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कविता संग्रह - मैं हिन्दी हूँ - रतन लाल जाट

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1. मैं हिन्दी हूँ                                जननी जिसकी है देवभाषा संस्कृत की वो प्यारी सूता नागरी लिपि बनी है वेशभूषा कथनी करनी में...

1. मैं हिन्दी हूँ


                              
जननी जिसकी है देवभाषा
संस्कृत की वो प्यारी सूता
नागरी लिपि बनी है वेशभूषा
कथनी करनी में भेद ना

विधान तीन सौ तियालीसवाँ
नामकरण हुआ राजभाषा
चौदह सितम्बर आता
दिवस पावन याद दिलाता

इतिहास है जिसका लम्बा-चौड़ा
सदी दसवीं से आगे बढ़ा
पुत्रियाँ पांच अट्ठारह दुहिताओं का 
भरा-पूरा है एक बड़ा कुनबा

तू गाँधी की हिन्दुस्तानी है या
दक्षिण की पहचान रेख्ता 
उर्दू की तू बड़ी बहना
यूएनओ में गूंजी अटल की वीणा

माथे तेरे चाँद और बिंदिया
तन पर तू रखती एक रेखा
अंग-अंग सुडौल-सुंदर-सा
बावन आखरी है वर्णमाला

तू गीत है कान्हा का
और संदेश श्रीराम का
अपभ्रंश अवधी ब्रज का बाना
पहन आज खड़ी तू बोली बाला

मैं हिन्दी हूँ एक माता
सारे राष्ट्र की बनूँ भाषा
करना तुम नित वन्दना
लेकर नाम माँ शारदा

रतन लाल जाट

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2. प्रिय नेताजी


             
आज का जनतंत्र है,
जनता के हाथों बना।
जनता सीधी-सादी जो,
ऐसे नेता को चुना॥

प्रिय नेताजी हमारे,
सारी जरूरतें सुनी।
और फिर कह दिया,
बात करूँगा पूरी॥

और क्या चाहती भीड़,
सिर्फ सुनकर वह।
झूठे विश्वासों से ही,
फूली नहीं समाती॥

ऊपर से बजट था,
गरीब-भूखमंगों का।
जिनको नहीं मिलती,
दो समय की रोटी॥

आते ही बजट रूका,
प्रिय नेताजी के पास।
कभी नहीं भर सके,
ऐसे फैलाया हाथ॥

मालूम ही हुआ नहीं,
कैसे हुआ है घोटाला।
कौन कहे हिम्मत से,
भ्रष्टाचारी है नेता॥

बेचारी जनता जीये,
भूखी-प्यासी मरे।
नेता के साथ करते,
ऐश-आराम बेटे॥

कहीं पैसे के बल वो,
गरीबों को डराते हैं।
मार-लूट, हिंसा सभी,
साधारण खेल है॥

कोई कहता आतंकी-
मुखिया, उस नेता का ही
इकलौता और प्यारा
बेटा है, जो पकड़ाया।

होगी सजा कहने को,
गरीब को मिले फाँसी।
बिना कारण बताये,
सजा माफ है उसकी॥

क्यों? इस बार के पैसे,
जज-वकील को दिये।
क्या फर्क पड़ता है,
अभी चार वर्ष बाकी है॥

किसी दिन सजा होगी,
राम के हाथों इनकी।
दुष्कर्मी फल भोगेंगे,
खूब रो-रोकर के॥

रतन लाल जाट

3.  भूकम्प


         
खबर है आपको मार्च,
ग्यारहवाँ दिन क्या था?
मानते आ रहे थे हम,
वो देश भूकम्पों का॥

लेकिन उस दिन वो विकसित,
जापान खिलौना-सा।
ऊँची-ऊँची इमारतें,
डूबी हुआ तहलका॥

मानव दौड़ रहा शायद,
मशीन से होड़ लगी।
कुछ पाकर जग में वो,
लिखें अपनी कहानी॥

एक-एक पत्थर लाकर,
बड़ी मुश्किल से जोड़ा।
मालूम नहीं वो पहले,
कितनों को तोड़ चुका?

नर ने सोचा देव बनूँ,
लेकिन रति ना जाना।
अपना ही साधा स्वार्थ,
क्या परहित? भूल गया॥

अब देखो, रब का जादू,
दहल गया, काँप उठा।
केवल जापान ही नहीं,
सारा जहाँ जग गया॥

जरा सोचिए। क्या कारण?
प्यारी-सी माँ वसुधा।
क्यों हमसे रूठ गई?
क्या ऐसा काम किया॥


अगर हम करेंगे कुछ भी,
आँचल ओढ़े है माँ।
तब फटा देखकर आँचल,
बदल देगी वत्सलता॥

प्रिय पुत्र! माँ की ममता का,
खयाल तू भूल गया।
जब रोकर दे देगी शाप,
तब है विनाश तेरा॥

व्यर्थ ही भूल कर बैठा,
अब क्यों चुप रो रहा?
उठ! कुछ कर, क्षमा माँग,
धरती तेरी मैया॥

खबर है आपको मार्च,
ग्यारहवाँ दिन क्या था?
मानते आ रहे थे हम,
वो देश भूकम्पों का॥
    
रतन लाल जाट

4. अखबार


         
मुश्किल से निकलती है रात,
उड़ जाती है नींद इन्तजार में।
उनके इन्तजार में,
जिनको सुबह जल्दी नीचे गिरने से
पहले ही लोग उठा लेते हैं गोदी में।

आँखों में अपने
वो खुद बोलते है।
सच और सटीक
सबके सामने।
निडर हो फटकारे,
राजा और प्रजा को
अखबार हमारे॥

अखबार में जान है,
हिम्मत पूरे जहाँ की।
लगते हैं हरिश्चन्द्र,
जैसे राजा सत्यवादी॥
वो किसी मित्र से कम नहीं।
उनके बिना अधूरी है जिन्दगी अपनी॥

कोई बुराई उनको स्वीकार वहीं।
कभी किसी को माफ करते नहीं॥
कह देते हैं सबको ही,
साफ-साफ बात अपनी।

वो घर बैठे-बैठे ही,
सफर हमको करा देते हैं।
सारी दुनिया का
और भी उसके आगे॥

वह भी मात्र,
दो रूपये के टिकट में।
और ले जाकर
घुमाते हैं सब लोगों से॥
मंत्री, अफसर, जनता के साथ
चोर-डाकू और हत्यारों तक
और दिखाते हैं,
गाँव की गली।
खुला मैदान,
फिल्मी सितारे और
खोल-खिलाड़ी॥

सबको साथ लेकर अपने
रंग-बिरंगा परिधान ओढ़े।
आते हैं द्वार-द्वार पर,
सबको जगाने के लिए
आधीरात में ही निकल जाते हैं॥

दुष्ट राजा के मारे तमाचा
खुलेआम सड़क पर।
किसी गरीब के होनहार का
फोटो छापे तारीफ कर॥

हमारे अखबार
जिसने मिलने को
यदि कोई रोके।
तो महासंग्राम
मच जाना पक्का है॥

रतन लाल जाट

5. सुखद जीवन


           
मेरे सुखद जीवन में,
सबके लिए खुशियों हो।
मेरा करूणगान,
प्रत्येक दिल की आवाज हो॥

अन्तस में मेरे,
चिर-अभिलाषा व्याप्त है।
सार्थकता तभी है,
जब लोक-कल्याण का भाव समाये॥

मेरा हृदय नाच उठे, तो तुम जान लेना।
कि- जीवन सुखी है, सृष्टि के सभी प्राणियों का॥

