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लघुकथा - धन्य पीढ़ी - ज्ञानदेव मुकेश

धन्य पीढ़ी 

   सुबह होते ही बिस्तर पर लेटे-लेटे बूढ़ी सास ने आवाज लगाई, ‘‘बहू...., जल्दी से गर्म पानी ले आना। मुझे सुबह की दवा लेनी है। और हां, चाय भी लेती आना। क्या करूं, चाय के बगैर नींद पूरी तरह खुलती ही नहीं है।’’
   रसोईघर में अन्य कामों में व्यस्त मध्य आयु वर्ग की बहू के कानों में सास की आवाज स्पष्ट सुनाई दे गई। वह जल्दी-जल्दी गरम पानी और चाय लेकर सासू मां के कमरे की तरफ दौड़ी। यह देख, सासू मां बड़ी प्रसन्न हुई और उसने बहू को दुआएं दीं।
  बहू रसोईघर में वापस आई और अपनी नई नवेली नौकरीशुदा बहू के लिए उसकी पसंद की चाय बनाने में जुट गई। जब चाय उफनने लगी तो उसने अपने बेटे को आवाज लगाई, ‘‘बेटा, बहू को जगा दो। उसकी चाय तैयार हो गई है।’’
   थोड़ी देर में बहू आंखें मलते हुए आई और सोफे पर धंस गई। रसोईघर से निकलकर घर की पुरानी बहू ने नई बहू के हाथ में चाय का प्याला थमा दिया। नई बहू चाय सुड़कने लगी। पुरानी बहू वापस लौटने लगी, तभी बेटे ने उसे रोक लिया और कहा, ‘‘मां, कितनी सुन्दर पीढ़ी है तुम्हारी। अभी तक बहू के रूप में सेवा करती आई हो और अब देखो, बहू की भी सेवा कर रही हो। धन्य हो तुम !’’
      
                                                  -ज्ञानदेव मुकेश                          
                                    पता-
                                                फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                                अल्पना मार्केट के पास,
                                                न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी, 
                                                पटना-800013 (बिहार)

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