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महात्मा गाँधीजी का राष्ट्रभाषा हिन्दी में योगदान - उमा नवीन मेहता

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गुजरात प्रान्त के पोरबन्दर नामक स्थान पर जन्म लेने वाले बालक मोहनदास करमचन्द गाँधी सम्पूर्ण विश्व में ख्यातिप्राप्त महापुरुष हैं। वे 'बापू’ तथा 'राष्ट्रपिता’ के नाम से भारत के जनमानस में ख्याति प्राप्त कर चुके हैं। शिक्षा पद्धति के संबंध में उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उनके सादगीपूर्ण विचार हमारा आज भी मार्गदर्शन करते हैं।


सादगी- मेट्रिक तक स्वदेश में पढ़ने के पश्चात् उन्होंने विदेश में वकालात की परन्तु अपने देश की माटी की सुरभि वे कभी नहीं भूलते थे। विदेशी कपड़े त्याग कर वे खादी के वस्त्र धारण करते थे। अपने हाथों से सूत कातते थे, चरखा चलाते थे। वे अपने दैनिक जीवन में कम से कम वस्त्र धारण करते थे। उनके द्वारा दैनिक जीवन में उपयोग में ली जाने वाली सामग्री आज भी साबरमती आश्रम में रखी हुई हैं जिनका अवलोकन नई पीढ़ी करती रहती है। गाँधीजी के जीवन में उनकी पू. माताजी पुतलीबाई का प्रभाव विशेष दिखलाई देता था।


मातृभाषा के संबंध में गाँधीजी के विचार- महात्मा गाँधी ने कई बार दक्षिण अफ्रीका की यात्रा की। वहाँ वे भारतीयों पर होने वाले अत्याचारों के विरोध में लड़े। वे इंग्लैंड भी गए। वहाँ भी अंग्रेज लोग उनके विचारों से प्रभावित हुए। वे मातृभाषा हिन्दी के प्रबल समर्थक थे। उनका कथन था कि यदि भारत का उचित विकास रीति से करना है तो हमें हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाना होगा।
सन् १९१८ में इन्दौर (म.प्र.) में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में महात्मा गाँधी ने सभापति के पद को सुशोभित किया। गाँधीजी ने कहा कि हम सभी को कठिन परिश्रम करके हिन्दी को राष्ट्रभाषा के गौरवपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित करना होगा। सम्पूर्ण भारत में पूर्व से पश्चिम तक तथा उत्तर से दक्षिण तक हिन्दी का प्रचार करने के लिए गाँधीजी ने हिन्दी नव जागरण महा अभियान चलाया था, जिसमें पुरुषोत्तमदास टंडन, वेंकटेशन, नारायण तिवारी, शिवप्रसाद गुप्त आदि अनेक हिन्दी सेवकों ने अपना विशेष सहयोग देकर हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार किया था। गाँधीजी के अनुसार भाषा वही श्रेष्ठ है जिसे अधिक से अधिक व्यक्ति सरलता से समझ सकें। इससे प्रान्तीयता की संकुचित भावना दूर होगी और राष्ट्रीयता की भावना का विकास होगा। एक बार सन् १९१७ में राष्ट्रभाषा प्रचार सम्मेलन में एक विद्वान ने अंग्रेजी में भाषण दिया। गाँधी ने इस अवसर पर बहुत आलोचना की थी। गाँधी ने ६ फरवरी १९१६ को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अपना सार्वजनिक भाषण हिन्दी में दिया था। इस प्रकार के सम्मेलनों की शृंखला १ मई १९१० से सम्पूर्ण भारत में विभिन्न प्रान्तों में की गई। १९१७ में भागलपुर (बिहार) में आयोजित एक छात्र सम्मेलन के दौरान महात्मा गाँधी ने हिन्दी में भाषण देकर भारतवर्ष के युवाओं के मन में इस विचारधारा की नींव डाली थी कि हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा का सम्मानजनक पद प्राप्त हो।
हिन्दी लिपि में नवीन प्रयोग - राष्ट्रपिता बापूजी ने हिन्दी की वर्णमाला में एक अनूठा प्रयोग किया था। इस प्रकार के प्रयोग का अनुसरण करते हुए कई पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है। गाँधीजी अपने आश्रम में प्रात:काल प्रार्थना करते थे जिसमें विभिन्न भाषाओं के भजनों का समावेश किया जाता था। गाँधीजी का सर्वप्रिय भजन, 'वैष्णवजन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाणे रेÓ था। लिपि में महात्मा गाँधी जी ने जो अनूठे प्रयोग किए थे, उसके कतिपय उदाहरण मैं अपने सुधी पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रही हूं-


