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कहानी - बरसात - मूल – मोहन परमार, अनुवाद - डॉ॰ रानू मुखर्जी

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बरसात मूल – मोहन परमार, अनुवाद - डॉ॰ रानू मुखर्जी बरामदे के छोर पर पाँव धरते ही हवा की सनसनाहट मुझे छू गई। मैंने आकाश की ओर देखा। आकाश का...

बरसात

मूल – मोहन परमार,

अनुवाद - डॉ॰ रानू मुखर्जी

बरामदे के छोर पर पाँव धरते ही हवा की सनसनाहट मुझे छू गई। मैंने आकाश की ओर देखा। आकाश काली घटाओं से भरा हुआ था। लगा अभी भरभराकर बरस पड़ेगा। पर अभी तो केवल सनसनाती हवा का झोंका ही है। मुहल्ले भर की उड़ती फिरती नीम के तने से टकराती हुई रेत है। नजर तने पर से छिटककर नीम के पत्ते, टहनियॉ पर स्थिर हो गई। लगा नीम का पेड़ अभी के अभी टूटकर गिरेगा। टहनियाँ झूमझूमकर ऊपर नीचे हो रही थी। मेरे शर्ट का कोना रामपीर के ध्वजा की तरह फर-फर कर उड़ने लगा था। किसी का दरवाजा टकराया। किसी के कपड़े उड़े। कहीं पतरे तो कहीं खपरैल उड़ने की तैयारी में लगे थे। गाँव में चीख पुकार मची हुई थी। कोई घर से बाहर है। तो कोई बाहर से घर के भीतर आने के लिए दौड़धाम करने लगे। मैं चबूतरे से कूदकर बाहर आया।

भाभी बोल उठी,

“सुबह से, जबसे शहर से आए हो तब से बाहर जाने की ताक लगाए बैठे हो। पाँव घर मे टिकते ही नहीं। लो, जाओ अब बाहर।”

मैं हंस पड़ा। भाभी अंगूठा दिखाकर अंदर चली गई। मैं खपरैल पर से गिरती पानी की धार के नीचे से होता हुआ आँगन में आ गया। जमीन पर रेत सरसराती हुई फैल रही थी। एकदम साफ जमीन, जैसे किसी ने अभी के अभी आँगन को बुहार कर साफ किया हो ऐसा- - - रेत उड़ उड़ कर अब मेरे आँखों में पड़ने लगी थी। मै अपनी आंखे मालता हूँ। भाभी कमर पर हाथ धरकर नाराजगी जताती हुए चिल्लाई

“वहाँ क्यों खड़े हो, चुपचाप अंदर आ जाओ।“

मैं आँगन में से बरामदे में आ गया। ओटले पर बैठा। ओटले पर बर्तनों का अंबार। मेरे सामने ही भाभी बर्तन साफ करने बैठ गई। कुछ देर के लिए मेरी नजरें भाभी की पीठ पर अकारण ही टिक गई। स्थिति का ध्यान आते ही मैंने नजर फेर ली और दूर दूर तक के फैले गलियों को देखने लगा। दौड़ धाम अभी तक जारी था। नीम की टहनियाँ अभी तक झूले की तरह झूल रही थी। पर धीरे-धीरे - - - रेत की सरसराहट भी मंद पद गई थी। पवन की गति मंथर हो गई और फिर आकाश का गरजना चमकना शुरू। मैं खड़ा हो गया। चेहरा फेरकर भाभी ने आँखें दिखाई। मेरे चेहरे पर बेपरवाही की झलक देखकर उन्होंने फिर कुछ नहीं कहा। मैं नीम के तने से टिका खड़ा रहा। बहुत दिनों के बाद गाँव आया था। अगर भाई ने मजबूर न किया होता तो शायद ही आता। आ गया - - - भाई मुझसे मिलकर आता हूँ, कहकर बाहर चला गया। भाभी मेरी माँ के जैसी है। मुझसे बहुत स्नेह करती है। घर से निकलने ही नहीं दे रही है। ये खाओ, वो खाओ। यहाँ बैठो वहाँ बैठो। मेरे यहां आने पर बहुत खुश हुई। आनन्द ही आनन्द ॰ ॰ ॰ भाई के दो बच्चे। मुझसे बहुत लगाव है उनका । वे दोनों हरदम मेरे पीछे पीछे घूमते रहते है । स्कूल न गए होते तो अच्छा होता। अकेला पड गया। भाभी के साथ भी बात कर करके भी कितनी बातें करता? गाँव में घूमना था। पुरानी पहचान को फिर से ताजांतर करना था। खा-पीकर निकालने की तैयारी कर रहा था कि ये पवन ने आडिङ्गा लगाया। मैं नीम के पेड़ को पार कर गया। उसकी छाल मेरी ऊंगालियों में चुभ रही थी। मैंने आसमान की ओर देखा। गरजना चमकना और तेज हो गया था। थोड़ी-थोड़ी बूंदा बांदी होने लगी। मैं चिढ़ा हुआ चेहरा लेकर नीम के पत्तों पर गिरती बूंदों की धार को देखने लगा। पवन सांय सांय करती हुई इधर से उधर भाग रही थी। बर्तन उठाती भाभी की साड़ी में हवा भर गया। और साड़ी फूलकर फुग्गा बन गई। मैं इसे देखकर हंस हँसकर पागल हो गया। भाभी मुंह फाड्कर कर मुझे देखने लगी। उनके कुछ कहे बीना मैं आसमान की ओर देखने लगा। बूंदों की मार बढ़ गई थी। पहले तो मुझे ऐसा लगा जैसे ओले पड़ रहे हो। सर पर तड़ातड़ बूंदों के पड़ने के कारण शायद ऐसा लग रहा हो। पर नहीं ये तो बूंदें थी। हमारे समक्ष बूंदों की क्या मजाल? गाँव में घूम घूम कर सबको प्रभावित करना था। बहुत दिनों के बाद आया था गाँव। क्या ऑफिस में और क्या ऑफिस के बाहर, पूरे जिले में हर तरफ मेरा दबदबा फैला हुआ है। गाँव के लोग भी मेरा आदर कर मुझे मान दें ऐसा ही कुछ कुछ विचार मेरे मन में था। पर ये बरसात। अब तक तो बूँदाबाँदी हो रही थी पर अब तो मूसलाधार बरसात वातावरण बडा मौजीला, पर घर पर बैठना मुश्किल। मेंने मुंह बिचकाया, मुझे धार के नीचे उतार आने का मन हुआ। पानी की धार को माथे पर लेकर शीतल हो जाऊँ। भाभी मुझे ताकने लगी। बोली, “भिंगने का बहुत मन है क्यों? तुम फिर खड़े हो गए? कुछ देर बैठो तुम्हारे भाई आते ही होंगे।“

