पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा गो.तु. रामायण से टीका में से प्रसंग है।

वानरराज सुग्रीव ने ऋष्यमूक पर्वत के समीप से पम्पा सरोवर के निकट श्रीराम और लक्ष्मण को देखा। उन्हें देखकर सुग्रीव को भय लगा कि हो न हो इन्हें मेरे शत्रु बालि (वाली) ने ही भेजा है। मतंग मुनि का परम पवित्र आश्रम यहाँ था तथा मुनि के शाप से उसमें सुग्रीव के भाई बालि का प्रवेश कठिन था। इस कारण सुग्रीव के साथ अन्य वानर यहाँ निवास कर रहे थे। सुग्रीव एक कुशल धर्मात्मा थे। अत: उन्हें राजधर्म का ज्ञान था। उन्होंने अपने मंत्रियों के साथ इन दोनों के आने और शत्रु पक्ष की प्रबलता पर विचार कर निर्णय करने की मंत्रणा की। सुग्रीव को भयभीत देखकर हनुमान्जी बोले—

सम्भमस्त्यज्यतामेष सर्वेर्वालिकृते महान्।

मलयोऽयं गिरिवरो भयं नेहास्रि वालिन:।।

वा.रा. किष्किन्धाकाण्ड सर्ग-२-१४


आप सब लोग बालि के कारण होने वाली इस भारी घबराहट को छोड़ दीजिए। यह मलय नामक श्रेष्ठ पर्वत है। यहाँ बालि का कोई भय नहीं है। हनुमान जी ने सुग्रीव से कहा कि आपको अपने जिस पापाचारी बड़े भाई से भय है, वह दुष्टात्मा बालि यहाँ आ सकता नहीं है। अत: आप भयभीत न हो। हनुमान जी ने सुग्रीव से कहा— 'बुद्धि और विज्ञान से सम्पन्न होकर आप दूसरों की चेष्टाओं के द्वारा उनका मनोभाव समझें और उसी के अनुसार सभी आवश्यक कार्य करें, क्योंकि जो राजा बुद्धि-बल का आश्रय नहीं लेता, वह सम्पूर्ण प्रजा पर शासन नहीं कर सकता।

हनुमान जी की इन बातों के सुनने के भी उपरान्त सुग्रीव का भय समाप्त न हुआ तथा उन्होंने कहा— ये दो वीर लम्बी भुजाओं वाले और बड़े-बड़े नेत्र वाले हैं। ये दोनों ही धनुष-बाण और तलवार धारण किए हैं। अत: इन्हें देखकर किसके मन में भय का संचार नहीं होगा। मेरे मन में संदेह है कि निश्चित रूप से ये दोनों बालि के ही भेजे हुए हैं क्योंकि राजाओं के बहुत से मित्र होते हैं। अत: इन दोनों पर विश्वास करना उचित नहीं है।

अत: कपिश्रेष्ठ (हनुमान्)! तुम एक साधारण पुरुष की भाँति जाकर उनकी चेष्टाओं से तथा बातचीत की शैली से उन दोनों का यथार्थ परिचय प्राप्त करो। वानर शिरोमणि तुम एक बात का विशेष ध्यान रखना कि तुम्हारा मुख मेरी ही ओर हो तथा उन धनुर्धरों से वन में प्रवेश करने का कारण जानना (पूछना)। हनुमान्जी ने विचार किया कि-

