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कहानी "अरे, ओ बुड़भक बंभना" का पुनर्पाठ

(इंटरनेट पर गद्यकोश में संकलित अत्यंत मार्मिक कहानी "अरे, ओ बुड़भक बंभना" का पुनर्पाठ)

कहानी : अरे! ओ बुडबक बंभना

लेखक : डॉ मनोज मोक्षेन्द्र

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समीक्षक : नितिन चौरसिया (शोध-छात्र, लखनऊ विश्वविद्यालय)

सामाजिक समरसता के लिए मानसिक बदलाव आवश्यक है

मनोज मोक्षेन्द्र जी की कहानियों में जो उद्देश्यपरकता होती है उसको ही कायम रखते हुए सामाजिक उत्थान और राजनीति पर लिखी गयी ये कहानी जात-पात, ऊँच-नीच, गरीब-अमीर, और ग्रामीण परिवेश में होने वाली सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के साथ घालमेल को दर्शाती हुयी मानवीय किरदारों का समावेश करती है और इस बात पर दृष्टिपात करवाती है कि हमारा समाज जात-पात की कुंठा से किस तरह से ग्रसित हो चुका है| यह कहानी बहुआयामी है, पर उद्देश्य एक है |

इस कहानी का मुख्य पात्र है ‘मिसिर जी’| एक ब्राह्मण जो कर्मकाण्ड, पूजा-पाठ, और होम-हवन करवाकर अपना एवं अपने परिवार का पेट पालता था और कहानी की पृष्ठभूमि है एक मुसहर बस्ती | कहानी में मिसिर जी सामाजिक समरसता की भावना को लिए मुसहर बस्ती को अपने नेतृत्व में जहाँ एक ओर देश-समाज से जोड़ने का काम करते हैं, वहीँ दूसरी ओर मुसहर बस्ती का एक उद्दण्ड लड़का ‘हल्कू’, जिसके मामा शहर में राजनीति करते थे, मुसहरों को एवं उनके मुखिया को जाति के चोंगे में बाँध कर मिसिर जी का कट्टर विरोधी बना देता है | इतना ही नहीं, ये कहानी इस बात पर भी ध्यान आकृष्ट करती है कि कैसे समाज में एक समाजोद्धारक को देखा जाता है, अपनी बिरादरी में| मिसिर जी का ब्राह्मणों द्वारा और नाते-रिश्तेदारों द्वारा सामाजिक निष्कासन इस बात को प्रस्तुत करता है|

कहानी के बीच में ही इस बात का जिक्र होना कि ‘मुसहरों के लिए जो कपाट मिसिर जी ने खोले थे, उसमें रोशनी के साथ-साथ एकाध धुएं की लकीरें भी खिंची हुयी थी इस बात का द्योतक है कि सुख-समृद्धि के साथ ही क्लेश की फसल भी हरी होने लगती है | अतएव कहानी का अर्द्धांश लेखक ने भी यहीं से आरम्भ किया है|

लेखक ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि घटनाओं का क्रम पाठक को बाँध कर रखे और आने वाली घटना के बारे में जिज्ञासु बनाये| उन्होंने इस बात का जिक्र बड़ी कुशलता से किया है कि कैसे मिसिर जी ने मुसहरों की बस्ती में अपनी जगह बनायीं और फिर उनकी भलाई के लिए सरकारी विभागों में दौड़-धूप की| उसके बाद मुसहर समाज को अपने गले लगाकर, उनके साथ बैठकर उनकी भलाई की बात करने लगे| दो बार मुसहरों के श्रमदान से उस बस्ती का कायाकल्प हो जाना और सरकारी सुविधाओं का मुसहरों तक पहुँचना मिसिर जी की मेहनत और लगन का ही नतीजा था| मुसहरों के बीच मिसिर जी की अहमियत का अंदाजा कहानी के इन वाक्यों से लगाया जा सकता है –

‘मिसिर जी और उनका परिवार मुसहरों के सामाजिक जीवन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता, शादी-ब्याह के आयोजनों का बंदोबस्त वह खुद करते, तीज-त्योहार की विधियाँ बताते, उनके बीच उत्पन्न मनमुटाव और झगडे-फसाद में हस्तक्षेप कर निपटारा करते’, और ‘मुसहर जन अम्बेडकर गाँव के सुनहरे भविष्य की कामना करते, वे मिसिर जी को देवता और मसीहा से कम न मानते...’

