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सब्जी वाली पॉलिथीन - लघुकथा - सुशील शर्मा

"अरे शर्मा जी सब्जी पॉलिथीन में ले रहो हो कम से कम आप से तो ये उम्मीद नहीं थी।" 'एक पर्यावरण प्रेमी दोस्त ने शर्मा जी को टोका।

"हैं हैं ...... सही है अब क्या करें घर से घूमने निकले थे थैला नहीं ला पाए सोचा इसी में ले लो। "'शर्मा जी पॉलिथीन को छुपाते हुए बोले।

"वो तो ठीक है पर कल पर्यावरण संरक्षण पर आपने पॉलिथीन के विरोध में कितना अच्छा बोला था और आज आप ही ....... ।" पर्यावरण प्रेमी दोस्त ने शर्माजी को आइना दिखाया।

"अरे यार शर्मिंदा मत करो कल से थैला लेकर ही चलूँगा। "शर्मा जी को वास्तव में शर्म आ रही थी।

दूसरे दिन शर्माजी बाकायदा थैला लिए सब्जी मार्किट में पर्यावरण प्रेमी दोस्त के पीछे खड़े थे।

पर्यावरण प्रेमी दोस्त सब्जी वाले से कह रहा था "टमाटर पॉलिथीन में रख दो वरना सब्जी में पिचक जाएंगे  ,साथ ही कटा हुआ एक किलो कद्दू वो भी अलग से पॉलिथीन में रख दो ,कटहल भी छोटे छोटे टुकड़ों में काट कर अलग पॉलिथीन में रख देना। "

सारी सब्जियों को पॉलिथीन में रखवा कर उन सभी को थैले में रख कर पर्यावरण प्रेमी दोस्त जब मुड़ा तो शर्मा जी के थैले पर नजर पड़ी "वह शर्माजी आज तो आप थैला लेकर आये हैं बहुत शुभ कार्य ,मुझे देखिये हमेशा थैला लेकर ही सब्जी मार्किट आता हूँ।"

अभी भी शर्मा जी को समझ में नहीं आ रहा था कि सब्जी थैले में लें या पॉलिथीन में।

रिमझिम बारिश हो रही थी एक मिडिया चैनल का संवादददाता अपने कैमरे को पॉलिथीन से ढके पॉलिथीन में सब्जी ले जाने वालों को प्रेम से लताड़ लगाकर डॉक्यूमेंट्री बना रहा था।

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