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बाँसुरी के मधुर सुरों में कड़वे दिनों की राग - संत समीर का संस्मरण

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इस बाँसुरी पर जब भी निगाह पड़ती है, जैसे कोई अलिखित इतिहास रूपाकर होने को मचलता है। अतीत के कुछ चेहरे आँखों के सामने तैरने-से लगते हैं। कई व...

इस बाँसुरी पर जब भी निगाह पड़ती है, जैसे कोई अलिखित इतिहास रूपाकर होने को मचलता है। अतीत के कुछ चेहरे आँखों के सामने तैरने-से लगते हैं।

कई वर्षों से यह मेरे साथ है। कभी-कभी इसे बजाता भी हूँ। राग भोपाली और यमन कल्याण जैसे कुछ आसान-से राग। सङ्गीत सीखते समय की प्रयोगात्मक परीक्षा के अलावा कभी किसी सार्वजनिक आयोजन में प्रस्तुति नहीं दी, पर इसने मेरी ज़िन्दगी को ज़रूर सार्वजनिक बना दिया। सन् 1990 के आसपास क़रीब बीस बरस की वय वाले वे दिन थे, जब मेरी शामें अक्सर इलाहाबाद के प्रयाग सङ्गीत समिति में गुज़रा करती थीं। राजीव दीक्षित (जिन्हें आप जानते ही होंगे) के छोटे भाई प्रदीप दीक्षित भी वहीं बाँसुरी सीखने आते थे। सहपाठी होने की वजह से परिचय तो होना ही था। अच्छी बात थी कि मेरे बारे में उन्हें पता था कि मैं रेडियो के लिए नाटक वग़ैरह लिखता हूँ। रेडियो का तब के समय में बड़ा जलवा हुआ करता था। लोग सुनते थे और प्रतिक्रियाएँ देते थे। वैसे आज की तारीख़ में दिमाग़ पर ज़ोर डालता हूँ तो भी याद नहीं आता कि आकाशवाणी तक आख़िर मैं पहुँचा कैसे, कौन मुझे वहाँ ले गया। बस रेडियो वालों की फ़रमाइश मिल जाती थी और मैं नाटक वग़ैरह लिखकर उन्हें दे देता था। ‘किराये का कमरा’ तो इतना लोकप्रिय हुआ था कि रेडियो से माँगकर बाहरवालों ने भी उसका मञ्चन किया।

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ख़ैर, प्रदीप दीक्षित (हमारे लिए ‘दीपू’) से दोस्ती कुछ यों हुई कि शाम को सङ्गीत समिति, तो सवेरे यमुना में तैराकी के लिए भी हम साथ-साथ जाने लगे। यमुना की धार से खेलकर वापस लौटते समय अक्सर गुड़ की जलेबी खाने का लोभ संवरण न कर पाते। उस स्वाद की याद से मुँह में आज भी जैसे पानी भरने लगता है। प्रदीप उम्दा तैराक तो थे ही, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की तैराकी टीम के कैप्टन भी थे। एक दिन वह आया कि हमने अपनी ज़िन्दगी बहुराष्ट्रीय साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ आन्दोलन को समर्पित कर दी। उस समय के अन्तरराष्ट्रीय गणित परिषद के अध्यक्ष गाँधीवादी प्रो. बनवारीलाल शर्मा हमारे अगुआ थे। डॉ. कृष्णस्वरूप आनन्दी, रामधीरज, राजीव दीक्षित, पद्मश्री रघुनाथ सिंह गहलौत, डॉ. रघुवंश जैसे बड़े-बुज़ुर्गों के अलावा कई नामी लोग और आज के कुछ फ़िल्मी चेहरे व रङ्गकर्मी भी इस आन्दोलन का हिस्सा थे। वैश्वीकरण के नफ़ा-नुक़सानों पर इलाहाबाद में हम दस-बारह लोगों के शुरू किए इस आन्दोलन ने बाद के दिनों में जो राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय बहसें छेड़ीं, उसकी कथा लम्बी है। इस पूरे काम में हमारी कमज़ोरी यह ज़रूर रही कि हमने काम तो दिन-रात किया, पर कभी श्रेय लेने की कला नहीं सीख पाए। हमारी इस कमी पर ‘धर्मयुग’ ने एक बार एक लम्बा-चौड़ा लेख छापा था।