कहानी के दूसरे अर्द्ध भाग में लेखक ने पात्र ‘हल्कू’ के माध्यम से उसी धुएं की लकीर को गहरा होता हुआ दर्शाया है जो अंततः मिसिर जी के जीवन के घने अन्धकार और विपत्ति के बादलों को लाने का कार्य करते हैं| हल्कू का अपने मामाजी के साथ अचानक चले जाना और वापस लौटने के बाद गंभीर रहना, जाति और भेदभाव को पुनः स्थापित करना और मिसिर जी को मुसहरों के बीच से बेदखल करने को तत्पर रहना, मुसहरों के बीच मिसिर जी के लिए जो सम्मान का भाव था उसको तिरस्कार में परिणित करना| हल्कू इस काम में सफल भी हो जाता है| उदाहरण के लिए,

हल्कू का वाक्य - ‘बाँभन देउता कुछ नहीं होता | न उसके सरापने से कोई मरता है....’

मिसिर जी का वाक्य –‘हम दलितों से भी दलित हो गये हैं | अब तो भूखों मारने की नौबत आ गयी है...’

कहानी का एक और अंश है जिसमें लेखक ने मिसिर जी के मुसहर बस्ती में रहने के पीछे के कारणों का जिक्र किया है| सामाजिक मंचों पर आकर अन्तरजातीय विवाहों को प्रोत्साहन हमारे समाज में दिया तो जरूर जाता है पर इसका परिणाम अपनी बिरादरी से बेदखल हो जाने से नीचे कुछ नहीं होता| लेखक ने इसका जिक्र बिना किसी लाग-लपेट के मिसिर जी की बहन मधुरिया और रमई तेली के भागकर विवाह करने की घटना के माध्यम से किया है| शिक्षित मधुरिया ने सामाजिक परिवर्तन का ज़िम्मा अपने अन्तरजातीय ब्याह से करने की ठान ली थी; सो रमई तेली के साथ भाग गयी| ब्याह कर लिया| पर, सामाजिक बहिष्कार के शिकार हुए ख़ुद मिसिर जी|

लेखक ने कहानी के साथ कोई समझौता न करते हुए इसे आगे बढ़ाया और मुसहरों के मुखिया लक्खू और हल्कू के बीच के संवाद को प्रस्तुत किया, जो इस बात का प्रमाण है कि जातिगत कुंठा से ग्रसित मनुष्य अपने हित और अहित करने की बात करने वालों में भेद करना भूल जाता है| सो, हल्कू की बातों में लक्खू कैसे न आ जाता? मिसिर जी को अनहोनी की खबर हो गयी थी और उन्होंने उस बस्ती को छोड़कर काशी भागने का मन भी बना लिया था पर होनी को टाला नहीं जा सका| मिसिर जी को हल्कू और गाँव के अन्य मुसहरों का भेदभाव-भरा रवैया सहन न हो सका| उन्होंने पानी लाने गयी बिटिया की बाल्टी में खखारकर थूकने पर एक मुसहर पर हाथ उठा दिया और उसके बाद उस दिन रात तो हुयी पर मिसिर जी के परिवार में उस रात की सुबह नहीं हुयी |

लेखक ने संवादों में कहीं भी भावों को पीछे नहीं छोड़ा है| यथा –

‘मिसिर जी के होश तभी फाख्ता हो गये थे...’

‘मिसिर जी ने करवट बदलकर सोने की असफल कोशिश की...’

‘हमलोग भी एकदम्मै उकता गये हैं...’

‘बाउजी! कलिहे चलिए न...’

‘अब हमलोग जिन्दा नहीं बचेंगे...’

