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ललित निबंध - गोलार्थ - डा. सुरेन्द्र वर्मा

गोलार्थ

डा. सुरेन्द्र वर्मा

गोल का अर्थ क्या है ? एक हो तो बताएं। यों तो पूरी धरती ही गोल है। आकाश भी गोल ही है। तभी तो उसे आकाश-मंडल कहते हैं। मिट्टी का घड़ा भी गोल ही होता है। कहा यह जाता है , जो भी गोल गोल है, अस्पष्ट है। लेकिन न तो घड़े का वजूद अस्पष्ट है और न ही गेंद का जो, ज़ाहिर है, गोल ही होती है। फिर भी गोल गोल बात करना उतना ही गलत है जितना उसका गोलमाल हो जाना। आप क्या कहना चाहते हैं, पता ही नहीं चलता। पर लोग बातों की गोलंदाजी से बाज़ नहीं आते।

लोग गोल मेज़ पर बैठकर अपने विवाद सुलझाने की कोशिश करते हैं। नही सुलझने पर, धीरे से खिसक लेते हैं , गोल हो जाते हैं। कई खेल ऐसे हैं, जैसे फुटबाल या हॉकी, आदि, कि जिनमें जीतने के लिए गोल करना अनिवार्य होता है। गोल खेल का वह स्थान है ( भले ही वह गोल न हो) जहां, और जहां से, गोल दाग़ा जाता है। वहां बेशक गोल कीपर तैनात रहते हैं। वैसे गोल दागने में, ज़ाहिर है, कोई गोलाई या गोला नहीं होता। सिर्फ कहने की बात है।

हाँ, तोप में रखकर जो गोला दागा जाता है वह हलके में नहीं लिया जा सकता। उसमें तो जीवन-मरण का सवाल है। उसका सामना करना बड़े कलेजे का काम है।

पता नहीं योग-आसनों में कोई 'योगासन' है या नहीं पर ज्योतिष का एक योग ‘गोल-योग’ ज़रूर कहलाता है जिसमें एक साथ छः या सात ग्रह एकत्र हो जाते हैं। अब इसका क्या अर्थ है यह तो ज्योतिषाचार्य ही जाने ! ज्योतिर्विद्या का एक अंग विशेष 'गोल -विद्या' कहलाता है। इस गोल विद्या से हम धरती का आकार, विस्तार और गति आदि जानने की कोशिश करते हैं। बड़ी तकनीकी बात है। इसे विशेषज्ञ ही समझते हैं।

वह जो वृत्ताकार है, गोल है। बच्चे अपनी गुल्लक (गोलक ) में पैसे इकट्ठे करते हैं, जो अधिकतर बच्चों के काम तो नहीं आ पाते पर ज़रूरत पड़ने पर बड़े लोग उनका उपयोग करने में हिचकिचाते नहीं हैं।

मिर्च तो मिर्च है। हरी हो या लाल। फर्क नहीं पड़ता। एक लोक गीत में हरी मिर्च डालने के लिए मना किया गया है - " हरी मिर्चें ततय्या ज़ालिम ना डालो रे।" लेकिन एक मिर्च 'गोल-मिर्च' भी होती है। वह हरी या लाल न होकर काली होती है। काली - मिर्च स्वास्थ्य के लिए अच्छी मानी गई है। ( गोल जो है ! )

आजकल लोग अपनी ज़रा ज़रा सी बात मनवाने के लिए गोल-बंद हो जाते हैं। हमारी मांगें पूरी हों का नारा बुलंद करते हैं। गोल बंद हो जाने का अर्थ इकट्ठा हो जाने से कैसे लगा लिया गया, यह शब्द -शास्त्रियों केलिए शोध का विषय हो सकता है । पर लोग गोलबंद होते हैं इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

जो लोग बर्तनों पर नक्काशी आदि करते हैं, उनके पास एक विशेष प्रकार की कलम या कहें, छेनी होती है। इसे गोल-कलम कहा जाता है। यह कलम गोल तो हरगिज़ नहीं होती है। पर इसे गोल-कलम क्यों कहा गया है, कोई नहीं जानता।

गोल को आप हलके में हरगिज़ न लें। गोल है तो गोलाई है। गोल है तो गोलक है , गोल है तो गोलोक है। गोल है तो गोली है : वही खट्टी-मीठी गोली जिसे बच्चे बड़े स्वाद से खाते हैं। गोल हैं तो लड्डू हैं । लड्डू गोपाल हैं। गोल है तो हथगोले हैं , जिन्हें फेंककर हम डराते हैं।

-डा सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आईजी

१, सरकुलर रोड , प्रयागराज

आलेख 2904289366603162768

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