मैं बरामदे पर जाने की सोचता हूँ। सुबह से आया हूँ और तभी से घर में ही पड़ा हूँ। ऐसे में तो गाँव में मेरा आना होता ही नहीं है। जिला कलेक्टर के पद पर हूँ। जिधर भी जाऊँ, उधर ही आइए साहब, आइए आइए, करते रहतें हैं लोग। बड़े भैया भी गाँव में मुझे बुलाकर अपनी प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं, साला, इस जवाबदारी से छुट्टी मिले तब नां आऊँ। इस बार तो बड़े भैया माने ही नहीं। बोलने लगे, “नौकरी में तो तनाव रहता ही है, वो तो आता जाता रहता है कहीं टिककर रहा है भला?” इस बार तो मैंने पक्का मन बनाया। वैसे भी मैं तो अकेला ठहरा। भैया मेरे लिए अच्छी अच्छी लड़कियों का रिश्ता लाते है पर मेरी ज़िम्मेदारियां ? विवाह करने का अवसर ही कहाँ है? ओहदेदार नौकरियों की बात ही ऐसी होती है। एक बार इसमें जड़ जाओ तो कुछ सुझता ही नहीं। ऐसा लगता है, जैसे अपने बल बूते पर ही सब कुछ चल रहा है। हमारे न रहने पर दो चार दिन इधर उधर हो जाएगा ऐसा लगता है पर इस बार तो मन मजबूत करके आया हूँ। कम से कम दो चार दिन तो गाँव में रहना ही है। बड़े भैया ने सरपंच से मिलकर एक सम्मान समारोह का कार्यक्रम तय किया है। और फिर मुझे भी तो इस प्रकार के कार्यक्रम में बहुत आनन्द आता है॰ ॰ ॰ मजा आएगा ऐसा लगा। ॰ ॰ ॰ पर सुबह से घर में पड़े रहना ये कहाँ तक सही है?

खडे – खडे मैं बरामदे के कोने कोने में से अपने बचपन के भूले बिसरे पलों को ढूँढने की कोशिश कर रहा हूँ। कुछ न मिलने पर दीवालों की परतों को हाथों से कुतरने लगा। और तभी भाभी बर्तन लेकर उठ खड़ी हुई। पसीने से लथ पथ। ऐसा लग रहा था जैसे रही सही जवानी भी निचुड़कर निष्क्रिय होकर बह जाएगी। उन पर मुझे दया आने लगी। भाभी आँगन और बरामदे के बीच में खड़े होकर पाँव को पछाड़ पछाड़कर पानी झाड्कार सूखा रही थी। उन्होंने मुझे आंखें दिखाई। मैं घबराए बगैर ही उनके सामने हंसने लगा। इस समय भाभी खुश मिजाज में थी।

“फिर से कहाँ चले?”

“गाँव में बरसात कहाँ पर कितना हुआ ,एक चक्कर लगाकर जरा देखकर आता हूँ ”

“क्या बरसात पहली बार देख रहे हो?”

“नहीं नहीं, हम तो ऐसे ऐसे ही बड़े हो गए है॰ ॰ ॰ क्यों?”

“लग तो यही रहा है॰ ॰ ॰ ।”

इस बार भाभी हँसती हुई दोहरी हो रही थी। मैं झेंप गया। न जाने कब तक भाभी हँसती रही और मैं देखता रहा। बड़ी मुश्किल से हंसी रोककर भाभी बोली - - -

“छाता दूँ क्या?”

