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कविताई से पहले, कविता से परिचय जरूरी - संत समीर

क्या आप भी काव्य रचते हैं?

यदि हाँ तो आपके लिए एक बेहद जरूरी आलेख.

तीन-चार दिनों पहले एक बड़े आदमी (सचमुच प्यारे इनसान) की लिखी एक ग़ज़ल पर मेरी निगाह पड़ी। तीसरी पङ्क्ति पढ़ते ही माथा ठनका। फिर पाँचवीं, सातवीं पङ्क्तियों और आख़िरी पूरे शेर में ही मुश्किल दिखाई दी। ग़ज़ल मीटर से बाहर भाग रही थी। मज़ाक़ में कहना चाहें तो ग़ज़ल का नाड़ा ढीला था और वह पाजामे के बाहर अब निकली कि तब निकली। बड़े आदमी की लिखी हुई थी तो मैंने सोचा कि क्यों न इसे किसी बड़े शायर के पास ही भेजूँ, क्योंकि मैं कोई शायर हूँ नहीं और हो-न-हो मुझसे ही समझने में ग़लती हो रही हो। शङ्का वाली जगहों पर मैंने निशान लगाए और इसे व्हाट्स एप कर दिया एहतराम इस्लाम जी को। अच्छा लगा और अपने हल्के-फुल्के ज्ञान पर भरोसा जगा, जब एहतराम भाई ने हर शेर की तक़ती की और मेरी सारी शङ्काओं को एकदम सही ठहराया। उन्होंने शुरुआती शेर में कहन की गड़बड़ी पर कुछ महीन बातें और बताईं।

इस बात का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूँ कि नए-नवेले शायर सावधान हो जाएँ। कुछ लोग ग़ज़ल को मीटर-मुक्त या कहें बहर की बन्दिश से आज़ाद करना चाहते हैं। थोड़ा गहरे उतरेंगे तो पता चलेगा कि यह मीटर-मुक्ति मज़ाक़ के अलावा और कुछ नहीं है। यह दोहे और चौपाई को छन्द-मुक्त बनाने जैसा है। मैं उस व्यक्ति की चरण-वन्दना करना चाहूँगा, जो एक मात्रा भी कम या ज़्यादा करके दोहा या चौपाई लिखने का दम दिखा दे। आप कविता में एक ऐसी धारा तो चला सकते हैं, जो छन्द-मुक्त हो, पर किसी छन्द को ही छन्द-मुक्त भला कैसे कर लेंगे? छन्द-मुक्त कविताएँ लिखी जा रही है और अच्छी लिखी जा रही हैं, पर आज तक एक भी दोहा, चौपाई, सोरठा, सवैया नहीं लिखा जा सका, जिसके पाँव छन्द के बाहर निकले हों। ज़रा ध्यान देंगे तो यह रहस्य भी पता चलेगा कि दोहा, चौपाई वग़ैरह हमारे दिए हुए नाम भर है, वरना गेयता के ये प्राकृतिक नियम हैं, जिन्हें हमने बस जान भर लिया है और जिन्होंने हमारी अभिव्यक्ति को एक अलग तरह के सुर-ताल में ला दिया। इस बात को समझिए कि आप नियम बनाते नहीं, सिर्फ़ तलाशते हैं। आप बस मात्राओं के उस नियम तक जा पहुँचे, जहाँ से दोहे या चौपाई की धुन निकलने लगती है। विज्ञान यह भी है, बस बात इतनी है कि यहाँ भौतिक वस्तुओं के बजाय केन्द्र में भाषिक अभिव्यक्ति है।

ग़ज़ल का मामला ऐसा ही है। ग़ज़ल काव्य की एक विधा है, जिसके लिए छन्द या बहर ज़रूरी है। आप कोई नई बहर ईजाद कर लें, यह आपकी क़ाबिलियत, पर समझ लें कि बिना बहर के बात नहीं—बहर गई तो ग़ज़ल गई। मीटर पर लड़खड़ाती ग़ज़ल की मुश्किल गायक से पूछिए। एक पङ्क्ति का सुर ईर घाट पर भागेगा तो दूसरे का मीर घाट। बहर-मुक्त ग़ज़ल के जिन भी हिमायतियों से मेरा संवाद हुआ है, वे सभी-के-सभी ऐसे मिले, जिन्हें बहर की बारीकियाँ और मात्राओं की तक़ती या कहें गणना की ठीक जानकारी नहीं थी। नाम बड़ा हो गया, तो शायद अब उन्हें किसी दूसरे से कुछ सीखने में शर्म भी महसूस हो रही होगी। ऐसों से मैं बस यही कहूँगा कि ज़बर्दस्ती अपने अज्ञान पर परदा डालने के लिए बहर की बन्दिश से आज़ादी का अभियान मत चलाइए। ज़रा खुली नज़र से देखिए तो बहर गुलामी नहीं आज़ादी नज़र आएगी। यह रहस्य समझिए कि बहर की बन्दिश जैसे ही मुकम्मल होती है, वैसे ही ग़ज़ल आज़ाद होकर ज़बान पर तैरने लगती है।

नया कुछ सीखने में कैसी शर्म? पद और क़द का सङ्कोच छोड़कर कोई अच्छा-सा उस्ताद तलाशिए और विनम्र भाव से ग़ज़ल के कुछ गुर सीख लीजिए। मैं सिर्फ़ तुकबन्दी के शौक़ीनों को कोई सलाह नहीं दूँगा, लेकिन यदि ग़ज़लगोई के हिसाब से आप समृद्ध भावों के मालिक हों तो आपको इसका छन्द-विधान भी ज़रूर सीखना चाहिए। फ़ायदे में रहेंगे। दिल्ली के आसपास हों, मिल सकते हों, तो चार-छह आसान-से बहर मैं ही बता दूँगा कि आप ताउम्र ग़ज़ल कहते रहिए। वैसे, बहर के बाहर विचरण का विशेष ही शौक़ हो तो छन्द-मुक्त कविता का संसार भी कोई कम बड़ा नहीं है। छन्द-मुक्त कविताएँ कई बार ज़्यादा असरदार साबित हुई हैं।

ग़ज़ल की बनावट का रहस्य जान लेने के बाद यक़ीन मानिए आप आनन्द से भर उठेंगे। लेकिन सावधान, अगर लिखने के पहले ही नाप-जोख के चक्कर में पड़ेंगे तो गच्चा खाएँगे। ग़ज़ल मुकम्मल हो जाए, फिर उसे पैमाने पर परखने की ज़हमत उठाइए। असल में तो पैमाने से अच्छी तरह परिचित होना ही काफ़ी है, क्योंकि यह होने पर यह अजब घटना भी आपके साथ घटेगी कि लिख लेने के बाद में नाप-तौल शायद ही कभी करनी पड़े। आपका अवचेतन ख़ुद ही नापतौल करता चलेगा।

सीधी-सी बात...ग़ज़ल कहनी है तो मीटर पर चलना ही पड़ेगा, पर यह भी याद रखिए कि कहन में वज़न न होगा, तो भी बात न बनेगी; क्योंकि ऐसे में आप सिर्फ़ शब्दजाल रचेंगे।

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