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जारी रहती हैं यात्राएँ - माह की कविताएँ

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प्रभा मुजुमदार

जारी रहती हैं यात्राएं                 


एक यात्रा
भीतर से बाहर की ओर
प्रस्थान करती हुई ,
बिन्दु से परिधि तक
अनवरत फैलाव लेती है
अनंत को छूती सी .....

एक यात्रा
बाहर से भीतर की ओर .
यात्रा के भीतर ही जारी
कितनी अंतरयात्राएं,
अनंत प्रकाशवर्षों में भी
पूरी न हो सकने वाली.

पर्त दर पर्त
अपने को ही छीलती उधेड़ती हुई
तो कभी अपने ही अलग अलग टुकड़ों को
साथ बाँधती भी है .
यात्रा,
छीनती है देहरी की सुरक्षा,
जमीन की आत्मीयता
हवा और मिट्टी की सौंध.
नम हाथों से विदा करते
अपनों का साथ.
एक आश्वस्ति और निश्चिंतता।   

बहुत कुछ दे जाती हैं यात्राएं !
नए परिचय और रिश्ते
नए पड़ाव, नए रास्ते।
मील के पत्थरों
जंगलों, नदियों,रेगिस्तानों
पर्वतों, घाटियों, समुंदरों से
साक्षात्कार कराती
नए रंगों, आकारों और इबारतों से
भर देती हैं जिंदगी के पन्नें।

स्मृतियों में होती यात्राएं,
विचरती हैं
भूली बिसरी देहरियों
बगीचों पगडंडियों में ।
खोलती है
वक्त के कंधे पर लदी
छोटी बड़ी गठरियों को ,
टटोलती है
बंद पड़ी दराजों के भीतर
धुँधले होते अक्षर।

वर्तमान की यात्राएं,
अनजान ठिकानों
अनंत संभावनाओं को टटोलती है।
जिजीविषा और संकल्प
साहस और संघर्ष को
नए वितान और आयाम देती है।
सपनों के पंख
अंतरिक्ष में उड़ान भरते है...
मन के आकाश में आकांक्षाएं
नक्षत्रों सी झिलमिलाती हैं।

इतिहास, भूगोल, दर्शन
अर्थशास्त्र, तकनीक
राजनीति की भी व्याख्यायें देती हैं यात्राएं
जिंदगी की वर्णमालाए, आँकड़े
सूत्र और समीकरण सिखाती हैं.
हर एक पड़ाव के बाद ।
हार के बाद भी जारी रहती हैं यात्राएं
जीत के बाद भी पूरी नहीं होतीं।
कल की निर्धारित मंजिल ,
हासिल होने के ठीक उसी क्षण
प्रस्थान बिन्दु बन जाती है
नई यात्रा का ।

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    जारी रहती हैं यात्राएं
     कैलेण्डर पर दर्ज
किसी एक तारीख से आरंभ होती है
और आगामी कितने ही दिनों
महीनों और बरसों से गुजर कर
ताउम्, निरंतर यात्रा।
कोरी स्लेटों पर
वक्त  की धूलमिट्टी से उंकेरे अक्षर
और खाली कंधों पर
स्मृति और अनुभवों की गठरियां,
दिल और दिमाग पर
इंद्रधनुषी संवेदनाओं और अहसासों के रंग ....,
प्रश्न के साथ आरंभ होती है कुछ यात्राएं
और मुड जाती हैं अनंत दिशाओं में।
इन्हीं प्रश्नों से निर्मित होती हैं संभावनाएँ....
अपनी अपनी सोच और समझ
संवेदना और अहसासों से
बनती जाती हैं पगडंडिया
कला, दर्शन, इतिहास और संस्कृति को
व्याख्यित करती,
कभी ज्ञान-विज्ञान के आलोक में
धुंध और जालों को साफ करती है।

राहगीरों के साथ आरंभ हुई यात्राएं
अकेले, निर्जन में भटका देती हैं,
धरती और आकाश के बीच
दुर्गम पहाड़ियों, मरुस्थलों, जंगलों की तलाश
तो कभी खण्डहरों की दीवार से
गूँजती आवाजों को समझने की कोशिश में ।

जरूरी नहीं कि उद्देश्य ही हो हर यात्रा का,
निरुद्देश्य यात्राएं भी
बहुत कुछ अर्थ और संदर्भ दे जाती हैं .
संकल्प और जिजीविषा
साहस, संघर्ष और जोखिमों को
  नए वितान देती हैं ।
उत्कंठा और प्रतीक्षा भी है यात्रा,
भविष्य की दिशा में बढ़ती,
नए क्षितिजों को तलाशती,
समय के साथ धुंधलाते सपनों के लिए
उमंगों का उत्स शोधती हैं
तो जख्मों की टीस को सहलाने
रुकती भी हैं यात्राएं ।

भटक जाती है यात्रा कई बार ,
बंदी कर देते हैं उसे पेशेवर गिरोह
अपने मकसद के लिए,
रैली में बन जाती है तब
बैनर और पत्थर लिए
नारों के शोर में।
 