कपिरूपं परित्यज्य हनुमान् मारुतात्मज:।

भिक्षुरूपं ततो भेजे शठबुद्धितया कपि:।।

वा.रा. किष्किन्धाकाण्ड सर्ग-३-२


मेरे इस कपि रूप पर किसी का विश्वास नहीं हो सकता है, अत: अपने उस रूप का परित्याग करके भिक्षु (सामान्य तपस्वी) का रूप धारण कर लिया। तदनन्तर हनुमान जी ने बड़े ही विनीत भाव से उन दोनों वीरों के पास जाकर प्रणाम् करके मधुर वार्तालाप किया। हनुमान जी ने उन दोनों से बारम्बार उनका परिचय पूछा। किन्तु उनके उत्तर देने पर हनुमान जी ने अपना परिचय दिया। हनुमान जी ने कहा कि राजा सुग्रीव नामक श्रेष्ठ वानर यहाँ रहते हैं जो बड़े धर्मात्मा और वीर हैं। उनके बड़े भाई बालि ने उन्हें घर से निकाल दिया है, इसलिए वे अत्यन्त दु:खी होकर यहाँ रह रहे हैं। मैं उनके द्वारा भेजे जाने से यहाँ आया हूँ। मेरा नाम हनुमान् है। मैं भी वानरजाति का हूँ। सुग्रीव आप दोनों से मित्रता करना चाहते हैं। मुझे आप उन्हीं का मंत्री समझें। मैं वायु देवता का वानरजातिय पुत्र हूँ। मेरी जहाँ इच्छा हो वहाँ मैं जा सकता हूँ और जैसा चाहूँ रूप धारण कर सकता हूँ। इस समय मैं सुग्रीव का प्रिय करने के लिए भिक्षु के रूप में अपने को छिपाकर, मैं ऋष्यमूक पर्वत से यहाँ आया हूँ। श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा— ये वानरराज सुग्रीव के सचिव हैं और उन्हीं के हित की इच्छा से मेरे पास आए हैं। अत: लक्ष्मण तुम इनसे मधुर वाणी में वार्तालाप करो, क्योंकि हनुमान् मर्म को समझने वाले हैं तथा श्रीराम ने कहा—

नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिण:।

नासामवेदविदुष: शक्यमेवं विभाषितुम।।

वा.रा. किष्किन्धाकाण्ड सर्ग-३-२८


जिसे ऋग्वेद की शिक्षा नहीं मिली, जिसने यजुर्वेद का अभ्यास नहीं किया तथा जो सामवेद का विद्वान नहीं है, वह इस प्रकार भाषा में वार्तालाप नहीं कर सकता। हनुमान् संस्कार और क्रम से सम्पन्न अद्भुत अविलम्बित तथा हृदय को आनंद करने वाली कल्याणकारी वाणी का उच्चारण करते हैं।

हे लक्ष्मण! जिसके कार्यसाधक दूत ऐसे उत्तम गुणों से युक्त हों, उस राजा के सभी मनोरथ दूतों की बातचीत से ही सिद्ध हो जाते हैं। अत: लक्ष्मण तुम सुग्रीव सचिव कपिवर हनुमान् से वार्तालाप करो। लक्ष्मणजी ने हनुमान जी से कहा कि— हम दोनों भाई वानरराज सुग्रीव की खोज में यहाँ आए हैं। आप सुग्रीव के कथनानुसार यहाँ आकर जो मैत्री की बात चला रहे हैं, वह हमें स्वीकार है। हनुमान जी ने मन ही मन समझ लिया कि अब सुग्रीव को राज्य प्राप्ति होने वाली है, क्योंकि ये दोनों जिस कार्य या प्रयोजन से आए हैं वह कार्य अवश्य सुग्रीव के द्वारा सिद्ध होने वाला है। हनुमान जी ने श्रीराम से पूछा कि आप अपने छोटे भाई के साथ यहाँ किसलिए आए हैं? यह सुनकर श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मणजी ने अपने भाई के पिता का नाम, वन में आने का कारण तथा सीताजी के हरण का पूर्व वृत्तान्त बता दिया। सीताजी के हरण के बारे में लक्ष्मणजी ने बताया कि इच्छानुसार रूप धारण करने वाले एक राक्षस ने सूने में आश्रम से उन्हें हर लिया। वह राक्षस कौन है? वह कहाँ रहता है? इत्यादि बातों का ठीक ठीक पता नहीं लग रहा है। दनु नामक दैत्य था जो शाप से राक्षस भाव को प्राप्त हुआ, उसने सुग्रीव का नाम बताया और कहा— 'वानरराज सुग्रीव सामर्थ्यशाली और महान् पराक्रमी है, वे सीताजी का हरण करने वाले राक्षस का पता लगा लेंगे। ऐसा कहकर वह दनु स्वर्गलोक में पहुँचने के लिए उड़ गया। हनुमान जी से लक्ष्मणजी ने कहा— आपके प्रश्न के उत्तर में मैंने सब बातें ठीक-ठीक बता दी। मैं और श्रीराम दोनों ही इस कारण सुग्रीव के पास आए हैं। यह सब सुनने के पश्चात् हनुमान जी ने भिक्षुक रूप को त्यागकर वानर रूप धारण कर लिया एवं उन दोनों वीरों को पीठ पर बैठाकर सुग्रीव के पास ऋष्यमूक पर जा पहुँचे।