‘उनकी जुबान तलवे से चिपक गयी|

‘जिन्दा जला दिये जाने का भय जिसके मन में भायं-भांय कर रहा हो...’

अंततः यह कहानी जातिबंधनों में जकड़े हुए समाज को इन बेड़ियों से मुक्त करने के प्रयासरत उपायों का सामाजिक रूप से चित्रण करते हुए उनके जमीनी स्तर की हकीक़त को पाठक के समक्ष रखती है | साथ ही, यह कहानी इस बात पर भी ध्यान आकृष्ट करती है कि सामाजिक समरसता के पथ को आगे बढ़ाने के लिए मात्र एक व्यक्ति की मानसिकता बदलने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा| सामाजिक परिवर्तन के लिए सामाजिक स्वीकार्यता अति आवश्यक है| उसके साथ-साथ, आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा भी| अतः जब तक ये चारों समाज के एक-एक व्यक्ति को नहीं प्राप्त होते तब तक इस समाज को जातिबंधन से मुक्त करने का कोई भी प्रयास असफल ही होगा और समाज में समरसता की बजाय वैमनष्यता ही पनपेगी|

(समाप्त)

नितिन चौरसिया,

Nitin Chaurasiya

B1/35 Sector G

Aliganj Lucknow

PIN - 226024

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जीवन-चरित

लेखकीय नाम: डॉ. मनोज मोक्षेंद्र {वर्ष 2014 (अक्तूबर) से इस नाम से लिख रहा हूँ। इसके पूर्व 'डॉ. मनोज श्रीवास्तव' के नाम से लेखन}

वास्तविक नाम (जो अभिलेखों में है) : डॉ. मनोज श्रीवास्तव

पिता: (स्वर्गीय) श्री एल.पी. श्रीवास्तव,

माता: (स्वर्गीया) श्रीमती विद्या श्रीवास्तव

जन्म-स्थान: वाराणसी, (उ.प्र.)

शिक्षा: जौनपुर, बलिया और वाराणसी से (कतिपय अपरिहार्य कारणों से प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित रहे) १) मिडिल हाई स्कूल--जौनपुर से २) हाई स्कूल, इंटर मीडिएट और स्नातक बलिया से ३) स्नातकोत्तर और पीएच.डी. (अंग्रेज़ी साहित्य में) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से; अनुवाद में डिप्लोमा केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो से

पीएच.डी. का विषय: यूजीन ओ' नील्स प्लेज़: अ स्टडी इन दि ओरिएंटल स्ट्रेन

लिखी गईं पुस्तकें: 1-पगडंडियां (काव्य संग्रह), वर्ष 2000, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 2-अक़्ल का फलसफा (व्यंग्य संग्रह), वर्ष 2004, साहित्य प्रकाशन, दिल्ली; 3-अपूर्णा, श्री सुरेंद्र अरोड़ा के संपादन में कहानी का संकलन, 2005; 4- युगकथा, श्री कालीचरण प्रेमी द्वारा संपादित संग्रह में कहानी का संकलन, 2006; चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह), विद्याश्री पब्लिकेशंस, वाराणसी, वर्ष 2010, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 4-धर्मचक्र राजचक्र, (कहानी संग्रह), वर्ष 2008, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 5-पगली का इंक़लाब (कहानी संग्रह), वर्ष 2009, पाण्डुलिपि प्रकाशन, न.दि.; 6.एकांत में भीड़ से मुठभेड़ (काव्य संग्रह--प्रतिलिपि कॉम), 2014; 7-प्रेमदंश, (कहानी संग्रह), वर्ष 2016, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 8. अदमहा (नाटकों का संग्रह) ऑनलाइन गाथा, 2014; 9--मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में राजभाषा (राजभाषा हिंदी पर केंद्रित), शीघ्र प्रकाश्य; 10.-दूसरे अंग्रेज़ (उपन्यास); 11. संतगिरी (कहानी संग्रह), अनीता प्रकाशन, ग़ाज़ियाबाद, 2017; चार पीढ़ियों की यात्रा-उस दौर से इस दौर तक (उपन्यास) पूनम प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, 2018; 12. महापुरुषों का बचपन (बाल नाटिकाओं का संग्रह) पूनम प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, 2018; चलो, रेत निचोड़ी जाए, नमन प्रकाशन, 2018 (साझा काव्य संग्रह) आदि