ये सब छोटी उम्र की बड़ी बातें हैं। इस दौरान मेरे लिखे की हल्की-फुल्की अनुगूँज संसद तक पहुँची और उत्तर प्रदेश की विधानसभा तक भी। रामसेतु का मुद्दा मेरी क़लम से निकला तो नोटा (जिसके लिए कुछ सङ्गठन अदालत तक गए) का आज का क़ानून एक विचारगोष्ठी में व्यक्त किए गए मेरे विचार से। वह जोश और जज़्बे का कुछ अलग दौर था, जब हमने दो-तीन सौ युवाओं का एक बड़ा समूह बना लिया था और कोई बात जम जाए तो हङ्गामा खड़ा करने से बाज़ नहीं आते थे। जाने कैसे मेरी वजह से उत्तर प्रदेश के तब के राज्यपाल इलाहाबाद में एक विशिष्ट आयोजन का हिस्सा बने। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान को सँभालने का न्योता भी मुझे मिला। किसी संस्था-सङ्गठन में पद लेने की मानसिकता तब थी नहीं, तो ऐसी चीज़ों को नकारना ही था। यों, मैं कोई लेखक या साहित्यकार भले नहीं था, पर अच्छा तो लगता ही है कि आपका लिखा कुछ समय तक अगर कुछ लोग याद रख रहे हों। कई साल बाद एक बार जब किसी काम से दिल्ली आया और गोविन्द सिंह से परिचय हुआ तो उन्होंने नवभारत टाइम्स में छपे मेरे लेख ‘साहित्यकारों के तीर्थ में साहित्य का चकलाघर’ का ज़िक्र करके ही मुझे याद किया, तो मेरे लिए यह भी किसी पुरस्कार से कम नहीं था। एक अजीब आदत ज़रूर मेरी थी कि अगर मेरे किसी लेख या काम की कुछ ज़्यादा चर्चा हो जाती तो मैं कुछ दिनों के लिए लिखना बन्द देता या शान्ति धारण कर लेता। क्लास में अक्सर पीछे की सीट पर बैठने की कोशिश करता, बोरियत होती तो बेञ्च पर सिर टिकाकर ऊँघता या पिछले दरवाज़े से खिसक लेने की फ़िराक़ में रहता। ज़्यादा वक़्त आत्मकेन्द्रित रहता। कई बार एक-एक, दो-दो हफ़्ते तक किसी से बात करने से भी बचता। गुमनाम रहकर सहज ज़िन्दगी जीना मुझे हमेशा अच्छा लगता रहा है। आज भी सहूलियत मिल जाए तो जङ्गल या पहाड़ पर रहना पसन्द करूँगा।

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ते-पढ़ते और आन्दोलनकारी बनते-बनते अजब-ग़ज़ब अनुभवों से गुज़रा हूँ। वह समय भी नहीं भूलेगा जब कला और कलाकार के मुद्दे पर जानेमाने आलोचक और निहायत भले इनसान पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपने एक नहीं, तीन-तीन लेखों में मेरा विरोध किया। मज़ा यह कि आज तक उनसे मेरी कोई मुलाक़ात नहीं हुई है। शायद उन्हें यह तक न पता रहा होगा कि वे किसी लड़के से उलझ रहे हैं। बावजूद इसके, मेरे लिए यह बड़ी उपलब्धि थी कि साहित्य से कुछ ख़ास लेना-देना न होते हुए भी बड़े-बुज़ुर्ग तमाम साहित्यकारों का स्नेह मुझे ख़ूब मिला। दूधनाथ सिंह जैसे व्यक्ति, जो गाँधी भवन के मञ्च पर आने से परहेज़ करते थे, वे भी मेरे बुलावे पर बोले—‘‘बेटा, तुम कह रहे हो तो मैं ज़रूर आऊँगा...’’ और वे आए। मुद्राराक्षस को आमन्त्रित करने लखनऊ दुर्विजयगञ्ज वाले उनके घर पहुँचा तो उन्होंने मुझे बच्चे से ज़्यादा मित्र जैसा मान दिया। पूरे परिवार के एक-एक व्यक्ति से परिचय कराया और आयोजन के दिन बस में सवार हो ठीक समय पर इलाहाबाद पहुँच गए।

