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आलेख - सम द्रष्टि - दीपक दीक्षित

मेरे घर के पास एक व्यस्त सड़क है। मैं इस पर कभी कार से तो कभी पैदल चला करता हूँ।

जब मैं कार चला रहा होता हूँ और अक्सर जल्दी में होता हूँ तो लगता है कि क्यों इतने सारे लोग पैदल चल रहे हैं? क्या ये आराम से अपने घर नहीं बैठ सकते? रेंग रेंग कर आखिर ये पहुँच भी कितनी दूर जायेंगे? बिना ज़ेबरा क्रोसिंग के जब कोई अचानक सड़क पार करते हुए कार के सामने आ जाता है तो खलनायक नज़र आता है जिस पर गुस्सा भी आता है और तरस भी। दो चार भद्दी सी गाली भी निकल ही पड़ती है जो कभी मुंह से बाहर छलक जाती है और कभी दिमाग में अटक कर रह जाती हैं।

पर जब में इसी सड़क पर पैदल चल रहा होता हूँ तब मेरी विचारधारा उलटी तरफ चल रही होती है। इन गाड़ी वालों को जरा भी सब्र नहीं है? ऐसे फर्राटे मार कर कहाँ भागे जा रहे है? क्या दुनिया इनके बिना रुक जायेगी? जब कोई तेज गाड़ी किसी पैदल या खुद को बिल्कुल छूती सी निकलती है तो गाड़ीवाला खलनायक बन जाता है और दिमाग से गालियों की यात्रा शुरू हो जाती है।

जीवन में भी अकसर ऐसा ही होता है। बाहर कुछ खास नहीं बदलता पर हमारा रोल बदल जाता है। कभी हम सरकार की तरफ होते हैं तो कभी विरोधी पार्टी मैं। प्रश्न यह है कि जीवन के इन दो विरोधाभासी नज़रियों के बीच झूलते हए क्या खद को सही साबित करने के लिए दूसरे के गलत कहना /सोचना जरूरी है?

वैसे तो अगर हम समाज में अपने तरह तरह के रोल को समझें तो इस प्रश्न का उत्तर अपने आप ही मिल जाता है। कही हम बौस तो कही मातहत, कही बेटा / बेटी तो कही पिता/माता, कही दामाद तो कही सास-ससुर,कहीं ग्राहक तो कहीं दुकानदार। समय के साथ समाज की रचना ही हमें हमारे इस अज्ञान से छुटकारा दिला देती है।

पर अगर यह समस्या हमें परेशान कर रही हो तो योग और अध्यात्म में इसके निदान की विधियाँ बताई गयी है। इन सभी का मूल यह है कि जब हम साक्षी भाव से बिना पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हुए जीवन की घटनाओ में भाग लेते है तो सब कुछ सही लगने लगता है और किसी को भी गलत साबित करने की जरूरत ही नहीं रहती । जब हम मन वचन और कर्म से इस तरह का व्यवहार करना सीख जाते है तो सही अर्थों में जीवन में रहते हुए भी एक योगी या संत हो जाते है।

दीपक दीक्षित

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लेखक परिचय

रुड़की विश्विद्यालय (अब आई आई टी रुड़की) से इंजीयरिंग की और २२ साल तक भारतीय सेना की ई.ऍम.ई. कोर में कार्य करने के बाद ले. कर्नल के रैंक से रिटायरमेंट लिया . चार निजी क्षेत्र की कंपनियों में भी कुछ समय के लिए काम किया।

पढने के शौक ने धीरे धीरे लिखने की आदत लगा दी । कुछ रचनायें ‘पराग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘अमर उजाला’, ‘नवनीत’ आदि पत्रिकाओं में छपी हैं।

भाल्व पब्लिशिंग, भोपाल द्वारा 2016 में "योग मत करो,योगी बनो' नामक पुस्तक तथा एक साँझा संकलन ‘हिंदी की दुनिया,दुनियां में हिंदी’ (मिलिंद प्रकाशन ,हैदराबाद) प्रकाशित हुयी है।

कादम्बिनी शिक्षा एवं समाज कल्याण सेवा समिति , भोपाल तथा नई लक्ष्य सोशल एवं एन्वायरोमेन्टल सोसाइटी द्वारा वर्ष २०१६ में 'साहित्य सेवा सम्मान' से सम्मानित किया गया।

वर्ष 2009 से ‘मेरे घर आना जिंदगी​’ ​(http://meregharanajindagi.blogspot.in/ ​) ब्लॉग के माध्यम से लेख, कहानी , कविता का प्रकाशन। कई रचनाएँ प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं तथा वेबसाइट (प्रतिलिपि.कॉम, रचनाकार.ऑर्ग आदि) में प्रकाशित हुई हैं।

साहित्य के अनेको संस्थान में सक्रिय सहभागिता है । राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई गोष्ठियों में भाग लिया है। अंग्रेजी में भी कुछ पुस्तक और लेख प्रकाशित हुए हैं।

निवास : सिकंदराबाद (तेलंगाना)

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन

संपर्क​ : coldeepakdixit@gmail.com

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