सुग्रीव के समीप जाने से पूर्व हनुमान जी ने पुन: भिक्षुक का रूप धारण कर लिया तथा सुग्रीव के समीप जाकर श्रीराम और लक्ष्मणजी सहित उनके वंश, नाम आदि का परिचय देते हुए श्रीरामजी की पत्नी सीताजी का दण्डकारण्य में रावण द्वारा सीताहरण का वृत्तान्त बता दिया। सुग्रीव ने श्रीराम से कहा कि भगवन्! मैं वानर हूँ आप नर। मेरे साथ जो आप मैत्री करना चाहते हैं इसमें मेरा सत्कार ही है और मुझे इसमें उत्तम लाभ प्राप्त होगा। उस समय हनुमान जी ने भिक्षुक रूप को त्याग कर पुन: अपने स्वाभाविक रूप धारण कर लिया और दो लकड़ियों को रगड़कर अग्नि पैदा की—

दीप्यमानं ततो वह्निं पुष्पैरभ्यर्च्य सत्कृतम्।

तयोर्मध्ये तु सुग्रीवो निदधौ सुसमाहित:।।

वा.रा. किष्किन्धाकाण्ड सर्ग-२-१४


उसके बाद उस अग्नि को प्रज्वलित करके उन्होंने फूलों द्वारा अग्निदेव का पूजन किया। फिर एकाग्रचित होकर श्रीराम और सुग्रीव के मध्य में साक्षी के रूप में उस अग्नि को प्रसन्नतापूर्वक स्थापित किया। श्रीराम और सुग्रीव ने प्रज्वलित अग्नि की प्रदक्षिणा की और दोनों एक-दूसरे के मित्र बन गए। सुग्रीव ने भी भाई बालि द्वारा घर से निकाले जाने व उसकी पत्नी छीन लेने की पूरी बात बताई। श्रीराम ने यह सुनकर कहा कि मैं तुम्हारी पत्नी का अपहरण करने वाले बालि का वध कर दूँगा। सुग्रीव ने पुन: श्रीराम से कहा- मेरे मंत्रियों में श्रेष्ठ सचिव ये हनुमान् आपके बारे में सारा वृत्तान्त बता चुके हैं, जिन्हें आपको निर्जन वन में आना पड़ा। श्रीराम ने कहा- मैं आपकी भार्या सीता पाताल में हों या आकाश में मैं उन्हें ढूंढकर आपकी सेवा में समर्पित कर दूँगा।

सुग्रीव ने सीताजी को विलाप करते, राक्षस के साथ देखा था। सुग्रीव ने श्रीराम को बताया कि वह शैल शिखर पर अपने मंत्रियों सहित उस समय बैठा हुआ था। सीताजी ने अपने वस्त्र (उत्तरीय) और कई सुन्दर आभूषण ऊपर से हमें देख गिराए। इतना कहकर सुग्रीव उस पर्वत की गुफा में गए और वह वस्त्र तथा आभूषण लेकर आ गए। श्रीराम ने लक्ष्मण से उन आभूषणों के पहिचानने का कहा—

एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत।

नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले।

नूपुरे त्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात्।।

वा.रा. किष्किन्धाकाण्ड ६-२२


श्रीराम के ऐसा कहने पर लक्ष्मण बोले— भैया! मैं इन बाजूबन्दों को तो नहीं जानता और न इन कुण्डलों को ही समझ पाता हूँ कि किसके हैं? किन्तु प्रतिदिन भाभी के चरणों में प्रणाम करने के कारण मैं इन दोनों नूपुरों को अवश्य ही पहचानता हूँ। तब श्रीराम ने सुग्रीव से पूछा कि वह राक्षस मेरी सीता को किस दिशा में ले गया। यह बताओ? सुग्रीव ने उस पापात्मा राक्षस को जानने से इंकार किया। सुग्रीव ने भी श्रीराम को अपने भाई बालि के बैरी होने का पूरा वृत्तान्त कह सुनाया। दुन्दुभी राक्षस के साथ युद्ध के वृत्तान्त को बताते हुए कहा कि बालि ने राक्षस दुन्दुभी को उठाकर पृथ्वी पर दे मारा तथा उसके शरीर को दबाकर पीस डाला। दुन्दुभी राक्षस के शरीर से रक्त बह निकला तब बालि ने उसे दोनों हाथों से उठाकर एक साधारण वेग से एक योजन दूर फेंक दिया। वेगपूर्वक फेंके गए उस असुर (दुन्दुभी) के मुख से निकली हुई रक्त की बहुत सी बून्दें हवा के साथ उड़कर मतंग मुनि के आश्रम पर पड़ी। मतंगमुनि ने तपोबल से यह जान लिया कि यह एक वानर की करतूत है। अत: उन्होंने उस राक्षस की लाश को फेंकने वाले वानर को शाप दिया— 'जिसने रक्त के छींटे डालकर मेरे आश्रम एवं इस वन को अपवित्र कर दिया है वह आज से इस वन में प्रवेश न करें। यदि इसमें प्रवेश करेगा तो उसका वध हो जाएगा। आज के दिन के बाद यदि कोई वानर यहाँ मेरी दृष्टि में पड़ जाएगा तो वह कई हजार वर्ष के लिए पत्थर हो जाएगा। यह शाप सुनकर समस्त वानर वहाँ से निकलकर बालि के पास गए तथा शाप की बात बता दी। बालि मतंगमुनि के पास गए तथा शाप की बात बताई। बालि ने मतंगमुनि से विनयपूर्वक क्षमायाचना की। मतंगमुनि ने बालि का आदर नहीं किया तथा आश्रम में चले गए। तब से ही बालि शाप के कारण भयभीत हो गया है तथा यहाँ प्रवेश नहीं करता है।

तदनन्तर सुग्रीव ने श्रीराम से कहा यह रहा दुन्दुभी की हड्डियों का ढेर जो कि एक विशाल पर्वताकार जान पड़ता है। बालि ने अपने बल के घमण्ड में आकर दुन्दुभी के शरीर को इतनी दूर फेंका। उसके बाद सुग्रीव ने श्रीराम को ताल के सात विशाल एवं मोटे वृक्ष दिखाकर बताया कि बालि इनमें एक-एक को बलपूर्वक हिलाकर पत्रहीन कर सकता है। सुग्रीव द्वारा इतना सब कुछ श्रीराम को दिखाने का उद्देश्य यह था कि क्या श्रीराम शक्तिशाली बालि का वध कर सकेंगे या नहीं? सुग्रीव ने श्रीराम से यही पूछा कि आप उसे किस प्रकार युद्ध कर मार सकेंगे।

सुग्रीव के ऐसा कहने पर लक्ष्मणजी को बड़ी हँसी आई। वे हँसते हुए ही बोले- कौन सा काम कर देने पर तुम्हें विश्वास होगा कि श्रीरामचन्द्रजी बालि का वध कर सकेंगे। तब सुग्रीव ने लक्ष्मणजी से कहा- पूर्वकाल में बालि ने ताल के इन सातों वृक्षों को एक-एक करके कई बार बींध डाला है। अत: श्रीरामजी भी यदि इनमें से किसी एक वृक्ष को एक ही बाण से भेद डालेंगे तो इनका पराक्रम देखकर मुझे बालि के मारे जाने का विश्वास हो जाएगा।

इसके साथ ही लक्ष्मण यदि इस महिषरूपधारी दुन्दुभी की हड्डियों को एक पैर से उठाकर बलपूर्वक दो सौ धनुष की दूरी पर फेंक सके तो भी मैं यह विश्वास कर लूँगा कि इनके हाथ से बालि का वध हो सकेगा। बस फिर क्या था। श्रीरघुनाथजी ने खिलवाड़ में ही दुन्दुभी के शरीर को अपने पैर के अँगूठे से टांग लिया और उस राक्षस के सूखे हुए कंकाल को पैर के अँगूठे से ही दस योजन दूर फेंक दिया।

तदनन्तर श्रीराम के सुवर्ण भूषित बाण ने उन सातों सालों के वृक्ष को छेद कर पाताल में चला गया। यह देखकर सुग्रीव ने हाथ जोड़कर धरती पर माथा टेक दिया तथा श्रीरामजी को साष्टांग प्रणाम् किया। सुग्रीव ने श्रीराम से कहा कि आप तो अपने बाणों से युद्ध में इन्द्र सहित सम्पूर्ण देवताओं का भी वध कर सकने में समर्थ हैं। अंत में सुग्रीव ने श्रीराम से कहा कि—