किसी की पीड़ा-वेदना,
झलकेगी मेरी आँखों से।
जिसका अथाह सागर,
हिलोरें मारता मेरे दिल में॥

जब दिखाई देगी मुझको,
हर भिक्षुक के हाथ में रोटी।
तब मेरी क्षुधा हमेशा
शांत हो जायेगी॥

मेरी मुस्कान का अन्दाज,
दुखीजन के चेहरे से मालूम होगा।
और चिर-काल के लिए,
उड़ जायेगी आँखों से निद्रा॥

जब जन-जन के चेहरे पर उदासी
सदा के लिए दूर हो जायेगी।
बढ़ूँगा तब मैं कर्म-क्षेत्र पर,
फुर्सत किसी को भी ना होगी।

कर्म से थककर सब सो जायेंगे।
अर्द्धरात्रि को जगकर देखूँगा मैं सपने॥
उन सपनों में होंगे सब मानव अपने।
एक ही वेश में, एक ही देश में॥

अपनी भाषा, अपना मजहब।
मिलजुल कर, बढ़ायें कदम॥

हर राह पर बिछे काँटे
फूल की तरह बन जाये।
एक दुखी जन को
हम मिलकर सुखी बनायें॥

ऐसा मेरा सुखद जीवन।
जो सदा है हरा-भरा उपवन॥
जहाँ रहे बसंत सदा।
गुँजार करें सब अपना॥

मेरे सुखद जीवन में,
सबके लिए खुशियों हो।
मेरा करूणगान,
प्रत्येक दिल की आवाज हो॥

रतन लाल जाट

6.  कभी मैं


            
कभी मैं भाई हूँ, कभी मैं स्वामी।
कभी मैं बेटा हूँ, कभी मैं बाप की॥
कभी मैं राजा, तो कभी हूँ प्रजा।
कभी मैं आजाद, तो कभी गुलाम हूँ यहाँ॥

एक तरफ माँ का दुलार।
दूसरी तरफ बहन का प्यार॥
इसके सिवा पत्नी का जिम्मेदार।
और संतान को देना है स्नेह अपार॥

कहीं गम रूलाते, तो कहीं खुशियाँ हँसाये।
कहीं संकट की घड़ियाँ है, तो कहीं प्यार की बत्तियाँ है॥
दोस्ती निभाऊँ, आशिक कहलाऊँ।
प्यार दूँ, फिर भी प्यार ना पाऊँ॥

ऐसा कोई रूप या रंग नहीं है।
जिसमें नहीं रंगा हूँ कभी मैं॥
दुनिया में निभाने होते हैं कई रिश्ते।
कुछ जाने कुछ अनजाने॥

रतन लाल जाट

7. गीत- आज का युग


          
यह आज का फैशन है
या नये युग की पहचान।
जो जीन्स-टीशर्ट में फिरे,
आजकल के नौजवान॥

इससे बेहतर है,
घर-गली पड़े हुए।
बोरी जैसे तापड़े
जो सड़कर नये बन गए॥

इनको पसंद है,
बड़ी होटलों में जाना।
जबकि मालूम नहीं कि-
कैसे हो रहा घर-गुजारा?

आज बैठना जरूरी है,
नई मोटरसाईकिल पर।
क्या पता है इनको?
पाँव धरने को भी ठौर नहीं घर॥

आजकल मोबाइल का जमाना।
हर किसी के लिए जरूरी हो गया॥
जबकि इन बातों से क्या?
हम समृद्ध हो हुए है जरा॥

पहले की बातचीत में,
अपनापन था, विशेष अर्थ था।
अब किसी राजा की तरह
केवल बेतुका वार्तालाप ही बचा॥

ये लोग उस चिट्टी का महत्व,
नहीं जान पायेंगे हजार सन्देश भेज।
टीवी सीडी का भी महत्व
अश्लील बुराई से जोड़ेंगे ये लोग॥

इनको पसंद है नहीं,
कोई अच्छा प्रोग्राम देखें।
बस, इनके लिए
कॉमेडी पिक्चर ही काफी है॥

आजकल बाहरी थोथलापन,
ज्यादा मायना रखता है।
इनकी असलियत का आभास
इनको सड़क छाप कर देंगे॥

इन किशोरों के बीच,
ज्यादा प्रचलित है यह बात।
किसी भी चीज के प्रति सोचें,
सबसे पहले नकारात्मक भाव॥

यह आज का फैशन है
या नये युग की पहचान।

रतन लाल जाट

8. एक नारी


           
अच्छे आचरण वाली हो तुम नारी।
फिर क्यों लगे दाग तुम पर कभी॥
सौन्दर्य से मंडित, पुलकित-सी मोहित।
मणियों-सी देह, मोती-से नैनन॥

कमल-सा मुख तुम्हारा।
हर रूप है बड़ा ही प्यारा॥
कली-सी कोमल हो तुम।
रजनी बीच चाँदनी-सी तुम॥

प्रिय-रस में हो डुबी,
मधुर-मधु तुम्हारी वाणी।
जिसने भी सुना वही,
हो गया तुम्हारा प्रेमी॥

कितनी अच्छी हो तुम?
इस लोक की अनुपमा।
धन्य है उस असीम का,
जिसने तुमको जन्म दिया॥

जरा, पहचानो,अपने शील को।
मत लुटाना यह कभी कमीनों को॥

तेरी चमक से जग-रत्न,
सदियों तक रहेंगे जगमग।
जिसके आगे-पीछे पहरा,
लगाये दिन-रात रब॥

तुम्हारी रक्षा के खातिर
जब उठेगा खड़ग।
फिर कोई ना बचेगा
सारे हो जायेंगे अपंग॥

उस वक्त उन नर-पैशाचों को
नतमस्तक करवा देंगे।
तब नहीं बख्शेगी उनको
यह प्रकृति-नारी उन्हें॥

अब यह कहना है उनको,
नर का जन्म पाया तुमने।
मुँह-माँगी मौत चाहो तो
सद्कर्म में लग जायें॥
वरना तुम्हारे द्वारा बनायी,
बुरी-जमीं से उपजेंगे कीट-पतंगे।
जो मरते दम तक देह तुम्हारी,
काट-काटकर चूसते रहेंगे॥

पक्का है वचन अपना।
असीम का साथ है सदा॥
जब थे दुःखों के बीच हम।
तब साथ निभाया बनकर सच्चा मित्र॥

जब भी ऐसा होगा भू-पर
अवतार लेंगे हरि धरा पर।
तब मचल जायेगी हलचल
और सब हो जायेंगे नष्ट॥

फिर पुनः स्वर्ग होगा साका,
जहाँ जगमग होगी नारी।
अच्छे आचरण वाली हो तुम नारी।
फिर क्यों लगे दाग तुम पर कभी॥

रतन लाल जाट

9.  नवचेतना


                 
इस धरा पर खिला दो।
हर तरफ नयी सौरभ फैला दो॥

कर्म के बल पर, सफलता के सरताज हैं हम।
मालिक से दो शब्द सबका भला पुकारेंगे हम॥

तू बन्धु, मैं सखा, कोई ऊँच-नीच।
फिर भी हम एक ही मानव के बीज॥

गायेंगे गीत पावनता के।
आयेंगे दिन नवीनता के॥

उन्नत मस्तक रखेंगे हम।
महान् गौरव पायेंगे हम॥

पनप रहे हैं आज कलंकित संघर्ष।
रोक सकता है कौन इसे सहर्ष?

