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संस्मरण - मेरी छात्राएं - डॉ. पद्मजा शर्मा

मेरी छात्राएं

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डॉ. पद्मजा शर्मा

किसी शिक्षिका के लिये अपनी छात्राओं के साथ सहेलियों सा व्यवहार कितना सुखदायी होता है ? इसका अनुमान आप पद्मजा के इस आलेख से लगा सकते हैं। कक्षा में छात्राओं की मनः स्थिति के अनुसार अध्यापन में नये-नये रंग भरते हुए खासा लचीलापन रखने का काम कोई सधा हुआ अध्यापक ही कर सकता है।

अध्यापन साधना है और आनन्द भी। इसमें केवल डूबने, उतरने की आवश्यकता होती हैऔर तभी कोई अध्यापक अपने अध्यापन को एक सृजनात्मक क्रिया में बदल सकता है। वैसे भी अध्यापन अपने आप में एक सृजनात्मक क्रिया है। यह काम न नीरस है न बोझिल। आपसी रिश्तों में रस घोलने की सामर्थ्य रखने वाला अध्यापक इस काम को आनन्ददायी बना सकता है और अपने लिये एक अप्रतिम जीवनानुभव ।

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आज आपसे एम.ए. की पत्रकारिता की क्लास व छात्राओं की बात करूंगी। मैं अपनी छात्राओं को पैंतालीस मिनट के पीरियड में कुल मिलाकर पैंतीस मिनट सिलेबस के अनुरूप पढ़ाई कराती थी और उन्हें पढ़ाने के लिए खुद भी पढ़ती थी। आप आश्चर्य करेंगे कि कब कक्षा का समय पूरा हो जाता पता ही नहीं चलता था न लड़कियों, को न मुझे। यह अलग बात है कि मैं घंटी बजते ही किताब बंद कर देती थी। मैं नहीं चाहती थी कि अगले पीरियड वाले टीचर को इंतजार करवाया जाये। मेरा वर्ष भर का निर्धारित सिलेबस समय से पहले ही पूरा हो जाता था और छात्राओं की उस विषय में कोई शिकायत कभी नहीं आयी और उन्हें कोई दिक्कत भी नहीं हुई। न नोट्स की न विषय को समझने की।

छात्राएं चाहती थीं कि उन्हें समझाने के साथ ही विषय के नोट्स भी मिलें। मैं थोड़ा समझाकर नोट्स देती और कभी कोई समस्या आती तो भी किसी एक दिन बैठ कर सारी समस्याओं का समाधान कर देती। छात्राओं को इस विषय में अंक भी आनुपातिक दृष्टि से अन्य विषयों से अधिक ही आते थे। पत्रकारिता में यूं तो विषय विशेष पर कई किताबें मिल जाती हैंपर अच्छी सामग्री कम ही मिलती है। अधिकतर किताबों में दोहराव ही होता है। मौलिक सामग्री की गुंजाइश बहुत कम होती है। मैं कई महत्त्वपूर्ण पुस्तकें खोज खोज कर पढ़ती और नोट्स बनाती थी। यह मेरी आदत है कि कोई काम करो तो मन-मस्तिष्क लगाकर करो। वरना हाथ जोड़ लो।

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मैं अपने लेक्चर के बीच-बीच में छात्राओं को उनके सपनों के बारे में, उनकी पसंद-नापसंद के बारे में, घर के बारे में, आर्थिक परिस्थितियों के बारे में, उनकी मुश्किलों-परेशानियों के बारे में पूछती रहतीथी। उनमें छिपी प्रतिभा को भी मैं टटोलती और तलाशती रहती थी। उनसे कुरेद-कुरेद कर बातचीत करती थी। यह बातचीत सर्वथा अनौपचारिक और आत्मीय होती थी। कक्षा से बाहर और खुले आसमान के नीचे; उनके साथ बैठकर। छात्राएं घुल मिल जाती थीं। संवाद यहां भी शुरु हो जाता था।