फिर भी बेमानी नहीं होती कोई यात्रा
इतिहास और आगत के बीच के
हर कालखंड को
अलग अलग पड़ावों में सहेज लेती हैं यात्राएं।

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शिव कुमार 'दीपक'

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वृद्धों को समर्पित कविता-

          बाबूजी को दुनिया छोड़े---

                             

बाबूजी को  दुनिया छोड़े,

एक साल भी  ना बीता ।

पुत्र -वधू तंग करे माँ को,

वह करती रोज फजीता ।।-1

                                जान बूझकर काम बिगाड़े,

                                अम्मा  के  रख  सर  देती ।

                                हर पल  पति  से करे बुराई,

                                मन  में  नफरत  भर  देती ।।-2

प्रेम जाल में फँस कर बेटा,

माँ  से  नफरत  कर बैठा ।

अब घर से  दूर भगाने को,

पत्नी   देती   नित   ऐंठा ।।-3

                                इक दिन पूत कपूत हुआ जी

                                किस्मत  ने  मुख  को मोड़ा ।

                                मैया  को  ले  जाकर  सुत ने,

                                वृद्धा  आश्रम   में   छोड़ा ।।-4

पति-पत्नी अब रहें मौज में,

माँ  नौ - नौ  आँसू  रोये ।

कष्टों का नित करे कलेवा,

दुख  में  जागे  औ सोये ।।-5

                                बूढ़ी माँ के जर-जर तन को,

                                रोगों   ने   आकर   घेरा  ।

                                माँ की नजरों में अब लगता,

                                यम  के   दूतों   का  फेरा ।।-6

सुरपुर को जाने से पहले,

माँ  मन  में ममता जागी ।

उसे बुला दो अरे सेवको,

जो  है  नारी  अनुरागी ।।-7

                                सुने वचन उस बूढ़ी माँ के,

                                बेटे  को  फोन  मिलाया  ।

                                मिलना है तो ,जल्दी आओ,

                                सेवक  ने  यह  फ़रमाया ।।-8

सुनकर टेलीफोन,चला वह,

अधवर में पिकनिक छोड़ी ।

छोड़ी साली, घरवाली फिर,

गाड़ी  आश्रम  को मोड़ी ।।-9

                                 आकर देखा जननी माँ को,

                                 माँ  की  आँखें  भर आईं ।

                                 बड़े दुखों से पाला जिसको,

                                 उस मति  पर  रोये  माई ।।-10

माँ का  हाल  देखकर  बेटा,

हाथ  पकड़  कर यूँ  बोला ।

बोलो माँ,क्या करूँ आपको,

मन का  दरवाजा  खोला ।।-11

                                 मेरी अंतिम इच्छा को तू

                                 चाहे  तो  पूरी  कर  दे  ।

                                 कमरों को पंखा कूलर ला,

                                 दो फ्रिज,वाटर कूलर दे ।।-12

इतनी सुनकर बेटा बोला,

वर्षों  से  कुछ  ना  माँगा  ।

अब क्या होगा माँ इन सबका,

टूट  रहा  जीवन  धागा ।।-13

                                सुत की बातें सुन माँ बोली,

                                मैंने  दुर्दिन  सब  झेले ।

                                गर्मी - सर्दी,दुख-दर्द  सहे,

                                भूख प्यास में दिन ठेले ।।-14

मुझको डर है सुत जब तेरा,

घर  से  तुझे  निकलेगा  ।

मैंने  कष्ट  सहे  हैं  बेटा ,

तू  कैसे  सह  पायेगा  ?।।-15

                                इतनी सुनकर,हिचकी भर-भर,

                                बेटा   रोया   पछताया  ।

                                मैं नीच,स्वार्थी,खल कामी ,

                                माँ  को  मेरा हित भाया ।।-16

तू ! जो कहती सब कर दूँगा,

लेकिन  यहाँ  न  छोड़ूंगा ।

बाहों में भर,शपथ उठाऊं,

अब ना मुख को मोडूंगा ।।-17

                                इत माँ देखी, रब रूठ गया,

                                बोल  रुके  समझाने  से ।

                                पंछी पिंजड़ा छोड़ चला अब,

                                क्या होगा अब पछताने से।।-18

                                    ✍  शिव कुमार "दीपक"

                                          बहरदोई,सादाबाद

                                            हाथरस (उ०प्र०)
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ममता सिंह

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कुछ दोहे-
1
आज हमारे देश का, देखो ये है हाल ।
पढ़ा-लिखा बैठा रहे, अनपढ़ करे धमाल।।
2
कर्म सदा करते रहो, जब तक तन में जान।
कर्म विमुख नर झेलता, बस अभाव, अपमान ।
3
कन्या को मत मारिये, ये लक्ष्मी का रूप ।
घर आँगन रोशन करे, जैसे खिलती धूप ।।