भारत माँ को फिर से जगायेंगे हम।
भारत माँ के लाल, मानवता के पुजारी हम॥

सदियों से रहा है मान हमारा।
युगों से गुँजा है गीत हमारा॥

अपनी ललकार आज फिर हम करेंगे।
पाक-कला को जड़ से हम उखाड़ देंगे॥

इस अभय वतन को, एक इशारे पर चलायें हम।
पैशाचों की कुल घंटियों को झकझोर हिलायें हम॥

प्रियतम की हरीतमा आ जायेगी।
मधुरता की कूक-कूक उठेगी॥

वसुधा के शुष्क-आँचल को,
आनन्द से,मोद से भर देंगे।
भारत माँ के सपूत हम,
नवपट का दरवाजा आज खोलेंगे॥

माँ! तेरे चरणों में आज।
नव-मानवता का हो आगाज॥

रतन लाल जाट

10. दैवीय-शक्ति


                 
माँ की कोख में जगह बनायी बच्ची बनके।
वात्सल्य उमड़ आया सूखे-से उस आँचल में॥

पाकर उसको शरीर वो भर आया रूप-सौन्दर्य से।
जन्म हुआ था जब कालिमा-भरी उस रात में॥

खिली पँखुड़ी बनकर वह, जगमग हो गयी जननी।
छा गयी छवि यहाँ, जैसे नयी आशा है रवि की रोशनी॥

बीता बचपन, खायी ठोकरें,
बन गयी कली कोमलता की।
सभी ने सँजोये ख्वाब अपने,
उनको वो पूरा करने में जुट गयी॥

अपनी चंचलता की जादुई-शक्ति से।
फिरकने लगी वह इस घर-आँगन में॥

वह करती है दूर,
रोग-शोक-क्रोध तुम्हारे।
बहती है निर्झर-सी वह,
रहते हैं सब खोये-से डूबे उसमें॥

मुसीबतों में सिखाती है वह धैर्य हमको।
युद्ध-स्थली में भरती है हुँकार कानों में वो॥

जब हो जाती है वह तरूणी,
फिर जोड़ती है रिश्ते दो घरों में।
वह अभागे का हाथ थामती,
जीवन प्रवाहित करती है नयी धार से॥

स्वामी को नाम पितृ का दिलाती है,
और घोर-परिश्रम का मंत्र सिखाती है।
अपने लाल को अमृत-सा दूध पिलाती है,
साथ ही शक्ति-साहस का वह संचार करती है॥

भरती है जोश वह, अपने बूढ़े-स्वामी में।
रोती है तो मृत देह काँप उठती गर्जना से॥

वह विधवा होकर भी, विधाता को नहीं कोसती है।
पतन के कगार पर खड़े, परिवार को आधार देती है॥

महाप्रलय की छत्र-छाया में,
दैवीय-शक्ति का रूप लेती है।
बिना पतवार की नाव को,
उतल उदधि के पार पहुँचाती है॥

निधि है स्नेह, प्यार और प्रेम की वह।
देती है मातृत्व-प्रेम का अनमोल दुलार यह॥
होती है पूजा उसकी तीनों लोक-परलोक तक।
भिति है सबकी वह जो खड़ी है इस सतह पर॥

चाँद-रवि ऋणी है अम्बर के,
अम्बर ऋणी है थिति का।
थिति से बड़ी प्रसिद्धि है इसकी,
जिसे सकल जग ने जननी कहा॥

कौन नहीं जानता है नाम इसका?
क्या कभी कोई इस ऋण से मुक्त होगा?
हम क्या? शिव-राम-कृष्ण भी,
पूर्ण नहीं कहला सके इसके बिना॥

रतन लाल जाट

11.  मत कर अभिमान तू


                 
मत कर अभिमान तू।
उठते तूफान के बीच यूं॥
रख स्वाभिमान, झुका दे शीश।
थम जायेगा विनाश इसी बीच॥

रावन बन जो रहे, वो दब गये।
हाथ जोड़ झुके, तो विभीषण कहलाये॥

निश्चित है अहं का अंत।
चाहे राजा हो या हो रंक॥
किसी को नहीं देता है शोभा।
नर होकर भी दैत्य-भाव कैसा?

नम्रता के आगे देवों का देव।
और कायरों का है कायर सदैव॥

परवश नहीं हो जाते हैं कभी अपने आप।
झुके बिना किसी को झुकायें हम आज॥
यह तो नम्रता नहीं होगी।
केवल है भय और दबाव ही॥
तुम्हें झुकने को विवश कर।
पत्थर-सा मान ले कोई मृत॥

अब सोचो-समझो।
थोड़ी देर भी मत लगाओ॥
घमंड से कुछ मिलता नहीं।
अपनी चीज भी है चली जाती॥

आज जरूरत है यही,
अपने मार्ग भटकें नहीं।
मत कर अभिमान तू।
उठते तूफान के बीच यूं॥

रतन लाल जाट

12.  किसी ने कहा था


               
किसी ने कहा था,
'नहीं गयी मेरे मन से।
एकपल भी हे वासना तू!'
सच ही कहा था उसने॥

वासना कम नहीं तू,
है किसी राक्षस से।
न जाने कब तू?
मुझमें जाग जाये॥

देवों का देवत्व और
दृढ़ भीष्म-प्रतिज्ञा।
सभी को तू कुछ
क्षण में ही देती है मिटा॥

फिर क्या है मानव?
वह तो पहले ही गिरा है।
कई सारी दुर्बलताएँ
रहती है उसको घेरे॥

क्यों जाग जाती?
तू हरकहीं, हरकभी।
थोड़ी-सी रूक जा।
वो मनुज है बेचारा॥

जब हो जरूरत,
तब है सार्थकता तेरी।
वरना कहूँगा मैं,
तुझको एक पैशाच-सी॥

यह एक फर्क है देवों से,
इसीलिए अलग है मनुष्य।
जो कर ले काबू इन पे,
वो सचमुच है एक देव॥

आज से सभी ठान लेना,
मन में विश्वास यह पक्का।
वासना का स्मरण तो दूर,
नाम से भी करना उसके घृणा॥

जो चाहोगे, वो पाओगे,
ईश आकर बस जायेगा।

कोई भेद नहीं करें,
तभी है उपयोगिता॥

तू मत घेरना किसी को,
नहीं तो मानव में जाग जायेगा।
कई दिनों से सोया राक्षष वो,
देव से गिर मानव दानव कहलायेगा॥

जो अक्षम्य पाप,
है महाघृर्णित कर्म।
और हिंसा-धोखा,
करती है तू ही सब॥

व्यर्थ है कर दो इसे त्याग,
नाम से भी रहो दूर इतना।
राक्षष भी छोड़ इसे बन
जाते हैं कभी-कभी देवता॥

किसी ने कहा था,
'नहीं गयी मेरे मन से।
एकपल भी हे वासना तू!'
सच ही कहा था उसने॥

रतन लाल जाट

13. क्या है यह जमाना?