“नहीं मुझे भीगना है।”

“अब तो भीगे बिना रह नहीं सकते? कब तक कोरे रहोगे।” भाभी हँसती रही। नीम के नीचे के थोडी सी सुखी जगह को मैं देख लिया। चारों ओर पानी ही पाने और नीम के तले सूखा सूखा - - - ऐसे ही कुछ कुछ, हँसना चाहता था पर हंसी नहीं आई। अब तो बरसात भी तेजी से होने लगी थी। भाभी को मेरी कार की चिंता सताने लगी।

“ओ हो – हो, तुम्हारी गाड़ी तो भीग गई न। इस नीम के नीचे लाकर रख दो।”

“भीगने दो कपड़े से पोंछ दूँगा तो पहले जैसी हो जाएगी।”

“मुझे क्या? तुम ठहरे बड़े आदमी। तुम्हें जो सही लगे वही करो।“

भाभी अंदर चली गई। छ्ल छ्ल बहते पानी की धार में पाँव रखकर मैं चलने लगा। पानी की छीटें चारों ओर उछल कूद कर रही थी। मजा आ रहा था। नीम को पार करके मुहल्ले में आ गया। चिकनी मिट्टी में पाँव धंस गए। थोड़ा फिसलने जैसा हुआ। पाँव को किचड से निकालकर जमीन पर रखा और तभी मेरी नजर करसन के घर पर पड़ी। करसन मेरा हमउम्र था। मेरे कहे जैसा करने वाला। मुझे उसे अभी इसी वक्त अपने साथ लेकर जाना था पर वो तो बरसात के छीटों से बचने के लिए घर के सामने में बोरे को बांधने में व्यस्त था। मैं कमर में हाथ धरकर करसन के घर के सामने खड़े खड़े सब देख रहा था। करसन की बीवी संतोक ने उसे हाथ से इशारा करके मेरी उपस्थिती बताई। पर करसन को जैसे मेरी कुछ पड़ी ही नहीं थी। वह तो अपने काम में मग्न था। बोरे का दूसरा हिस्सा उसकी बीवी ने पकड़ रखा था। बारिश का एक झोंका ऐसा आया कि उसकी पत्नी हचमचा उठी। मेरे देखते हे देखते बोरे का एक छोर उसके हाथों से छूट गया। करसन बिफर उठा। कोशिश करके संतोक ने फिर से उस कोने को पकड़ लिया। मैं नजदीक जाकर कह उठा,

“करसन भाई किस झमेले में पड़े हो?”

करसन ने मुझे देखा। देखते ही खिल उठा।

मुझे अच्छा लगा। ये तो वो करसन हैं जो मुझे देखकर सब कुछ छोड़ छाड़कर भाग आएगा ऐसा लगा था। अगर दौड़ा नहीं तो मेरा हाथ पकड़कर घर के अंदर तो जरूर ले जाएगा। मैं इंतजार करता रहा। पर वो तो बोरे को बांधने में ही व्यस्त रहा। जैसा मैंने सोचा था वैसा तो कुछ हुआ ही नहीं। वो तो दीवार पर ठुकी कील पर बोरे को बांधता हुआ बोला ,

“कौन है कान्ति। अरे तू कब आया रे ?”

मेरे अंदर कुछ ऐसी हलचल मची कि मेरा सर फटने लगा। मन में दर्द का एक रेला ऐसा उठा कि मेरा मन करसन की ओर से हट गया। अपने गाँव के लोगों में शिष्टाचार जैसा कुछ है कि नहीं? करसन और मैं दोनों साथ-साथ पढे खेले इसका कोई मतलब नहीं? मान मर्यादा जैसा कुछ है कि नहीं? अंतर में अहम की लौ ऐसी जली कि मैं जल कर भरता बन गया। मेरे अंदर उत्तर प्रत्युत्तर का ऐसा दौर चला कि मैं मूक बन गया। केवल आँखें ही करसन के चेहरे पर चिपकी रही। हँसता हुआ करसन बोला –

“अरे! ऐसे मनौती मांगने की तरह क्यों खड़ा है? चल इधर आ ?”

मैंने करसन के घर की ओर नजर दौड़ाई। घर का छापपर नीचे खिसक आया था। बरामदे में सब कुछ बिखरा पड़ा था। करसन की पत्नी संतोक मुझे देखकर खीं खीं करके हंस रही थी। अब भी मेरा सर फट रहा था। मैंने पानी की धार में पाँव रखा। फिर मुड़कर घर के पीछे की दीवार की ओर मुड़ा। करसन के घर का छापपर मुझ पर धंस पड़ेगा ऐसा लगा। वहाँ से मुड़कर संकरी गली में घुसते ही करसन के शब्द हथौड़े की तरह मेरे कानों में पड़े।

“बहुत बड़ा साहब बन गया है तू। कितना घमंडी हो गया है। बुलाने पर ही बोलता है रे अब तो तू॰ ॰ ॰ ।”

