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किवड़ीया - मूल लेखिका – डॉ॰ हिमांशी शेलत - अनुवादिका - डॉ॰ रानू मुखर्जी

किवड़ीया

मूल लेखिका – डॉ॰ हिमांशी शेलत


अनुवादिका - डॉ॰ रानू मुखर्जी

“मूई, ऐसी की ऐसी ही मरने वाली है, आज चार दिन हो गए तेरे पेट में चुभ नहीं रहा है क्या? ये सारे कितनी मज़े से जाती है दिखता नहीं, तू अकेली ही बड़ी शर्मवाली आई है.....

माँ को बडबडआती देख सावली बड़ी मुश्किल से उठ खड़ी हुई, दो दिन पहले ही उसे तेज बुखार था, नाले के उस पार जाने के नाम से ही उसके हाथ पाँव ठंडे हो जाते हैं। कीचड़ वाला फिसलन भरा रास्ता, गंदे पानी के गड्डों से बचते-बचाते दूर झाड़ियों के पीछे तक जाना पड़ता है। वहाँ फिर लोगों के पाँव तले मसली हुई कीचड़ से लिथड़ी घास, ऐसे में सही जगह ढूंढकर बैठना भी - - - । कभी पैरों में केंचुए लिपट जाते हैं और कहीं मेंढक फुदकता हुआ दिखता है तो चींख निकाल जाती है। आँख मूंदकर जान हथेली पर लेकर निपटना पड़ता है। पता नहीं कैसे सावंती और देवु को इसमें कुछ भी खराब नहीं लगता है। जगह देखी और फट से बैठ गई।

“जगह दिखते ही बैठ जाना, कीचड़, फांदकर दूर तक नहीं जाना समझी, यहाँ ताकने के लिए किसे फुर्सत है - - -“ फिर खीसें निपोरती हुई कहती है, “सब अपना-अपना कर रहे होते है किसके पास वक्त है जो ताक-झांक करेगा - - -।“ सेवन्ती तो है ही नफ़्फ़ट।

अंधेरे को चीरकर भोर का उजाला फूटते ही पगडंडियों में से सरकते हुए साये नज़र आने लगते हैं। ऐसे में मामला बड़ा रहस्यमय लगता तो है पर इसमें कोई दम नहीं होता हैं। नाले के आस-पास में रहने वाले लोग इस ऊबड़-खाबड़ ज़मीन का उपयोग केवल इस काम के लिए ही करते है। इससे किसी को भी कोई फर्क नहीं पड़ता है केवल शर्म की दम सवली को ही खुले खेतों में जाने से डर लगता है।

“सवली की माँ कहती कि इसे भी अपने साथ ले जाओ, पर बाप रे बाप सवली तो बहुत नखरे वाली है, यहाँ नहीं तो वहाँ भी नहीं, आगे और आगे बढ़ते जाओ तो फिर उसे कहीं एक कोना बैठने लायक लगता है”।

“अरी ओ री - - - इतना आगे कहाँ चली, जीव जन्तु चिपक जाएंगे पाँव में - - -।”

ऐसे में सवली को रोकना पड़ता था। झड़ियों के पीछे अपने को छुपाकर बैठी तो थी पर थोड़ी भी आहट हुई नहीं कि फट से उठ खड़ी होती थी। उसे सर पर खुला आसमान तांगा दिखता और नीचे एक छोटा सा गड्ढा खोह जैसा लगता। जब गाँव में रहती थी तो उसका बाबा उसको और बुधिया को बाहर खटिए पर सुला देता था। और रात को एकाएक जब चौंककर जग जाती तो बाबा आस पास कही होते ही नहीं थे। खोली का दरवाजा तो बंद होता। पर दूर से सियारों के रोने की आवाज, नीचे गिरती टहनियों से झरते पत्तों की तेज आवाज, नजदीक की बोडियों के घास में से कुछ सरकने का एहसास लगातार उसे होता रहता। ऐसे में अंधेरा उसे निगल लेगा ऐसा लगता, और सर्दी की ठंडी रात में भी वह पसीने से सराबोर हो जाती। एक बार तो वह डर के मारे दौड़कर दरवाजा पीटने लगी थी और बाबा ने जब निकालकर देखा कि कहीं कुछ भी तो नहीं है फिर उसे ज़ोर का एक थप्पड़ लगाया था। पर उसे उतनी ज़ोर से भी नहीं मारा क्योंकि तभी बाबा गहरी नींद में से उठे थे।

उसके बाद से उसे दरवाजा ठोककर माँ – बाबा को जगाने में देर लागने लगा था और वह ऐसी काली अंधेरी रात को अकेली खाट पर पड़े – पड़े खुली आँखों से ताकती पसीने से सराबोर होती रहती। बुद्धियो तो अभी छोटा है इन सबसे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है, वह तो आराम से सोता रहता है।

