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काजू किशमिश (लघुकथा) - देवी नागरानी

(देवी नागरानी के लघुकथा संग्रह - और गंगा बहती रही से लघुकथाएँ)


५॰ काजू किशमिश (लघुकथा)

"अरे अब आवाज़ देना बंद भी करो और शरारतें तो बिलकुल भी बँद करो." कहते हुए सुधाजी ने अपनी बालकनी की चौखट की सरहद पर लटके सुनहरी पिंजरे की ओर लपकर उसे उतरा और किचिन की ओर बढ़ी.

मैं किचिन में लगी डाइनिंग टेबल पर बैठी उनके हाथों की बनी चाय की चुस्कियाँ लेती रही थी. मैंने उनकी ओर मुड़ते हुए पूछा " आप किस के साथ गुफ़्तार किये जा रही हैं सुधाजी?"

" ये हैं काजू और किशमिश !! मेरे घर की रौनक. आज नहलाने में थोड़ी देर क्या हो गई है, दोनों बेचैन होकर शोर किये जा रहे हैं." कहते हुए उन्होंने पिंजरे को लाकर सिंक में रखा और शावर पाईप से उन्हें नहलाने लगी. जब वह इस काम से फारिग हुईं तो उनके खाने का बंदोबस्त करने लगी. पिंजरे के दोनों ओर आमने-सामने दो कटोरियों में बर्ड फुड भरते हुए कहने लगीं..

" खाने के मामले में दोनों एक दूसरे को अपनी परिधि में दख़्ल नहीं देने देते . कोई एक दूजे की हद में जाकर तो दिखाये..बस शुरू हो जाते हैं. दोनों लफंगे होते जा रहे हैं!." मेरी ओर मुख़ातिब होकर सुधा जी ने मुस्कराते हुए कहा.

मैंने अपनी सोच का समाधान पाने के लिये उनसे पूछा " सुधाजी आप कैसे पहचानती हैं कि कौन काजू है ओर कौन किशमिश?" मेरी उकीरता को राहत देने वाले अंदाज में मुझे पिंजरे के पास बुलाते हुए कहा.." ये जो नीली चोंच वाला है वो है काजू, ओर सफ़ेद चोंच वाली है किशमिश!"

और सवाल नर मादा की पहचान के बारे में पूछने से पहले मैं सतर्क हो गई. चोंच वाला नर, चोंच वाली मादा!! Simple !

"आप वहीं खड़े रहिये सुधाजी" कहते हुए मैंने झट से उनकी दो तीन तस्वीरें ले लीं. लीजिये आप भी मिलिये उन प्यार के पँछियों से जो डाँट डपट की भाषा तो बिलकुल भी नहीं जानते.. जी हां ये दो प्यार के पँछी हमारी प्रिय सुधा ओम ढींगरा जी का प्यार पाकर उनके आंगन की शोभा बढ़ा रहे हैं।

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