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दो गज़ ज़मीन चाहिए (लघुकथा) - देवी नागरानी

(देवी नागरानी के लघुकथा संग्रह - और गंगा बहती रही से लघुकथाएँ)


. दो गज़ ज़मीन चाहिए (लघुकथा)

सुधा अपनी सहेलियों के साथ कार ड्राइव का आनंद लेती हुई खुशनुमा माहौल का भरपूर मज़ा लुटा रही थी. अक्टूबर का महीना, कार के शीशे बंद, दायें बाएँ शिकागो के सुंदर सजी हुई मीलों तक फैली हरियाली इन्द्रधनुषी रंगों के फूलों से सजी मन को लुभा रही थी।

जान लेवा सुन्दरता में असुंदर कोई भी अनचाही बात खटक जाती है; इसका अहसास सुधा को तब हुआ जब उसकी सहेली ने रास्ते में एक ढाबे पर चाय के लिए कार रोकी. चाय की चुस्की लेते हुए उस कार वाली सहेली ने अपने बालों को हवा में खुला छोड़ते हुए चाय के ज़ायके में कुछ शोख़ी घोलते हुए कहा -‘सुधा, अपनी कार का होना कितना जरूरी है, जब चाहो, जहाँ चाहो, आनंद बटोरने चले जाओ. यह एक ज़रूरत सी बन गई है. बिना उसके कहाँ बेपर परिंदे उड़ पते हैं?’

तीर निशाने पर बैठा था. सुधा नज़र-अंदाज़ न कर पाई, अपनी औक़ात वह जानती थी और बिना किसी मिलावट के अपनी मुस्कान के साथ सच को स्वीकारते हुए कहा, “मैं ज़ियादा पैसे वाली तो नहीं, पर मुझे अपनी ज़रूरतों का और दायरों का अहसास है. उन्हीं कम ज़रूरतों ने मुझे सिखाया है कि मुझे फ़क़त दो गज़ ज़मीन चाहिए.”



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