शशि गोयल की कविताएँ

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     धूप प्यारी बच्ची सी भोर होते ही सूरज की बग्घी से कूद आती है नन्ही किरन, गुदगुदाती है मेरे तलुओं को लिपट जाती है मेरे पैरों से शैता...

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     धूप प्यारी बच्ची सी
भोर होते ही सूरज की बग्घी से
कूद आती है नन्ही किरन,
गुदगुदाती है मेरे तलुओं को
लिपट जाती है मेरे पैरों से
शैतान बच्ची सी मुझे देखती है
आ बैठती है मेरी गोदी में
खिलखिलाती , खेलती , मुस्कराती है
प्यार से सहलाती है
झूल जाती है गले से
थपथपाती ले लेती है बांहों में
गालों से सटकर बैठ जाती है
भोली बच्ची सी जैसे गुनगुना रही हो
सुनने लगती हूं उसकी मीठी बातें
उसके तन की खुशबू से
अंदर तक महक जाता है मन
घोड़ों की टाप ठहरने लगती है
कूद जाती है पीछे कंधे से
मुड़कर कहती है फिर कल आउँगी
दादा से सुनी कहानी सुनाउँगी
कल फिर आउँगी ।
धूप प्यारी बच्ची सी।
3

अवगुँठन

धूँघट में जो देखा है रूप तेरा
अवगुंठन से मुझको जलन हो गई
पास कितना है वो तेरे रूप के
आवरण बनने की  ललक हो गई
छू छू करके इठला रहा चांद को
बादलों के ह्रदय में जलन हो गई
गीत कितने हवाओं ने गा जो दिये
सावन की गमक सी पवन हो गई
काली जुल्फों ने छिपकर उतारी नजर
दीठ का सा दिठौना लहर हो गई
नयन के दीप जब जल उठे नेह से
विरह के डर से पलकें सजल हो गईं
बारहा बार धूँघट ने चूमे अधर
कैसी धूँघट की दुनिया चमन हो गई।

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4

नहीं भूलता बचपन

नहीं भूल पाता वो प्यारा सा बचपन
न्यारा सा बचपन हमारा वो बचपन
नहीं भूल पाता नन्हा सा बचपन
सदा याद रहता हमको वो बचपन
मिट्टी के अनगढ़ खिलौने बनाना़
कॉपी के पन्नों से नावें बनाना
छोटी सी गुड़िया को दुल्हन बनाना
सहेली के गुड्डे से शादी रचाना
दीदी की चुन्नी को साड़ी बनाना
आँगन में कागज की तुरही बजाना
विदा करके गुड़िया को रोना रुलाना
जिद करके वापस वो गुड़िया को लाना
चिपका के छाती से उसको लगाना
वो हॅंसना वो रोना वो माँ का मनाना
बाबू की गोदी में सोना सुलाना
दादी की बांहों का झूला बनाना
चीनी खटाई को चुपके से खाना
छत की मुंडेरों पर कुदकी लगाना
डर कर के अम्मा का छाती लगाना
वो छिप्पन छिपाई पतंगें उड़ाना
नहीं लौट सकता हमारा वो बचपन
नहीं आयेगा  फिर से प्यारा वो बचपन
बच्चों के बचपन में देखेंगे बचपन
अनोखा वो बचपन प्यारा सा बचपन
बचपन की नन्ही सी यादें है जीवन
खट्टी सी मीठी सी यादों की सीवन
तितली सी मंडराती फिरती वो यादें
आँखों में  रहती हैं सपनीली यादें ।



5
      बसँत का उपहार

      बसॅंत तुम आये   
       लेकर मेरे लिये उपहार
       प्रकृति का शृंगार
       टाँग दिये झूमर,पहनाये गलहार,
       सूरज ने छीन लिये मुझ से आभूषण
तपती दोपहरी ले गई सुगंध
किरणों ने पत्तों का पोंछ दिया रंग
हवाओं ने उड़ेल दिये धूल के गुबार
बसँत तुम आये
        लेकर मेरे लिये उपहार
       सावन ने पहनाई सतरंगी चूनर
       बादल ने छनकाये छनछनछन घूँधर
       इठलाई नाची पहन लिया घूमर
       तूफानों ने छीन ली मेरी अभिलाषा
       मौन हुई मेरी मीठी सी भाषा
       रणभेरी सी बज उठी घनघन घन टंकार
       अंग अंग बिखर गया घायल हुए गात
       बसँत तुम आये
       लेकर मेरे लिये उपहार ।

      शरद की ठंडी सी बयार ने
मेरा मन मोहा था
लगाये थे सफेद बूटे मेरे आंचल में
चाँद की चाँदनी का बिछाया था बिछौना
       रंग छिटका भी न पाई थी
हेमंत हो उठा था निठुर
चुराली मेरे पतों की नरमी
ढकने लगा चाँद तारों को
       मेरी हरियाली से
अपने ठंडे पड़ते हाथों को
छिपा लिया था
       छीनकर मेरी गरमी
       बसॅंत तुम आये
       लेकर मेरे लिये उपहार