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4
अच्छी यादों को रखो, हरदम अपने पास।
बुरे वक़्त में भी कभी, होगे नहीं उदास ।।
5
हरा भरा जग हो रहा, देखो चारों ओर।
सावन की छाई घटा, नाचन लागे मोर ।।
6
आ जाओ मन मीत नित, देख रही मैं राह ।
दर्शन के प्यासे नयन,  और न कोई चाह ।।
7
प्रेम पियासे नैन नित, चितवत आस लगाय ।
एक बूंद  प्रभु-प्रीत की, मिले जीव तर जाय।।
8
मधुर मिलन की चाह में, बैठी पंथ निहार।
कब आओगे साँवरे, इस जोगन के द्वार ।।
9
आ जाओ अविलंब अब, जग के पालनहार ।
बीच भँवर नैया फंसी, कौन लगाए पार ?  ।।
10
बचपन हमने खो दिया, गई जवानी बीत ।
छल-प्रपंच सब त्याग कर, गाओ हरि के गीत ।
11
आओ नया कुछ सोच लें, करें नया कुछ काम ।
ऐसा कुछ कर जायें हम, जग में गूँजे  नाम  ।।
12
आन्दोलन छेड़े बिना, पाओगे अधिकार   ?
कहाँ ज़ुबानी जंग का, निकलेगा कुछ सार ।।   

--
ममता सिंह (Mamta singh ) का परिचय
जन्म-3 अप्रैल- 1972
पिता- श्री छेदी सिंह गौतम
माता- श्रीमती पवित्री सिंह गौतम
पति- श्री अरवेन्द्र सिंह गहरवार
शिक्षा- एम.ए., एम एस डब्ल्यू
लेखन विधा- ग़ज़ल, गीत, दोहा आदि

छतरपुर (म.प्र.)



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संजय वर्मा 'दृष्टि'


उदास नदियाँ

इतनी चुप क्यों हो
जैसे रीति नदियाँ
तुम्हारी खिलखिलाहट
होती थी कभी
झरनों जैसी कलकल
रूठना तो कोई तुमसे सीखे
जैसे नदियाँ रूठती बादलों से
मै बादल तुम बनी नदियों सी
स्वप्न में
सूरज की किरणें झांक रही
बादलों के पर्दे से
संग इंद्रधनुष का तोहफा लिए
नदियाँ सूखी रहे
तो नदियाँ कहाँ से
बिन पानी भला उसकी क्या पहचान
वैसे तुम औऱ में हूँ
रीति नदियों में
पानी भरने को बेताब बादल
सौतन हवाओं से होता
परेशान
नदी से प्रेम है तो
बरसेगा जरूर
नही बरसेगा तो
नदियां कहाँ से गुनगुनाए
औऱ बादल सौतन हवाओं के
चक्कर मे
फिजूल गर्जन के गीत गाए
जो गरजते क्या वो बरसते नही
यदि प्यार सच्चा हो तो बरसते जरूर।


संजय वर्मा 'दृष्टि'
मनावर(धार)

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महेन्द्र देवांगन माटी

पानी बरसा दे

तोर अगोरा हावय बादर , सबझन देखत रस्ता ।
कब आबे अब तिही बता दे , हालत होगे खस्ता ।।

धान पान सब बोंयें हावय , खेत म नइहे पानी ।
कोठी डोली सुन्ना परगे , चलय कहाँ जिनगानी ।।

बादर आथे उमड़ घुमड़ के , फेर कहाँ चल देथे ।
आस जगाथे मन के भीतर,  जिवरा ला ले लेथे ।।

माथा धर के सबझन रोवय , कइसे करे किसानी ।
सुक्खा हावय खेत खार हा , नइहे धान निशानी ।।

किरपा करहू इन्द्र देव जी  , जादा झन तरसावव ।
विनती हावय हाथ जोड़ के , पानी ला बरसावव ।।

सौंधी सौंधी खुशबू हा जब , ये माटी ले आही ।
माटी के खुशबू ला पा के , माटी खुश हो जाही ।।


महेन्द्र देवांगन माटी (शिक्षक)
पंडरिया कबीरधाम
      छत्तीसगढ़
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डां नन्द लाल भारती

पिता
हाड़ निचोड़ता,तन पर टंगे वस्त्र
पांव में कई सुराखों वाली पनहीं पहने
जरुरतों से जूझते,
पसीने से उपजे खनकते सिक्के को
सन्तानों पर मुक्त हस्त लूटाते
अच्छे लगते हैं.........
बदले युग में एटीएम भर रह गए
सोचते हैं सुरक्षित हो रहा कल
उत्साहित रीन-कर्ज तक कि
फिक्र नहीं
जीवन के सांझ की रकम
भर ही नहीं खुद को गिरवी
रख देता है,
सन्तान के भविष्य को
फलदायी बनाने के लिए पिता ........
ज्यो ज्यो नजदीक पहुंचने लगता है
जीवन के अन्त की ओर
वही खून के सगे दूर होने लगते है
सिर अपयश, अपमान, सौतेलेपन का
सुलगता छेद करने लगते हैं
हृदय के बीचों-बीच बड़ी निर्लज्जता से
मर जाता है जीते जी
बचा हुआ जीवन हो जाता है
तेजाब के दरिया का जीवन
अकेला-असहाय हो जाते हैं पिता.....
तेजाब के दरिया का जीवन
मरते सपने का बोझ लिए
दधीचि की भांति न्यौछावर करने को तत्पर
बिना किसी  लोभ के सन्तानों की
उन्नति के लिए हाथ फैलाये
बहिष्कृत,तिरस्कृत,तेजाब की दरिया का
जीवन बीता देता है पिता
वाह रे सन्तानें उन्हें खबर ही नहीं लगती
एक दिन सर्वस्व छोड़ कर
चल पड़ता है अन्तिम यात्रा पर
तब आती है याद .......तब ना होता
ना सुन पाता फरियाद पिता ...।

