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लघुकथा - फर्क - ज्ञानदेव मुकेश

फर्क

   दो कुत्ते थे। दोनों अलग-अलग बेड़ियों में हमेशा बंधे रहते। उन जानवरों के लिए ये सचमुच ही लोहे की बेड़ियां थीं, मगर उनके मालिक के लिए ये स्नेह के बंधन थे। मालिक को इन जानवरों से गहरा लगाव था। वे कहीं छोड़कर न चले जाएं, इसलिए स्नेह की ये ‘बेड़ियां’ आवश्यक थीं।


   मालिक उनपर असीम प्यार लुटाते। स्नेह-वात्सल्य की वर्षा कर देते। अपने हाथों से नहलाते-धुलाते। अपने हाथों से पुचकार-पुचकार कर मुंह में खाना डालते। बराबर पीठ सहलाते, सिर पर हाथ फेरते। कुत्ते धन्य-धन्य हो जाते और अपनी किस्मत पर नाज करते। उन्हें जानवर होने का कोई मलाल न होता।
   एक दिन एक कुत्ते ने दूसरे से पूछा, ‘‘दोस्त, हम मालिक के स्नेह बंधन से वैसे ही बंधे हैं। फिर हमें लोहे की इन जंजीरों में क्यों रखा जाता है ?’’
   दूसरे ने धीरे से कान में कहा, ‘‘मालिक का डर।’’


   ‘‘कैसा डर ?’’
  ‘‘मालिक सोचते हैं कि हम आजाद खुला रहेंगे तो दूसरे के पास चले जाएंगे। दूसरा हमें बेहतर भोजन देगा तो हम उसी के हो जाएंगे।’’
   ’‘धत् तेरे की ! मालिक ने हमें अपने जैसा इंसान समझ लिया है क्या ?’’
      
                                                   -ज्ञानदेव मुकेश                         
                                     पता-
                                                 फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                                 अल्पना मार्केट के पास,
                                                 न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी, 
                                                 पटना-800013 (बिहार)

e-mail address - gyandevam@rediffmail.com

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