संपादन: महेंद्रभटनागर की कविता: अन्तर्वस्तु और अभिव्यक्ति”

संपादन: “चलो, रेत निचोड़ी जाए” (साझा काव्य संग्रह)

--अंग्रेज़ी नाटक The Ripples of Ganga, ऑनलाइन गाथा, लखनऊ द्वारा प्रकाशित

--Poetry Along the Footpath अंग्रेज़ी कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य

--इन्टरनेट पर 'कविता कोश' में कविताओं और 'गद्य कोश' में कहानियों का प्रकाशन

--वेब पत्रिकाओं में प्रचुरता से प्रकाशित

--महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल, वर्धा, गुजरात की वेबसाइट 'हिंदी समय' में रचनाओं का संकलन

--सम्मान--'भगवतप्रसाद कथा सम्मान--2002' (प्रथम स्थान); 'रंग-अभियान रजत जयंती सम्मान--2012'; ब्लिज़ द्वारा कई बार 'बेस्ट पोएट आफ़ दि वीक' घोषित; 'गगन स्वर' संस्था द्वारा 'ऋतुराज सम्मान-2014' राजभाषा संस्थान सम्मान; कर्नाटक हिंदी संस्था, बेलगाम-कर्णाटक द्वारा 'साहित्य-भूषण सम्मान'; भारतीय वांग्मय पीठ, कोलकाता द्वारा ‘साहित्यशिरोमणि सारस्वत सम्मान’ (मानद उपाधि); प्रतिलिपि कथा सम्मान-2017 (समीक्षकों की पसंद); प्रेरणा दर्पण संस्था द्वारा ‘साहित्य-रत्न सम्मान’ आदि

"नूतन प्रतिबिंब", राज्य सभा (भारतीय संसद) की पत्रिका के पूर्व संपादक

"वी विटनेस" (वाराणसी) के विशेष परामर्शक, समूह संपादक और दिग्दर्शक

'मृगमरीचिका' नामक लघुकथा पर केंद्रित पत्रिका के सहायक संपादक

हिंदी चेतना, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, कथाक्रम, समकालीन भारतीय साहित्य, भाषा, व्यंग्य यात्रा, उत्तर प्रदेश, आजकल, साहित्य अमृत, हिमप्रस्थ, लमही, विपाशा, गगनांचल, शोध दिशा, दि इंडियन लिटरेचर, अभिव्यंजना, मुहिम, कथा संसार, कुरुक्षेत्र, नंदन, बाल हंस, समाज कल्याण, दि इंडियन होराइजन्स, साप्ताहिक पॉयनियर, साहित्य समीक्षा, सरिता, मुक्ता, रचना संवाद, डेमोक्रेटिक वर्ल्ड, वी-विटनेस, जाह्नवी, जागृति, रंग अभियान, सहकार संचय, मृग मरीचिका, प्राइमरी शिक्षक, साहित्य जनमंच, अनुभूति-अभिव्यक्ति, अपनी माटी, सृजनगाथा, शब्द व्यंजना, साहित्य कुंज, मातृभाषा डॉट कॉम वैचारिक महाकुम्भ, अम्स्टेल-गंगा, इ-कल्पना, अनहदकृति, ब्लिज़, राष्ट्रीय सहारा, आज, जनसत्ता, अमर उजाला, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, कुबेर टाइम्स आदि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, वेब-पत्रिकाओं आदि में प्रचुरता से प्रकाशित

आवासीय पता:--सी-66, विद्या विहार, नई पंचवटी, जी.टी. रोड, (पवन सिनेमा के सामने), जिला: गाज़ियाबाद, उ०प्र०, भारत. सम्प्रति: भारतीय संसद में संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत

  ई-मेल पता: drmanojs5@gmail.com

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