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सुधा शर्मा

जनवरी की रात,सर्द कडकडाती रात,
ट्रेन की गति के कारण, तन पर कर रही अति आघात।
व्यथित हो हमने बैग टटोला,
उपलब्ध सामान निकाला।
टोपा,कोट,दस्ताने,मोजे,नी-कैप,
शरीर किया पूर्णतया लैस।
किन्तु सर्द हवा चिढा रही थी,
क्षमता को अँगूठा दिखा रही थी।
शायद प्रथम बार इतना ठंडा  मौसमआया है,
या शायद प्रथम बार जज्बातों को जगाया है।
ट्रेन धडधडाती थी,
दाँत किटकिटाती थी।
पता नहीं ट्रेन का धडधडाना प्रबल था,
या हमारे दाँतो का किटकिटाना सबल था।
हम सर्दी से हार गये थे,
जालिम सर्दी की मार को पहचान गये थे।
फुटपाथों पर सोते इंसान के होसलों,
का लोहा मान गये थे।
वह कपडों से सर्दी को नहीं जीतता है,
दृढ निश्चय से जख्म सींता है।
हर सम्पन्न व्यक्ति कहता है,
कम्बख्त देशी ठर्रा पीता है।
सचमुच वह दिन में मजदूरी करता है,
रात में मजबूरी की जी-हजूरी करता है।।

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अमित कुमार

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मधुर सिक्त सा अविरल अविराम,
            जी चाहे बन जाऊँ श्याम।
छल-छल करके जग को अर्पित,
        कर डालू  परहित  यह वायु धाम।।


दृढी मुझमें शक्ति तन की,
      चाह रहे सब शक्ति धन की।
हर ले कान्ति परम पुरुष की,
     चाही न शक्ति मन की।।


मैं रीते हाथ खडा हूँ,
      देखा सबने सौ बार।
लुटा न सौम्यता मन की,
     मिटे न किसी प्रकार।।


मैंने एक आवाज लगाई,
     तुम मेरे हो, तुम मेरे हो, तुम मेरे हो।
आवाज लौटकर आई,
    तुम मेरे हो, तुम मेरे हो, तुम मेरे हो।।


मैंने फिर आवाज लगाई,
      मैं तेरा हूँ, मैं तेरा हूँ, मैं तेरा हूँ।
आवाज फिर लौटकर आई,
      मैं तेरा हूँ, मैं तेरा हूँ, मैं तेरा हूँ।।
  

--
अमित कुमार
प्रोजैक्ट मैनेजर, इन्फॉसिस कम्पनी

जीवन परिचय
नाम- अमित कुमार
शिक्षा- बी. एस. सी.डी एन कॉलिज मेरठ से,
           एम सी ए Institute of Engg. & t      technology Lucknow U P
Job- project manager .Infosis com.Pune
posted- अमेरिका,आस्ट्रेलिया,मैक्सिको,ओस्लो,बैंगलूरू.वर्तमान में पूणे में।
शौक- लेखन, दार्शनिक व आध्यात्मिक पुस्तकें पढना,
प्राकृतिक स्थलों का भ्रमण, स्वाध्याय।

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सीए सुनील गोयल  

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जिंदगी यही तो है...

जिंदगी यही तो है...
कुछ पूरी कुछ अधूरी...
परिवार साथ है तो पूरी...
और दूर, तो अधूरी...
एक ऐसी प्यास जो ना बुझती कभी...
ऐसी भूख जो ना लगती कभी...
एक अहसास है...
कुछ पाने का कुछ खोने का...
यही तो है जिंदगी...
कुछ पूरी कुछ अधूरी।

सांसें नहीं है जिंदगी...
जिंदगी वो उमंग है,
जो उम्मीदों के घर में रहती है...
कुछ टूटे सपने, कुछ छूटे अपने...
कुछ बनती बातें, कुछ बिगड़ी बातें...
कभी तन्हा, तो कभी शोर...
ये जिंदगी ही तो है...
कुछ पूरी कुछ अधूरी।

ठहरती नहीं बस...
भागती ही है...
तभी तो खास है...
ना परवाह किसी की, कौन साथ है...
ना परवाह कौन जुदा है...
बस चलती है अपनी ही धुन में...
ना रूकती किसी के लिए...
सोचो तो कुछ भी नहीं...
और सोचो तो सब कुछ...
कुछ पाने की उम्मीद है...
कुछ खोने का डर...
जिंदगी ही तो है...
कुछ पूरी कुछ अधूरी।