पत्रकारिता और लेखन को समर्पित बीस दिनी कुछ शिविरों में दक्षिण और वाम का भेद जैसे मिट-सा गया था। प्रभाष जोशी, अच्युतानन्द मिश्र, मुद्राराक्षस, दूधनाथ सिंह, नरेश मेहता, ममता कालिया, अनन्त मित्तल, प्रियदर्शन, वीरेन डङ्गवाल, विनोद मिश्र, डॉ. सत्यप्रकाश मिश्र जैसे लोगों को एक मञ्च पर एक-एक दिन बारी-बारी से बोलते हुए सुनना किसी आह्लाद से कम नहीं था। इन्दिरा गान्धी राष्ट्रीय कला केन्द्र के आज के अध्यक्ष रामबहादुर राय चुनावी व्यस्तता के चलते आ तो नहीं पाए थे, पर क़रीब बीस बरस बाद दिल्ली में जब उनसे दुबारा भेंट-मुलाक़ात हुई तो उन्होंने यह बताकर ख़ुश कर दिया कि मेरी तब की चिट्ठी उनकी फ़ाइलों में अब तक सुरक्षित है। एक आयोजन में मन्नू भण्डारी भी पहुँची थीं। जहाँ तक मुझे याद आता है, ममता कालिया जी उन्हें अपने साथ लेकर आई थीं। मैं और दिल्ली में आजकल कृपलानी संस्थान सँभाल रहे अभय प्रताप ने युवा आन्दोलनकारियों की सबसे बड़ी टीम बनाई थी। पत्रकारिता और लेखन वग़ैरह से जुड़े आयोजनों का मैं महज़ माध्यम भर था।

दिन गुज़रते गए और वह समय आया जब प्रदीप दीक्षित ने समाजसेवा को कैरियर बनाना शुरू कर दिया। यह मुझे नागवार गुज़रा। समाजसेवा मेरे लिए पैसा बनाने का साधन नहीं हो सकती थी। यह बात अलग है कि एनजीओ विरोधी होते हुए भी अपने लिए न सही, कई दूसरे लोगों के लिए मैंने एनजीओ बनवाए और जैसा बन पड़ा उनको काम भी दिलवाए। यह भी मज़ेदार रहा कि मेरे एनजीओ विरोध के चलते ही नोबल प्राप्त कैलाश सत्यार्थी से उस दौर में मेरी क़रीबी मित्रता बनी।

सन् 2004 के आसपास राजस्थान के भीलवाड़ा में मैं एक केन्द्र स्थापित करने में लगा था। अचानक एक दिन ख़याल आया कि अब मुझे कुछ दिनों के लिए शान्ति धारण कर लेनी चाहिए। लोगों से मिलना-जुलना बन्द। सहयोग-असहयोग बन्द। कुछ लोग परेशान भी हुए कि मैं अब क्या करने वाला हूँ। एक दिन आनन-फानन में ट्रेन में एक बोगी बुक कराई, अपनी किताबें लदवाईं और पत्नी-बच्ची के साथ दिल्ली रवाना हो गया। आज मुझे ख़ुद ताज्जुब होता है कि भीलवाड़ा से दिल्ली के लिए निकला तो जाने किस ज़िद में सिर्फ़ किराया भर साथ लेकर चला था। ट्रेन में सवार हुआ तो यह वही दिन था जब पहाड़गञ्ज, सरोजनी नगर वग़ैरह में सीरियल ब्लास्ट हुए थे।

