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मैं कहाँ कवि हूँ ? - डॉ. प्रणव भारती

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मैं कहाँ कवि हूँ ?

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उम्र के ऊपर-नीचे गुज़रते मोड़ों पर कब ? किसने ?रोक लगा दी है साहब ! वो तो बस जैसे समय आता है ,गुज़र ही तो जाती है। न कोई पता,न ठिकाना --बस जो ,जैसा आए उसमें से गुज़रते रहना। अक़्सर सोचा हुआ होता कहाँ है इंसान का ,बस उसे उस रास्ते से गुज़र जाना ही होता है जो उसके सामने आता है। विवाह के चौदह वर्ष बाद दुबारा पढ़ने का भूत सवार हुआ। दो छोटे बच्चों व घर-गृहस्थी के साथ पढ़ने का एक अलग ही अनुभव !

शुरू-शुरू में तो लगा हाथ-पैर काँपे लेकिन चार दिनों बाद ही ज़ुबान खुल गई ,भीतर भरा हुआ जैसे बाहर निकलने को व्याकुल ! गुनगुनाने की आदत ने फिर से पद्य के रचना-संसार में प्रवेश करा दिया। विवाह से पूर्व अंग्रेज़ी में एम.ए करके आई हुई मैंने गुजरात विद्यापीठ में हिंदी में एम.ए में प्रवेश लिया फिर वहीं से एम फ़िल और पी. एचडी !

अब तक शैतानियों के झंडे गड़ चुके थे। विद्यापीठ जैसी शांत संस्था में प्रार्थना-हॉल के पीछे से खिलखिलाने की आवाज़ें वातावरण में गुनगुनाने लगीं। पेड़ों से गिलहरियों की चढ़ने-उतरने की सरसराहट सी आवाज़ें मन को खिला देतीं। एक ग्रुप बन गया था ,सीढ़ियों पर बैठकर खाना खाने का ,जिसमें दो गढ़वाली ,दो पंजाबी,एक गुजराती,एक जापानी और मैं स्वयं उत्तर-प्रदेश से साथ ही गिलहरियों से दोस्ती ! यानि एक इंटरनेशनल ग्रुप जिसमें कभी कभी दूसरे देशों के 'स्टूडेंट एक्सचेंज प्रोग्राम ' के युवा भी सम्मिलित हो जाते।

सीढ़ियों पर बैठकर मद्धम स्वरों में गाते-गाते मेरे गीतों को सुनने की बारी भी आने लगी। तब तक 'ऑल इण्डिया रेडियो' से भी निमंत्रण मिलने शुरू हो गए थे ,वैसे अहिन्दी प्रदेश होने के कारण कार्यक्रम कम ही होते किन्तु सबसे परिचय हो गया था ,बुला भी लिया जाता कभी कवि-सम्मेलन में या फिर एकल पाठ के लिए !

उन्हीं दिनों 'रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया' की बहुत बड़ी शाखा पास ही में इनकम टैक्स बिल्डिंग के पास खुली। गुजराती व हिंदी मिश्रित कवि-सम्मेलन का कार्यक्रम रखा गया और आकाशवाणी से नाम लेकर मुझे भी निमंत्रण भेजा गया। तब तक विवाह के बाद किसी मंच पर नहीं गई थी सो वही हाल --दिल की धड़कनें सप्तम पर।

एक अंकल थे जिनसे ससुराल पक्ष की ओर से कुछ रिश्ता भी था। बड़े खुश होते थे मेरी रचनाएँ सुनकर। मैं उन्हें भाई साहब कहती थी ,पता नहीं किसी रिश्ते के कारण शायद ! पता चला कि कवि -सम्मेलन में शिरकत के लिए निमंत्रण मिला है ,बड़े प्रसन्न हुए।

"मैं भी आऊँगा ---"

"मुझे तो डर लग रहा है ---" मैं उनसे सब बात कह देती थी।
"तुम्हें याद हैं न ,कौनसी रचनाएं सुनानी हैं ?"

"जी,याद तो हैं --पर --"

"पर--वर ,कुछ नहीं,बस आँखें बंद कर लेना और रचना गुनगुनाना शुरू कर देना ,समझना तुम्हारे जैसा कोई है ही नहीं ,यू आर द बेस्ट ---"

" भूल जाऊँगी ,कागज़ तो ले ही जाना पड़ेगा ---"

"तो ले जाना ,बस यही याद रखना कि तुम सबसे उत्तम हो ---"

उन्होंने तो कहकर मेरी हौसला-अफ़जाई कर दी पर मैं तो अंदर से काँप रही थी। आकाशवाणी में तो रीटेक हो जाते थे पर सालों बाद मंच पर से कविता -पाठ कर रही थी।

विद्यापीठ का पूरा काफ़िला भी पहुंचा हुआ था ,आख़िर उनकी प्यारी दीदी कविता पाठ कर रही थी।

स्व. विष्णु प्रभाकर जी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि व अध्यक्ष थे। इतना बड़ा नाम और चूज़े से हम ! प्रभाकर जी को खूब पढ़ रखा था ,बहुत बड़ी फ़ैन थी उनके लेखन की ! उनके साथ बैठने में ही संकोच हो रहा था।
"मैं कहाँ कवि हूँ ,बताओ फिर अध्यक्ष कैसे बना दिया गया मुझे ?"बातों बातों में उन्होंने कहा।

"आपका लेखन ---सर ---"और लोगों ने न जाने क्या कहा पर मैंने अपने कानों को हाथ लगा दिए। उन्होंने एक सरल मुस्कुराहट मेरी ओर उछाल दी। बेहद सरल,सुदर्शन ,सात्विक व्यक्तित्व !

हमारे पास तो कुछ और कहने के लिए था ही नहीं ,शैतान मित्रों की टोली हाथ दिखाकर 'चीयर अप 'करने में मग्न थी बिना सोचे कि इस दीदी जैसी बेचारी चीज़ की क्या दुर्दशा हो रही होगी भीतर से !

ख़ैर,कविता -पाठ सुन्दर रहा ,तालियों की गड़गड़ाहट में मेरा चेहरा चमक गया।

अध्यक्षीय प्रवचन में प्रभाकर जी ने इतनी गरिमामई व सुंदर समीक्षा दी कि उनके गद्य में हम सब खो से गए। जब उन्होंने मेरी रचना व प्रस्तुति को सराहकर मुझे बधाई दी ,मैं कृत कृत्य हो उठी।

उस समय जाना और समझा कि बड़प्पन किसे कहते हैं और विवेकशीलता किस प्रकार सम्मोहित करती है ?

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डॉ.प्रणव भारती

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