तमद्यैव प्रियार्थं में वैरिणं भ्रातृरूपिणम्।

वालिनं जहि काकुत्स्थ मया बद्धोऽयमञ्जलि:।।

वा.रा. किष्किन्धाकाण्ड सर्ग १२-११


काकुत्स्थकुलभूषण! मैं हाथ जोड़ता हूँ। आप आज ही मेरे प्रिय करने के लिए उस बालि का जो भाई के रूप में मेरा शत्रु है वध कर डालिए। इस कथा प्रसंग में सुग्रीव ने अग्रि के समक्ष मित्रता को साक्षी करने के बाद भी श्रीराम के बल की इस तरह एक नहीं दो बार शक्ति परीक्षण उपरान्त ही बालि के वध के योग्य उन्हें समझा।

ओड़िया (उड़िया) बिचित्र रामायण विरचित विश्वनाथ खुँटिया

सुग्रीव द्वारा श्रीराम की मित्रता उपरान्त परीक्षा-

भगवान जगन्नाथ की पावन भूमि उड़ीसा में भी समय-समय पर सन्तों द्वारा विविध रामायणों की रचना की गई। ओड़िया साहित्य में 'बिचित्र रामायणÓ अत्यन्त लोकप्रिय है। यही प्रमुख कारण है कि इसका प्राय: मंचन भी होता है। सम्पूर्ण उड़ीसा में इस पवित्र मूल ग्रन्थ के गेय पद बहुधा रामलीलाओं के मंचों से लगाकर घर-घर में बड़ी ही श्रद्धापूर्वक गाए जाते हैं। ग्रामीण अंचलों से लेकर बड़े-बड़े संगीताचार्य इन्हें गाते हैं। श्रीराम का चरित्र लोकमंगल भावनाओं से ओतप्रोत है। यही कारण है कि भारत के कोने-कोने से विभिन्न प्रांतों के विचारकों, संतों तथा साहित्यकारों ने अपनी-अपनी मातृभाषाओं में इस आदर्श उदार चरित्र को चुना। उन सभी सुधीजनों ने अपनी बुद्धि के अनुसार श्रीराम के चरित्र को जैसा देखा परखा वैसा ही कागज पर उतारने का भरपूर प्रयास किया, ताकि भारत के जन-जन के मानस में श्रीराम की छवि हृदय में समा जाए।

श्रीराम एवं सुग्रीव की मित्रता तथा श्रीराम की शक्ति की परीक्षा का प्रसंग इस रामायण में किष्किन्धाकाण्ड के छान्द (अनुच्छेद) ५, ६, ८ में देखने को प्राप्त होता है। श्रीराम पम्पा सरोवर के तट पर पहुँच कर लक्ष्मण से उस पर्वत का नाम पूछने पर उसे ऋष्यमूक पर्वत कहते हैं, कहा, जहाँ कि सुग्रीव अपने मंत्रीगणों सहित निवास करता था। उसने जब श्रीराम और लक्ष्मण को देखा तथा भागकर दूसरे पर्वत के शिखर पर चढ़ गया। उन्होंने हनुमान् से कहा कि पता लगाओ कि यह बालि द्वारा भेजे हुए तो नहीं है। यह सुनकर हनुमान् ने भिक्षुक का रूप धारण कर लिया, श्रीराम और लक्ष्मण के तेज को देखकर उनके चरणों में मन में नमन कर पूछने लगे- हे देवराज! आप कौन लोग हैं? लक्ष्मण ने उत्तर देते हुए कहा कि यह श्रीरामचन्द्रजी हैं। हे भिक्षुक यदि सुग्रीव की दया हुई तो उनके साथ मित्रता करेंगे। इतना सुनकर हनुमान्जी ने अपना परिचय देते हुए कहा कि वे पवनपुत्र हैं। तत्पश्चात् हनुमान्जी उन दोनों को कंधे पर बैठाकर सुग्रीव के पास गए।

हनुमान्जी ने सुग्रीव को श्रीराम का परिचय कराकर कहा कि इनका मन आपसे मित्रता करने का है। यह सुनकर नल-नील तथा सुषेण प्रसन्न हुए। श्रीराम ने उठकर सुग्रीव का आलिंगन किया। मंत्रीगण ने श्रीराम के पैर छुए और उसी समय अग्नि प्रज्वलित कर अग्रि को साक्षी बनाकर श्रीराम और सुग्रीव मित्र हो गए। बारम्बार अग्नि की परिक्रमा करते हुए श्रीराम कहने लगे कि कपिपति! मैं सत्य कहता हूँ कि आज से हमारा दु:ख तुम्हारा और तुम्हारा दु:ख सहज रूप से हमारा हो गया।