बड़ी खवाहिश भी है...
छोटी मुस्कान भी है...
कुछ प्यार है...
कुछ दर्द भी...
कुछ विश्वास है, कुछ धोखा भी है...
कभी मर्जी से चले हमारी कभी खुद की...
जिंदगी यही तो है...
कुछ पूरी कुछ अधूरी।

कभी सब चाहिए...
कभी कुछ भी नहीं...
कभी रूकना ही नहीं...
कभी चलना ही नहीं...
कभी रास्ते खुलें
कभी सब बंद..
क्या क्या करवाती है...
और करवाती कुछ भी नहीं...
यही तो है जिंदगी...
कुछ पूरी कुछ अधूरी।

 
- सीए सुनील गोयल


भिवानी-127021 (हरियाणा)   
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नाथ गोरखपुरी


ग़ज़ल


तेरे मधुर अधर को लिखा था
तेरे सलोने नजर को लिखा था
लिखा तेरे काजल की रोशनाई
नहीं लिख सके बस तुझसे जुदाई

तुमसे मैंने मिलन को लिखा था
चाहत बढ़ती अगन को लिखा था
लिखा तेरे संग जो नशा मुझपे छाई
नहीं लिख सके बस खुदा की खुदाई

लिखे तो मोहब्बत के सारे फ़साने
लिखे तो मोहब्बत के होके दीवाने
लिखा तेरे इश्क की सारी वफ़ाएं
पर नहीं लिख सके तेरी बेवफाई

इश्क-ऐ-शरम को लिखा है शरम से
मैंने लिखा इश्क हो ना भरम से
लिखा मैंने सब कुछ जो हिस्से में आई
बस 'नाथ' लिख ना सके हैं तेरी बेहयाई

कविता

बस्ती का धुप्प सहना सीख लो
जीना है तो चुप्प रहना सीख लो
धारा के प्रतिकूल जीवन है नही
धारा के अनुकूल बहना सीख लो

मैं ना कहता हूँ कि मन को हार दो
सबके जीवन को तुम्हीं संवार दो
संग चलना सबके संभव है नही
तुम डूबते हुये को बस पतवार दो

इस धरा से आसमां तक मत चलो
तुम किसी भी कारवां तक मत चलो
जिसका दामन एक बार थाम लो
छोड़ उसको उस जहां तक मत चलो

वीर अभिमन्यु बनो या ना बनो
युध्द में अर्जुन बनो या ना बनो
कायरों की भाँति लड़ना छोड़ दो
तुम विजय हासिल करो या ना करो

हर जगह ललकार दो संभव नहीं
हर जगह तलवार हो संभव नहीं
खुद ही तुम काबिल बनो ये सोचके
हर जगह पतवार हो संभव नहीं

तुम बढ़ो या ना बढ़ो प्रतिकार को
तुम लड़ो या ना लड़ो अधिकार को
मौन रहना पर हमेशा देखना
मौन स्वीकृत ना मिले गद्दार को

सत्य का तुम्हें बोध हो चिन्तन करो
मन में जो गर क्रोध हो चिन्तन करो
यूं तुनककर स्वयं को लज्जित न कर
स्वचेतना सिंचित करे चिन्तन करो

सुन तुझे पतवार दे देता हूँ ,ले
हाथ में तलवार दे देता हूँ ,ले
क्या करेगा तुं विजय का सामना
स्वर्ग का अधिकार दे देता हूँ ले

जानता हालात से डरता है तू
स्वयं के जज्बात से लड़ता है तू
मन में जीने का असंभव चाह ले
जिंदगी में हर कदम मरता है तू

तेरी तृष्णा नित्यनित बढ़ती रही
दृष्टि कातर चाह ले चढ़ती रही
एक ही पल और जी लूं सोचके
जिंदगी तेरी मौत से लड़ती रही


कौन कहता है कि धारा मोड़ दे
ना संभलती है तो धारा छोड़ दे
बाजुओ के बल पे सागर जीत ले
डुबी किश्ती का सहारा छोड़ दे

बैठ ना तू मन को अपने मारकर
चित्त तेरा चित ना हो चीत्कारकर
बिन लड़े अधिकार मिलता है नहीं
जिंदगी की जंग लड़ ललकार कर

वल्लरी जस कब तलक् हिलता रहेगा
आँसू आखिर कब तलक् गिरता रहेगा
कितने पुरखों ने है अपनी जान दे दी
हक के लिये मिट्टी में लहू मिलता रहेगा

तेरी छाया छांव बनकर वास देगी
आने वाली पीढ़ियों को आस देगी
कायरों की भाँति डरना है नही
उनके मन में प्रबल ये विश्वास देगी

तेरी रक्षा ना करेगी ऐ सियासत
तू करेगा खुद से ही खुद की हिफाजत
जिंदगी को खेल करदे बाजुओं से
तू करेगा मौत से भी तब शरारत

भोजपुरी

मोर गउआं गोरखपुर हवे
सुनले होबे मशहुर हवे

मोर करबे का, तें धरबे का
कुछ उखरी ना,तें उखरबे का
जे हमरा से अझुरा जइबे
छर्रा मारब छितरा जइबे
इ गर्मी ना ई गरूर हवे
मोर गउआं गोरखपुर हवे
सुनले होबे मशहुर हवे

