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जाति है कि जाती ही नहीं देवेन्द्र कुमार पाठक

कथेतर/देवेन्द्र कुमार पाठक

जाति है कि जाती ही नहीं

देवेन्द्र कुमार पाठक

आज़ादी के बाद के पहले दशक में जब हम पैदा हुये, तब के वक़्त की कुछ धुंधली-धुंधली यादें अब भी हैं. गोपालसिंह नेपाली और प्रदीप जैसे कई-कितने कवियों के लिखे गीतों को देश के लोग सुनते, गाते और दोहराते थे. उस दौर में देश सर्वोपरि होता था. श्यामलाल पार्षद का झंडा-गीत 'विजयी विश्व तिरंगा प्यारा' गाते हुये हम जोश से भर जाते.

अगस्त में सावन माह या सावन में अगस्त माह होना ही होना है और उसमें स्वतन्त्रता दिवस का होना. उस दौर में आज़ादी का जश्न मनाने का अपना ढंग-ढर्रा होता. कुछेक नियमों का पालन पक्के तौर पर होना तय होता. कतारबद्ध, अनुशासित परेड, राष्ट्रीय ध्वज को झुकने न देना, 'जनगणमन '  सही लय और आरोह-अवरोध का ध्यान रखना होता था. गाते हुये मिनट भर से पहले पूरा करना, सूर्यास्त होते ही उतारकर रखना. झंडा-गीत गाते हुये चौक-चौराहों पर नारे-जयकारे लगाने का रोमांच अनोखा होता, तिस पर बारह वार्डों की कीचड़ भरी गली-खोरियों से होकर प्रभातफेरी करना आदि कुछ नियमों में हेर-फेर के सवाल ही नहीं उठते थे.

कुल जमा बरस भर में स्वतंत्रतादिवस, गणतन्त्र दिवस, शिक्षक दिवस, बाल दिवस के अलावा गांधी जयंती, शास्त्री जयंती, तुलसी जयंती, नागपंचमी पर कुश्ती, सरस्वती-पूजा और वार्षिकोत्सव पर एकांकी, नाटक, खेलादि होते. हर सप्ताह होनेवाली बालसभाओं में महापुरुषों के उपदेशों, घटना-प्रसंगों से जीवन को सुख-शांतिपूर्ण और जनजीवन और समाज को प्रगतिशील, जागरूक बनाने की प्रेरणा मिलती थी. ईद, होली, दीवाली, राखी आदि त्यौहारों के अलावा गीत, कहानियों के जरिये हमें सामाजिक, पारिवारिक रिश्तों और धरती, पेड़, पशु-पक्षी, जल, हवा से हमारे रिश्तों की अहमियत हमें समझाई जाती. हर बाल सभा में बच्चों की अधिकाधिक प्रतिभागिता होती. अंत में कोई न कोई एक गुरुजी सम्बोधित करते थे.

तब टीचर, मास्साब, सर शहरों में होते होंगे. हमारे गंवई-गाँव और देहाती शिक्षा संस्कारों में गुरुजी या पण्डितजी का पद और सम्बोधन बड़े आदर, गौरव, श्रद्धा और आदर्श का प्रतीक होता था. गुरुजी की जाति-जमात, धर्म-मजहब को लेकर कोई तंगख्याली, भेदभाव, रोक -टोक हमारे गाँव-जवार के किसानी समाज में न थी. इसी दौर की कई हिंदी कहानियों में जिस तरह के सामाजिक भेदभाव, अस्पृश्यता, उत्पीड़न-शोषण, अत्याचार के अमानुषिक, बर्बर और भयावह स्वानुभूत सत्य घटना-प्रसंग पढ़ने को मिलते हैं, उस तरह का सामाजिक भेदभाव कमोबेश मेरे बचपन की स्मृतियों में नहीं है. जो, जितनी, जैसी भी जातिगत अस्पृश्यता थी, परम्परागत और चाहे जिस वजह से रही हो अमूमन आत्मस्वीकृत सी जान पड़ती. अस्पृश्य कही गई जातियों के लोगों में जहाँ आपसी छूत-छात का विचार व्यवहार था, वहां बड़ी तथाकथित सवर्ण जातियों के साथ भी छूत-छात कठोरता से मानी जाती थी.

