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गुजराती कहानी - लुगाइयाँ - मूल – किरीट दूधात - अनुवाद - डॉ॰ रानू मुखर्जी

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“सभी तैयारियां हो गई है न जादू?” सवजी दादा ने पूछा “जादव मामा ने हामी भरी” “जी दादा”। “रसोई का माहौल कैसा है?’ “लुगाइयों का तो वहाँ जबर्दस्त...

“सभी तैयारियां हो गई है न जादू?” सवजी दादा ने पूछा “जादव मामा ने हामी भरी” “जी दादा”।

“रसोई का माहौल कैसा है?’

“लुगाइयों का तो वहाँ जबर्दस्त विरोध है अभी तक तो मेरी माँ और चाची यही कह रही हें कि मंजू को तो नहीं ही भेजना है।“

सवजीदादा गुस्से से भर उठे, “सब गंवार के गंवार ही रही। सबको समझाया कि बेकार के झंझट को छोड़ो फिर भी अड़ी हुई हैं, बहुत हो गया अब तो उनसे निबटना ही पड़ेगा।“ कहते हुए सवजीदादा ऑफिस से निकालकर रसोई की ओर चल दिए।

“लुगाइयाँ तो बड़ी जिगरवाली निकली।“ कहते हुए जड़ाव मामा ऑफिस के फर्श पर चाक से तीन गोटी से खेलने वाले खेल की रेखाएँ खींचने लगे। फिर मुझे देख कर बोले, “भांजे तेरी दादी से कह देना कि तुझे सुबह सबेरे तैयार कर दे, कहीं तेरी वजह से देर न हो जाए।“

और तभी जादवमामा के पिताजी रामजी दादा बाहर से आए। उन्होंने पूछा, “भाई कहाँ गए सब? क्या हुआ पूरी बात का?”

“देखिए न मेरी माँ और चाची अभी तक इस बात से सहमत नहीं हैं। दादाजी उधर रसोईघर की ओर ही गए हैं।“

“इसका मतलब ये निकाला कि कल अमरेली जाने की कोई निश्चितता नहीं हॅ क्यों? आज ही बतकों मेडी गया, मैंने उसके हाथ संदेश भेज दिया है कि कल की बात पक्की हैं?”

“मेरी माँ कहती है कि इस रिश्ते पर यहीं धूल डालो। हमें विराणी के सिवाय दूसरे भी बहुत सारे रिश्ते मिल जाएंगे। वो एक ही है क्या ? जो वो जैसा कहें हम वैसा हे करते जाएँ।“

“तेरी माँ की तो मती तो मारी गई है ये कोई माली-तेली के घर का रिश्ता है क्या जो छोटी मोटी मामूली सी बात पर रिश्ता तोड़ डालें? क्या मंजू हमें प्यारी नहीं हैं? अभी-अभी मैं मगना दर्जी को कहकर आ रहा हूँ कि गुरुवार से अपने ऑफिस में सिलाई मशीन रख दे, विराणी का एक पूरा कमरा मंजू के दहेज से भर जाए। हम चारों भाइयों में वो अकेली ही तो है, बेचारी!”

इतने में सवजी दादा हाँफते हुए ऑफिस में आए और सर पर की पगड़ी को खटिया पर पछाड़ते हुए बोले “ऑफ हो! ये हमारे रीति रिवाज, व्यवहार, बाप रे बाप, हद हो गई...”

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“क्या हुआ भैया?” रामजी बापा ने पूछा।

“माँ को रूलाना पड़ा, और क्या? मैंने तो माँ से साफ-साफ कह दिया माँ, आप और ये चार लुगाइयाँ आप लोग सब यहाँ से चलते बनो। हमें आप लोगों की कोई जरूरत नहीं। फिर तो माँ खूब रोई और कहा कि अगर ऐसा है तो कर लो अपनी मर्जी की और फेंक दो लड़की को कुएं में। कल सुबह ही मंजू को तैयार कर देते हैं। जादू ये व्यवहार मतलब ये बात खत्म, ठीक है?”