ऐहंवा बुढ़वे समझावेलें
फिर ललकी आँखि देखावेलें
मान गइल तब त ठिक ह
ना त फिर लतिआवेलें
ई ऐहंवा का दस्तूर हवे
मोर गउआं गोरखपुर हवे
सुनले होबे मशहुर हवे

जे सामने वाला अधेड़ मिलल
ओकर हवे हाथ बहुते खुलल
उ सब सुनी पर मानी ना
ऐसे बच्चा मनमानी ना
इ जानल बहुत जरूर हवे
मोर गउआं गोरखपुर हवे
सुनले होबे मशहुर हवे

गर मोछ तनि करिआइल बा
त नई जवानी आइल बा
ओकरा से एकदम दूर रहे
ओका सुनिहे तें कूछ न कहे
उ ना जानि ई बेकसूर हवे
मोर गउआं गोरखपुर हवे
सुनले होबे मशहुर हवे

ऐहंवा उहे ह कूटा जाला
जे सबका से अझुरा जाला
गरमी में जे बतिआजाला
उहे ऐहंवा लतियाजाला
जे मनके मगरूर हवे
मोर गउआं गोरखपुर हवे
सुनले होबे मशहुर हवे

एक बाति अउर हमनी में बा
पियार त हर धमनी में बा
ओके खातिर जान लूटा दिहें
ई जेकरा कै अपनालिहें
सज्जन त इनका हजूर हवे
मोर गउआं गोरखपुर हवे
सुनले होबे मशहुर हवे

बिटिया

कोई आयेगा, मुझ बेटी को बचाने?
  मैं कोख में मारी जाती हूँ
कोई आयेगा,अपना फर्ज निभाने ?
मैं सड़कों पर बिलखाती हूँ

कोई तो आओ परदा करने,
  देखो वो घुरता है वहसी
मुझे बचाओ बुरी नजर से,
ताक में बैठा है वह हवसी।

कोई आयेगा, मेरी रक्षा करने?
मुझे सड़कों पे सताया जाता है।
कोई आयेगा, मेरा दामन धरने?
जिंदा मुझे जलाया जाता है।

बीच बाजार में मुझे बचालो,
चिल्लाना क्यों पड़ता है?
उसकी गिरी हरकतों से क्यों,
मुझे लजाना  पड़ता है?

कोई आयेगा मेरा हाथ पकड़ने?
कोई हाथ है मेरा खींच रहा
कोई आयेगा मेरे खातिर लड़ने?
  कोई बलसे मुझको भींच रहा

पुरूषों के संग पुरूषों से ही,
क्यों असुरक्षित होती हूँ?
पुरूषवाद नारी मर्यादा से,
मैं क्यों कल्पित होती हूँ?

चलो! दिखावा बंद करो,
तुम सब असली पापी हो!!
ना री नारी करने वाले,
  तुम सब नारी के घाती हो !!

नेता


खादी पहनके रोज तुम ,घूमते हो हस्तियों में
इकरोज जरा घूम लो,तुम बदनसीब बस्तियों में

मखमल सजी कालीन पर,मारते हो चौकड़ी
बैठो कभी जमीन पर,निकल जायेगी हेकड़ी

उन बस्तियों के बच्चों को ,बुलाकर चूम लो
नेतागिरी भूल जायेगी, संग उनके घूम लो

खुद के बच्चों को बहुत पालते हो प्यार से
गरीब बच्चों को जरा ,देख लो दुलार से

अपना हिस्सा प्रेम से, देते हो अपने लाल को
फिर कैसे हक को लूटकर,सौंप देते काल को

बस्तियों के ज्योति को, कैसे बुझा जाते हो तुम
रक्त बूंद-बूंद चूसकर , कैसे अघा जाते हो तुम


खुद को ऊचाँ मानते तो , निम्न को संवार दो
पहले ज्ञान को प्रेरित करो, तब कहो गंवार हो

सारी सत्ता पूंजी के ही, क्यों इर्द गिर्द घूमती
ये सियासत क्यों अमीरी पांव खाली चूमती

लूटकर के लाख कर लो खाक होना है उसे
आज सुन्दर जो घड़ा है चाक होना है उसे

तुम सियासत गर करो तो देश को संवार दो
आने वाली नस्ल को करूणा दया दुलार दो

ग़ज़ल

आ अब तुझे गले से लगालूं सनम
अब भी रूठे हो तुम तो मनालूं सनम

तू आती है, तो आ...दिल इन्तजार करता है
प्यार है, तो बता... दिल इन्तजार करता है

मैं हूँ अगर पसन्द तो फिर... देर यूं ना कर
रस्म आगे को बढ़ा... दिल इन्तजार करता है

बेचैन दिल है और... परदा किये हो तुम
घूंघट जरा हटा... दिल इन्तजार करता है

नाराज क्यूं हो हमसे...खता हुई है क्या?
दिल तोड़के ना जा... दिल इन्तजार करता है


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डॉ0 मृदुला शुक्ला "मृदु"

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"सावन ऋतु हइ आई"
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झमकि कइ बरसहु मेघा, सावन ऋतु हइ आई।