कई दृष्टांत और कई उद्धरण याद आते थे। आजादी की लड़ाई में किन हिन्दी पत्रों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आवाज उठायी ? हिन्दी का पहला समाचार पत्र कौन सा था आदि का उल्लेख यदि सिलेबस में था तो मैं छात्राओं से पूछती कि आप कौनसा पत्र या पत्रिकाएं पढ़ती हैं ? नहीं पढ़ती हैं तो ये पत्रिकाएं पढ़ना शुरू कीजिए, उनमें क्या अच्छा लगता है। फिर यह भी पूछती कि किस कॉलम में रुचि है। किस विधा में दिलचस्पी है जैसे कोई कहती हम कहानी पढ़ते हैं। कोई कहती कि मैं कविता पढ़ती हूं। फिर आगे यह सवाल होता कि पढ़ती हैं तो कुछ लिखती भी होंगी जैसे कि डायरी, कविता, कहानी, कोई अविस्मरणीय घटना वगैरह तो लड़कियां पहली बार संकोच करतीं बताने में, पर थोड़ा मोटिवेट करने पर बताती थीं कि, हां हम डायरी लिखते हैं; कि कविता लिखते हैं; कि कहानी लिखना चाहते हैं।

लिखना बहुत लड़कियां चाहती थीं पर उनके पास भावों के अनुरूप भाषा नहीं होती थी। इच्छा के होते हुए भी उनके विचार, भाव मन में ही दबे रह जाते थे। मैं उन्हें तब बताती कि आप साहित्य से अपनी रुचि की विधा से जुड़ी पत्रिकाएं पढ़ें, समाचार पत्र में यह कॉलम पढ़ें, फलां लेखक की फलां रचना पढ़ें कुछ समय बाद उनसे फिर पूछती किस- किस ने क्या पढ़ा, नहीं पढ़ा तो पढ़ें। अगर क्लास में पच्चीस लड़कियां हैं तो उनमें कम से कम पांच छः लड़कियां साल की आखिर तक अपनी प्रतिभा, अपनी कहानी, कविता के साथ जरूर सब के सामने आतीं। वे अपने सिलेबस के अनुरूप पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान देती थीं। हम बारी-बारी उनसे वे रचनाएं क्लास में जरूर सुनते। इससे मुझे उनके रुझान और उनकी मनः स्थिति को जानने में भी मदद मिलती थी।

उन्हें भी यह लगता था कि वे औरों से थ़ोडी अलग हैं। उनकी सब के बीच में बोलने की झिझक भी कम होती। साल में संबंधित विधा पर प्रतियोगिता भी करवाती थी। इनाम मिलने से उनका उत्साह भी बढ़ता था। साल के खत्म होते होते तो वे लड़कियां खुलकर उस विषय पर बातचीत भी करती थीं। एक लड़की ने एक दिन कहा कि वह अपनी कविता नहीं सुना सकती। मैंने पूछा क्यों ? उसने झिझकते हुए बताया कि वह प्रेम को लेकर है तो मैंने उसे बताया कि बड़े से बड़ा कवि भी सबसे पहली रचना प्रेम पर ही लिखता है। प्रेम जीवन में है तो इसमें शर्म की कौनसी बात है। यह तो सामान्य क्रिया है जो बताती है कि हम एक सामान्य इंसान हैं। हमारे कवि तो कहते हैं कि वियोगी होगा पहला कवि। आह से उपजा होगा गान। कविता का हृदय से, हृदय का प्रेम से संबंध है जिसे कोई नहीं नकार सकता। बड़े बड़े कवि भी । तो प्रेम कविता लिखना अपराध नहीं है। यह बहुत ही सहज है।

कोई लड़की चाहती थी कि उसे स्कूल में टीचर बनना है तो किसी को कॉलेज में पढ़ाने की इच्छा थी। कोई बैंक के एग्जाम देना चाहती थी तो किसी को यह नहीं पता था कि स्लैट, क्लैट, नैट की एग्जाम कैसे दी जाती है? कहां उनकी तैयारी कराई जाती है ? किस किताब से पढ़ें? किस टीचर से गाइडेंस लें तो उन्हें इस तरह की बातें भी मैं अपनी क्लास में बताती रहती थी। क्लास के बाद कभी कभी फोन पर भी उनकी उलझनें सुलझाती थी।

