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संजय कर्णवाल की कविताएँ

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जो मौके हैं जीवन में कुछ करने के

उन्हें मत गंवाओ  ओ साथियों ।

कुछ करो ऐसा काम तुम, नाम

जग में कमाओ  ओ साथियों।।

ये मौसम तो आते जाते रहे

वक़्त ऐसे ही क्यूँ गंवाते रहे

कब तक ऐसे ही बर्बाद होते रहेंगे 

आँखों को आंसुओं से भिगोते  रहेंगे

2

अपना नेक इरादा,करे हम नित काम भले

मिले जग को हमसे,हमेशा ही अंजाम भले

सभी से ही अपना मानवता का नाता हो

करे हम सभी से बर्ताव जो सबको भाता हो

जो समझे दर्द किसी का उसी को कहते हैं

हमदर्द सभी

जो दे अपना सहारा, ना दे किसी को भी

धोखा  कभी।

3

देखे हैं हमने लोगों के वायदे

मुकर जाते हैं कहकर बातें।

देकर धोखा जो बढ़ते हैं आगे

करते हैं बस झूठी मुलाकातें।

हर बात कुछ कहती है हमसे

कुछ न कुछ तो सही होता है।

जिन रास्तों पर चलते हैं हम

जो चाहे सब कुछ तो नहीं होता है

ढूंढे हम जिनको मन की नज़र से

नज़र का ही तो कोई असर होता है

जो चाहते हैं हम अपने दिलों में

दिलों का ही तो बसर होता है

4

जो भी तू  करता है, उसी का ही फल तुझे मिलता है

जब जब तेरी मेहनत रंग लाती है, फूल कोई खिलता है

जब जब कोई तन मन से किसी काम में जुटता है

उसकी कड़ी मेहनत से ही श्रम का कण कण जुड़ता है

जो रहते हैं बैठे भरोसे अपने भाग्य के

वो काट नही सकते पल दुर्भाग्य के

कठिन घड़ी से जो आगे बढ़ जाता है

वही तो जीवन का सच्चा सुख पाता है।

5

हम खोये खोये क्यों हैं,

पूछो तो अपने मन से

रूठी है  बहार क्यों

पूछे तो कोई चमन से

पतझड़ और बसन्त

आता है, जाता है

हवाएं गुनगुनाती है

कभी सावन गाता है

बनी रहती हैं क्यू

ऐसी उलझन है

न जाने ये कैसा

अपना जीवन है

6

नेक नीयत से आगे बढ़ते जाओ

उत्तम राह पर मिलकर कदम बढाओ

थाम ले हम हाथ एक दूजे का

जरूरत में दे साथ एक दूजे का

आती जाती बहांरे कुछ कहती हैं

धूप ,हवा और गर्मी सब सहती है

सीख इन सब से तुम लो

सन्देश नया कुछ तुम दो।

7

जो करना जरूरी

काम पहले वो ही करो

अच्छा ही करो

काम जो भी करो।

सभी से करो तुम व्यवहार बेहतर

करो तुम खुद ही हर बार बेहतर

हमेशा नाम अपना बनाओ तुम जग में

न रुकना आगे बढ़ना जीवन की जंग में

जीवन में लक्ष्य तक पहुँच जाओ

जो मन में उम्मीदें कर दिखाओ

8

जो जग को जान गये बड़ी तरकीबों से

वो डर नहीं सकते  कभी इन रकीबों से

क्या ढूंढते रहते हैं हम कुछ यहाँ

साथ मिलता लोगों का बस नसीबों से

ये वक़्त आता है, जाता हैं सभी पे

न इतने दूर  रहो तुम गरीबों से

करो तुम ऐसे कर्म ,जो साथ मिले

सारी दुनिया देखो तुम बहुत करीबों से

9

ये कैसा दौर है इस जमाने का।

नहीं हक किसी को दिल दुखाने का।।

मैं सोचता रहता हूँ दिन रात यूँ ही

मुझे मिले मौका कुछ कर जाने का।।

क्यूं लोगों की ऐसी फितरत है

वादा करके उसे खुद ही तोड़ जाने का।।

कभी लुभाते है मीठी मीठी बातों से

नया नया सबब ढूंढते हैं लुभाने का।।

10

वक़्त से हम गुजारिश करे

वो ठहरे पल दो पल

बन जाय हसीन जीवन के रंग

बने हम इतने सरल।

सब रंग शामिल हैं

जीवन की बगिया में

फिर भी बेचैन क्यूं मन

इस दुनिया में।

क्या खो दिया

जो हम ढूंढ रहे हैं

खुद से ही सब

क्या पूछ रहे हैं

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