कारे-कारे बदरन बीच मा बिजुरी रजत मढ़ाई,
बदरा ठिठुकि-ठिठुकि कइ बरसइं बयारि चलइ पुरवाई,
दादुर, मोर, पपीहा ब्वालइं बरखा कइ करइं अगुवाई,
सावन ऋतु हइ आई ।

चहुँ दिसि हरे-भरे हइं खेतवा धानन कइ रोपाई,
ईखहु क्यार लगन अति पावन प्रहरी हइ मनभाई,
पातन बीच तै टप-टप टपकइ नीर-बिन्दु भरमाई,
सावन ऋतु हइ आई ।

ताल, तलइया बहियाँ पसारे गरे मिलइं अकुलाई,
बिरवा, डार झूमि झुकि झूमइं मानहुँ गए बउराई,
जन-जन महं उल्लास जागिगा धरती भई सुखदाई,
सावन ऋतु हइ आई ।

गेंदा, गुलाब तउ महं-महं महँकइं केउड़ा सुबास हइ लाई,
बेला, चमेली, कनेर अउ गुड़हल सगरे हइं हरसाई,
बागन महं कोयलिया ब्वालइं झींगुर चिंकारा बजाई,
सावन ऋतु हइ आई।

घर-आँगन दुआरु महं पानी ओरउनी टप टपकाई,
कागज कइ नउका तै लरिका मगन होंहिं हरसाई,
हरहा-गोरू सुखी भये जनु नवनिधि हइ घर आई,
सावन ऋतु हइ आई ।

बिरवन परिहाँ झुलवा परिगे सखियन मेंहदी रचाई,
नान्हें-नान्हें लरिका झूलइं कजरी-मल्हार मनभाई,
राधा-किशन का वेश बनाइ कइ मुरली मधुर बजाई,
सावन ऋतु हइ आई ।

       कवयित्री
डॉ0 मृदुला शुक्ला "मृदु"

लखीमपुर-खीरी (उ0प्र0)

कॉपीराइट–कवयित्री डॉ0 मृदुला शुक्ला "मृदु"
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प्रिया वर्मा


शांति का परिचय


मैं रहती हूं वहां जहां कहीं कोलाहल का शोर नहीं

मैं रहती हूं वहां जहां आने-जाने की दौड़ नहीं

मैं रहती हूं वहां जहां मंजिल पाने की होड़ नहीं

मैं रहती हूं वहां जहां भावनाओं की तोड़फोड़ नहीं

हां खंडहर पसंद है मुझे मगर जहां पर्यटकों का शोर नहीं

मैं रहती हूं उस स्थल पर जहां ईश्वर पूजे जाते हैं

मगर पसंद नहीं मुझको प्रार्थनाओं का शोर कहीं

मैं अंबर में मैं धरती में लोगों के मध्य मैं कहीं नहीं

मैं जल में मैं थल में अंधियारे के भयानक क्षण में

वादी भी मेरी बस्ती है पर्वत पर भी बसेरा है

नदियों की शीतलता में रहती हूं

पेड़ों की छाया भी मेरा डेरा है

जुगनू से मैं खेलती हूं अंधियारे से है प्रेम मुझे

मैं तन्हा हूं मैं अकेली हूं पर इसका न एहसास मुझे

गर करनी हो अनुभूति मेरी तो धीरे से आना उस और

जिस ओर मेरा बसेरा है कदमों की आहट न लाना उस ओर

ध्वनि मुझे करती भयभीत इसलिए लोगों से थोड़ी दूर हूँ

पर भयभीत न होना तुम मुझसे मैं मौन नहीं गंभीर हूं
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" वो इश्क नहीं हो सकता है "
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सचिन राणा हीरो

पिता  की पगड़ी को जो गिरा दे,वो इश्क नहीं हो सकता है,,
अपनी शान में पिता का मान गिरा दे, वो इश्क नहीं हो सकता है,,
मां की कोख में जिस बेटी को, पिता ने बचाया है,,
उसी बेटी ने देखो पिता का कैसे मान गिराया है,,
जिस बेटी को खूब पढ़ाया, ऊंची तालीम दिलाई है,,
उसी बेटी में देखो जग में, पिता की जग हंसाई कराई है,
  जो पिता की आंखों में आंसू ला दे, वो इश्क़ नहीं हो सकता है
करना है अगर तो प्रेम करो, प्रेम त्याग दे जाता है,,
बेटी का एक गलत कदम, पिता को भीतर तक खा जाता है,,
जो पिता के मस्तक पर दाग लगा दे, वो इश्क नहीं हो सकता है,,
प्यार के नाम पर जो बच्चा,  केवल अपनी ही हाकेगा,,
वो पिता सब कुछ मांगेगा, लेकिन रब से बेटी ना मांगेगा,,
जिस बेटी को नजर से बचाने को, मां काला टीका लगाती है,,
वही बेटी अपने सपनों की खातिर, पिता का मुंह काला कर जाती है,,
जो बेटी पिता को इतना जलील कराए, वो इश्क नहीं हो सकता है,,
खून के आंसू जो पिता की आंखों में लाए,
वो कुछ भी हो, कुछ भी हो, कुछ भी हो,
लेकिन इश्क नहीं हो सकता है, इश्क नहीं हो सकता है,,