जजमानी-सेवाओं के आदान प्रदान की सामाजिक व्यवस्था तत्कालीन खेतिहर समाज की महत्वपूर्ण व्यवस्था है. दरअस्ल भारतीय किसानी जीवन में कृषि हर जाति का परिवार करता रहा है. जाति सामाजिक स्तरीकरण की पहचान या अस्पृश्यता के दुर्विचार-दुर्व्यवहार से भी अधिक श्रम-कौशल, उत्पादन, जीवन यापन, परम्परागत जाति-श्रम-कौशल के आदान-प्रदान और पारस्परिक निर्भरता की दृष्टि से ज्यादा अहमियत रखती थी. जाति के परपरागत श्रम कौशल ये जजमानी सम्बन्ध खेती से जुड़े होते थे. खेतिहर मजूर ही जजमानी के अंतर्गत परजन या कमीन कहलाते थे. (कमीना-अपमानबोधक सम्बोधन यहीं से चला-बढ़ा हो) खेती और खेतिहरों और उनके घर-परिवार के सदस्यों की रोज़मर्रा की जैवकीय सेवाओं-को पूरा करने वाले धोबी, कुम्हार, पनिहामणिहार, पाटकार, लखेरा, पुरोहित, बनिया, अहीर, गड़ारी जैसी तमाम जातियों के लोग आपस में सेवाओं की अदला-बदली करते थे. श्रम-कौशल या कर्म ही तब उसकी पहचान थी, जो जाति कहलाती थी. आज शहरीकरण, यांत्रिकी और सेवा के बदलते रूप-प्रकृति के अनुसार पहचान क्यों न तय हो. अब जब जातियों के काम सेवायें हर जाति के लोग करने लगे हैं तो फिर समाज को हजारों साल पुरानी जाति से मुक्त क्यों न किया जाये. जजमानी अब भी है पर उसकी प्रकृति नयी है. अब हलवाई, मिस्त्री, टेलर, पेंटर, प्लम्बर, इलेक्ट्रीशियन, ड्राइवर आदि को ही पहचान मानना न्यायसंगत है जाति नहीं.

कितना अच्छा होता कि आगामी जनगणना में लोगों नाम के साथ जाति के साथ उसके काम को चिह्नांकित कर उसकी आर्थिक स्थिति का आकलन किया जाता. व्यक्ति घर से निकलने के बाद दिन भर किसी से जाति पूछकर सामान नहीं खरीदता. विवाहादि को छोड़ अब जाति की अहमियत राजनीतिक ज्यादा है. सरकारी सुविधाओं के लाभ उठाने के लिये 'जाति प्रमाण पत्र' की ज्यादा जरूरत होती है.

आज के नये राजनीतिक परिवेश में जाति को लेकर अब जो रार-तकरार है वह राजनीतिक है.

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आत्मपरिचय

देवेन्द्र कुमार पाठक.

( जिला- कटनी, मध्यप्रदेश ) जिले के दक्षिणी-पूर्वी सीमांत पर आबाद छोटी-महानदी ग्राम्यांचल के एक गांव में जन्म. (02/03/1955)

शिक्षा-M. A. B. T. C. (हिंदी/शिक्षण)

कविता, कथा, व्यंग्य, निबन्धादि विधाओं में लेखन, पत्र-पत्रिकाओं में 1981 से प्रकाशन और आकाशवाणी-दूरदर्शन से प्रसारण.

'महरूम' तखल्लुस से गज़लें कहते हैं.

'विधर्मी' उपन्यास  'दुष्यन्त कुमार पुरस्कार' ( म. प्र. साहित्य परिषद) से सम्मानित.

आत्मकथ्य-

"मुझसे शुरू हुयी थी मुझ पर खत्म कहानी मेरी होगी;

एक चिराग बुझे, बुझ जाये, दुनिया नहीं अँधेरी होगी. "

2 उपन्यास, (विधर्मी/अदना सा आदमी)

4 कहानी-संग्रह, (मुहिम/ मरी खाल ; आखिरी ताल/धरम धरे को दंड/ चनसुरिया का सुख)

2 व्यंग्यसंग्रह, ( दिल का मामला है/कुत्ताघसीटी )

ग़ज़ल संग्रह, (ओढ़ने को आस्मां है)

गीत-नवगीत संग्रह; (दुनिया नहीं अँधेरी होगी)

10 किताबें प्रकाशित.

सम्पादन- 'केंद्र में नवगीत' ( कटनी जिले के 7 नवगीतकारों का संग्रह)

मध्यप्रदेश के शिक्षा-विभाग में लगभग 40 साल सेवायें देने के बाद सेवानिवृत्त. 1981 से 2007 तक पत्र-पत्रिकाओं में लेखन- प्रकाशन. 10 साल अंतराल के बाद पुनः लेखन में सक्रिय.

सम्पर्क-1315, साईपुरम् कॉलोनी, साइन्स कॉलेज डाकघर-कटनी-483501(म. प्र. )

Email - devendrakpathak. dp@gmail. com

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