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अपने नकुल को बचा लो - कहानी - प्रियंका कौशल

अपने नकुल को बचा लो

नमस्कार दोस्तों, मेरा नाम इंस्पेक्टर अरुणोदय है। मैं चाहता हूं कि आपके कलेजे के टुकडे मेरा मतलब है कि आपके बच्चे सुरक्षित रहें। इसलिए आज मैं आप सबको एक सच्ची घटना सुनना चाहता हूं। यूं तो मैंने अपने कैरियर में अपराध से जुड़े कई केस सुलझाएं हैं। बड़े-बड़े अपराधी मेरे सामने कांप जाते थे।  लेकिन मेरे सामने एक केस ऐसा भी आया, जिसे सुलझाते-सुलझाते मेरे भी रौंगटे खड़े हो गए। मेरी आत्मा कांप गई।

मेरी पोस्टिंग उन दिनों फरीदाबाद में थी। मुखबिर से खबर मिली कि फरीदाबाद की एक गंदी बस्ती में कुछ बच्चों की लाशें मिली हैं। मैं फौरन अपने थाने की टीम को लेकर बताए गए पते पर पहुंच गया। मौके पर पांच लाश मिली थी। बच्चों की उम्र 7 से 10 की बीच रही होगी। लाशें देखकर ऐसा लग रहा था कि बच्चों को लंबे समय तक भूखा रखा गया होगा। उनके तन कपड़े भी आधे-अधूरे थे। जिस कोठरी में बच्चों की लाशें मिली थीं, वो काफी दिनों से बंद थी। आसपास के लोग कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं थे। वैसे भी उस बस्ती में अधिकांश लोग मेहनतकश मजदूर थे। अलसुबह घर से निकलने वाले, देर रात  थके हारे घर लौटने वाले। उन्हें फुर्सत ही कहां रही होगी, पास-पड़ोस के बारे में जानकारी रखने की। लेकिन मामला बड़ा था। इसलिए पड़ताल तो करनी ही थी। मैंने अपने अधीनस्थ अधिकारियों को कुछ जरूरी दिशा-निर्देश दिए और कोठरी का मुआयना करने लगा।

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अचानक मुझे लगा कि कोठरी के एक कोने में रखे हुए ड्रम में कुछ हलचल सी हो रही है। मैंने लपककर उसमें झांका तो दंग रह गया। एक बच्चा बिलकुल मृतप्राय स्थिति में उस ड्रम में मौजूद था। मैंने बच्चे की नब्ज़ पकड़ी तो वो धीमे-धीमे चल रही थी। फौरन मौके पर मौजूद एंबुलेंस में पहले जीवित बच्चे को अस्पताल भेजा गया। बच्चे की हालत बेहद नाजुक थी। लेकिन डॉक्टरों ने उम्मीद नहीं छोड़ी और उसके इलाज में जुट गए। एंबुलेंस के पीछे-पीछे मैं भी अस्पताल पहुंच चुका था। मैंने भी डॉक्टरों से निवेदन किया कि हर हाल में आपको इस बच्चे को बचाना होगा। बच्चा दस साल का रहा होगा। मुझे लग रहा था कि यदि बच्चा ठीक हो गया, तो इस केस की पड़ताल करने में बड़ी मदद मिल जाएगी। लेकिन एक बात और थी, जो मुझे परेशान कर रही थी। उस बच्चे को देखकर मुझे बार-बार अंकुर याद आ रहा था। अंकुर, मेरा बेटा। उसकी उम्र भी दस साल ही है। बहुत प्यारा बच्चा है। नटखट, शैतान, भोला-भाला सा। मुझे लग रहा था कि जैसे मुझे अंकुर बहुत प्यारा है, ये बच्चा भी अपने माता-पिता को बहुत प्यारा होगा। और वो बच्चे, जो इस दुनिया में नहीं रहे, जिनकी लाशें मिली हैं, वो भी अपने माता-पिता के दुलारे ही रहे होंगे। मैं उस शैतान को खोजना चाहता था, जिसने इन बच्चों को इस अंजाम तक पहुंचाया था। अब आप ये मत सोचिएगा कि पुलिसवालों के पास दिल नहीं होता। हां, ये ठीक है कि आपने आसपास अपराधियों को देखते रहने, अपराध कथाओं को लिखते और सुलझाते रहने के कारण हम आम लोगों जैसे कोमल भावनावाले नहीं होते। लेकिन हमें भावशून्य समझने की गलती भी मत कीजिए। कई बार हम भी घटनाओं-दुर्घटनाओं को देख-सुनकर भावनात्मक रूप से आहत होते हैं। लेकिन हमारी सोच की दिशा कॉमन मैन जैसी नहीं होती, बस इतना ही अंतर है आपमें और हममें।