      शिशिर ने छीना था जिसे
बरफीली हवा ने बीना था जिसे
नोंच कर मेरे पंख
       भर ली थी अपनी झोली
अपनी सफेद चूनर
       टाँग दी मेरे माथे पर
बसँत तुम आये
       लेकर मेरे लिये उपहार
टाँग दिये झूमर पहनाये गलहार
कोयल के गीतों की मादक पुकार
हौले से छूती तन मकरंदी बयार
हरा हुआ धरती का मन
       छाई फूलों की बहार
तुमने मेरी सूनी डालों को भर दिया
गदरा गई पाकर तेरा साथ
टाँग दिये झूमर पहनाये गलहार
       बसँत तुम आये
       लेकर  मेरे लिये उपहार


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6

                           फागुन

                            फागुन के आते ही
                             सिर पर
                             हरे पीले गुलालों की
                             डलिया लेकर
                             खड़े हो जाते हैं
                             शैतान बच्चे से
                             अमलतास गुलमोहर
                             किंशुक
                             राही के ऊपर
                             डाल देते हैं
                             चुटकी भर गुलाल
                             रंग देते हैं
                             खुशी के रंग में
                            एक एहसास में
                            पिरो देते हैं
                            अपनत्व के
                            बदल देते हैं
                            पीले पत्ते की
                            चुर मुर को
                            संगीत में
                            बजने लगती है
                            पत्ते से बांसुरी की धुन
                            झलकने लगती है
                            कृष्ण की माधुरी सूरत
                            झूलने लगती है
                            राधा डाल पर
                            नृत्य कर उठती है
                            धरती छमाछम छमाछम



7
पतंग

जब तब आँखों में एक धुंध छा जाती है
तुम बच्चों की बहुत याद आती है
जब छत से गुजरती है कटी पतंग
तुम्हारे दौड़ते कदम याद आ जाते हैं
पतंग तुम उडाते थे हुचका मुझे पकड़ाते थे
अब तुम्हारी पतंग कहीं और उड़ रही है
कुछ उलझी टूटी डोर के टुकडे़ पीछे छोड़ गये
उनको सुलझाती उन्हें जोड़ रही हूं
बांध रही हूं बार बार तुम्हारी छोड़ी पतंग
उड़ रहे है सारे सपने तुम्हारी यादों के संग ।


8
                    बन गयी मंत्राणी मैं  यार

मेरे सैंया की सरकार
मैंतो नाचूँ छम छम
मेरा रैाब चलेगा यार
मैंतो नाचूँ छम छम
कोठी होगी बंगला होगा
होगी मोटर कार
एक सिपहिया मेरे आगे
पीछे थानेदार
मेरे ----
बडे बडे झुमके पहनूंगी
पहनॅू नौलख हार
अबकी बेटा मंत्री होगा
बेटी अगली बार
मेरे सैंया की-----
इधर उधर ठलुआ डोलत हो
करती बाते रार
बन गई बाई की सरकार
मैं नाचूँ छम छम


                  9
                             आद्य शक्ति

         आद्यशक्ति
          दुर्गा सिंह वाहिनीं
          लेकिन पिंजरे में बंद
          मैं नारी हूँ नारी
         जीवन के कड़वे घूँट पीती
         जीवन जी रहीं हूँ
         मैं औरत हूँ
         तोड़ देती हूँ आइने
         क्योंकि झलकता है
         समाज का क्रूर चेहरा
         लेकिन उस चेहरे को
         बिगाड़ने में लाचार 
         मैं नारी हूँ
         न अरि किसी की
         जो सहता है
         सहता जाता है
         सहता जाता है
         विद्रोह की चिंगारी
         आग लगा देगी
         पर नाश से डरती हूँ
         मैं नारी हूँ
         जो सृष्टि करती है
         विनष्टि नहीं
         अपनी सृष्टि का नाश करना
         आँसुओं की वृष्टि कर देगा
         यहाँ उसे बढ़ने से रोक देती हूँ
         क्षमा की नरम टहनी सी
         झुक जाती हूं
         मैं माँ हूँ
                                इसलिये उत्सर्ग दया क्षमा
                                यही शब्द है मेरे अपने
                                धुँधले बादलों के पार
                                खो जाते हैं सपने
                                धुँधलाई आँखों में
                                कौंध जाती है बिजली
                                कहर बनकर गिर पड़ती है
                                पर कोमल हाथों से सहलाकर
                                जला लेती हूँ अपने ही हाथ
                                मैं नारी हूँ
                                मैं माँ हूँ
                               मैं आद्यशक्ति हूँ
                               फिर भी हूँ लाचार



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आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: शशि गोयल की कविताएँ
शशि गोयल की कविताएँ
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