                  
क्या है यह जमाना?
हरकोई चाहता है यहाँ॥
दादागिरी अपनी दिखाना।
जो फैशन से है बताता॥

हरकहीं आपने देखा होगा,
ऐसे लड़के-लड़की ही नहीं हैं।
मैंने तो प्रौढ़ों के अलावा,
कई सारे देखे हैं बड़े-बूढ़े॥

लड़के चाहते हैं सदा,
काले-काले लम्बे बाल।
  जैसे गुँथकर बनाते हैं जुड़ा,
और चेहरे पर करते है साज॥

हाँ, शृंगार-सौन्दर्य सब यहाँ,
बिना किसी रोक-टोक के चलते हैं।
देखकर चेहरा लगता है ऐसा,
शायद वो मर्द ना होकर औरत हैं॥

काले-काले लम्बे बाल,
चेहरे पर ना दाढ़ी, न मूँछ।
सिर्फ लिपा हुआ आये नजर,
पाउण्डर-क्रीम उसके मुँह॥

यही नहीं और भी,
क्या-क्या चला है फैशन।
पुरूष हो या सभी,
एकमेव हैं उनकेवस्त्र॥

नहीं दिखाई देते हैं सूती-रेशमी कपड़े,
पहनते हैं अच्छे-अच्छे जीन्स-कार्गो।
लगते हैं कितने सुन्दर और सुन्दरी,
क्या कहूँ स्कर्ट पहने हैं या टी-शर्ट वो॥

क्या है यह जमाना?
हर कोई चाहता है।
बाल कटवाती लड़कियाँ,
लड़के बाल गूँथते हैं॥

काजल की जगह काला चश्मा,
सैंडल नहीं पहने शूज महँगे।

उधर कमर में करधनी नहीं बेल्ट,
और लड़के गले में दुपट्टा डाले॥

क्या कहूँ? वो है क्या?
अंग-प्रत्यंग दिखाकर चलें।
वो चाल लड़कों से ज्यादा
तेज और अच्छी-खासी है॥

शर्म आती हैं बूढ़ों को क्या?
जो लगना चाहते हैं लड़के।
मरने का समय आया,
फिर भी बुढ़िया काजल-टीकी माँगे॥

क्या है यह जमाना?
लगते हैं कितने सुन्दर और सुन्दरी?

कितने कोमल लगते हैं युवा?
वज्र-सी मजबूत बन गयी आज युवती।
शायद घर से बाहर आने-जाने का
काम है उसी का जो है एक नारी॥

पति पिलाते हैं दूध बेटे को,
माँ जाती है नौकरी पर।
बेटी बन जाती है अफसर,
लेकिन बेटे का धंधा नृत्य-गायन॥

क्या है यह जमाना?
हरकोई चाहता है यहाँ॥
दादागिरी अपनी दिखाना।
जो फैशन से है बताता॥

रतन लाल जाट

14. प्यारी दुनिया


                 
यह दुनिया सच्ची है।
जिसे दुनिया ही झूठा कहती है॥
खुद झूठे हैं, तो सच्चा कौन होगा?
वह है जैसा, सब लगता है उसे वैसा॥

अच्छी है यह दुनिया।
विदा होने वालों ने कहा॥
मगर जो जी रहे हैं यहाँ।
उनको लगती है बुरी दुनिया॥

इसे स्वर्ग कहा जाता है।
जबकि इसके निवासी नरक में हैं॥

इसका शाश्वत विधान है।
जो सदा ही एक समान है॥
जिनका जीवन क्षणभंगुर है।
वो नाश के कगार पर खड़े हैं॥

यह सज्जत ही सबकी है जड़।
जो धरा की सतह के अन्दर॥
इस वट की टहनियाँ है।
अपना सारा संसार ये॥

कहते हैं  यह काम,
अगले जन्म में करेंगे।
क्यों करते हो उसका इन्तजार?
क्या पता? आप फिर जन्म पायेंगे॥

सब कर्मों की पवित्र-स्थली,
यही धरती माँ का है आँचल।
जिसके कर्मों की पूजा में ही,
चाँद-सूरज हैं पहरेदार॥

यह प्यारी दुनिया,
ब्रह्माण्ड की एक बाला है।
जिसकी महिमा से टक्कर
नौ नक्षत्र भी नहीं कर पाते हैं॥

अब बोल के तुम सुनाओ।
तब जानूँ मैं सच्चा उसको॥
कितना प्यारा-प्यारा?
यह लोक है हमारा॥

रतन लाल जाट

15. सूरज की रोशनी


                    
यह सूरज की रोशनी,
जिसकी हिलती-डुलती छाया।
कभी पास आ, कभी दूर,
जाती है यह परछाईयाँ॥

जो कभी हमको भाती है।
यही तपकर सबको जलाती है॥

नयी उमंग की एक निशान,
प्रभात की पहली किरण है।
वो ही डुबते सूरज की रोशनी
मानो दुःखों की पहचान है॥

जिसका इन्तजार है सर्दी में।
जो काँपते तन को राहत दे॥
फिर वही गर्मी में हमें।
इससे कटु-धिक्कार हैं॥

सुखों की महारानी है धूप,
जो सुनहरी साड़ी को फैलाये।
हँसते-रोते लोगों के बीच,
वो अपनी मुस्कान दिखाती है॥

आँसू की जमी बून्दों को,
यह भाप बना सोख जाती है।
ठण्डे दिलों में इसकी ज्वाला,
पसीने की एक धारा बहाती है॥

यह सूरज की रोशनी,
तिमिर को हर लेती है।
जिसके भयमात्र से यह
निशा भी चाँदनी होती है॥

उषा है उसकी पहली सहचरी,
फिर वो दिनभर सूर्य के साथ रहे।
सास है इसकी संध्या जो,
धक्के-मार डूबो देती है॥

यह सूरज जिसके ताप से।
लोहा हो या हो सोना,
सब पानी हो जाते हैं॥
कौन रोक सकेगा?
उसका शाश्वत-विधान है॥
इसकी दहक मात्र से,
सब झुलस जाते हैं।
कौन है जो उसे?
कभी आँच पहुँचा सके॥

जिसके उजाले से,
यह धरती जगमगाती है।
कौन ऊर्जावान है,
जो दीप दिखा सके॥

ब्रह्माण्ड का पिता है यह,
कौन इस असीम से टकराये?
सात लोक ऋणी हैं इसके,
कौन है धनवान? जो ऋण चुका सके॥

रतन लाल जाट

16.  परिश्रम


                         
यह परिश्रम ही है,
जो बड़े-बड़े महा-हस्तियों को भी।
घुटने  टिका करके,
कर देता है धराशाही॥

तब उनका तन निर्बल बन जाता।
किन्तु मन में होती है अपार प्रसन्नता॥

यही परिश्रम शैतान-दिमाग को,
चिन्तन करने की शक्ति देता है।
इसके बल पर मानव,
पहाड़ तक खोद डालते हैं॥

और चाँद पर पहुँच,
अपना आवास बनाते हैं।
इन सबके पीछे,
इसका ही एक हाथ है॥

सिर का पसीना धार बन
एड़ी पर उतर आता है।
तन पर जमें पाप को
पिघलाकर पुण्य बना देता है॥

ऐसे परिश्रमी की देह में,
परमेश्वर की ही वास है।
और  वो ताकत है उसमें,
जो नया इतिहास रचती है॥

बिना परिश्रम के मानव-जीवन,
एक जड़-पदार्थ के समान है।
जो सूक्ष्म जीवाणु से भी
गया-बीता समझा जाता है॥

दानवी-शक्ति अवसर तलाशती है।
जहाँ पौरूष कर्म की पुकार धीमी है॥
क्यों रूकते हैं विश्राम के लिए?
वो मरने के बाद मिलना पक्का है॥

तो फिर इस धारणा को,
खत्म कर नये स्वर्ग की स्थापना करो।


मरने पर यही परिश्रम
उस असीम को गवाही देता है।
तब जाकर कहीं न कहीं,
आत्मा को शान्ति मिलती है॥

वही भाग्य-निर्माता होता है।
जो परिश्रम को पक्का दोस्त मानता है।
वरना यह उनके लिए शाप हैं।
जो दुःख-पीड़ा और निराशा के आदी हैं॥

