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मनीषा 'शिखर' की ग़ज़लें

ग़ज़लें

(1.)

चलता हमारे सँग-सँग बस ग़म का कारवां है
सागर किनारे घर है और रेत का मकां है

धरती है तेरी प्यासी, बैठा तू मेघ लेकर
ये क्यूँ नहीं बरसते कैसा तू आसमां है!

ये कौन आज गुज़रा इस दिल की रहगुज़र से
धड़कन में जाने किसके क़दमों का ये निशां है

होना है पास मुझको मैं पढ़ रही हूँ तुझको
मालूम है मुझे ये उल्फ़त का इम्तहां है

लिखती है ये 'शिखर' जो इक बार पढ़ तो इसको
ये तेरी दास्तां है, ये मेरी दास्तां है

-मनीषा 'शिखर'
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(2.)

चाँद की निकली सवारी रात भर
बस वही मैंने निहारी रात भर

याद को तेरी बनाकर आइना
है ग़ज़ल मैंने सँवारी रात भर

नींद आँखों से अलग फिरती रही
पास थी बस बेक़रारी रात भर

रौशनी ख़ामोश यूँ बैठी मिली
चीज़ हो जैसे उधारी रात भर

तीरगी तलवार ले लड़ती रही
पर 'शिखर' तेरी न हारी रात भर

-मनीषा 'शिखर'
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(3.)

उल्फ़त का ज़माने में इतना ही फ़साना है
इक आग है ये जिसमें ख़ुद को ही जलाना है

इन प्यार की नज़रों को पलकों में छुपा लो तुम
चाहत का यहाँ दिलबर! दुश्मन ये ज़माना है

जो चीज़ यहाँ अपनी,उसपे भी न हक़ अपना
सीने में है जो अपने, वो दिल भी बिराना है

जो अश्क मिले मुझको, तोहफ़ा है मुहब्बत का
दुनिया की निगाहों से तोहफ़ा ये छुपाना है

उल्फ़त के जनाज़े पर क्यूँ आए 'शिखर' कोई
ये ख़ुद ही सजाना है, औ' ख़ुद ही उठाना है

-मनीषा 'शिखर'
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(4.)

टूटे हुए इस दिल का इतना ही इशारा है
तोड़ा है मुझे जिसने वो जान से प्यारा है

दहलीज़ पे बैठी हूँ चाहत का दिया बाले
तेरी ही इबादत में जीवन ये गुज़ारा है

मझधार में है कश्ती, तूफ़ान खड़ा सर पर
कैसे मैं भला पहुँचूँ तू मेरा किनारा है

ज़ालिम है जहां सारा, है कौन भला किसका
मैं तेरा सहारा हूँ, तू मेरा सहारा है

इक बार लिपट जाएँ जाकर तेरे सीने से
मत पूछ 'शिखर' कब से अरमां ये हमारा है

-मनीषा 'शिखर'
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(5.)

अपनी नज़रों से नज़रे-इनायत ही कर
कौन कहता है तुझसे, मुहब्बत ही कर

क्या मिला, क्या नहीं, सोचना छोड़ दे
यार को मान रब तू इबादत ही कर

लूटने के लिए हैं ये आँसू खड़े
अपने ख़्वाबों की इनसे हिफ़ाज़त ही कर

कौन उसका यहाँ पर है तेरे सिवा
अपने महबूब की तू हिमायत ही कर

ऐ 'शिखर' कर फ़ना ख़ुद को उसके लिए
जो भी करना है तू उसकी बाबत ही कर

-मनीषा 'शिखर'

तुम से तुम्हीं तक (ग़ज़ल-सँग्रह) से

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गोविंदपुरी,मोदीनगर,जिला- गाज़ियाबाद (यू.पी) 201201

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