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मैं भी शातिर, तू भी शातिर, ये सारी दुनिया भी शातिर। तेजपाल सिंह 'तेज' की कुछ ग़ज़लें

तेजपाल सिंह 'तेज' की कुछ ग़ज़लें

-एक-

घर के आगे मस्जिद मेरे, घर के पीछे मंदिर है,
लेकिन मेरे घर की छत से गायब आज कबूतर है।

मानवता के दाम गिरे, है मज़हब का बाजार गर्म,
इक पाले में अल्लाह-ताला, इक पाले में ईश्वर है।

अब कैसे उम्मीद करें, भवसागर से तिर जाएंगे,
छोटी-छोटी नदियों में याँ डूबा स्वयं समंदर है।

आने-जाने वाले मेरे घर की ईंटें गिनते हैं,
सियासत के खूनी पंजों ने लिक्खा मिरा मुकद्दर है।

‘तेज' हवाएं चली आज फिर, छप्पर कौन संभालेगा,
मेरा घर यूँ धूप-छाँव का जाना-माना दफ़्तर है।
*****

-दो-

नए दौर में अधिकारों की सेज सजी,
रफ़्ता-रफ़्ता प्रशासन पर जंग लगी।

नैतिकता और मानवता के सीने पर,
विध्वंसों  ने पाली-पोसी एक सदी।

सहरा–सहरा तल्ख समंदर का दर्शन,
है मनाँगन में भूखी-प्यासी एक नदी।

लँगड़े-लूले थके विचारों से ना टूट,
बेशक इनकी सिंहासन पर नज़र लगी।

रक्षक और भक्षक के जैसे भेद मिटे,
अपनी चौखट पर धनिया की लाज लुटी।
*****
-तीन-

मैं भी शातिर, तू भी शातिर,
ये सारी दुनिया भी शातिर।

कैसे हो फिर मेल-मिलापा,
मैं भी शातिर, तू भी शातिर।

सब अपनी खातिर जीते हैं,
ना तेरी, ना मेरी खातिर।

सब कुछ आखिर है यां आखिर,
मैं भी आखिर, तू भी आखिर।

नादिरशाही खत्म हो कैसे,
मैं भी नादिर, तू भी नादिर।
*****
  -चार-

बेसुध, बेसुध, बेसुध, बेसुध,
कौन नहीं यां बेसुध बेसुध। 

हमने दुनिया को देखा है,
खाते- पीते , बेसुध बेसुध। 

मानो मत मानो पर सच है,
सब के सब हैं बेसुध बेसुध। 

छोटा मुंह और बात बड़ी है,
हम भी बेसुध तुम भी बेसुध। 

‘तेज' जमाना कब सँभलेगा,
सदा रहत है बेसुध बेसुध।
*****

-पाँच-

ढोली ढोली ढोली,
उमर भौत है ढोली।

चोली चोली चोली,
दूध-मुँहे ने खोली।

पोली पोली पोली,
साँच की धरती पोली।

सोली सोली सोली,
जगते जगते सोली।

खेली खेली खेली,
आँख मिचौनी खेली।

*****

-छ: -

झेली झेली झेली,
थकी जवानी झेली।

चेली चेली चेली,
कौन है किसकी चेली

तेली तेली तेली,
सागर-सागर तेली।

पेली पेली पेली,
कांच की सरसों पेली।

खेली खेली खेली,
आँख मिचौनी खेली।
*****

-सात-

टूटी टूटी टूटी,
नींद अधर में टूटी।

कूटी कूटी कूटी,
मां ने खिचड़ी कूटी
लूटी लूटी लूटी,
अस्मत अपनी लूटी।

छूटी छूटी छूटी,
कैद से धनिया छूटी।

फूटी फूटी फूटी,
दही की मटकी फूटी।

झूठी झूठी झूठी,
सारी दुनिया झूठी।

टूंटी टूंटी टूंटी,
सूखी नल की टूंटी।

*****

-आठ-

ना धेला ना पैसा हूँ,
मैं भी तेरे जैसा हूँ।

न ठहरा न बहता हूँ
वैसे चलता रहता हूँ।

इसके उसके मैं सबके,
  निशदिन ताने सहता  हूँ।

वो बात बनाते रहते हैं,
मैं खाक उड़ाता रहता हूँ।

उनको रस्ता देकर मैं,
खुद पीछे रह जाता हूँ।
*****

-नौ-

फैली फैली फैली,
छाया दुख की फैली।

मैली मैली मैली,
मन की चादर मैली।

मैली मैली मैली,
मन की चादर मैली।

भूली भूली भूली,
दुनिया खुद को भूली।

गूंगी गूंगी गूंगी,
सारे दुनिया गूंगी।

सूली सूली सूली,
‘तेज' चढ़ाया सूली।

-दस-

गूंजी गूंजी गूंजी,
चीख गगन में गूंजी।

खूनी खूनी खूनी,
आँखें नम हैं खूनी।

लौटी लौटी लौटी,
आंख में निंदिया लौटी।

रूठी रूठी रूठी,
माँ की ममता रूठी।

मूंजी मूंजी मूंजी,
सारी दुनिया मूंजी।
*****

मूंजी = कंजूस

-ग्यारह-

खोली खोली खोली,
किसने सांकल खोली।

खोली खोली खोली,
कहां मिलेगी खोली।

रोली रोली रोली,
ममता माँ की रोली।

ढोली ढोली ढोली,
उमर भौत  है ढोली।

चोली चोली चोली,
दूध-मुहे ने खोली।

पोली पोली पोली,
सच की धरती पोली।

सोली सोली सोली,
जगते जगते सोली।
*****

-बारह-

आड़ी तिरछी खड़ीं लकीर,
कुछ औंधे मुंह पड़ीं लकीर।

जैसी भी हैं रहने भी दो,
दिलों में खींचो मती लकीर।

सूई धागा मांग रहा है,
भूखा नंगा एक फकीर।

लाल चुनरिया लाल लकीर,
फिर क्यूँ गौरी भई अधीर।

भाल-भाल पर `तेज' खिंची हैं,
गूंगी-बहरी थकी लकीर।
*****
(तूफां की ज़द में से उद्धृत)

  तेजपाल सिंह तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार-विमर्श की लगभग दो दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं - दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से, हादसो के शहर में, तूंफ़ाँ की ज़द में ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि,  पुश्तैनी पीड़ा आदि  (कविता संग्रह),  रुन - झुन, खेल - खेल में,  धमाचौकड़ी आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), पांच निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता का साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा का उपसंपादक, आजीवक विजन का प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक का संपादक भी रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से भी आप सम्मानित किए जा चुके हैं।

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