आज अभी से जाग जाओ।
चारों ओर परिश्रम की पुकार करो॥
तब गुँजेगी आवाज यह गगन-मण्डल में।
मनुज-कर्म से ही यह धरा गौरवान्वित है॥

रतन लाल जाट

17.  बदलते युग में


             
नयी सदी का नया दौर।
युवाओं का है ज्यादा जोर॥

कुछ हो सके तो आप भी।
जुटा लेना चीजें बहुत सारी॥

इनमें है जवानी का जोश।
और तुम्हारे में प्राचीनता का दोष॥

कुछ न कुछ बुरी चीज जरूर ही,
व्याप्त है हमारे में।
त्याग दें इन्हें आज ही,
नवीनता को धरें॥

इतना ही नहीं,
यदि युवा-वर्ग की गलत हो शैली।
तो जल्दी से आप,
सही राह पर चलने की दो चेतावनी॥

यदि हम दोनों ने मिलकर,
नये और पुराने का संगम कर दिया।
तो जान लेना कि-
इस धरा को स्वर्ग  में बदल दिया॥

जरूरत है आपसी सन्तुलन की।
एक-दूसरे से अच्छाई ग्रहण करने की॥

यही मंत्र हो अपना,
उसे जपकर हरकोई बने देवता।
धन्य हो, इस बदलते युग में सबका॥

रतन लाल जाट

18. सत्य ही है।


                 
न जाने क्या हो रहा है?
जो भी हुआ, इसे भूल जाऊँ मैं॥
लेकिन आँखों के सामने,
जो भी हो रहा है।
कैसे कर दूँ ?
अनदेखा उसको मैं॥

भले मैं मर जाऊँ।
लेकिन ऐसा कभी ना होने दूँ॥
कैसे समझाऊँ?
जो सत्य और यथार्थ में है।
विश्वास नहीं होगा,
यदि सहजता से सच्चाई मिल जाये॥

चाहे दुनिया छोड़ दूँ।
लेकिन उस मालिक से कैसे बच पाऊँ॥
जो कर्मगति निर्माता है।
और हम उसके लघु रूप हैं॥

यहाँ सत्य दब सकता है।
लेकिन खुदा की राह में,
वही पथ-अवलोकित करता है॥

जो पाप करके,
गंगा में नहाकर अपने को
पण्डित मान बैठे।
उसे तो नरक में,
कीड़े-मकोड़ों-सा जीवन मिलता है॥

कानों से सूना तो नहीं,
मगर आँखों से देखा जरूर ही सच है।
इन आँखों ने हमेशा ही,
यहाँ जुर्म-धोखा ही देखा है॥

उस परवरदिगार से कौन बच सकता है?
छुपा हुआ पाप कभी भी प्रकट हो सकता है॥

विजय सत्य और साहस की है।
जिसे खुद पर पूरा विश्वास है॥

भाग्य बदल नहीं सकता,
बिना पौरूष-कर्म के।
सुख मिलते हैं उसी को,
जिसने कभी घोर-निशा देखी है॥

उस असीम के दरबार में,
सज्जनता और परहितकारिता की जय-जयकार है।
इस बात का साक्षी,
कलियुग का प्राणी नहीं।
सत्युग से ही है,
इसके प्रमाण की निशानी॥

यहीं पर न्याय का द्वार है,
जहाँ किसी अपराध की सजा माफ नहीं।
और न ही यहाँ पर होती है,
बेईमानी, भ्रष्टाचारी और रिश्वतखोरी॥

रतन लाल जाट

19.  मृत्यु के बाद


                         
कहाँ थे इतने दिन पहले?
कुछ दिनों के मेहमान हैं॥
फिर एकदिन पहुँच जायेंगे।
वहीं जहाँ से आये थे॥

यह जीव आता है,
फूर्व-कर्मों का फल भोगने।
कुछ कर्म बन्धन
शिथिल हो जकड़ जाते
और कुछ जकड़न से
थोड़े ढ़ीले भी हो जाते हैं॥

जैसे कोई निकला हो,
अनंत काल की यात्रा पर।
लम्बी दूरी हैं वहाँ, जगह-जगह पर॥

मिलते हैं स्थान उसको।
थोड़ा रूकने-ठहरने के लिए
जैसे कोई धर्मशाला हो॥

यह धर्मशाला न हमारी है
और न ही किसी दूसरे की॥
सभी आते-जाते हैं,
कीट-पतंगे की भाँति॥

वो चलते रहते हैं,
कुछ खाते और पाते भी हैं।
यदि कोई रूक जाये,
तो यह कर्महीनता एक पाप हैं॥

यहाँ पर आना और रूकना।
कुछ करना और चला जाना॥

घुमते पहिये की भाँति
आते हैं बार-बार।
सभी यहाँ पर नये-नये बन॥
पुनः जीर्ण-शीर्ण बन जाते हैं,
वो कुछ कर्म करके।

पुराने वस्त्र त्याग कर।
लौट आता है नवीन बन॥


जैसे उठती हैं समुद्र की लहरें।
या रोज सूर्योदय हो जैसे॥

कितने ही मिलते हैं,
बिछुड़के अनजान से।
बिना परिचय के,
जीवन गुजार देते हैं॥

किन्तु वहाँ पर तो सभी अनजान हैं।
या एक ही जान के छोटे बिखरे टुकड़े॥

मृत्यु मुक्ति नहीं हैं,
कर्म ही सर्वोच्च है।
जिसके ही बल पर,
सबकुछ बदल सकता है॥

राह में भटकना, मंजिल पर पहुँचना।
या धीरे-धीरे सीढ़ियाँ, चढ़ना और उतरना॥
यह विधान है, सबका आदि-अन्त।
मगर आत्मा-परमात्मा हैं इनसे अलग॥

जो निर्णय-कर्त्ता है, जीवन-पथ पर।
वो निस्वार्थ भाव से, अपना फैसला कर॥

उसके कर्म ही जीवात्मा को साथ ले।
निकल जाते हैं राह पर अकेले॥
ना किसी का संग है, ना कोई है जूदा।
सभी है अपने आप में पूरा॥

जब तक आपको,
कर्म-फल मिलना बाकी है।
पुनर्जन्म ले-लेकर,
यात्रा पर भ्रमण करना है॥

आना है, जाना है,
कहीं न आश्रय-स्थल हमारा।
बिरले जन ही है,
जिनको मिलती है मंजिल वहाँ॥

मंजिल पर जाने वाला,
कर्म-फल का भोगी।
जो जीवन-यात्रा का पथिक
और कठिन-पथ का बटोही॥
वही पायेगा मृत्यु के बाद शान्ति।
और उसी का नाम है मुक्ति॥

रतन लाल जाट

20. मैं कौन हूँ?