जब गृहस्थी सँभालने का समय था तो फ़क़ीरी की; और जब फ़क़ीरी करने का समय आया तो गृहस्थी सँभालने के लिए कमर कसने लगा। ऐसे हाल में कुछ चीज़ें अनपेक्षित गुज़रें तो आश्चर्य की क्या बात! रोज़ी-रोटी की शुरुआत माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल के लिए किताबें लिखने के साथ हुई। अच्युतानन्द जी ने कहा कि मुझे कोऑर्डिनेशन की ज़िम्मेदारी सँभालनी है, पर मैंने कोऑर्डिनेशन के बजाय हाथ में काम लेना पसन्द किया।

कुछ और दिन बीते। किसी से माँगने की आदत नहीं थी तो सोचा चलो कुछ दिनों के लिए पत्रकारिता का दामन थामा जाय। शायद अब तक के जीवन का यह मेरा सबसे ख़राब फ़ैसला था। बीते आठ-नौ साल हद से कुछ ज़्यादा बुरे गुज़रे हैं। लिखना-पढ़ना लगभग बन्द है। कई प्यारे लोग मिले ज़रूर हैं, पर जैसी बदरङ्ग नई दुनिया देखी है यहाँ, उसकी सपने में भी कल्पना नहीं की थी। अपनी सम्पत्तियों के बहुत कुछ को मैं बहुत पहले ही तिलाञ्जलि दे चुका था, सो इतनी हिम्मत तो थी कि अपनी रोज़ी-रोटी की कभी ज़्यादा चिन्ता नहीं हुई, पर पत्नी और नन्ही बच्ची के भोले चेहरे देख-देखकर तकलीफ़ के ये दिन जैसे-तैसे स्वीकार करता रहा। जब नौकरी शुरू की तो तय कर लिया था कि नौकरी बस नौकरी की तरह करूँगा, लेकिन सच्चाई यह है कि जितना भयग्रस्त होकर नौकरी की जा सकती है, उससे भी कहीं ज़्यादा निचले स्तर पर ख़ुद को महसूस कर रहा हूँ।

यह सन् 2009 के आसपास का समय था जब स्वामी रामदेव को पता चला कि मैंने पत्रकारिता करनी शुरू कर दी है। तब उनकी छवि विवादरिहत और क्रान्तिकारी सन्न्यासी की थी। कोई दाग़-धब्बा नहीं लगा था। एक दिन उनका फ़ोन आया। क़रीब पौन घण्टे तक वे बात करते रहे और समझाने की कोशिश की। बोले—‘‘आपको अख़बारवाले आख़िर क्या दे रहे होंगे? मेरे पास आ जाइए।’’ मैंने बस इतना कहा—‘‘स्वामी जी, अभी मैं जहाँ भी हूँ, वहाँ के कुछ अनुभव लिए बग़ैर कहीं नहीं जाऊँगा। मित्रता एक बात है और ज़िन्दगी जीना दूसरी।’’ मुझे मालूम था कि स्वामी रामदेव के पास जाने से मेरी ग़रीबी दूर हो जाती और मैं करोड़ों का मालिक बन जाता, पर चाहे कितना भी नुक़सान हो जाए, किसी को ज़बान देने के बाद बीच में मुकर जाने वाली मेरी आदत नहीं थी। यह बात भी सही है कि स्वामी रामदेव को उस समय सचमुच कुछ अच्छे लोगों की ज़रूरत थी। हमारे जैसे कुछ लोग उनके पास होते तो एक बात तो हो सकती थी कि ‘रामलीला काण्ड’ की नौबत शायद न आती।

बहरहाल, पत्रकारिता की दुनिया में रहते हुए एक अजब बात ज़रूर हुई है कि राजनीति के बारे में मेरे कई विचार बदल गए हैं। अब मुझे लगता है कि नेता उतने बुरे क़तई नहीं होते, जितना कि हम उनके बारे में सोचते हैं।