“तो इससे हमें क्या?” संतोक धीरे से बोली।

“ये तो शहर जाकर ही इतना बड़ा साहब बन गया है न।“

इस बार करसन ज़ोर से बोला।

क्षण भर के लिए तो मेरे पाँव जमीन पर जड़ गए। चारों ओर सुनसान हो गया। मेरे कदमों को छूकर बहती धारा तो जैसे जम सी गई। मैं जोश से भर पानी में अपने पाँव को पछाड़ने लगा। पानी की छींटे चारों ओर उडने लागी। करसन के मिट्टी की भींत पर भी पानी की छींटे लगती थी। दिल में खटास भरकर मैं आगे बढ़ गया। कभी तेजी से तो कभी धीमी चाल से चलने लगा। मैं तो नहीं पार मेरे पैर चल रहे थे। बरसात के कारण सब लोग घर में बैठे थे। एक भी आदमी बाहर नहीं दिख रहा था। बाहर एकदम शांत। मुझे लगा थोड़ी देर पहले हवा का फर्राटेदार तुफान का जो झोंका आया था उसी के कारण गाँव में शायद बहुत नुकसान हुआ है। इसलिए शायद सब व्यस्त है। पर मुझे ऐसा कुछ दिखई ही नहीं दे रहा था। मैं चौराहे में आ गया। चौराहे में अम्बा माँ का मंदिर एक अकेला खड़ा भीग रहा था। मंदिर के बरामदे में बैठ जाऊँ ऐसा लग रहा था। पर नहीं बैठा। सामने से चिल्लाते हुए, वेणीदा मुखी अपनी मोजड़ी को ठपठपाते हुए चले आ रहे थे। बरसात से बचने के लिए एक हाथ को ऐसे हिला रहे थे जैसे मक्खी उड़ा रहे हो। उन्हें देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। जब बापुजी जीवित थे उन दिनो वे हमारे घर बहुत बार आते थे। देश-विदेश की बातें करते थे। सब मुझे याद आया। और मैं तेजी से उनकी ओर भागा। आँखों में घुस आती पानी की धार को पोंछते हुए उन्होने मुझे देखा। मैंने झुककर उनके पाँव छूए।

“कौन है रे तू?”

“मुझे नहीं पहचाना?”

“नहीं भई, तेरे जैसे तो यहाँ हर रोज आते हैं। खिससा भरने। किस किस को याद रखूँ बोल।“

“पर मैं तो यहाँ का इस गाँव का हूँ। त्रिभुवन भाई का बेटा कांतिलाल।“

“कांतिलाल? वो कौन? हा हा हमारे तबलेवाला कांति। अरे सुना है कि तू तो बहुत बड़ा साहब बन गया है रे।“

मुझे समझ में नहीं आ रहा था क्या बोलूँ? सामने मंदिर लावारिस पड़ा था । वेणीदा मुझे लावारिस खड़ा छोडकर अम्बा माँ के चरण छूने चले गए। मैं अर्धजागृत अवस्था में खड़ा रहा। मेरे अंदर की कुलबुलाहट बढ्ने लगी। अम्बा माँ को प्रणाम करके वेणीदा चलने को हुए। पर मुझे खड़ा देख लौट आए। मुझ पर उपकार कर रहे हो इस तरह से बोले, “अरे तू तो अब तक यहीं खड़ा है। चल चलता है तो घर चल। अदरकवाली चाय पिलाऊंगा।“ क्षणभर के लिए तो मेरा मन हुआ कि उनसे कहूँ कि मुझे आपकी चाय भी नहीं पीनी है और आपकी परछाई से भी दूर रहना है। पर कुछ बोला नहीं। चेहरे पर बनावटी हंसी बिखेर कर बोला “नहीं चाचा नहीं आप नाहक हैरान होंगे।“

वेणीदा का जवाब सुने बीना ही मै आगे बढ़ गया। मेरा अंतर जल रहा था। सुबह जब गाड़ी लेकर निकला तब मन में उमंग भरे पड़े थे। बड़े बूढ़ों के साथ बैठकर देश विदेश की बातें करनी है। बचपन के दोस्तों के साथ जंगल में घूमने जाना है। स्कूल के प्रांगण में जी भर कर घूमना है। गाँव के फाटक के चबूतरे पर पैर लटकाकर बैठना है। रात के अंधेरे में मुझे गाँव की सीमा के दृश्य को देखना है। मैंने सोचा था कि गाँव के लोग मुझे देखकर भाव विभोर हो जाएंगे। “कांति भाई आए, कांति भाई कहते हुए दौड़ आएंगे। पीछे-पीछे घूमेंगे। मेरे मान सम्मान को महत्व देंगे। पर गाँव के लोगों को तो बोलने की तमीज ही नहीं है। दिल दुखानेवाली, मन को जला देने वाली बातें करते हैं। अरे! चाय किसे नहीं पसंद है? पर उसे कहने का भी एक तरीका होता है। इन्होंने इसे सीखा ही कब? - - - मैं परेशान हो गया। पानी मंथर गति से गाँव के दरवाजे की ओर बह रहा था। बारिश धीमे बरस रही थी। फिर भी आकाश घनघोर घटाओं से घिरा हुआ था। दूर-दूर तक बिजली चमक रही थी। बिजली के उस चमकारे में मुझे रतिलाल मास्टर के घर का दरवाजा दिखा। कुढ़ा हुआ मन थोड़ा शांत हुआ। नाराजगी गायब। मेरे कदम मास्टर साहब के घर की ओर बढ्ने के लिए मचल उठे। मास्टर साहब बहुत बुद्धिशाली, निवृत शिक्षक हैं। पढाने में होशियार। उन्होंने गाँव में कुछ साल तक नौकरी की। मैं छठवीं-सातवीं कक्षा तक उनसे ही पढ़ा। अगर घर पर मिले तो बहुत अच्छा लगेगा। मुझे उनसे बहुत सारी बातें करनी है। उनको देखे वर्षों हो गए। मुझे उनसे मिलना है। उनके बुद्धिचातुर्य में मुझे रंग जाना है। उनके साथ बैठकर गाँव के विकास की बातों की जानकारी लेनी है। इन दिनों गाँव में शिक्षा की हालत कैसी है। अंतिम पाँच-सात वर्षों में गाँव के कितने लोगों को नौकरी मिली? कोई इंग्लैंड अमेरिका गया या नहीं? सभी जानकारी रतिलाल मास्टर साहब के घर से मिलेगी। रतिलाल एक मान-मर्यादाधारी व्यक्ति हैं। मुझे देखकर बहुत खुश होंगे। वो तो मेरे गुरू है। उनके द्वारा किया गया व्यंग भी ग्रहणीय है। ऐसा सोचकर मैं रतिलाल के घर की ओर बढ़ गया। दो मंज़िला ईंटों का मकान। धीरे-धीरे कदम उनके घर के आगे रूक गए। घर के दरवाजे पर ही खडे-रहकर मैंने रतिलाल को पुकारा। मेरी आवाज सुनते ही मकान में हलचल बढ़ गई। एक साथ दो बच्चों का चेहरा झांक गया। एक लड़का और दूसरी लड़की। मुझे देखकर लड़की घर के अंदर चली गई। कुछ देर के बाद टोपी-झब्बा पहने एक सज्जन बाहर झांक गये। एकदम स्वच्छ, प्रतिभावान। हाँ यही है। रतिलाल मास्टर जी मेरे साहब। धीरे धीरे चलकर उन्होंने दरवाजा खोला। और मैं दौड़कर उनके चरणों में लोट गया। मुझे उठाकर उन्होंने अपने अंक में भर लिया और उसी हालत में घर के अंदर ले गए। देखा तो और पाँच लोग गोला बनाकर कुर्सी पर बैठे थे। मुझे देखकर उन लोगों में से दो जन से चुप हो गए। मेरी नजर उन दोनों पर ठ्हरकर एक बार चारों ओर घूम गई। पर वे पहचान में नाही आए। शायद कहीं कभी देखा होगा। पर मुझे देखकर वो दोनों उठकर खड़े क्यों हो गए? उनके साथ तो मेरा कोई परिचय भी नहीं है। ऐसा भी हो सकता है शायद जिला कलेक्टर होने की वजह से वो मुझे जानते हो। पर मैं उन लोगों को नहीं जानता हूँ। मुझे, दोनों मेरे दबाव में हो, ऐसा बर्ताव करने लगे। खड़े खड़े मैंने उनसे पूछा, “मैंने आप लोगों को पहचाना नहीं। मेरी आवाज सुनकर एक जन ने मुझे सलाम ठोक दी। दूसरा थोड़ा झिझकते हुए बोला,