खैर, मैंने बच्चे की तस्वीर अखबारों में छपने के लिए भिजवा दी। उसकी सुरक्षा कड़ी कर दी। पुलिस के मिसिंग बच्चों वाले पोर्टल में उसकी जानकारी साझा करवा दी ताकि कहीं किसी पुलिस थाने में यदि इस बच्चे की मिसिंग रिपोर्ट दर्ज की गई होगी, तो हमें उसके असली माता-पिता तक पहुंचने में मदद मिल जाएगी। ऐसा हुआ भी, दिल्ली से सड़े गुडगांव के एक पुलिस थाने से मुझे फोन आया। इसी बच्चे से मिलती-जुलती शक्ल का एक बच्चा करीब साल भर पहले वहां से लापता हुआ था। फोन पर उस थाने के थानेदार थे। हूं, तो उस बच्चे के अभिभावकों को ले आइए। देखते हैं कि ये बच्चा उन्हीं का है या नहीं। मैंने जबाव दिया। गुडगांव में रहने वाले सलिल वर्मा उनकी पत्नी के साथ कुछ घंटों बाद ही मेरे सामने थे। बच्चे की तस्वीर, उसके शरीर पर मौजूद कुछ चिन्हों, उसके जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल के सर्टिफिकेट और ऐसे ही कुछ जरूरी दस्तावेज वे अपने साथ ले आए थे। हम उनकी पूरी खोजबीन कर संतुष्ट होने के बाद उन्हें बच्चे के पास ले गए। सलिल की पत्नी बच्चे के पास पहुंचते ही उसे पहचान गई। यही है, यही है मेरा नकुल। बच्चे का नाम नकुल था। बच्चा वर्मा दंपत्ति का ही था।

तीन साल पहले घर के बाहर खेलते हुए गायब हो गया था। पिछले एक साल से सलिल अपनी पत्नी के साथ बच्चे को हर जगह ढूंढ रहे थे, लेकिन उसकी कोई खोजखबर नहीं मिली थी। आज बच्चा मिला तो भी मरणासन्न हालत में। खैर, पुलिस दंपत्ति को बच्चा नहीं लौटा सकती थी, क्योंकि इसकी लंबी कानूनी प्रक्रिया है। लेकिन हमनें उन्हें अस्पताल में बच्चे के पास रहकर उसकी देखभाल करने की परमिशन दे दी थी। मैं भी चाहता था कि बच्चा जल्दी से स्वस्थ हो जाए ताकि उसके साथ क्या हुआ है, ये पता लगाया जा सके। हालांकि पुलिस केस की अपने तरीके से तफ्तीश कर रही थी। लेकिन ये बच्चा पुलिस को अपराधियों तक आसाने से पहुंचा सकता था। आखिर सबकी दुआ रंग लाई, नकुल को होश आ गया। बच्चे ने होश में आने के बाद अपने माता-पिता को फौरन पहचान लिया। धीरे-धीरे नकुल के स्वास्थ्य में आशातीत सुधार आया। अब मैंने कोशिश शुरु की नकुल से बात करने की। बच्चे से सच पता लगाना एक बड़ी चुनौती था।