यहीं शहर का माहौल ही कुछ अलग है। दिन-रात सारी बस्ती खदबदाती रहती हैं। ऐसे में खुल्ले में ही पानी से भरा डब्बा लटकाते हुए सब - - -। छोटी चाची एक बार उसे पक्के पाखाने में लेकर गई थी। वहाँ जानेवालों की लंबी लाइन होने पर भी एक बात की सहूलियत तो थी कि दरवाजा अंदर से बंद होता था। ये तो अंदर जाने के बाद पता चला कि दरवाजा तो केवल नाम के वास्ते ही था सांकल का तो नामों निशान ही नहीं था। उसने चोटी चाची और पनी से बार-बार यह ध्यान रखने के लिए कहा था कि कोई दरवाजा खोल न दे। पर दोनों तो हंसी ठट्टा में इतना खो गई कि उसकी बात को भूल ही गई और तब एक तगड़े से मुच्छड़ ने धड़ाक से दरवाजे को खोल दिया। वह तो अंदर जम सी गई, फिर उठकर खड़ी हुई तो उसके पैर कांप रहे थे। वो नालायक तो बाहर खड़ा हंस रहा था, आँख मारी हो ऐसा भी लगा। फिर रास्ते में उससे मिलते ही सवली इधर-उधर देखने लगती।

अष्टमी की रात को दयाजीनगर में सिनेमा दिखाया गया। आधी सिनेमा तो नींद के झोखे में बीत गई पर गुलाबी टाइल्सवाले बाथरूम और साबुन के बुलबुलों में लिपटी पारियों के जैसी लड़कियां याद रह गई। सेवन्ती ने कहा कि बंगलों पर के बाथरूम तो ऐसे ही होते हैं। शायद इसीलिए वो बंगलों में काम करने जाती है। यहाँ पर चार खूँटों पर तो इतना घिसा हुआ बोरे का टुकड़ा लटकता रहता है कि कपड़ा खोलकर नहाया ही नहीं जाता। हर वक्त डर लगा रहता है कि कोई देख ले तो या फिर कोई देख न रहा हो। पिछले भाग पर ही कारख़ाना जाने का रास्ता है। लगातार साईकल – स्कूटरों का आना जाना लगा रहता है। निठल्ले छोकरे सीटी बजाते हुए हैरान करते रहते हैं, मवालियों की तरह, इसलिए अंदर होने पर भी ऐसा लगता है कि जैसे खुले में ही लोगों के सामने नहा रहे हों। सेवन्ती और मुमताज़ तो पाँच-छ: महीने पर सर धोती हैं कहती कि इन दिनों में बाहर जाना बहुत झंझट का काम है। अपने को सब रोक कर रखना पड़ता है। फिर वो तो बंगले पर जाती हैं वहीं पर सब निपटा के आती होगी। पनी कहती थी कि उसको भी ऐसा हे होगा। ऐसा ही मतलब हर महीना गंदा-संदा - - फिर तो क्या पता कितना खराब होगा। अभी से ही तो - -।

“इस भोंदू को तो रोज-रोज साबुन चाहिए। कमाने की बात करो तो एक पैसा भी नहीं लाती। घर में भी सबसे ज्यादा नखरे तो इसके ही होते हैं। फिर साबुन भी घासती तो इतना है कि हफ्ते में ही घिसकर चिंदी सी हो जाती है।“

मैदान में मेला लगा है। बस्ती के सारे लोग उस ओर दौड़ रहे हैं। दो-चार दिन से पन्नी और सेवंती उसके पीछे पड़ गई हैं पर माँ की ना तो ना। उसने सोचा माँ सोचती होगी मेले जाएगी तो सवली पाँच रुपया खर्च करके ही आएगी उससे न ही जाए तो अच्छा - - सेवंती के तो उसकी अपनी कमाई के पैसे हैं किसी से पूछने – कहने की उसे जरूरत ही नहीं।

फिर तो माँ मान गई। उसने सुंदर से अपने बाल काढ़े, चेहरे पर पावडर चुपड़ा और सेवंती की उंगली थामकर मेले के भीड़ में घुल मिल गई। जान से पहले माँ ने दस बार कहा कि एक दूसरे का हाथ थामें रहना नहीं तो भीड़ में खो जाओगे। फिर एक दूसरे को ढूँढने में ही रात हो जाएगी। अंधेरा होने से पहले ही आ जाना, एक जगह पर ज्यादा देर तक खड़े मत रहना। चूड़ियों और बिंदियों की लरियों की कतार पर लोग उबाल पड़ रहें थे। ठसाठस भीड़ और शोर गुल से भरा माहौल। समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। भागमभाग और लोगों का चीखना भी सुनाई नहीं दे रहा था। खड़े-खड़े वह रोने-रोने को हो गई कि किसी भली औरत ने उसका हाथ थाम लिया। भीड़ में से उसे संभालकर बाहर खींच लाई और उसके बारे में पूछ-ताछ करने लगी।