“साहब आप तो हमारे बॉस हैं। आपके हाथ नीचे के तालुके में मैं मामलतदार हूँ। ये नायाब मामलतदार है।”

“अच्छा पर आप यहाँ कैसे?”

“ये रतिलालभाई हमारे रिश्तेदार हैं। एक आध बार आप जब हमारे तालुके के विजिट में आए थे तब हमने आपको अपना परिचय देना चाहा पर आपको बुरा लगेगा यह सोचकर कहा नहीं।“

मैं मन ही मन हंसने लगा। दोनों का विनम्र भाव देखकर मुझे अच्छा लगा। हाथ से इशारा करके मैंने उन्हे बैठने के लिए कहा। रतिलाल मेरे लिए कुर्सी लेकर आए। सबके सामने मैं रूआब से बैठ गया। जैसे कि ऑफिस में मेरे सामने कर्मचारी बैठे हों, और मैं उनको मार्गदर्शन दे रहा हूँ। असली कलेक्टर की मुद्रा में था। मेरे दो कर्मचारियों के सिवाय और तीन जन की आँखों में मेरे लिए प्रशंसा के भाव थे। रतिलाल मास्टर साहब ने सबसे मेरा परिचय कराया। एक शिक्षक थे और दो जिले के सामाजिक कार्यकर्ता थे। सभी के साथ मैंने जिले के विकास के बारे में ऐसे बातें की कि सब मुग्ध हो गए। सभा ऐसी जम गई थी कि मेरा रूआब सब के सर चढ़कर बोल रहा था। मैंने देखा रतिलाल की छाती गर्व से फूलती जा रही थी। चाय से फारिग होते ही रतिलाल मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोले, “ये मेरा विद्यार्थी कांति। पढ़ने में बहुत होशियार।“ “साहब होशियार हैं इसमें कोई दो राय नहीं हैं।“ एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा।

“पर” रतिलाल संजीदा होकर बोले।

“कहिए – कहिए”। मैंने रतिलाल की ओर शिष्यभाव से देखा “पर इसकी एक खराब आदत थी - - - चोरी करने की। दूसरे विद्यार्थियों की पुस्तकें चुरा लेता था।“

“क्या?” सब एक साथ बोल उठे।

मैंने सबके चेहरे पर नजर दौड़ाई। जैसे सब मेरा मज़ाक उड़ा रहे हों। ऐसे हंसने लगे। मेरा अंतर दहल उठा। तभी रतिलाल बोले,

“वह आदत गई कि नहीं कांति? या फिर अभी भी ॰ ॰ ॰

मैं हंस पड़ा। सब हंस उठे। मैंने सभी के चेहरे को बड़े ध्यान से एक बार फिर देखा। सभी के चेहरे पर मेरे लिए जो आदरभाव था वह कम हो रहा था। कार्यकर आपस में काना फूसी करने लगे। मामलतदार जरा बातूनी था, वह तुरंत बोल पड़ा,

