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समीक्षा - " फुसफुसाते वृक्ष कान में"

प्रकृति की करुण पुकार " फुसफुसाते वृक्ष कान में"

समीक्षक - वीरेन्द्र सरल

आखिर क्या है कविता? महज शब्दों का मेल य तुक में तुक मिला देने की कला? यदि किसी आचार्य से इस सम्बंध में राय लें तो वे संस्कृत के दो चार श्लोक सुनाकर छंद विधान समझाने लगेंगे य अंग्रेजी के आठ दस कोटेशन कोट करके कविता को परिभाषित करने लगेंगे। पर एक सर्जक अपनी सर्जना के समय क्या इन ढेर सारी बातों को ध्यान में रखते हुए अपनी सृजन करता है? इसे आप मेरी अल्पज्ञता कहें या दृष्टि। मुझे लगता है कि रचनाकार सबसे पहले अपने हृदय की सहज अनुभूतियों को कागज के कोरे पन्ने पर उतरता है उसके पश्चात ही उसमें विधा की कलात्मक बुनावट करके उसे जीवन्त करने का प्रयास करता है। ताकि रचना के शब्द शब्द बोल सके, अपने में समाहित अनुभूतियों को साझा कर सके, चिंतन को झकझोर सके और मानवीय संवेदना को जागृत कर सके।

        साहित्य सृजन का उद्देश्य भी है, जिस साहित्य में समाज में समरसता, सहिष्णुता और सद्भावना के संचार का सार्थक सन्देश समाहित न हो, वह मेरी दृष्टि में साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं है।

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          सार्थक साहित्य वही जिसे पढ़कर हम न केवल मनुष्य की बल्कि पूरी प्रकृति की पीड़ा को महसूस कर सकें, और अपने आने वाले कल को आज से बेहतर बनाने के लिए प्रेरित हो सकें, जागरूक हो सके।

         मैं एक ऐसे ही उत्कृष्ट साहित्य की चर्चा करना चाह रहा हूँ। वर्तमान में भारत से दूर मेलबोर्न की धरती पर बसे  वैज्ञानिक कवि आदरणीय अग्रज हरिहर झा जी ने अपनी कृति " फुसफुसाते वृक्ष कान में "  मुझे भिजवाई। यह नवगीत संग्रह है ,जिसे प्रकाशित करने का गौरव अयन प्रकाशन दिल्ली को मिला है। शीर्षक से ही स्पष्ट है कि इस कृति का केन्द्रीय सन्देश वृक्षारोपण करके प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का है। बढ़ते औद्योगीकरण, सिमटती कृषि जमीन, कटते पेड़, सूखती नदियां और विनाश को विकास मान लेने वाली मानवीय स्वार्थ। बारूद के ढेर पर बैठकर, नीरो की तरह बंशी बजाने वाले मानव को जगाना ही कृतिकार का उद्देश्य है।

      कृति को पढ़ते हुए सुखद आश्चर्य और हार्दिक प्रसन्न्ता हुई कि देश से दूर रहकर भी कृतिकार की रचनाओं में देश के जल, जंगल और जमीन की चिन्ता के साथ साथ, टूटते सयुंक्त परिवार, स्व पर केंद्रित मनुष्य की स्वार्थपरता, अंधी आधुनिकता के दौड़ में शामिल मनुष्यता की चिन्ता समाहित है। डॉ हरिहर झा साहब भले ही देश से दूर हैं पर उनकी जड़े यहां की जमीन से जुड़ी हुई है, उनकी सांसों में देश की मिट्टी की खुशबू है और उनकी धड़कन में देश की धरती का प्यार है। आप इस कृति को पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे। यदि मैं संग्रह में संकलित हर नवगीत की चर्चा करूँ तो यह लेख लम्बा खिंच जाएगा, आप स्वयं जब इसे पढ़ेंगे तभी आओ कृति का आनन्द लेते हुए नवगीतों में समाहित सन्देश को ग्रहण कर पाएंगे। एक  न केवल पठनीय बल्कि मननीय कृति की सर्जना के लिए मैं डॉ हरिहर झा साहब को अपनी हार्दिक बधाई एवम शुभकामनाएं प्रेषित करता हूँ।

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