सुग्रीव ने कहा कि यह आपकी कृपा है। सुग्रीव ने एक पेड़ की डाल तोड़कर श्रीराम और लक्ष्मण को बैठाया, फिर सुग्रीव भी बैठ गए। तदनन्तर लक्ष्मणजी ने श्रीराम और स्वयं के वनवास का कारण, खरदूषण के वध एवं सीताजी का रावण द्वारा हरण का सारा वृत्तान्त बताया। सुग्रीव ने श्रीराम से कहा कि हाँ देव! हमने भी यह देखा है। रावण द्वारा सीताजी को ले जाते समय, हमें देखकर सीताजी ने आभूषण गिरा दिए थे। श्रीराम ने कहा कि उन्हें ले आओ। सुषेण ने गुफा में से वे आभूषण श्रीराम से उन्हें ग्रहण करने का कहा। उन्हें देखकर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा— क्या सीता के यह आभूषण हैं? लक्ष्मणजी बोले मैं इन्हें पहचान नहीं सकता। मैं तो केवल नुपूर को ही पहचानता हूँ। श्रीराम के नेत्र आँसू से भर गए और साथ में सुग्रीव भी रुदन करने लगे। श्रीराम ने कहा मित्र सुग्रीव! सुनो मित्र के समस्त गुण हम और तुम उसी समय समझेंगे जब रावण मारा जाएगा।

लक्ष्मणजी ने कहा हे कपिराज! सुनो श्रीराम के चरण सभी लोगों के लिए शरणस्थल हैं। अब श्रीराम आपकी शरण में आ गए हैं। अब किसी प्रकार सीताजी मिल जाए वह उपाय बताइए। यह सुनकर सुग्रीव ने कहा कि मैं स्वर्ग, मृत्युलोक, पाताल तीनों लोकों में सीताजी को खोज सकता हूँ, किन्तु मेरे पास वानरदल नहीं हैं। मैं यहाँ बालि के भय से छिपकर रह रहा हूँ। इस असमय में तुम्हारा साथ हुआ है। श्रीराम ने कहा कि— 'मेरा कार्य रहने दो तुम्हारा कार्य हम पहले करेंगे, जिससे तुम्हारा भय समाप्त हो जाए।Ó इतना सुनकर सुग्रीव ने श्रीराम का हाथ पकड़कर एकान्त में बैठकर दोनों मित्रों ने बहुत प्रकार से सोच विचार किया।

अन्य श्रीरामकथाओं से भिन्न श्रीराम-सुग्रीव संवाद इस रामायण में है। सुग्रीव बोला— 'मेरे मन में विश्वास (भरोसा) नहीं हो रहा है, दुन्दुभी का शव यदि आप फेंक दें तो विश्वास हो जाएगा। बालि ने इसे सैकड़ों बार फेंका है, उस समय से उसकी अस्थियाँ पर्वत के समान पड़ी है। ऐसा कहकर सुग्रीव श्रीराम को उसके पास ले गया और यहीं वे अस्थियाँ हैं, कहकर उसने श्रीराम को दिखा दी। श्रीराम ने अपने बाँए पैर के अँगूठे की नोक से दबाकर उस अस्थि समूह को ऐसा फेंका कि वे दस योजन दूर जाकर गिरी। यहाँ यह सुग्रीव द्वारा श्रीराम की शक्ति की प्रथम परीक्षा (मूल्यांकन) कर लिया।

दुन्दुभी की अस्थियों के श्रीराम द्वारा फेंक दिए जाने के उपरान्त भी सुग्रीव सन्तुष्ट नहीं हुए तथा उन्होंने श्रीराम की शक्ति-बल-सामर्थ्य की दूसरी परीक्षा ली। अस्थियों के फेंक देने के पश्चात् सुग्रीव ने लक्ष्मणजी के कान में कहा कि 'अस्थियाँ (सूखी हड्डियाँ) यहाँ बहुत काल से पड़े रहने के कारण सूख गई थी। अत: हे भाई! मेरे मन में अभी भी संतोष नहीं हुआ। जब सात ताल के वृक्षों को एक बार में श्रीराम इन्हें बेंध देंगे तभी मित्र को सेहराँ बाँधूँगा। उसी समय मैं समझ लूँगा कि श्रीराम बालि के समान बलवान हैं। यह कार्य पूर्ण हो जाने के बाद ही रीछ और वानर इनकी वंदना करेंगे।