“अरे साहब! आप बचपन में ऐसा करते थे?” मुझे शर्म आने लगी। रतिलाल के लिए मेरे मन में दरार पड़ गई। मामलतदार का गला दबा देने के लिए मैं अधीर हो उठा। ये मेरे अधीन में काम करनेवाले कर्मचारी इनकी ये मजाल ॰ ॰ ॰ । यहाँ से भाग जाने का मन होने लगा। पर मैं बैठने पर मजबूर था। रतिलाल मेरे सामने ही मुस्कुरा रहा था। जैसे मुझ पर दया कर रहा हो इस भाव से बोला,

“बेचारा वह भी क्या करता, गरीबी में पला बढ़ा। पुस्तक कहाँ से लाता।“

मुझ पर बिजली गिरी। इस मास्टर को हो क्या गया है? मेरी बीती बातों को याद करके मुझे लोगों के सामने नंगा क्यों कर रहा है? खीज ऐसी चढ़ी कि सर चक्कर खाने लगा। चारों ओर मेरी छाप एक रोबदार आफिसर की है और यहाँ मैं एक निराधार गरीब॰ ॰ ॰ रतिलाल का पुस्तक चुरनेवाला शिष्य ॰ ॰ ॰ रूआब रहित॰ ॰ ॰ मेरी आँखों में पानी भरने लगा। फिर भी मन मजबूत करके मैंने सभी की ओर देखा। एक सामाजिक कार्यकर ने मामलतदार के कान में कुछ कहा। मामलतदार ने सर हिलाया और उसने मुझे कहा, “साहब कुछ ही दिनों में हम आपके ऑफिस में आपसे मिलते हैं। कुछ काम है।“

मेरा गुस्सा भभक उठा। कुंडली मारकर बैठे अहम ने सर उठाया। और मैं फटाक से उठकर खड़ा हो गया। उन लोगों को देखने की कोई इच्छा भी नहीं रह गई थी। रतिलाल ने मेरे कंधे को पकड़कर मुझे बैठाना चाहा। मैंने कोई मौका दिए बगैर फट फट चलकर घर से बाहर निकल आया। बरसात फिर से शुरू हो गई थी। मैंने आसमान की ओर देखा ॰ ॰ ॰ अंतर में दरार। और धरती पर खलबलाता पानी। कहाँ जाऊं? मेरी लंगड़ाती चाल। दूसरी गली में गया। वहाँ पर एक मकान के सामने अच्छा खासा बीसेक लोगों की भीड़ इकट्ठी थी। मुझे आश्चर्य हुआ। ध्यान से देखा तो एक मकान के छट पर नीम का पेड़ गिर गया था जिसे हटाने के लिए सब कोशिश कर रहे थे। महेश और लक्ष्मण भी वहाँ थे। मेरे बचपन के मित्र। मन उनसे मिलने को व्याकुल, पर दिल ने दृढ़ता से मना कर दिया। अंतर की दरार अब भी वहीं की वहीं थी जुड़ी नही थी। मैंने तुरंत दिशा बादल ली। कदम सुरेश के घर की ओर बढ़ गए। सुरेश मेरा खास मित्र है। बाजू के गाँव में डाक्टर है। उसकी पत्नी लक्ष्मी मेरे साथ हाई स्कूल में पढ़ती थी। दोनों बहुत ही स्नेही स्वभाव के हैं। वहाँ जाकर मुझे मेरा मन हल्का करना है। सुरेश की गली में पहुंचा तब तक तो बरसात और तेज हो गई थी। मेरे मन में जो आया मैंने बरसात से कह दिया। कभी तो इतनी बरसती नहीं और आज ही इतना बरसना था तुझे? दो दिन रूक जाओ फिर मन भरकर बरस लेना। अभी तो रूक जाती?” मन भारी-भारी, कड़वाहट से भरा। ऐसे में सुरेश के घर बरामदे के दरवाजे का सांकल खड्का बैठा। सुरेश की पत्नी ने बरामदे का दरवाजा खोलकर झाँककर देखा।

मुझे देखकर पहले वह आश्चर्य चकित हो गई फिर हँसती हुई दोहरी हो गई।

“अरे! आप?”

“हाँ, मैं। सुरेश नहीं है क्या?”

“वो तो नौकरी पर गया है।“

“कब तक आएगा?”

“रात को।“

लक्ष्मी झिझकती हुई खड़ी रह गई। मैंने उसे एकदम से परख लिया। वो मुझे जाने को भी नहीं कह रही थी और अंदर भी नहीं बुला रही थी। मैं द्वन्द्व में पद गया। शर्मिंदा हो गया। फिर तो, वह हंसने लगी।

“तुम क्यों हंस रही हो?”

“कुछ पुरानी बातें याद आ गई।“

“क्या”?

