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अष्टांग योग - आलेख - दीपक दीक्षित

अष्टांग योग

पतंजलि ने योग के आठ अंग बताये गए हैं जिसे अष्टांग योग के नाम से जाना जाता है। ये 8 अंग हैं -
१ यम
२. नियम
३. आसन
४. प्राणायाम
५. प्रत्याहार
६. धारणा
७. ध्यान
८. समाधि

यम- यम वह व्यवस्था है जिसके द्वारा सभी व्यक्तियों का समाज में रहना आसान हो जाता है। ये सामान्य दिशा-निदेश है जिसका आचरण सामूहिक रूप से एक हमें व्यवस्थित रखता है। इनका आकलन निजी स्वार्थ की कसौटी पर नहीं किया जा सकता। ये हमारे सामाजिक दायित्व है। इनका महत्त्व अपने फायदे के लिए नहीं पर सबके फायदे में है। ये हैं-

(क) अहिंसा - शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को हानि नहीं पहुँचाना

(ख) सत्य - विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना

(ग) अस्तेय - जिस चीज पर किसी दूसरे का हक़ है उसे अपना न समझाना, ये चोरी है

(घ) ब्रह्मचर्य - सभी इन्द्रिय-जनित सुखों में संयम और अनुशासन बरतना

(च) अपरिग्रह - आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना

हममें से अधिकतर लोग इनके महत्त्व को समझते हैं पर शायद सब लोग मन से और ईमानदारी से इनका पालन नहीं कर पाते हर बार। कुछ तार्किक प्रवृत्ति के लोग सोचेंगे ,ये सब तो अस्पष्ट है -इन सब बातों का फैसला कौन करेगा कि सच क्या है और झूठ क्या? आवश्यकता कितनी है? अनुशासन क्या है? आदि आदि । दरअसल ये प्रश्न इतने व्यापक है कि इनका जवाब किसी फिक्स्ड फ़ॉर्मूला से नहीं निकला जा सकता ।समय और परिस्थिति के अनुसार इनके अर्थ इतने बदलते रहते है कि इन्हें शब्दों में बांध हम परिभाषित नहीं कर सकते । योग में इन सवालों का जवाब ढूँढने की जिम्मेदारी भी साधक पर ही छोडी गयी है। असल में जैसे ही हमें इन सवालों का सही जवाब (अपने परिप्रेक्ष्य में) मिलता है हम योगी हो जाते है और अपने सच्चे स्वरूप से हमारा परिचय हो जाता है।

नियम: यम में जहाँ हमारे सामाजिक दायित्वों का बोध कराया गया है, वहीं नियम के द्वारा हमें व्यक्तिगत रूप से अनुशासित और स्वस्थ रखने का प्रयास किया गया है। नियम कोई खास ढंग से काम करने की हिदायत नहीं है और इसे बंधन या मजबूरी के रूप में नहीं देखना चाहिए। ये हमारी चेतना को उन व्यवस्थाओं से जोड़ने का प्रयास है जो हमें स्वस्थ रखने में सहायक हो सकती हैं। इस बारे में हम अपनी परिस्थिति और सीमाओं में रह कर जो भी श्रेष्ठतम कर सकते है उसका प्रयास करना चाहिए।
पतंजलि ने ये नियम बताये हैं –

(क) शौच - शरीर और मन की शुद्धि

(ख) संतोष - संतुष्ट और प्रसन्न रहना

(ग) तप - स्वयं से अनुशासित रहना

(घ) स्वाध्याय - आत्मचिंतन करना

(च) इश्वर-प्रणिधान - इश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा
नियमों का पालन करने के लिए अलग अलग परिप्रेक्ष्य में विधि अलग हो सकती है। यहाँ विधि का महत्व ना होकर आपकी भावना और ईमानदारी का महत्व अधिक है।

आसन: आसन या योगासन अनुसंधान द्वारा स्थापित वो शारीरिक मुद्रायें हैं जो एक स्वस्थ शरीर को व्यवस्थित करने में सहायक है। इन्हें जबरदस्ती करके अपने शरीर को कष्ट नहीं पहुंचना चाहिए जैसा कि कुछ लोग करते हैं। हर व्यक्ति को हर आसन करने की कोई जरूरत नहीं है जैसे हर व्यक्ति को सब दवाई खाने की जरूरत नहीं होती । अगर आप अपनी दिनचर्या में अपने आपको स्वस्थ रखने के लिए उचित श्रम कर लेते हैं तो अलग से आसन करने की आवश्यकता नहीं है, ये तो स्वयं ही हो जाते हैं। अगर शरीर के कुछ भागों का श्रम नहीं हो पाता या आप किसी रोग से पीड़ित हैं तो अवश्य किसी सक्षम व्यक्ति के मार्गदर्शन में हमें उचित आसन चुन कर करना चाहिए। हमें वह आसन करने के लिए चुनना चाहिए जो हमारे जीवन में वांछित बदलाव ला सके। चुने गए आसन की अवस्था में हमें तब तक रहने चाहिए जब तक हमारा शरीर इसे प्रसन्नतापूर्वक करने की इजाजत देता है - फिर धीरे धीरे इस अवधि को बढ़ाना चाहिए।