और तभी बाघजी दादा और माथुर मामा ट्रैक्टर लेकर आए। बाघजी दादा मंजू के पिता, पर उनको अपनी बेटी के चल रही बातों पर कोई रूचि नहीं है। वो तो बस इतना जानते हैं कि व्यवहार की बातों की पूरी ज़िम्मेदारी सवजी भाई का है। वो सब निभा लेंगे। मुझे तो बस खेती-बाड़ी का काम ही संभालना है। पर सवजी बापा के बेटे माथुर मामा एक शौकीन इंसान हैं। उन्होने ट्रेलर पर से छलांग लगाते हुए पूछा, “क्यों भांजे क्या कह रहे हैं, कामरू देश के सेनानी”?

जादव मामा बोले, “बड़ी मुश्किल से लाइन पर गाड़ी आई है, अब कल सब कुछ सही हो जाए तो शांति”

वाघाजी दादा चुपचाप आकार ऑफिस में बैठ गए। वाघजी दादा एक सच्चे भगत थे। सारा दिन राम नाम की माला जपते रहते हैं। भगत बनाने से पहले तो वे तीनों भाइयों के जैसे संसारी थे। एक दिन उन्होने अपनी पत्नी चंचला से कहा, “कल से मैं और मेरा भगवान और कोई नहीं। समाज के नियमानुसार तुम मेरी पत्नी हो यह सही है पर कल से मेरा नया जीवन शुरु। कल से संसार के सारे काम बंद और वो भगत बन गए। नया जन्म। गाँव वाले कहते हैं कि भगत पर भक्ति की लाली चढ़ गई है। पर गाँव के कुछ लोग, कुछ और ही बातें करते हैं, भगत, भगत बनाने से पहले गाँव के मजदूरों से बीड़ी मांगकर पीते थे। इसलिए उनके दिमाग में मुफ्त की बीड़ी का धूआं भर गया है। भक्ति तो मात्र दिखावा है। भगत भगवान को छोड़कर और किसी विषय पर बात नहीं करते हैं। हाँ, कभी, कभी जब मैं आँगन में खेल रहा होता तब मुझे बच्चा समझकर बुलाते, “आओ भांजे” मेरे नजदीक जाने पर कहते “आज तो मीरा बाई की एक भजन की रचना की है।“ भगत कभी कभार मीराबाई या नरसिंह मेहता के भजनों की रचना कर लेते थे। मुझे पूछते “सुनाऊँ?”

मैं हामी भरता। तब लकड़ी के पुराने सन्दूक पर जंग लगे हुए पुराने पतरे पर अठन्नी से बजाकर भजन सुनाने लगते, फिर पूछते, “कुछ समझ में आया?”

मैं सर हिलाकर ना कहता, तो भी भगत खुश हो जाते और हँसते हुए कहते, “कहाँ से समझ में आएगा, ये तो भक्ति है भक्ति, क्या है?” तब मैं कहता “भक्ति”।

असली बात तो यह थी कि भगत अपनी भजन सुनाने के बाद मुझे दस पैसे खर्च करने के लिए देते थे । इसलिए जब तक मुझे दस पैसे खर्च करने के लिए मिलते हैं तब तक इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं थी कि ये भक्ति है या पागलपन।

मथुर मामा ने कहा, “माँ को रूलाया ये ठीक नहीं किया” बात सही थी। पूरा गाँव जकल माँ का आदर करता है। उनकी कही बात को मानता है। जब जकल माँ नजदीक होती तब माँ बच्चों को मारते पिटते वक्त अपशब्द नहीं बोलती है। सवजी दादा भी वक्त बेवक्त जरूरत पड़ने पर जकल माँ से सलाह मशवरा करते हैं। पर ये बात तो एकदम अनोखी है।

मंजू की मंगनी बचपन में मेडी के सरपंच रतिभाई विराणी के बेटे दिनेश से तय हो गई थी। दिनेश इकलौता बेटा है। उसकी माँ उसके बचपन में ही गुजर गई थी। इतने साल तक सब ठीक ठाक चल रहा था। पर जब शादी के दो तीन महीने रह गए तब किसी ने दिनेश के कान में यह बात दाल दी कि मंजू की जांघ पर सफ़ेद दाग है।

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पहले भी गाँव में दो एक के साथ ऐसा हुआ कि सुहागरात को उनके दागों का पता चला और फिर दुल्हन को घर से निकाल दिया गया। भविष्य में ऐसा न हो इसलिए दिनेश निश्चिंत होना चाहता था। उसने कहला भेजा था कि या तो मैं वहां आकार निश्चिंत हो जाऊं या आप मंजुला को यहाँ भेज दें।

गर्मी की दोपहर को मैं पढ़ाई पूरी करके सवजी दादा के घर खेलने के लिए जाता हूँ तब अंधेरे सीलनवाले घर में दोपहर का काम खत्म करके नहा धोकर मंजू कंघी करती हो या दिनेश को चिट्ठी लिख रही होती तब मैं पहुंचता और मंजू से पूछता, “मंजू क्या कर रही है?”