                
लाखों का निवासी, मानवता का प्रेमी।
और भी हूँ मैं रोड़ी का रतन भी॥

अच्छा है जो भी, रहता हूँ साथ उसके,
शील ही शक्ति और शक्ति में सौन्दर्य है।
जिसका रक्षक हूँ मैं, उसको सर्वस्व कुर्बान है॥

जब भी होगी आवश्यकता उसको,
हँसते-हँसते लगा दूँगा मैं प्राणों की बाजी।
किन्तु नहीं लुटने दूँगा शक्ति-शील
और वो मूर्ति सौन्दर्य की॥

और भी हूँ मैं सत्यवादी-परोपकारी।
साथ ही हूँ झूठ का विरोधी॥
कर्म-फल का हूँ मैं पूर्ण विश्वासी।
मोह-माया से दूर, ना ही कामी-क्रोधी॥

मद भी है नहीं मुझमें
और क्या पाने की करूँ इच्छा मैं।

जो नहीं है किसी के पास।
मिल गया वो मुझे आसान॥

और भी हूँ मैं दिखावों से दूर।
और है भी क्या? जिसे दिखाऊँ खूब॥

यदि चीज अनमोल है,
तो फिक्र क्यों करें?
वो धूल-मिट्टी में पड़ी हुई
हीरे-सी चमक उठेगी।

और भी हूँ मैं, चिर-प्रेम का विश्वासी।
वादे पर अटल तथा सात जन्मों का संगी॥

चाहता हूँ नहीं अपने लिए
क्या चीज और किसलिए?
निज का त्याग कर सर्वस्व की आस है।
जिसका मिला साथ अपना सबकुछ दिया है॥

नहीं हूँ मैं किसी का स्वार्थी।
और भी हूँ मैं शील का सारथी॥

रतन लाल जाट

21.  मजदूरिन


                
तमतमाती धूप में नित चलती हूँ मैं।
गोद में लिए अपने लाल को,
कंधे पर घेंती-पावड़ा धरे॥

मजदूरी करती हूँ और
पालती परिवार अपना।
खून-पसीना बहाकर
कमाती हूँ एक-एक पैसा॥

किन्तु इज्जत-मर्यादा की
लाज बचाकर रखी।
आज तक है अपना आँचल,
निष्कलंक एक भी दाग नहीं॥

मैं किसी के हाथों,
निर्भर नहीं हूँ कभी।
इज्जत का सौदा करके,
नहीं कमाती हूँ एक कौड़ी॥

है नहीं इच्छा कभी
लखपति बनने की।
बस, मैं तो हूँ,
अपने में परमसुखी॥

तन अपना है, मन पर भी अधिकार अपना।
पवित्र कंचन-सी काया, बसती है पूज्य आत्मा॥

विधाता ने दिया, स्वर्ग से प्यारा लाल।
बस, यही मेरा है सारा धन-वैभव और संसार॥

मौज इसी में है निराला,
जब अपने हाथों से कमाकर।
सूखी रोटी और चटनी चबा,
खायें आँगन में बैठकर॥

परम स्वाद उठाना अकेले नहीं।
मेरा भरा-पूरा घर-परिवार भी॥

सदा स्वाभिमान से जीयें
और अलग रहें बुराई-से।
बस, इतना-सा कहती हूँ,
उठें और चल दें।
मेरी तरह तमतमाती धूप में॥

रतन लाल जाट

22. बचपन


                
नन्हे-मुन्ने बच्चे,
आते हैं दौड़ते-कूदते।
बात-बात पर वे
लड़ते और झगड़ते॥
सर्दी के मौसम में,
बिना कपड़े पहने।
तपती भीषण गर्मी में,
नंगे पैरों ही चलते॥
शायद उनके बचपन के आगे,
सर्दी-गर्मी भी थककर झुक जाती है।
यह कहकर कि-
तुमसे कौन जीत पाता है?

जब जेठ की दोपहरी में,
सारा जगत् चिर निद्रा में।
सोया हुआ खींचता हैं श्वाँसें
और ये नन्हे-मुन्ने बच्चे!
सोते तो है नहीं,
मगर बहाने कर भाग जाते।
मम्मी के सोते ही,
लड़कों के संग जा कहीं गुम हो जाते॥

तपती लू, बरसता पानी
और हिम के गिरते खण्ड।
ये सब रोक पाते हैं नहीं
और मौज उठाते हैं मासूम॥
जहाँ भी बच्चे जाते हैं,
मच जाता है तूफान वहाँ।
उनके आगे-पीछे,
रौनक चलती है सदा॥
यही चमन है इस धरा पर।
स्वर्ग का आनन्द इनके बीच॥
चारों तरफ हर्षोल्लास भर जाता है।
उनके जाते ही स्तब्धता छा जाती है॥

ये बच्चे ही शान हमारी।
आशा है भविष्य-निर्माण की॥
ये प्यारे बच्चे,
निष्कपट, सच्चे और कोमल हैं।
कहाँ खोजते हैं हम ईश्वर को?
वह बच्चों के संग खेलते हैं॥
इस जहां में सबसे सुन्दर फूल से।
ये बच्चे ही हमारे बाल-गोपाल कृष्ण हैं॥

रतन लाल जाट

23.  अपने शौक


                        
रोज सुबह उठने के बाद
खुद पढ़ना और पढ़ाने के साथ।
लिखना कुछ साहित्य खास
फिर खाली समय की है बात॥

गाने सुनना विशेषकर उदित नारायण के।
फिर स्वयं गुनगुनाकर गायक बनने की लत है॥
इतना ही नहीं, अवसर ढ़ूँढ़ना हूँ।
कहीं खेलने-कूदने को जाऊँ॥
मगर वक्त कहाँ मिलता?
और ना ही कोई संग है ऐसा॥

कभी बाहर जाऊँ, गाँव-शहर छोड़कर।
तो मैं देखना चाहूँ, प्रकृति के साथ ऐतिहासिक स्थल॥
इतना ही नहीं, हमेशा मन चाहता है।
बच्चों और महिलाओं के साथ,
दीन-दुःखियों के लिए॥
कुछ सहयोग करना,
उनका साथ देना।

यह सिर्फ कहना ही नहीं।
अपितु मेरी है विशेष अभिरूचि॥

बिन इसके जीना असंभव-सा लगे।
जीवन कटे कैसे? यदि कोई शौक ना है॥
दिन वर्ष जैसा लगे,
और जीवन मरण बन जाये।
इसीलिए मैं अपने शौक में,
रहता हूँ मस्त बिना किसी खौफ के॥

रतन लाल जाट

24. ये आँखें


            
ये आँखें सबकुछ देखकर भी,
कुछ भी देखती है नहीं।
वो आँखें जो दिखाई तक नहीं देती,
फिर भी सबकुछ कैसे देख लेती?

हमने कुछ कहना चाहा था,
समझ में ना कुछ भी आया।
फिर हमने सोच लिया कि- चुप रहना।
लेकिन अब हमसे वो ही आकर कुछ पूछता॥


सभी में भगवान के साथ शैतान है।
भगवान कभी तो नजर आ जाते॥
नहीं आये तो शैतान ताण्डव मचाये।
फिर भी भगवान क्यों बाहर नहीं आते?

अन्दर से आवाज आती कि-
यह मार्ग अच्छा है नहीं।
फिर भी मन चाहता है कि-
हम इसे कभी छोड़ेंगे नहीं॥


आज हमें अपनी पहचान नहीं,
दिल की बात हम कभी सुनते नहीं।
वो लोग कितने है अजनबी,
जो कुछ कहते, उसे करते नहीं॥

मालूम यह पेड़ छाया नहीं देगा।
फिर भी जरूरी है इसका उगना॥
क्योंकि यही एक आनंद है।
फल और छाया की जरूरत किसे?
फिक्र नहीं काँटे अपनों को चुभे।
फिर भी हमें तो मजा ही आता है॥

कोई ज्ञान-चक्षु अपने खोले रखता,
कोई बाहरी आँखें भी बंद किये रखता।
कोई अपने दिल की बात औरों को कहता,
तो कोई अपने दिल की भी कुछ ना सुनता॥

मालूम है यह डगर,
नहीं कोई इसकी मंजिल।
फिर भी चलते है निडर,
आगे क्यों ना हो कठिन?