सचिन राणा हीरो
हरियाणवी युवा कवि रत्न
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रीझे यादव

*पिता*

पिता परिवार का मूल आधार है।
बच्चों के लिए तो पूरा संसार है।

पिता की उंगली ही चलना सिखाते हैं।
थामते हैं हाथ,कदम जब भी लड़खड़ाते हैं।

पिता के कंधों मे ही दुनिया के सब सुख है।
उनके स्नेह के छांव तले,न प्यास है न भूख है।

बच्चों की हर मांग, पिता ही पूरा कर पाते हैं।
जादू है उनके हाथों में,सब खुशियां घर ले आते हैं।

सब्जी नहीं तो,नमक मिर्च मे ही खाना खा लेते हैं।
जमानेभर की फ़िक्र को बीड़ी के धुएं में उडाते हैं।

पिता सदा ही, बच्चे का साहस होता है।
पिता पास हो तो, बेफिक्र नींद भर सोता हैं।

पिता के वरदहस्त तले, मुसीबत तमाम टल जाती है।
घिर आती है मुसीबत जब, तब याद पिता की आती है।

रीझे यादव
टेंगनाबासा(छुरा)
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चंचलिका

     " ताला "

मैं ,
इस घर का ताला हूँ ..
घर के सदस्यों के
अलग अलग चाबियों से
प्रतिदिन खोला जाता हूँ ......

घर का रिश्ता
घर वालों से कहीं ज्यादा 
मुझसे होता है.. ..
सचेत रह कर
हर पल घर की रखवाली करता हूँ   .......

मालकिन
जब घर आती है
दरवाज़ा खोल ,
बेरहमी से मुझे पटकती है
कभी भी प्यार से मुझे नहीं देखती है  .......

मगर
इस घर के मासूम बच्चे
मुझसे बहुत प्यार करते हैं
पढ़ने लिखने के बाद
कभी कभी मेरे साथ खेलते हैं ...

कभी देर रात
नशे में धुत होकर 
जब साहब घर आते हैं
गलत चाबी घुमा घुमा
मुझे चोट पहुँचाते हैं ........

अंततः
रविवार के दिन छुट्टी ..
खूंटी में टांग पसारे
मैं लटकता रहता हूँ
दिन भर बस आराम ही रहता है....

शायद
समय के साथ अब मैं
थोड़ा सा बूढ़ा हो गया हूँ
कहते हैं मेरा लीवर
कुछ खराब हो गया है... .......

अब तो
मेरी जगह एक नया
सुंदर सा ताला आया है
और मैं कबाड़ खाने में रहता हूँ
जहाँ मेरा दम घुटता है......

बहुत लगाव
मुझे इस घर से है
सबसे प्यार करता हूँ
बरसों इस घर की रक्षा की है
लगता सब कुछ आज भी अपना है....

शायद
इस दुनिया के लोग
बड़े ही स्वार्थी होते हैं
पुरानी चीज़ों की कद्र नहीं
एक दिन हर कोई वयस्क होता है....
---- चंचलिका.
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डा. सुरेन्द्र वर्मा

एक ही बात
लहजा बदलता
अर्थ अलग

खटखटाओ
तो खोला ही जाए
ज़रूरी नहीं

नीचे से देखो
शिखर पे आदमी
दीखता छोटा

बादल घिरे
झलक बताकर
बहका गए

मौत निश्चित
पर इच्छा जीने की
अटल रही

गुज़रा वक्त
वापस नहीं आता
पीछे न देखो

वक्त बेवफा
पल पल बदला
ठगता रहा

बढ़ती उम्र
अकेले होते गए
सभी बिछड़े

आतंकवाद
दर्शन न ही धर्म
सिर्फ धत्कर्म

- डा. सुरेन्द्र वर्मा
प्रयागराज - २११००१ 
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आर.एस.प्रीतम


मैं चल रहा हूँ इतना संभल कर मानो जीवन समर है।
अब तक सही हूँ ये दोस्तों की मोहब्बत का असर है।।

मिलती यहाँ देखी धोखों की सौग़ातें हर क़दम पर।
अब आदमी की बातों में मीठापन दिल में ज़हर है।।

अकड़े रहोगे तो टूटोगे यह तय है जान लो तुम।
बचता वही आँधी तूफ़ानों में झुकता जो शजर है।।

तू आइने-सा लगता है सज़दा करता हूँ सदा मैं।
ये वक़्त बदले तू ना बदले ऐसी तेरी डगर है।।

तू जीत सकता है हर बाज़ी पर कोई दाँव तो चल।
मायूस होकर झुक जाए वो खुद से हारी नज़र है।।

प्रीतम कभी हक से अपना कहना मैं खुद को लुटा दूँ।
दिल के गगन में रहता बस इक तू ही बनके क़मर है।।

आर.एस.प्रीतम
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सर्वाधिकार सुरक्षित–radheys581@gmail.com
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