लक्ष्मण से कहने पर श्रीराम समझ गए। उन्होंने धनुष पर डोरी चढ़ा ली। चुनकर उन्होंने एक बाण प्रत्यंचा पर रखा। श्रीराम के द्वारा छोड़े गए बाण ने पाषाणों को फाड़कर सातों तालों के वृक्षों को बेधकर उलट दिया। यह देखकर सुग्रीव प्रसन्नतापूर्वक से श्रीराम के चरणों में गिरकर बोला, 'हे अयोध्यानाथ! हमारे दोषों को क्षमा करें। आपने मेरी शंका को नष्ट कर दिया।

सुग्रीव को मन में पूरा-पूरा विश्वास नहीं था कि श्रीराम शक्तिशाली बालि का वध कर सकेंगे? तथा उसने उन्हें सामान्य मनुष्य समझा। इस अविश्वास के कारण उसने श्रीराम की परीक्षा अग्नि को साक्षी करने के बाद भी एक ही नहीं दो बार परीक्षण कर ली। जबकि दूसरे मित्र विभीषण ने तो श्रीराम के शरण में आकर मित्रता स्थापित की।

श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासकृत रामायण टीकाकार पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र में सुग्रीव श्रीराम मित्रता परीक्षा प्रसंग

गोस्वामी तुलसीदासजी कृत रामायण के टीकाकार पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र (मुद्रक प्रकाशक खेमराज श्रीकृष्णदास 'श्री वेंकटेश्वरÓ स्टीम्-प्रेस बम्बई-४) ने सुग्रीव-श्रीराम की मित्रता प्रसंग में अन्य श्रीरामकथाओं के समान इन दोनों की मित्रता का उल्लेख किया है। सुग्रीव को पूरा-पूरा विश्वास देने हेतु श्रीराम ने कहा—

सेवक शठ नृप कृपण कुनारी। कपटी मित्र शूल सम चारी।।

सखा शोच त्यागहु बल मोरे। सब विधि घटब काज मैं तोरे।।

(गो. तुलसीदासकृत रामायण टीकाकार पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र किष्किन्धाकाण्ड १५-९-१०)


मूर्ख सेवक, कृपण (कंजूस) राजा, लड़ाकी (कुलटा) स्त्री और कपटी मित्र, यह चारों शूल के समान हैं। हे मित्र! सब प्रकार से तुम मेरे बल पर चिन्ता छोड़ दो। मैं सब प्रकार से तुम्हारे काम आऊँगा, मैं सब प्रकार से तुम्हारे कार्य करूँगा। सुग्रीव ने बालि की शूरवीरता का वर्णन करते हुए कहा कि बालि इन सात ताल के वृक्षों को एक बाण से बेध देता है। सुग्रीव ने बालि की मृत्यु के बारे में कहा कि चन्द्रमण्डलाकार वृक्ष जिस वीर से एक ही बाण से पृथ्वी पर गिर जाएं तो उसके हाथ से बालि की मृत्यु हो सकती है। सुग्रीव की यह बात सुनकर श्रीराम ने कहा कि मैंने तुम्हारी चतुराई समझ ली है। तुम इस तरह मेरे बल की परीक्षा लेना चाहते हो। अच्छा ताल वृक्षों के बारे में कुछ जानते हो तो बताओ। सुग्रीव ने बताया कि बालि एक दिन वन में गया और फूल, फलवाले वृक्ष देखने लगा। उसने सात फल वहाँ से लेकर जल में धोकर पवित्र किए। हे जगदीश! बालि उन फलों को लेकर पम्पासुर आया और स्नान ध्यान कर फिर इष्टदेव को सिर नवाया। उसने वे फल मार्ग में लाकर अहंकारपूर्वक रख दिए। हे प्रभु! उन फलों पर एक सर्प आकर बैठ गया। फण निकाल कर उन फलों पर सर्प को बैठा देख, बालि को क्रोध आ गया। उसने कहा—