संकोच से भर मंजू कह उठती “देख न दिनेश को लेटर लिख रही हूँ”

“इसमें मेरा नाम लिखा या नहीं?” आती-जाती चिट्ठियों में मेरा नाम हो ऐसी मेरी इच्छा रहती। नखरे दिखाकर मंजू कहती, “तेरी घरवाली जब तेरे को पत्र लिखेगी तब उसमें तेरा नाम लिखेगी।“ पर मैं अपनी परेशानी दिखाता हुआ कहता, कि मेरी तो घरवाली है ही नहीं।

फिर मंजू कहती, “एक दिन तेरी बहू आएगी न। अगर जल्दी है तो घर जाकर मटके में कंकड़ डाल।”

घर जाकर मैं पिताजी को पूछता, “मेरी बहू कब आएगी बाबा”? बाबा खुश होकर कहते, “तू कहे तो अभी लेकर आएँ। बोल एक चोटीवाली लानी है या दो चोटीवाली?”

मैं परेशान हो जाता, दादी को जाकर पूछता कि इसमें क्या फरक पड़ता है? फिर दादी समझाती एक चोटीवाली काम ज्यादा करती है जबकि दो चोटीवाली अपना साज शृंगार खत्म करेगी तब न घर का काम करेगी और मैं थोड़ी देर तक सोच विचार में खोया रहता और फिर कहता, “मुझे तो एक चोटीवाली बहू ही चाहिए, काम न करे ऐसी घरवाली किस काम की?”

मंजू दो चोटी बनाती और घर के काम काज में उतनी रूचि नहीं लेती। मंजू की माँ तो अक्सर कहा करती, “निर्लज्ज, यहाँ बाप के घर में कुछ काम काज सीख ले नहीं तो ससुराल जाकर तू तो बातें सुनेगी ही हमें भी सुनाएगी।“ पर भगत की पत्नी चंचल बा कहती, “मंजू तो अपने घर की लक्ष्मी है। इसके जन्म के बाद ही हमारे घर का सारा कर्ज खत्म हुआ। हमें इससे काम थोड़े ही करवाना है।”

घर में इस बात का कोई विरोध नहीं करता था। इसका एक कारण यह भी था कि चंचल माँ को उनकी देवरानी-जेठानी जैसा संस्कारी नहीं माना जाता हॅ। सवजी दादा कहते “ये तो मजदूरों की बेटी है। इसको दूसरी बातें कैसे समझ में आएगी। दिन में चार-पाँच बार पेट जल जाए इतनी उबलती हुई गरम चाय पिएगी और जानवरों के जैसे दिन भर काम करती रहेगी। ये तो हमारे पिताजी और इसके दादा बचपन के दोस्त थे इसलिए हमारे पिताजी ने दोस्त की बात रख ली।

अर्थात चंचल माँ थोड़ी असंस्कारी है सही पर अगर बोलने मे आए तो किसी को नहीं छोडती हैं। मुंह से गंदी गाली भी निकाल आती है। फिर जकल माँ उसको समझाती है कि “चंचल बहू यह अच्छा नहीं लगता।“ इसलिए माँ की बात को मानती हुई चंचल माँ ने दिनेश की बात पर दो चार गालियां सुनाई और इस बात पर दिनेश और उसके बाप का गला दबा देने की इच्छा भी व्यक्त की थी और यह भी कहा था कि “मंजू मेरे बेटी है, आए तो कोई इसको परखने थोबड़ा ही न तोड़ डालूँ उसका।”

इस पर घर की सभी लुगाइयाँ एक हो गई। जकल माँ जैसी बुद्धिशाली स्त्री की अंतरात्मा भी थरथरा उठी।

सभी लुगाइयों का एक ही मत था कि भले ही ये रिश्ता टूट जाए पर मंजू की जांच तो कभी नहीं करने देगें।