योग आसन आधुनिक व्यायाम की अधिकतर विधियों से अलग तरह के सिद्धांत पर काम करते है। आधुनिक व्यायाम की अधिकतर विधियां आपके शरीर को एक ख़ास आकार या गुण देने के इरादे से रची गयी हैं और इसलिए इनसे वज़न बढ़ाना या घटाना, सहने की शक्ति बढ़ाना, मांसपेशियों को निश्चित आकार देना या फिर शरीर को कोई ख़ास तरह के काम के लिए तैयार करने का काम किया जाता है।

योग आसन में शरीर के नैसर्गिक गुणों में वापस स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। हमारा शरीर बचपन में जीने और कुछ नया जानने/करने की उमंग से भरा होता है और इसमें गजब का लचीलापन होता है जिससे हर तरह की परिस्थिति में अपने आप को व्यवस्थित कर लेता है। पर धीरे धीरे काम या समाज की रस्मों या अपनी/दूसरों की भावनाओं के दबाव में आकर हम अपने ये गुण खोते जाते है और तरह तरह की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। योग आसन के द्वारा हमारे शरीर के मूल गुण और व्यवस्थाओं को पटरी पर लाया जाता है जिससे बीमारियाँ इससे दूर भागने लगती है। आसनों के द्वारा हमारा रक्तचाप,स्नायु तंत्र, श्वांस तंत्र, प्रतिरोधक क्षमता और पाचन तंत्र आदि व्यवस्थाओं को अपने स्वाभाविक रूप में लाया जाता जाता है। नियमपूर्वक आसन उपयुक्त करने से अनियमितताएं अपने आप ही दूर हो जाती है। जैसे अगर आप मोटे हैं तो फालतू चर्बी अपने आप छंट जाती है और अगर आप बहुत पतले है तो आपकी मांसपेशियां स्वाभाविक रूप से उभर जाती है।

वांछित प्रभाव के लिए आसन कभी भी जबरदस्ती ,अपने को कष्ट देते हुए या जरूरत से ज्यादा नहीं करने चाहिए। शांत मन से, आनंदपूर्वक जितना आसानी से कर सकें उतने समय के लिए करके धीरे धीरे इनकी मात्रा और गिनती बढ़ाना चाहिए और इनके करते समय सांसों पर नियंत्रण रखना चाहिए ।

प्राणायाम: श्वास हमारे जीवन की डोर है। साँस अन्दर लेने पर एक ऊर्जा/ शक्ति और पदार्थ (हवा) कही बाहर से आकर हमारे खून बनने की प्रक्रिया के लिए उपलब्ध होती है। इसका जितना हिस्सा हम ग्रहण कर लेते है वो हमारा हिस्सा बन जाता है। इस तरह हम हर स्वांस के साथ बदलते रहते हैं। ये वायु तो वास्तव में माध्यम है ,इसके साथ बहुत से सूक्ष्म पदार्थ न जाने कहाँ कहाँ से आकर जुड़ जाते हैं और साँस द्वारा अंततः हमें मौका देते हैं अपने आपको बदलने का। जाने या अनजाने में हम हवा के माध्यम से इस विराट संसार की कितनी ही चेतनाओं और पदार्थों के गुण ग्रहण करते रहते हैं साँस लेकर। प्राणायाम की तकनीक द्वारा जहाँ के ओर हम लम्बी और गहरी साँस लेकर अपने लिए अधिक प्राण ऊर्जा उपलब्ध करते हैं वहीं दूसरी ओर ऊर्जा के इस विशाल भंडार से वही तत्व ग्रहण करने की कला सीखते हैं जो हमारे स्वस्थ जीवन में सहायक हो सके।

प्रत्याहार - इसका अर्थ है इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना। ईश्वर ने हमें ५ इन्द्रियां दी हैं-

१. देखने की शक्ति

२.सुनने की शक्ति

३.छू कर या स्पर्श कर वस्तुओं को महसूस करने की शक्ति

४.स्वाद लेकर या चख कर जाने की शक्ति

५.सूंघ कर पहचानने की शक्ति.