अरे दुष्ट भख मोर नशावा। यमपुर आज सदन तैं छावा।।

ताहित शीश शाप ले मोरा। वृक्ष फूटि निकसे तनु तोरा।।

गो.तु. रामायण टीकाकार पं. ज्वालाप्रसाद


अरे दुष्ट! तूने मेरा भोजन नष्ट कर दिया। तू आज यमपुर जाना चाहता है। इस कारण मेरे शाप तेरे सिर पर ले कि तेरे शरीर को फोड़कर यह सातों वृक्ष निकलेंगे। जैसा कि सर्प तू वेदी के आकार का शरीर किए बैठा है इसी प्रकार यह शरीर छेदकर ताल वृक्ष निकलेंगे (फूटेंगे)। बालि का क्रोध शान्त होने पर वह घर गया और यह समाचार तक्षक ने पाया। पुत्र को शाप सुनकर तक्षक को क्रोध आया तथा उसने अत्यंत दु:खी होकर—

दोहा— पुत्र शाप सुनि क्रोध करि, मन दुख भयो अपार।

निश्चय मारै बालि को, जो यह वैधे तार।।

(गो.कु. रामायण टीकाकार पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र, किष्किन्धा-१७)


यह शाप बालि को दिया कि जो यह सातों ताड़ एक बाण से तोड़ (छेद) देगा वह उसको मार डालेगा।

इसके उपरान्त मतंग ऋषि ने भी यह कहा कि-

पुनि ऋषिराज कही अस बाता। दुन्दुभि अस्थि करे यह व्राता।।

एक बाण जो देई उड़ाई। बाली मृत्यु तासु कर पाई।।

गो.तु. रामायण टीकाकार पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र, किष्किन्धा १८-१-२


यह दुन्दुभी की अस्थियों के समूह को जो एक बाण से उड़ा देगा, बालि की मृत्यु निश्चय रूप से उसके हाथ होगी।

क्षेपक- सुग्रीव ने दुन्दुभी की अस्थियाँ और ताल के वृक्ष ज्यों ही श्रीराम को दिखाए त्यों ही उन्होंने बिना प्रयास डहा दिए। पैर के अँगूठे से दुन्दुभी की अस्थि कई योजन दूर फेंक दी।

क्षेपक

भये शतखण्ड वृक्ष के जबहीं। निकस्यो सर्पताल तर तबहीं।

करि अस्तुति जब सर्प सिधावा। निरखि हरीश प्रभुहि सुख पावा।।

(गो.तु. रामायण टीकाकार पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र किष्किन्धा १८-४-५)


ज्योंहि सौ टुकड़े वृक्ष के हुए कि ताल के जड़ (नीचे) से वह सर्प निकला और सोते हुए बालि के निकट इन्द्र की दी हुई माला ले गया। इस माला को धारण कर युद्ध करने से हार (पराजित) नहीं होती थी। सर्प ने श्रीराम की स्तुति की तथा चला गया। तब सुग्रीव ने बड़ा सुख प्राप्त किया (क्षेपक)। श्रीराम का अतुलित बल देखकर सुग्रीव की प्रीति बढ़ी और बालि के वध का विश्वास हो गया। बार-बार श्रीराम को सिर नवाया और प्रभु को पहिचान गया। इस तरह इस रामायण में बालि को दिए गए शापों का वर्णन अन्य श्रीरामकथाओं से भिन्न बताकर तथा बालि के वध का रहस्यपूर्ण वृत्तान्त है।

सुग्रीव में धैर्य की न्यूनता थी, श्रीराम को वह अग्नि साक्षी रखकर भी मित्रता के प्रति मन में बालि का अत्यधिक भय होने के कारण श्रीराम की शक्ति नहीं जान सका, अत:

धीरज, धर्म, मित्र, अरु नारी। आपद काल परिखिहिं चारी।

(श्रीराम च.मा. अरण्य-५-४)


इस प्रकार सुग्रीव श्रीराम की क्षमता-शक्ति-भक्ति को पहिचानने में पहले तो असमर्थ ही रहा।

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डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता

'मानसश्री, मानस शिरोमणि, विद्यावाचस्पति एवं विद्यासागर

सीनि. एमआईजी-१०३, व्यास नगर,

ऋषिनगर विस्तार, उज्जैन (म.प्र.)

Email : drnarendrakmehta@gmail.com

पिनकोड- ४५६ ०१०

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