सावजीबापा तुरंत मेडी गए। उन्होने रतिभाई को कहा, भला आदमी, हमारे इतने वर्षों के संबंध है और आपको, मैं झूठा मोती दूंगा भला ? पर रतिभाई का एक ही जवाब था, “दिनेश जब बहुत छोटा था तभी उसकी माँ चल बसी थी। उसका पालन पोषण एक राजा के जैसे हुआ है, वह कहे दिन है तो दिन है अगर कहे रात है तो रात है।”

इस जवाब के साथ लौटने के बाद घर के सभी पुरुष इकट्ठे हुए और विचार विमर्श करने बैठे कि क्या किया जाए? वाघजीबापा ने इसका एक ही समाधान निकाला कि दिनेश की बात मान ली जाए।

सवजी दादा ने कहा कि “जादू माँ को कहकर आओ कि कल सुबह मंजू को तैयार करके रखे। उसे कल सुबह अमरेली में डॉ॰ खोखर के दवाखाने भेजना है। कोई पूछे तो कहना कि मंजू की भाभी बीमार है उसे डॉ॰ खोखर के दवाखाने में भर्ती किया है इसलिए उनका हालचाल पूछने जा रही है। और दिनेश को जो जांच करानी है करा ले बात खत्म करो यही पर, बस।

जादव मामा जितनी तेजी से गए उतनी तेजी से ही लौट आए, “लुगाइयाँ तो कह रही है कि ये रिश्ता तोड़ दें।“ इतना आश्चर्य तो सावजी बापा को दिनेश की बातों से भी हुआ था।

“लो कर लो बात, कह रहें है कि संबंध तोड़ दो। और भई, अगर दूसरा संबंध करने जाएंगे तो उनको क्या जवाब देंगे कि पहला संबंध क्यों टूटा?”

राघवजी दादा के चेहरे पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्रा जी जैसा तेज छा गया। उन्होने कहा, “जादू बैलगाड़े में बैठाकर तेरी चाची को उनके पिता के घर छोडकर आ।”

वाघजी बापा ने कहा, “भई हम कल से सब काम काज छोडकर खाना पकाने बैठ जाएँ।”

जादव मामा ने कहा, “भांजे! एक जगह पर आकार लुगाइयों की अक्कल काम करना बंद कर देती है। इसलिए उनसे ज्यादा बात करेंगे तो हम ही मूर्ख कहलाएंगे।“ बड़ा होने पर इस बात का ध्यान रखना समझे?”

मावजी दादा बोले, “घाघरा टोली ने कहा अर्थात बात खत्म”।

फिर सब ठहाका लगाने लगे। इतना आनंद तो भवाई देखने जाएँ और गले में ढ़ोल लटकाकर सवजी दादा जैसे प्रतिष्ठित लोगों से, पैसा दे दो माई बाप हम आपके भंगी है कहकर चतुराई से पैसा ऐंठ ले तो भी नहीं आता है। ये तो मैं पास में ही बैठा था इसलिए नहीं तो कोई बाहर से आनेवाला तो यही समझता कि सब इकट्ठे होकर जकल माँ का शोक माना रहे हैं।

दूसरे दिन मंजू को अमरेली भेजना तय हुआ। जादव मामा बैलगाड़ी लेकर जानेवाले थे और काम पूरा होने पर शाम को वापस आनेवाले थे। मैंने कहा कि अमरेली में जेसल-तोरल फिल्म लगी है। मुझे देखना है। इसलिए मुझे भी साथ लेकर जाना तय हुआ। सबेरे से मंजू रो रही थी और कमरे में पालती मार्कर बैठ गई थी और उठने का नाम भी नहीं ले रही थे। सवजी दादा गुस्से हो गए, “माँ अब और कितनी देर? जल्दी निबटाओ न इस बात को।”

फिर तो जकल माँ की आँखों में आँसू आ गए। उन्होने मंजू को बानहे पकड़कर उठाते हुए बोला, “जा नभ्भाई (बिन भाई के) अब न कहने से क्या होने वाला है?” चारों ओर नीरवता फैली थी केवल मात्र बैल की साँसे और मंजू की सिसकियाँ ही गूंज रही थी।