इन सभी शक्तियों का इस्तेमाल हम बाहर की दुनिया को पहचान करने में करते हैं. पर हमारी अपने बारे में जो जानकारी होती है वह दूसरों द्वारा हमारे बारे में दी गयी सूचनाओं के आधार पर बनी एक छवि मात्र होती है। इस छवि को बनने में जहाँ दूसरों की नजरें काम करती है वही उनका नजरिया भी इसे बनाता है जो हमारे नज़रिए से अलग हो सकता है। इस छवि को अपनी वास्तविक पहचान मान कर हम जो निर्णय लेते हैं वह हमेशा स्वस्थ नहीं रह पाते। प्रत्याहार की तकनीक द्वारा हम अपने आप को पहचानने के लिए अपनी ही इन्द्रियों या शक्तियों का सहारा लेते हैं और किसी दूसरे के द्वारा दी कृत्रिम जानकारी के बजाय अपने बारे में स्वयं जानकारी इकट्ठा करना सीखते हैं।

प्रत्याहार में हम अपनी इन्द्रियों और दिमाग का इस्तेमाल करते हैं, पर उसका अंदाज बदल जाता है। इसको इस तरह समझें – आमतौर पर हमारी आँखें एक कैमरे की तरह काम करती हुई हमारे आसपास हो रही घटनाओं की दिमाग में तसवीरें भेजती रहती हैं जिनके आधार पर दिमाग फैसले लेता है। अब इस कैमरे का फोकस अगर हम अपने भीतर चलने वाली घटनाओं पर कर दें तो हमें अपने बारे में अपनी ही आँखों से सूचनाएं मिलेंगी जो सत्य के ज्यादा नजदीक होंगी। इसी तरह पांचों इन्द्रियों और दिमाग का इस्तेमाल से प्रत्याहार स हम अपनी वास्तविक पहचान पाते हैं।

धारणा: धारणा का अर्थ है एकाग्रचित्त होना। आप पूछेंगे , 'किस पर? ' तो इसका जवाब है, 'किसी भी चीज पर जो आपको ठीक लगे'। यहाँ महत्त्व इस बात पर नहीं है कि आप कहाँ फोकस कर रहे है। महत्वपूर्ण यह है कि आप फोकस करने में समर्थ है। हमारा मन बड़ा चंचल है। ये हमें जगह जगह भटकता रहता है और हम आदतन इसके गुलाम बन जाते हैं। फिर हम किसी भी चीज पर ज्यादा देर तक ध्यान देने के काबिल ही नहीं रहते। अपने मन को एक मालिक की तरह इस्तेमाल कर पाने के लिए यह तकनीक बनाई है।

ध्यान: किसी चीज का ज्ञान भर हो जाने से हम उसे इस्तेमाल में नहीं ला पाते। हमें हर समय इस बात का अहसास भी होना चाहिए कि ये ज्ञान या विद्या जो हमारे पास है उसे अपने जीवन में प्रयोग के लिए उतारें। निरंतर इस बात को ध्यान में रखना ही ध्यान है। परोक्ष रूप से इसे ईश्वर का ध्यान बताया गया है पर वास्तव में यह विवेकपूर्ण (और विचार शून्य) जीने की कला है। इस अवस्था में रहने पर हमारे अधिकतर कार्य चेतन मस्तिष्क से परिचालित होते है अचेतन मस्तिष्क से नहीं (सामान्य लोगों की तरह)।

समाधि: योग की अंतिम अवस्था समाधि है। यह शब्दों से परे एक परम-चैतन्य की अवस्था है। स्वयं की आत्मा से जुड़ कर परमात्मा बनने का कार्य यहाँ संपन्न होता है।


लेखक परिचय

रुड़की विश्विद्यालय (अब आई आई टी रुड़की) से इंजीयरिंग की और २२ साल तक भारतीय सेना की ई.ऍम.ई. कोर में कार्य करने के बाद ले. कर्नल के रैंक से रिटायरमेंट लिया . चार निजी क्षेत्र की कंपनियों में भी कुछ समय के लिए काम किया।

पढने के शौक ने धीरे धीरे लिखने की आदत लगा दी । कुछ रचनायें ‘पराग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘अमर उजाला’, ‘नवनीत’ आदि पत्रिकाओं में छपी हैं।

भाल्व पब्लिशिंग, भोपाल द्वारा 2016 में "योग मत करो,योगी बनो' नामक पुस्तक तथा एक साँझा संकलन ‘हिंदी की दुनिया,दुनियां में हिंदी’ (मिलिंद प्रकाशन ,हैदराबाद) प्रकाशित हुयी है।

कादम्बिनी शिक्षा एवं समाज कल्याण सेवा समिति , भोपाल तथा नई लक्ष्य सोशल एवं एन्वायरोमेन्टल सोसाइटी द्वारा वर्ष २०१६ में 'साहित्य सेवा सम्मान' से सम्मानित किया गया।

वर्ष 2009 से ‘मेरे घर आना जिंदगी​’ ​(http://meregharanajindagi.blogspot.in/ ​) ब्लॉग के माध्यम से लेख, कहानी , कविता का प्रकाशन। कई रचनाएँ प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं तथा वेबसाइट (प्रतिलिपि.कॉम, रचनाकार.ऑर्ग आदि) में प्रकाशित हुई हैं।

साहित्य के अनेको संस्थान में सक्रिय सहभागिता है । राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई गोष्ठियों में भाग लिया है। अंग्रेजी में भी कुछ पुस्तक और लेख प्रकाशित हुए हैं।

निवास : सिकंदराबाद (तेलंगाना)

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन

संपर्क​ : coldeepakdixit@gmail.com

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