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कहानी - पुरस्कार - डॉ0 मृदुला शुक्ला "मृदु"

आज एक व्यक्ति चिलचिलाती धूप में खूब नाचता, गाता, झूमता, तालियाँ बजाता हुआ उछल-कूद कर रहा था, उसे खुद अपनी सुध-बुध तक न थी। लगभग 40, 50 व्यक्ति और थे, जो उसका साथ पूरी ईमानदारी के साथ दे रहे थे झूमने, नाचने, गाने में धुत होकर।

एक बुज़ुर्ग प्रतिष्ठित महिला अपने लॉन में बैठी-बैठी यह सारा नज़ारा बड़े गौर से देखे जा रही थी, पर यह सारा माज़रा आख़िर है क्या ? ये उसकी समझ में नहीं आ रहा था।

          वह महिला अपनी कुर्सी से उठकर धीरे-धीरे क़दमों से उस झूमते-गाते समूह के समीप गई, जहाँ सारे के सारे लोग बेसुध होकर झूमने में मगन थे। उनमें एक व्यक्ति कुछ कम झूम रहा था, उस बुज़ुर्ग महिला ने उस व्यक्ति से पूछा–"ज़रा सुनो भैया, वो सबसे आगे जो व्यक्ति है, जिसके गले में गेंदे के फूलों की मालाएँ पड़ी हुयीं हैं, वो इतना झूमता हुआ उछल-कूद क्यों कर रहा है ? क्या मानसिक विक्षिप्त है ? हाय हाय हाय । कितना हृष्ट-पुष्ट होते हुये भी अपनी मानसिक विक्षिप्तता के कारण कितना परेशान है बेचारा।" वह अपने दिल की गहराई से अफ़सोस जताने लगी। उस महिला से उस झूमने वाले कि तक़लीफ़ देखी नहीं जा रही थी।

           कुछ क्षण बाद उस महिला ने पुनः कहा–"अरे सुनो भैया! अगर तुम लोग कहो, तो मैं एक बहुत बड़े मनोचिकित्सक को जानती हूँ, वो बड़े-बड़े मानसिक रोगियों का इलाज करके उसे पूर्णरूप से स्वस्थ कर देते हैं।"

      वह महिला मनोचिकित्सक के विषय में बात कर ही रही थी, कि तभी वह व्यक्ति बीच में ही मेरी बात काटते हुये बोल उठा–"नहीं, नहीं। नहीं मैडम, वह कोई मानसिक रोगी नहीं है। यह तो सरकारी जूनियर हाई-स्कूल का मास्टर है, बहुत कर्मठ है, कर्तव्यपरायणता कूट-कूट कर भरी है इसमें, स्कूल कभी झाकने तक नहीं जाता और यदा-कदा कभी चला भी जाता है, तो बच्चों को पढ़ाने से उसका दूर-दूर तक कोई वासता नहीं होता। अधिकारियों और बड़े-बड़े नेताओं के तलवे चाटता रहता है, उनके आगे-पीछे घूमता रहता है, बढ़-चढ़ के बड़ी-बड़ी डींगें मारता रहता है, अधिकारियों का कृपापात्र बनकर खूब कमाता रहता है। जिन लोगों से मतलब होता है, कोई भी काम निकालना होता है, तो उन्हें अपने सगे-सम्बन्धी की तरह मानता है और अपना काम निकलते ही, उन्हें अपना सबसे बड़ा शत्रु मानने लगता है। तीन-चार बार तो निलम्बित भी हो चुका है और अन्दर ही अन्दर सबसे मिलकर मामला निपटा लेता है।"

           सभी अधिकारियों और नेताओं की, की गई चाटुकारिता आखिर आज अपना रंग ले ही आई है।

            सरकार ने उसे शिक्षा के स्तर को ऊँचाई पर ले जाने के प्रयास की अतिशय सराहना करके पुरस्कृत भी किया है। ये बहुत ही योग्य, विद्वान, कर्मठ और कर्तव्यनिष्ठ है, बहुत महान है, तभी तो सरकार के द्वारा पुरस्कृत किया गया है।

         हम सबके लिए तो ये साक्षात देवता है मनुष्य के रूप में। हम सभी बहुत ही गौरवान्वित हैं कि हम सबके मध्य में एक ऐसा मास्टर है, जिसने पूरे जिले का नाम रोशन किया है। बस इसीलिए हम सब मिलकर हर्ष और उल्लास के साथ ख़ुशियाँ मना रहे हैं, नाच-कूदकर जश्न मना रहे हैं।

         हम लोग तो हमेशा ही उसके साथ रहते थे , परन्तु अब तो और ज्यादा उसके साथ रहेंगे, खूब लम्बी-चौड़ी शोभायात्रा निकालेंगे, उसकी जय-जयकार करेंगे, जिससे हमें भी सब लोग जान जाएंगे, पहचान जाएँगे , हर जगह पहुँच बन जाएगी और आराम से घर बैठे नौकरी भी चलती रहेगी। ये भी हम सबको अपना सगा-सम्बन्धी मानेगा, हो सकता है कि कभी हमें भी पुरस्कार दिलवा दे।

          "हाँ, हाँ, क्यों नहीं ? बिलकुल, बिलकुल।" वह महिला अकस्मात ही बोल उठी। जो झूमते रहते हैं, घूमते रहते हैं, बड़े से बड़े गलत कार्य करते रहते हैं, महीने-महीने और सालों भी हो जाते हैं विद्यालय के दर्शन तक नहीं करते, वही तो पूजनीय, वन्दनीय,आदर्शपूर्ण और अच्छे, विद्वान और योग्य माने जाते हैं,वही सम्मानित किए जाते हैं और पुरस्कृत भी किये जाते हैं।

    और जो लोग शान्तिपूर्वक, निष्ठा, लगन, सत्यता, ईमानदारी के साथ और अथक परिश्रम से कार्य करते हैं, ज़िम्मेदारी निभाते हैं, अपने कर्तव्य अच्छे से निभाते हैं, वे लोग ऐसे पुरस्कारों के लिए लालायित भी नहीं रहते।

        मास्टर जी को असली और सच्चा पुरस्कार तो उसके पढ़ाये हुये शिष्य ही देते हैं। जब वे पढ़-लिख कर ऊँचे-ऊँचे प्रतिष्ठित पदों पर आसीन होते हैं, तब जिस अलौकिक आनन्द की प्राप्ति होती है और मन कमल के पुष्प की पंखुरियों की तरह खिल उठता है। सही अर्थों में एक सच्चे और महान शिक्षक के लिए वही सबसे बड़ा सम्मान और पुरस्कार होता है। इस प्रकार ये सब धीरे-धीरे बुदबुदाती हुई वह महिला अपने लॉन की तरफ चली गई और वहाँ पड़ी हुई कुर्सी पर हठात बैठकर न जाने किन खयालों की गहराई में डूबती चली गई।

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डॉ0 मृदुला शुक्ला "मृदु"

114, महराज-नगर

लखीमपुर-खीरी (उ0प्र0)


कॉपीराइट–लेखिका डॉ0 मृदुला शुक्ला"मृदु"

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