“हम तुम्हें “कांति पप्पू” कहते थे ॰ ॰ ॰ ।”

मेरा सर घूम गया। दोनों हाथों की मुट्ठियाँ कस गई। बरामदे पर मुक्का मारता हुआ मैंने कहा,

“कहता हूँ चुप हो जा, लक्ष्मी – लाखी – लखड़ी - -“

मैं और कुछ कहूँ इससे पहले ही उसने बरामदे का दरवाजा फट करके बंद कर दिया। मैं शर्मिंदा हो गया और वहां से चला आया। मुट्ठियाँ कसकर चला आया। एक मुहल्ले में से दूसरे मुहल्ले में, दूसरे से तीसरे में ऐसे न जाने कितने मुहल्लों को पारकर फाटक की तरफ आया। फाटक को लांघ गया। जबरदस्त बरसात हो रही थी। झड़ी लग गई थी। फाटक से गाँव की सीमा की ओर जाता हुआ पानी पानी नदी के जैसे बह रहा था। गाँव के तालाब में जाकर गिर रहा था। तालाब के आसपास के छोटे-छोटे ड़बोरियों में सालों पहले नहाने की बातें याद आ गई। दौड़ गया। फिर लौट के आया। मन की बेचैनी बढ़ रही थी। रह रह कर कदम घर की ओर मुड़ रहे थे। बड़े भैया लौट आए होंगे। अगर न आए हो तो भाभी से कहकर शहर चला जाऊँ गाड़ी लेकर ॰ ॰ ॰ । कदमों में तेजी आ गई। और तभी आनंद की ध्वनि सुनाई दी। देखा तो बच्चे थे। कुछ बच्चे चड्डी पहने हुए, कुछ शरट - चड्डी पहने, तो कुछ नंगे-पूंगे। सब पानी में छई छपाक कर रहे थे। सभी के चेहरे पर निखलास हंसी तैर रही थी। आडंबर हिन। मुझे देखकर ऐसे खिल-खिलाकर हँसे कि मैं सराबोर हो गया। पैर थिरकने लगे। और मन तो जैसे नाचने लगा। मुझे देखकर तो बच्चे जोश से भर उठे। खेलने में मत्त हो गए। एक दूसरे पर पानी छींटने लगे। कोई गोद में चढ़ गया, कोई पैर खींचने लगा। कोई सर पर टपकोरा मारने लगा। कोई नाक बंद करके डुबकी लगाने लगा। मैं डाबरे के किनारे खड़ा खड़ा हंस रहा था। पुलकित, खीले-खीले फूल जैसे बच्चे। मैंने सभी बच्चों को मन भरकर देखा। जैसे मैं स्वयं पर ही पानी छींटकर खुश हो रहा था। मैं सब कुछ भूल गया। कुछ भी याद नहीं रहा। और मैंने पानी में छलांग लगा दी। पानी की धार मुझ पर से बह गई और मैं पगला गया। हाथों को हिला हिला कर बच्चों को नजदीक बुलाया। सब मेरे आस पास इकट्ठे हो गए। पानी के बहाव में मैं अपना पैर ऊपर नीचे करता रहा। हाथ हिला हिलाकर पानी में नाव खेने जैसा कर रहा था। कभी सीधा तो कभी उल्टा होता रहा। फिर तो बच्चे मेरे साथ मस्त होकर खेलने लगे। मैंने उन पर पानी छिडका। बच्चे भी जोश में आ गए उन्होंने मुझ पर इतनी तेजी से पानी डालना शुरू किया कि जैसे अभी वर्षा हो रही हो। पूरे का पूरा भीग रहा था। पानी का प्रवाह बहुत तेज होता जा रहा था। मैं चित्त होकर लेट गया और पानी की धार को अपने ऊपर लेने लगा। क्षण भर के लिए आँखें खुल गई।

आकाश के साथ मेरे नेत्र ऐसे एकाकार हुए जैसे कि बादलों के मध्य प्रकाश पुंज की सृष्टि हुई हो। चित्त, बुद्धि मन और अहंकार सब रमन करने में लगे रहे। मेरे नाभि में से कुछ प्रकट हुआ और मेरे में से अनेक “मैं” प्रकट हुआ। मैं न जाने कितने “मैं” में बंटा हुआ था। इसका ज्ञान मुझे इसी समय हुआ। “मैं” की रेखाएँ ब्रह्मांड में विस्तार करने लगी। जैसे मेरे प्रत्येक “मैं” को ब्रह्मांड ने अपने आगोश में ले लिया हो। बरसात तेज होने लगी। अब तो बरसात जितनी तेजी से बरसे उतना ही अच्छा है ऐसा मुझे लगने लगा। मेरा “मैं” बरसात के इन बूंदों में भटक गया था। सब “मै” एक के ऊपर एक आ रहे थे। सब एक दूसरे पर अपनी श्रेष्ठता साबित करने पर तुले हुए थे। और मैं इन सब में फँसकर पीस रहा था। सांसों की गति में से मुझे फर्क का पता चला। जैसे मैं अनेक “मैं” में विभाजित एक पुतला सा हूँ। मेरे अंदर का “मैं” मुझे पकड़ने का प्रयास कर रहा है। मेरे नाभि पर भार बढ्ने लगा। मेरी अपनी पहचान समाप्त हो रही थे। मेरा नाम मिट रहा था। एक पल के लिए तो सभी “मैं” आपस में मिलकर एक सार हो गए। मैं उन में से भाग छूटने की तैयारी में था। और तभी दड़बड़ करती सुरता, मेरी सहायक बनी। मेरी स्वसोछ्श्वास की गति सामान्य हुई और मैंने आकाश की ओर हाथ फैलाया। जैसे मंतर फूँक रहा हूँ इस हाव भाव से मैंने अपने सभी “मैं” को मैंने फूँक दिया। फिर मैंने बरसात की बूंदों को हथेलियों में भरा और आंखें मूँद ली। फिर खोली। देखा तो पूरा गाँव मुझसे रूठा हुआ था। मैं हिम खंड जैसा बन गया था। सुधबुध खो बैठा था। विस्तृत होकर बैठे मेरे सभी “मैं” पर मैंने बूंदों की मार चलाई। नाभि शांत। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार सब एकाकार हो गए। ब्रह्मांड में फैला मैं हारे हुए योद्धा के जैसे शरण में आया। मैंने देखा तो एक मात्र “मैं”, केवल मात्र एक ही “मैं” ब्रह्मांड में विस्तृत है। ॰ ॰ ॰ रंग, रूप, गंध, स्पर्श या शब्द के माया जाल से भी परे, दूधिया दाँत वाला बालक मात्र। करसन, रतिलाल, मास्टर, वेणीदा, लक्ष्मी, महेश, लक्ष्मण – अरे यहां तक कि भाई भाभी को भी मैंने अपनी ओर पीठ फेरकर खड़े रहते हुए देखा। नाभि धड़क धड़क। उस में धीमी आवाज सुनाई दी, “अरे भाई मैं आपका कांति हूँ, मुझसे क्यों सब नाराज है?” और मैं पानी में बैठ गया। छलछल बहते हुए पानी को दोनों हाथों में भरकर उठ खड़ा हुआ। उठ गया। पानी में पैरों को पछाडने लगा। फिर दौड़ा गया। फाटक से सीधे गाँव में । सीधे गाँव में घुस गया। खलबल बहते पानी की धार में बैठ गया। और मैं कांति, सभी का कांति – उस नीम के पेड़ को खसेड़ने के लिए इकट्ठी भीड़ में समा गया।