कितना साहस है? जो सत्य को झूठ कहते।
अपनों से पराये हो, अनजान को खूब चाहते॥

जन्मों तक साथ है कोई,
फिर भी उसे पहचानते नहीं।
और कोई मिलते ही,
बन जाता है चिर-संगी॥

सब कहते हैं कि- यह गलत है।
गलत करने वाले भी यही कहते॥
फिर भी सत्य कोसों दूर भटके।
क्योंकि सत्य को कोई नहीं चाहे॥

रतन लाल जाट

25.  “नारी रूप एक है”


                       
नारी रूप एक है।
चाहे बाहर से कितनी ही अलग लगे?
हर स्त्री में सौन्दर्य है।
किसी में बाहर झलके, तो किसी में अन्दर छिपा है॥

नारी ममता की मूरत
प्रेम-परी-सी है सूरत
रणचण्डी जैसा धरे रूप
पापी को भी करे दूर

नारी पावन-शक्ति है।
चाहे बाहर से कितनी ही अबला दिखे?
नहीं है वो चरण-धूलि।
ना ही चीज है काम-भोग की॥

मत समझो तुम किसी एक को खास
हर नारी में दया-ममता और प्रेम-वास

कोई सुन्दर तो श्याम
फिर भी है एक नाम
लंबी हो या पतली
भारी हो या छोटी
शिक्षित हो या सुशील
शहरी हो या ग्रामीण
सब रूप-रंग में नारी है।
सच्चे-प्रेम की वो पुजारी है॥

सिर्फ एक नजर में यह कहना
ऐसी नारी नहीं हो सकती प्रिया
पत्नी या प्रिया ही नहीं
नारी कई रूप धर सकती

कभी शक्ति तो कभी कोमल
कभी परी तो कभी पावन
आँसू उसके मोती से महान्
आँचल में दूध अमृत-समान

सहिष्णुता का है नाम
बधाओं में दे साथ
बन जाये नाव
तो कभी छाँव
चन्द्रमा-सी दीपक जैसी

यही पहचान है, जो नारी कहलाये।
हारते का संग दे, जीत दिलाये॥
जीत के मद में डूबे, नर का नाश करे।
कोई बचे ना दिल से निकले, उसके शाप से ॥
एक नारी सदा नारी ही है।
एक चाँद की हजार किरणों जैसे॥

कोई पास तो दूर
सीधी आये या जाये तिरछी
कहीं चमके तो छुप
रहे हर आभा में हमेशा ही

नारी परी है एक शक्ति है।
माँ और सहचरी से आगे है॥

बेटी के रूप में कोमल
बहन के रूप में कोयल
पत्नी एक हंसिनी समान
प्रिया नदी-सागर मान

चाहे जो करे, सब उसके हाथ में।
देव-दानव दोनों मानव को बना दे॥

जैसा देखो, वो बन जाये।
नाश करो, तो काल जाये॥
जान दो, तो सत्ती बन जाये।
पूजा करो, तो मुक्ति दिलाये॥


लक्ष्मी-सरस्वती है विदुषी नारी
सीता-सावित्री है पतिव्रता नारी
राधा-मीरा है सच्ची प्रियतमा
रूप धरे झाँसी रानी व हाड़ी जैसा
तो अन्यायी दुर्गा-काली-भवानी-सा देखता

रतन लाल जाट

26.  संगीत


     
संगीत एक जादू
निराली है खुशबू।
दर्द में देता है चैन
सुख में करे बेचैन।
स्तब्ध में संचार
निर्जीव में भी जान।
संगीत की पहचान
सबसे ही बेमिशाल।
संगीत सागर
संगीत पावन।
बसंत संगीत
पतझड़ संगीत।
सरस है सतरंगी
अजर है अमर भी।
शांत को करे अधीर
अधीर हो जाये धीर।
कोमल है गात
सुमधुर आवाज।
हँसी के बीच अश्रु-सा
गमसीन माहौल में फूल-सा।
गरजता है संगीत
गूँजता है संगीत।

संगीत अनमोल
संगीत है बेजोड़।
कोयल भी, घुँघरू भी
मृदंग कभी, कभी मुरली।
शिव के तांडव में
कृष्ण की लीला में।
राम की पुकार सीते
हरे कृष्णा हरे-हरे।
सबमें गीत-संगीत
सबका मीत और प्रीत।
कंठ की सरगम
दिल की धड़कन।
एक खुमार, नया प्यार
अजब नाम, गजब काम।
संगीत है सच्चा
संगीत है पक्का।
जिन्दा भी खुशनुमा भी।
संगीत हरघड़ी है बस संगीत ही।

रतन लाल जाट

27.  श्रीराम


                   
मर्यादित जीवन, उचित कर्मरत
संयम शील आचार सुंदर
बोलना मित और मृदु
हँसना भी अति मंद
ऐसे राजा जो प्रजा-हित मर मिटे
ऐसे स्वामी जो हमेशा साथ रहे
पुत्र वचन निभाने वाला
भाई के लिए मरने वाला
अन्याय के विनाशक
सत्य के वो रक्षक
परहितैषी  है करुणावान
राजीवनयन वो राजा राम
दर्शन हेतु नयन प्यासे
बोलने को जी चाहे
अभिमान का नाम नहीं
पाप-क्रोध विकार नहीं
अयोध्या-सा सुंदर घर हो
दया-प्रेम तथा समर्पण हो
राम व राम से बड़ा है नाम
सबसे अच्छा है राम-राज

रतन लाल जाट

28.  एक बाप-बेटी


                  
एक बाप-बेटी की एक अजब कहानी
पापा जो कह दे  बिटिया वो कर दिखाये
जब कभी डाट पड़ती तो थोड़ा रूस जाती है
कुछ देर बाद ही वापस मान जाती  
अच्छी बात हो कोई तो हमेशा याद रखती
दुःख-पीड़ा बिन कहे मन में जान जाये 
कभी हँसना भी रुलाता कभी रोना हँसा देता
हर सजा पुरस्कार समझे छोटी-सी गलती भी याद रखे
दीपक की तरह जगमगाना तूफान में भी ना बुझना
कटु-सत्य की फटकार मिलती तो असीम दुलार की बौछार भी
ऊँचे सपनों की उड़ान है भरनी संघर्ष की एक मशाल जैसे जलती
पापा हर मोड़ पर निगाह रखे
तो बिटिया सपने आँखों में बसाये
लाख दुःख बस एक सुख पर भूल गये
और एक विश्वास पर हजार जंग छेड़ गये 

रतन लाल जाट

29.  बेटी है मेरी

मुँह बोली बेटी है मेरी
दुनिया की तुलना में भोली
और मैं भी हूँ कुछ ऐसा ही
जैसे बेटी वैसा ही है बाप भी

उस मासूम ने कहा था
अपने मुन्ने के राखी है बाँधना
बेटी के बिना बेटा भी है क्या
तुरंत मैंने सिर हिला दिया था

बस,कहना-पूछना तो एक बहाना मात्र था
वरना यह तो रब को पहले से ही मंजूर था
नहीं तो इस विशाल जहां में कौन किसका होता है
और बनाने से क्या कभी कोई किसी का अपना होता है

मैं खुद को बड़ा ही किस्मत वाला मानता हूँ
जो बेटे के साथ एक बेटी भी दुलारता हूँ
मुझे इसमें और उसमें आता नहीं कुछ फर्क है
अंदर से नहीं बाहर से देती दुनिया भी यह तर्क है


बेटी आँगन को स्वर्ग बनाये एक ऐसी परी है
  नेह के सागर में बहती हुई एक नदी है

बेटा जब पहली बार बोलने लगा कुछ
तो माँ ने दीदी-दीदी सिखलाया थोड़ा बहुत
सच ही उसे हमेशा के लिए हो गया स्मरण
और वो देख हर किसी को करने लगा पुनर्चक्रण