उठाने-गिराने की तमाम चालबाज़ियों के बीच सोचता हूँ कि कामयाबी क्या है? जिसके पास पैसा नहीं है, उसके लिए पैसा! जिसके पास शोहरत नहीं है, उसके लिए शोहरत! जिसके पास ऐसा सब कुछ है, उसके लिए शायद ज़िन्दगी में थोड़ी-सी शान्ति! नाकामी और कामयाबी की परिभाषाएँ तय करते-करते हम सबको भी आख़िर एक दिन गुज़र ही जाना है। बात बस इतनी है कि चलाचली की बेला में आपके चेहरे पर सुकून है या शिकन!

आज भी सवेरे या शाम जब कभी थोड़ी देर के लिए ध्यान करने बैठता हूँ, तो जाने-अनजाने जो लोग मुझे अपना दुश्मन मानते हैं, उनकी भी भलाई की प्रार्थना ज़रूर करता हूँ। यह मेरी पुरानी आदत है। शायद इसी नाते कुछ ऐसे लोग, जिनके मन में मेरे बारे में किन्हीं वजहों से कुछ ग़लतफ़हमियाँ बैठी हुई थीं, कुछ समय के बाद वे भी मेरे अच्छे मित्र बने। याद आता है कि जानीमानी कहानीकार ममता कालिया को हम अपने कार्यक्रमों में बुलाते ही रहते थे, कभी-कभार चन्दा भी वसूल लेते थे, पर उनके पति रवीन्द्र कालिया जी से, इलाहाबाद में रहते हुए, मेरी नज़दीकी नहीं बन पाई। एक बार मुद्राराक्षस जी को उनके तेलियरगञ्ज वाले घर में पहुँचाने के लिए गया भी तो तब भी कालिया जी से बिना बोले-बतियाए ही धीरे-से बाहर निकल आया। बात यह थी कि कालिया जी राजीव गान्धी के नज़दीकी थे यानी काँग्रेसी; और मैं था वैश्वीकरण की वजहों से धुर काँग्रेस विरोधी। यह ज़रूर है कि जब वे ‘गङ्गा यमुना’ के सम्पादक बने तो एक दिन एकदम बिन्दास ढङ्ग से मुझसे कुछ लिखने को कहा। ग़ज़ब तब हुआ जब दिल्ली आने के बाद अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी की सचिव मीनाक्षी नटराजन ने एक दिन फ़ोन पर कहा—‘‘भइया, रवीन्द्र कालिया जी के साथ बातचीत करनी है, भारतीय ज्ञानपीठ के दफ़्तर मैं ख़ुद चलूँगी और किसी भी हाल में आपको साथ चलना है।’’ मीनाक्षी जी लगभग हमउम्र हैं और आमतौर पर मुझे भइया ही कहती हैं। ज्ञानपीठ में कालिया जी ने मुझे मीनाक्षी जी के साथ देखा तो आश्चर्य से भर उठे कि आख़िर एक काँग्रेसी नेता के साथ मैं कैसे! यह बात वे रह-रहकर मुझसे पूछते रहे। इसके बाद हमारी मित्रता का एक अलग स्तर बना, घरेलू जैसा, पर दुर्भाग्य कि वे ज़्यादा दिन इस संसार में नहीं रहे।

ज़िन्दगी ही है, बाँसुरी के मधुर सुरों में कड़वे दिनों की राग भी छिड़ ही सकती है। बहरहाल, उम्मीदों का आसमान खुला हुआ है, उसे कौन कितना ढँक लेगा! ये दिन भी बीत जाएँगे, यह दौर भी गुज़रेगा...सुनने का दम बना रहे तो हर अन्धकाल में सुबह की आहट होती ही है।

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रचनाकार: बाँसुरी के मधुर सुरों में कड़वे दिनों की राग - संत समीर का संस्मरण
बाँसुरी के मधुर सुरों में कड़वे दिनों की राग - संत समीर का संस्मरण
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