जैसे भगवान ऊपर हे चढ़कर बैठे हो इस तरह से ऊपर देखते हुए भगत ने कहा, “बहन मंजू तो नासमझ है इसलिए रो रही है, बाकी तो सभी को अपने किए का फल भोगना ही है। क्यों भगवान?” कहते हुए भगत खुश हुए। मंजू ने रोते हुए जादव मामा से कहा,” भाई अभी भी वक्त है गाड़ी को लौटा ले न।” एक बार तो जादव मामा को, मेरी भाभी की कसम गाड़ी लौटा लो न, ऐसा भी कहा फिर तो जादव मामा ने चिढ़कर कहा, “तेरी भाभी अगर मरे तो मे दूसरी कर लूँगा पर ये गाड़ी तो अब लौटने वाली नहीं है। और उसके बाद रास्ते भर मंजू ने जादव मामा को एक शब्द भी नहीं कहा।

जब सब लोग डॉ॰ खोखर के दवाखाने पर पहुंचे, तब वहाँ दिनेश के मोटर साईकल खड़ी थी। जादव मामा ने मुझसे कहा, भांजे मैं तंबाकू लेकर आता हूँ, तू यही पर रहना। तभी एक रूम में से दिनेश निकाला और मंजू को एक कमरा दिखाकर बोला, “यहाँ पर आ जा”। मंजू ने मुझे दोनों हाथों से जकड़ रखा था।“ तू मेरे साथ ही रहना।“ दिनेश ने कहा,” इसका कोई काम नहीं है।“ वह माजू को कमरे मे ले गया और एक आध मिनट के बाद सीटी बजाता हुआ बाहर आया और अपना बुलेट लेकर चलता बना। पीछे से मंजू बाहर आई। मैंने पूछा, “क्या हुआ मंजू?” उसने जवाब दिया, “इससे तो मर जाना बेहतर है।“ मॅ बार बार पूछता गया पर उसने कोई जवाब नहीं दिया बस रोती रही। “ठीक है, कोई बात नहीं जल्दी चलो वरना फिल्म शुरू हो जाएगी।

लौटते समय रास्ता भर मंजू रोती ही रही। घर पहुँचने पर सभी ने पूछा क्या हुआ? जादवमामा ने जवाब दिया मेरे लौटने से पहले ही दिनेश निकाल चुका था और मंजू तो तब से ही रो रही है।

दूसरे दिन जादव मामा नारियल और पेड़े का डिब्बा लेकर आए और खबर दी कि रति भाई ने शादी की तारीख पक्की करने को कहा है। फिर बोले, ‘चलो ये नारियल मंजू के माथे पर फोड़ते है। यों तो ये सभी लुगाइयों के माथे पर फोड़ना चाहिए। मूर्ख सब मिलकर विलाप कर रही थी।“

बाद में वाघजी बापा और रामजी दादा सब एक के बाद एक आकार लुगाइयों पर व्यंग कसकर गए। “जरा भी बुद्धि नहीं है देखा! आपके कहने पर चलते तो पूरे समाज में फजीता न होता?” अंत में सवजी दादा आए और टोककर गए कि कुछ समस्या आकर खड़ी होती है तो अक्कल से काम लेना चाहिए सोचे समझे बगैर गालियां देने नहीं बैठ जाना चाहिए। समझ में आया? पर आप लोगों के सामने समझदारी की बात करने का क्या फायदा और नहीं करें तो भी क्या? निरे पत्थर पर पानी डालना ही है। मूर्ख लुगाइयाँ”।”

जकल माँ कोने में बैठकर चुपचाप माला फेर रही थी। वह कुछ नहीं बोली पर जैसे ही सवजी दादा ऑफिस के लिए मुड़े और कुछ ही कदम चले होंगे कि चंचल माँ रोटी बनाते हुई धधकते चूल्हे में से जलती हुई लकड़ी को लेकर खड़ी हो गई और चीख पड़ी, “तुम्हारी माँ के खासम, अब आए हो सयाने बनकर, तुम्हारे कूल्हों पर तो ये अंगारे दाग देने चाहिए॰ ॰ ॰ मेरी रतन जैसी बेटी॰ ॰ ॰ कहकर चंचल ने ज़ोर से बगैर लिपि, पपड़ी वाली दीवार पर जलती लकड़ी ठोकी, उसके कोयले चारों ओर उड़े, फिर चंचल माँ नीचे बैठकर ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। एक सिसकी लेकर दूसरों के लिए जब उन्होने सांस अंदर लिया तब तक तवे की रोटी जलकर कोयला बन चुकी थी।

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परिचय – पत्र

नाम - डॉ. रानू मुखर्जी

जन्म - कलकता

मातृभाषा - बंगला

शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.(महाराजा सयाजी राव युनिवर्सिटी,वडोदरा), बी.एड. (भारतीय

शिक्षा परिषद, यु.पी.)