फिर इसके बाद हम दोनों ने कर लिया फैसला
कि बेटे के साथ मिल गयी बेटी तो चाहिए क्या
दोनों देखने लगे सपने हैं
उनके पढ़ने व लिखने के
बेटी के मन में देखी मैंने एक ललक
कुछ कर पाने की एक चाह अजब

तभी तो मैंने सारे सपने
समर्पण उसको कर दिये
वो आगे बढ़कर कुछ ऐसा करे
जो हम चाहकर भी ना कर सके

और कहते भी है कि
सन्तान पिता की होती है एक नयी जिन्दगी
इसी नियम पर चलने की
थोड़ी बहुत हमने भी है ठानी

बेटी को पाकर एक नया संसार मिला
सोचा न था वो सच्चा स्नेहभाव मिला
इतने दिन जो केवल सपना मात्र था
वो अब कुछ साकार होने लगा था

बेटी हमारी दुनिया का
सबसे पहला चाँद था
जो खुद नहीं आता
फिर भी होती है चन्द्रिका
वो है सब कुछ
और ना चाहत कुछ

हम पथ-प्रदर्शक वो है एक दीपक
अँधेरा अपने जीवन का और रह उसकी शूल बिछौना
दोनों एक दूसरे के पूरक कुछ नहीं जब हो अलग
एक विश्वास का सहारा और एक नयी आशा का सपना

बेटी कहती है बातें हजार
पापा पूछते है सौ-सौ सवाल
कभी झगड़ा कभी नाराजगी
कभी रूठना-मनाना कभी गिला-शिकवा भी
पल में युग का क्रोध उतर जाता
एक क्षमा से गुनाह सारे भुलाना


कुछ ऐसी एक कहानी है
जो केवल सपना मात्र है
फिर भी लगता सबको भारी है
क्योंकि उनके लिए मजाक सारी है

जो जैसा भी है देखता सब वैसा ही है
आँखों देखि लगे झूठी है और कानों सुनी सच्ची है
फिर कौन सुने आत्मा की पूछे खुद से
कब मन ही मन का वश है सब पे

वो बदले हम ना बदले
वो हारे हम हार के जीते
हँस-हँसकर वो रोये
हम रोकर भी खूब हँसे

ताकत मिली जंक-सुता को
मजबूत हुए बंधन मिलने को
तोड़ने लगे वो और भी जुड़े
पहले दुखी थे वो और दुखी हुए

ना आकाश में सूरज डूबा
ना धरती से कोई चंदा
धरती-आकाश आज भी बिलकुल वैसे हैं
जो सदा से युगों-युगों तक थे

हम तो बस इतना ही कहेंगे
सत्य कब तक पाप झेलेंगे
एकदिन सब सामने आ जायेगा
दबा दिया फिर भी बदबू मारेगा

समय के आगे सब हार जाते हैं
हम भूल जाते मगर वो याद दिलाये
कौन-क्या था कौन-क्या है और क्या होगा
पाप बढ़ा खुद ही मिटा बोलो कब जीता

अग्नि से कोई ज्वाला मिटा दे
या धरती से आकाश मिला दे
धरती सबकी माँ और पिता आसमां
इनके बीच चराचर का रिश्ता क्या

एक अपने गर्भ से उत्पन्न करे
और एक उनकी सदा रक्षा करे
जो नियम तोड़ता वो इतिहास बन जाता
जो नियम पर चलता वो इतिहास बनाता

ऐसा तो होता आया है आज से नहीं
जब राम-कृष्ण थे उस जमाने में भी
किसने याद किया रावण-दुर्योधन को
कौन भूल गया जंक-वसुदेव को

कान्हा के पीछे त्याग था कितना
सीता से स्नेह उस पालक का
लेकिन सबको यह रस नहीं आया
किसी न किसी को जरूर सताया

हुआ नहीं जो खुदा ने चाहा
अब तक हमसे क्या कुछ हुआ
ओस बारिश नहीं
गरमी एक आग नहीं
गुलदस्ता फूल नहीं
और न इन्सान भगवान ही

पुत्री पिता से बड़ा नहीं
नहीं पिता उसके बराबर है
रिश्ता टूटता नहीं यदि जुड़ा है
और दुनिया में तो पाया भी खोया है

पिता को आज पुत्र से छोटा माना जाता है
माँ को नौकरानी का दर्जा दिया जाता है
बेटा बाप बनकर रहने लगा है
और माँ सीखती बेटी से क्या है
बहिन-बेटी बोझ बन गयी
घर की न घाट की रही
हम किसी के बन कभी ना सके
तो कोई अपना बनेगा भी कैसे
कहने को तो आज बहुत है
मगर करने को शायद नहीं कुछ है
सत्य को छुपाना
समय से टकराना
पाप का प्रचार करना
धर्म को मिटाना

हमारे-तुम्हारे बस की बात नहीं
बोलो तुम्हें इसका कुछ भान नहीं

रतन लाल जाट

30. सच ही


       

सच ही कहते हैं,
जीवन है पौधों में भी।
वे रोते हैं मूक-बन,
किसी को कहते नहीं॥

हिलते-डुलते भी हैं।
अपने आप में ही वे।
औरों को लगता ऐसे,
कि-वे खड़े जड़ हैं॥

लेकिन यह सच ना,
है केवल झूठ-हिंसा।
जो हम करते ऐसा,
सोचे-समझे बिना॥

वो देते हैं फल-फूल,
निःस्वार्थ भाव रखते।
यदि हम मनु–जन,
बिना सोचे-समझे॥

उतर आयें करने को,
दानवों-सी पाप-हिंसा।
गीली डाल या पत्ती को,
और जड़ भी काटा॥

तब कहूँगा हत्या है,
और आप-अत्याचारी।
और उपयोग करें,
तो सच ही माँसाहारी॥

अभी तक याद मुझे,
किसी मुख से सुना था।
बकरी-मुर्गी या गाय
इनका घोंट दे गला॥


कैसे बने माँसाहारी?
पेड़-पौधों का दिया।
सब उपहार भी हैं,
ठीक इनके जैसा॥

सुन यह सहमा-सा,
मैं हक्का-बक्का हो गया।
सोचने लगा था यह,
पौधा है अभी हरा॥

कहाँ हमने मारा हैं?
दया-से दिया हमें।
जैसे गाय दूध देती,
बकरी देती ऐसे॥

फिर क्यों लें जीवन,
बचाकर करें पूजा।
और इन सभी हाथों,
पायें नया तोहफा॥
 
रतन लाल जाट
  कवि-परिचय 
रतन लाल जाट S/O रामेश्वर लाल जाट
जन्म दिनांक- 10-07-1989
गाँव- लाखों का खेड़ा, पोस्ट- भट्टों का बामनिया
तहसील- कपासन, जिला- चित्तौड़गढ़ (राज.)
पदनाम- व्याख्याता (हिंदी)
कार्यालय- रा. उ. मा. वि. डिण्डोली
प्रकाशन- मंडाण, शिविरा और रचनाकार आदि में
शिक्षा- बी. ए., बी. एड. और एम. ए. (हिंदी) के साथ नेट-स्लेट (हिंदी)

ईमेल- ratanlaljathindi3@gmail.com

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रचनाकार: कविता संग्रह - मैं हिन्दी हूँ - रतन लाल जाट
कविता संग्रह - मैं हिन्दी हूँ - रतन लाल जाट
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