“दयालजीनगर? चल छोड़ आऊँ, डर मत”। भीनी आँखों को कोरे फ्रॉक से पोंछकर वह उस औरत के साथ चलने लगी। रिक्शे में बैठने के बाद औरत ने कहा, “पहले जरा घर जा कर बता दे, बाद में तेरे घर चलेंगे, तुझे जल्दी नहीं है न”?

उसने सर हिलाया। गली कूँची और झिलमिलाती दुकानों के बीच में सड़सड़ाट रिक्शा चल रही थी। न जाने कितने दरवाजे बंद और न जाने कितनी खुली, सब अंजाने, पर उसे डर नहीं लगा। वह औरत अच्छी थी शायद इसलिए भी। एक जगह पर आकार रिक्शा रुक गई। बहुत बड़ा मकान, बड़ा बरामदा, विशालकाय मजबूत दरवाजा।

बीच में चौक था। ऊपर छोटी-छोटी खिड़कियों में से दो-चार चेहरे झलके फिर खिड़कियाँ बंद हो गई। इतनी बड़ी जगह है, इसमें में बहुत सारे लोग रहते होगे। इधर-उधर ताकती हुई वह खड़ी रही।

न जाने किधर से हंसने की, गाने-बजाने की दबी-दबी सी आवाजें आ रही थी। ऊपर तो कुछ दिख नहीं रहा था। खोलियों का दरवाजा बड़ी मजबूती से बंद था और जो खुला था वह लाल गुलाबी फूल वाले पर्दों से पूरा का पूरा ढंका हुआ था। अंदर का कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था।

“आती हूँ अभी, फिर चलेंगे तेरे घर छोड़ने के वास्ते। - - -” इधर-उधर जाते हुए औरत ने कहा।

ढूंढती होगी उसे सेवंती भीड़ में। अब तक तो सब घर पहुँच चुके होंगे, माँ की चीख-चिल्ला रही होगी। माना करती तो अच्छा था, भीड़ में कौन उसे ढूँढने जाएगा। इतनी बड़ी छोकरी भीड़ के इस भाग दौड़ में न जाने कहाँ - - - -। माँ उसे घोड़ी जैसी छोकरी कहती।

अचानक उसे पेट में मरोड़ जैसा उठा। थोड़ी भूख और प्यास तो लगी ही थे। अब यह पेट का झंझट, झंझट नहीं तो क्या? तीन दिन से टालती आ रही थी - - - जाना तो है। औरत बाहर आए तो उससे पूछकर जाएगी। इतने बड़े घर में होगा तो सही सब कुछ। यहीं सब कुछ निपटा लेती हूँ तो कल के फिर कोई खिट पिट नहीं।

पेट में अब कुछ गोल-गोल सा घूम रहा था। वह घबरा गई। अब बाई के बाहर आने भर की देर है कि तुरंत - - - इन सब बातों के लिए कोई ना कोई थोड़े ही करता है? बस उसे देखते ही पूछा।

“हाँ, हाँ अरे मौनी जरा उसे - - -”

चौक के एक तरफ दो बड़े-बड़े बाथरूम, सुंदर मखमली गुलाबी और आसमानी रंग वाले उस फिल्म में देखा हुआ बाथरूम याद आ गया। एकदम साफ सुथरा, दरवाजा ठीक से बंद होने वाला, पक्का मजबूत दीवालों वाला - - - इसमें निपटाना है? वो सब इसमें जाती होंगी?

आंखें फाड़-फाड़कर वो दरवाजा और उसके उसके सांकल को देख रही थी। दरवाजे के बंद होने पर बाहर के सब बाहर ही रह जाते हैं - - - फिर अपने को तो अंदर में कोई डर नहीं, किसी से वह खुलेगा भी नहीं, किसी को कुछ दिखेगा भी नहीं, कोई झंझट नहीं।

“जा अंदर - - -”

हरखाती, वह जमीन से थोड़ी ऊपर उठ गई, जैसे उड़ रही हो, जैसे सपने में चल रही हो वैसे अंदर दाखल हो गई और उसके पीछे दरवाजा बंद हो गया। खटाक से।

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डॉ॰ रानू मुखर्जी


एच॰ टी॰ रोड, सुभानपुरा

बड़ौदा – 390 023


E-mail – ranumukharji@yahoo॰co॰in

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