लेखन - हिंदी, बंगला, गुजराती, ओडीया, अँग्रेजी भाषाओं के ज्ञान के कारण आनुवाद कार्य में

संलग्न। स्वरचित कहानी, आलोचना, कविता, लेख आदि हंस (दिल्ली), वागर्थ (कलकता), समकालीन भारतीय साहित्य (दिल्ली), कथाक्रम (दिल्ली), नव भारत (भोपाल), शैली (बिहार), संदर्भ माजरा (जयपुर), शिवानंद वाणी (बनारस), दैनिक जागरण (कानपुर), दक्षिण समाचार (हैदराबाद), नारी अस्मिता (बडौदा), पहचान (दिल्ली), भाषासेतु (अहमदाबाद) आदि प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में प्रकशित। “गुजरात में हिन्दी साहित्य का इतिहास” के लेखन में सहायक।

प्रकाशन - “मध्यकालीन हिंदी गुजराती साखी साहित्य” (शोध ग्रंथ-1998), “किसे पुकारुँ?”(कहानी

संग्रह – 2000), “मोड पर” (कहानी संग्रह – 2001), “नारी चेतना” (आलोचना – 2001), “अबके बिछ्डे ना मिलै” (कहानी संग्रह – 2004), “किसे पुकारुँ?” (गुजराती भाषा में आनुवाद -2008), “बाहर वाला चेहरा” (कहानी संग्रह-2013), “सुरभी” बांग्ला कहानियों का हिन्दी अनुवाद – प्रकाशित, “स्वप्न दुःस्वप्न” तथा “मेमरी लेन” (चिनु मोदी के गुजराती नाटकों का अनुवाद 2017), “गुजराती लेखिकाओं नी प्रतिनिधि वार्ताओं” का हिन्दी में अनुवाद (शीघ्र प्रकाश्य), “बांग्ला नाटय साहित्य तथा रंगमंच का संक्षिप्त इति.” (शिघ्र प्रकाश्य)।

उपलब्धियाँ - हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2000 में शोध ग्रंथ “साखी साहित्य” प्रथम

पुरस्कृत, गुजरात साहित्य परिषद द्वारा 2000 में स्वरचित कहानी “मुखौटा” द्वितीय पुरस्कृत, हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2002 में स्वरचित कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को कहानी विधा के अंतर्गत प्रथम पुरस्कृत, केन्द्रिय हिंदी निदेशालय द्वारा कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को अहिंदी भाषी लेखकों को पुरस्कृत करने की योजना के अंतर्गत माननीय प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयीजी के हाथों प्रधान मंत्री निवास में प्र्शस्ति पत्र, शाल, मोमेंटो तथा पचास हजार रु. प्रदान कर 30-04-2003 को सम्मानित किया। वर्ष 2003 में साहित्य अकादमि गुजरात द्वारा पुस्तक “मोड पर” को कहानी विधा के अंतर्गत द्वितीय पुरस्कृत।

अन्य उपलब्धियाँ - आकशवाणी (अहमदाबाद-वडोदरा) को वार्ताकार। टी.वी. पर साहित्यिक

पुस्तकों क परिचय कराना।

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डॉ॰ रानू मुखर्जी

17, जे। एम॰ के॰ अपार्टमेंट

एच॰ टी॰ रोड, सुभानपुरा

बड़ौदा – 390 023

E-mail – ranumukharji@yahoo॰co॰in

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जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,77,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: गुजराती कहानी - लुगाइयाँ - मूल – किरीट दूधात - अनुवाद - डॉ॰ रानू मुखर्जी
गुजराती कहानी - लुगाइयाँ - मूल – किरीट दूधात - अनुवाद - डॉ॰ रानू मुखर्जी
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