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लेकिन सादे वेश में उससे दोस्ती करते मुझे देर नहीं लगी। बच्चा प्यार का भूखा था, माता-पिता की उपस्थिति ने भी उसे सहज कर दिया था। फिर नकुल ने जो बताया, वो हर किसी के रौंगटे खड़े करने के लिए काफी था। 30 जुलाई 2018 की शाम वो घर के बाहर खेल रहा था। एक लड़का और एक लड़की उसके करीब आए और पता पूछने लगे। बच्चा कुछ समझ पाता, उसके पहले ही उसे बेहोश कर दिया गया। जब उसे होश आया तो वो एक अंधेरे कमरे में अकेला था। थोड़ी देर में कोई दो लोग उसके कमरे में आए। बच्चा डर कर चिल्लाने लगा। उन लोगों ने नकुल को एक इंजेक्शन दिया और नकुल फिर बेहोश हो गया। वो लोग रोज नकुल के कमरे में आते और उसे किसी दवा का इंजेक्शन लगा जाते। दो दिन तक बच्चे को कुछ भी खाने-पीने नहीं दिया गया। बच्चा बेदम हो गया। दो दिन बाद उसे दोनों टाइम खाने को दाल-चावल दिया गया। फिर कभी एक दिन कभी दो दिन उसे भूखा रखा जाने लगा। आप शायद यकीन नहीं करेंगे इस अंधेरी कोठरी में उस बच्चे ने तकरीबन छह महीने गुजारे। फिर उसे नए स्थान पर ले जाया गया। जहां उसके जैसे कई बच्चे थे। हर उम्र के बच्चे थे, लड़के भी थे, लड़कियां भी। कुछ लोग आते हर दिन कुछ बच्चों को कहीं ले जाते। ये सिलसिला भी चलता रहा। एक दिन नकुल की भी बारी आ गई। उसने दो लोगों को बात करते सुना कि इसको फरीदाबाद भेज रहे हैं। वहां उन्हें हिंदू और मुसलमान, दोनों के धर्म की शिक्षा-दीक्षा दी जाएगी। फिर वहां से मुंबई भेजेंगे। मंदिरों और मस्जिदों में भीख मंगवाने के लिए। नकुल को भी अन्य पांच बच्चों के साथ फरीदाबाद ले आया गया। वहां कुछ लोग उन्हें रोज नए पाठ पढ़ाते। ऐसे करते-करते वहां भी छह माह निकल गए। बच्चे एक छोटी सी कोठरी में दैनिक नित्य क्रिया करने को मजबूर थे। उसी नरक में रहते-रहते वे कई बीमारियों से ग्रस्त हो गए। कुछ बच्चे अपना मानसिक संतुलन भी खोने लगे। नकुल ने बताया कि वे बच्चे भी अच्छे घरों से थे। उन्हें भी अपहरण करके लाया गया था। हर बच्चा अपने घर को, अपने माता-पिता को याद कर खूब रोता था। लेकिन शैतानों के दिल नहीं पसीजते थे। ज्यादा रोने पर वे बच्चों को बर्बर तरीके से पीटने लगते थे। 

आखिर वो दिन भी आ गया, जब इन बच्चों को मुंबई ले जाया जा रहा था। लेकिन अचानक पता नहीं क्या हुआ, जो लोग इन बच्चों को ले जाने वाले थे, पता नहीं कहां गायब हो गए। पुलिस के हत्थे चढ़ गए या उनके साथ क्या हुआ? इन बच्चों को मालूम नहीं चला। ये बच्चे कोठरी में ही बंद रह गए। इन्हें पिछले महीने भर से खाना-पानी नहीं मिला। मासूम बच्चों ने जीने के लिए खूब संघर्ष किया। लेकिन भूख-प्यास के आगे पांच बच्चे हार गए और उन्होंने दम तोड़ दिया। नकुल के भाग्य में शायद जीवित रहना और अपने माता पिता से फिर मिलना लिखा था तो वो बच गया। मैंने मानव तस्करों के उस रैकेट का पता लगाने की बहुत कोशिश की, लेकिन मुझे सफलता नहीं मिली। मैं इसे अपने जीवन की सबसे बड़ी असफलता मानता हूं। एक बोझ सा है मेरे मन पर। इसे हल्का करने के लिए ही मैंने तय किया कि स्कूलों से संपर्क कर उनमें पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों का एक विशेष सेशन आयोजित किया जाए। इस सेशन में मैं नकुल की कहानी बताकर उनसे यही निवेदन करता हूं कि अपने बच्चों की सुरक्षा का ध्यान रखें। उसे समझाएं कि किसी अजनबी से बात ना करे। किसी अजनबी के साथ कहीं ना जाए। किसी अजनबी को पास आते देखकर भागकर किसी सुरक्षित स्थान पर जाए। अपने बच्चों को अकेले में बाहर ना छोड़ें। आप सारे काम छोड़कर बाहर खेलते हुए अपने बच्चों के पास मौजूद रहें क्योंकि वही आपकी सबसे बड़ी संपत्ति है। नकुल के अपराधियों को तो मैं सजा नहीं दिलवा पाया। लेकिन अब तक मैं 1500 स्कूलों में सेशन ले चुका हूं ताकि दोबारा किसी नकुल को वैसे नर्क ना देखना पड़े। जय हिंद।

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प्रियंका कौशल
संक्षिप्त लेखक परिचय -लेखिका पिछले 15 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। नईदुनिया, दैनिक जागरण, लोकमत समाचार, जी न्यूज़, तहलका जैसे संस्थानों में सेवाएं दे चुकी हैं। वर्तमान में भास्कर न्यूज़ (प्रादेशिक हिंदी न्यूज़ चैनल) में छत्तीसगढ़ में स्थानीय संपादक के रूप में कार्यरत् हैं। मानव तस्करी विषय पर एक किताब "नरक" भी प्रकाशित हो चुकी है।

ईमेल आई.डी-priyankajournlist@gmail.com

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