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परिचय – पत्र

नाम - डॉ. रानू मुखर्जी

जन्म - कलकता

मातृभाषा - बंगला

शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.(महाराजा सयाजी राव युनिवर्सिटी,वडोदरा), बी.एड. (भारतीय

शिक्षा परिषद, यु.पी.)

लेखन - हिंदी, बंगला, गुजराती, ओडीया, अँग्रेजी भाषाओं के ज्ञान के कारण आनुवाद कार्य में

संलग्न। स्वरचित कहानी, आलोचना, कविता, लेख आदि हंस (दिल्ली), वागर्थ (कलकता), समकालीन भारतीय साहित्य (दिल्ली), कथाक्रम (दिल्ली), नव भारत (भोपाल), शैली (बिहार), संदर्भ माजरा (जयपुर), शिवानंद वाणी (बनारस), दैनिक जागरण (कानपुर), दक्षिण समाचार (हैदराबाद), नारी अस्मिता (बडौदा), पहचान (दिल्ली), भाषासेतु (अहमदाबाद) आदि प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में प्रकशित। “गुजरात में हिन्दी साहित्य का इतिहास” के लेखन में सहायक।

प्रकाशन - “मध्यकालीन हिंदी गुजराती साखी साहित्य” (शोध ग्रंथ-1998), “किसे पुकारुँ?”(कहानी

संग्रह – 2000), “मोड पर” (कहानी संग्रह – 2001), “नारी चेतना” (आलोचना – 2001), “अबके बिछ्डे ना मिलै” (कहानी संग्रह – 2004), “किसे पुकारुँ?” (गुजराती भाषा में आनुवाद -2008), “बाहर वाला चेहरा” (कहानी संग्रह-2013), “सुरभी” बांग्ला कहानियों का हिन्दी अनुवाद – प्रकाशित, “स्वप्न दुःस्वप्न” तथा “मेमरी लेन” (चिनु मोदी के गुजराती नाटकों का अनुवाद 2017), “गुजराती लेखिकाओं नी प्रतिनिधि वार्ताओं” का हिन्दी में अनुवाद (शीघ्र प्रकाश्य), “बांग्ला नाटय साहित्य तथा रंगमंच का संक्षिप्त इति.” (शिघ्र प्रकाश्य)।

उपलब्धियाँ - हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2000 में शोध ग्रंथ “साखी साहित्य” प्रथम

पुरस्कृत, गुजरात साहित्य परिषद द्वारा 2000 में स्वरचित कहानी “मुखौटा” द्वितीय पुरस्कृत, हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2002 में स्वरचित कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को कहानी विधा के अंतर्गत प्रथम पुरस्कृत, केन्द्रिय हिंदी निदेशालय द्वारा कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को अहिंदी भाषी लेखकों को पुरस्कृत करने की योजना के अंतर्गत माननीय प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयीजी के हाथों प्रधान मंत्री निवास में प्र्शस्ति पत्र, शाल, मोमेंटो तथा पचास हजार रु. प्रदान कर 30-04-2003 को सम्मानित किया। वर्ष 2003 में साहित्य अकादमि गुजरात द्वारा पुस्तक “मोड पर” को कहानी विधा के अंतर्गत द्वितीय पुरस्कृत।

अन्य उपलब्धियाँ - आकशवाणी (अहमदाबाद-वडोदरा) को वार्ताकार। टी.वी. पर साहित्यिक

पुस्तकों क परिचय कराना।

संपर्क - डॉ. रानू मुखर्जी

Email – ranumukharji@yahoo.co.in.

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 1
  1. जितनी बढिया कहानी, उतना ही बढिया अनुवाद । कहानी को बृहद फलक पर लाने के लिए रानू जी का आभार और अभिनंदन मोहनभाई को ।

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रचनाकार: कहानी - बरसात - मूल – मोहन परमार, अनुवाद - डॉ॰ रानू मुखर्जी
कहानी - बरसात - मूल – मोहन परमार, अनुवाद - डॉ॰ रानू मुखर्जी
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