तब एक ही सोच रहती थी कि इस तरह से पढ़ाया जाए कि छात्राओं को बोरियत न हो। विषय के ज्ञान के साथ ही जीवन में आगे बढ़ने की राह खोजना भी आसान हो। इस तरह की कोशिश भी मैं करती थी। मैं सदा चाहती थी कि छात्राएं मुझे कहें कि आप क्लास कब ले रही हैं कि हमारा फलां फलां पीरियड खाली है क्या आप यह पीरियड भी इंगेज कर सकती हैं ? मैं हमेशा यह चाहती और सोचती थी कि मैं कुछ इस तरह क्लास में खुद को प्रेजेंट करूं कि छात्राओं को लगे कि मैं उनकी दोस्त जैसी हूं । वे बहुत ज्यादा दूरी महसूस ना करें। लेकिन एक निश्चित दूरी भी बनाए रखें जिसके तहत वे मेरी कही जरूरी बातों का खयाल रखें ।

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समय-समय पर अचानक लिए गए टेस्ट भी दें, कभी-कभी तैयारी के साथ भी दें। इसके लिए उनकी मानसिकता को समझना जितना जरूरी होता है उतना ही यह भी जरूरी होता है कि वे आप में यकीन करें और आप उन्हें खुद में यकीन करवाएं और यह भी उन्हें लगना चाहिए कि आप कुछ कुछ उन जैसी ही हैं। अगर मैं आज कॉलेज में टीचिंग कर रही हूं तो ये भी कल यह काम कर सकती हैं। बस थोड़े जुनून की, मेहनत की, ईमानदारी की, जरूरत है। जरूरत है विषय के ज्ञान की । रटना जरूरी नहीं, समझना ज्यादा जरूरी है।

वे क्लास में आपके आदेशों की, निर्देशों की पालना करेंगी पर पहले आपको विश्वास जगाना होता है । इसके लिए एक बार मैंने उन्हें अपनी एक कमजोरी भी उनके साथ बांटी कि मुझे सन् याद नहीं रहते। एक दिन सारे पत्रों के नाम सन् सहित बताए फिर लिखवाए।

उस दिन एक लड़की बड़ी मायूस होकर लेक्चर समाप्त होने के बाद मेरे पास आयी और बोली मैम हम भी आपके जैसे लेक्चरर बनना चाहते हैं पर यह संभव नहीं हो सकता। हम बन नहीं सकते। कम से कम आपके जैसे तो नहीं। मैंने पूछा ऐसा क्यों कहा और क्यों सोचा आपने ? उस लड़की ने बड़ी मासूमियत से कहा मैम आपको इतने नाम और सन् याद रह जाते हैं। हमें तो ये सन् याद ही नहीं रहते हैं। आज याद किये भूल गये इस डर से तो हमने इतिहास विषय नहीं लिया वरना उसमें हमारी रुचि कम न थी। तब मैंने उसे समझाया कि मैं तो जब क्लास में आती हूं तब आप लोगों के लिए याद कर के आती हूं वरना सन् तो मुझे भी कहां याद रहते हैं। चार दिन बाद पूछोगे तो मेरी भी हालत आपके जैसी ही होगी। तब मैंने उसे कहा कि आप एक दिन मुझसे अच्छी टीचर साबित होंगी यह मैं अपने अनुभव से कहती हूं क्योंकि आपको अपनी कमजोरी का अहसास है। तब उसने यह निश्चय किया कि वह लेक्चरर ही बनेगी। उसका खोया उत्साह लौट आया वह पहले से ज्यादा रुचि से पढ़ने लगी।

असल में तब मेरे पास समय की कमी रहती थी। मैं छात्राओं को जिस समय क्लास के लिए बुलाती वे आती थीं। पीरियड लगातार पढ़ाती तो भी शौक से पढ़ लेती। मैं उन्हें यह अहसास कराती कि वे मेरे लिए खास हैं । मैं जानती थी कि उन्हें मेरी क्लास में पढ़ने में आनंद आता था। उन्हें पढ़ने में आनंद इसलिए आता था कि मुझे पढ़ाने में आता था। मुझे इसलिए आता था कि मैं उन्हें पढ़ाने के लिए पढ़ती थी। वे बहुत अच्छी, प्यारी न्यारी छात्राएं थीं। उनकी यादें जुगनुओं- सी मेरे जीवन में चमकती रहती हैं।

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जोधपुर

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(अनौपचारिका - फरवरी 2012 से साभार प्रकाशित)

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