(अ) अुठो जागो और श्रेष्ठ पुस्तकों को पाकर उनसे ज्ञान प्राप्त कर लो। ज्ञानी लोग कहते हैं कि जिस तरह अुस्तरे की तीखी धार पर चलना कठिन है, अुसी तरह अिस विकट मार्ग पर चलना कठिन है। (आश्रम भजनावलि पृ. ३३ नव जीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद)


तथा


(ब) रघुकुल-रीति सदा चलि आअी।
प्राण जाय वरु वचन न जाअी।।
नहिं असत्य सम पातक-पुंजा।
गिरि सम होअी किं कोटिक गुंजा।
(आश्रम-भजनावलि पृ. ६१ नवजीवन प्रकाशन मन्दिर, अहमदाबाद)


उपर्युक्त दोनों उदाहरणों में उ.इ.ई. की मात्राएँ लगाने का प्रयोग नई पीढ़ी के लिए अनूठा एवं विस्मयकारी है। गाँधीजी का हिन्दी भाषा शिक्षा में योगदान-
महात्मा गाँधी का राजनैतिक तथा सामाजिक क्षेत्रों में योगदान अति महत्वपूर्ण रहा है कि शिक्षादर्शन तथा शिक्षा के क्षेत्र में किए गए उनके कार्य पर विश्व का ध्यान अपेक्षाकृत उतना नहीं गया जितना जाना चाहिए। केवल वर्धा शिक्षा योजना, नई तालिम या बुनियादी शिक्षा या बेसिक शिक्षा सम्बन्धी विचारों में उन सब शाश्वत जीवन मूल्यों पर विचार किया है जो जीवन के महत्वपूर्ण घटक हैं, जो उनकी शिक्षा को महत्वपूर्ण बनाते हैं।


शिक्षा दर्शन- सत्य, अहिंसा, निर्भयता, सत्याग्रह, भारतीय समाज की उन्नति, आत्मा का विकास, गुणों का विकास आदि बिन्दुओं पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। गाँधी जी का मूल उद्देश्य शोषण विहीन समाज की स्थापना करना था। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी शिक्षा को 'ब्यूटीफुल ट्रीÓ कहा करते थे। उन्होंने कुटीर उद्योगों को विशेष महत्व दिया। बाँस की टोकनी, झाडू, पंखे, मिट्टी के खिलौने आदि का निर्माण हमारी शिक्षा में लाभदायक सिद्ध होंगे। इनको सीखने से ग्रामीण जनता शिक्षा के साथ अर्थोपार्जन भी कर सकेगी।
वर्धा शिक्षा (बुनियादी शिक्षा) मेट्रिक स्तर तक हिन्दी में शिक्षा दी जाए। हमारी शिक्षा उद्योगों पर आधारित होना चाहिए। ७ से १४ वर्ष के बालकों को नि:शुल्क शिक्षा दी जाए। शिक्षा का माध्यम हिन्दी हो। बालक अपनी रुचि के अनुसार शिल्प की शिक्षा ग्रहण कर सकता है। बालक को शारीरिक श्रम के महत्व को समझाना चाहिए। ग्रामीण उद्योगों को तथा हस्तशिल्प की वस्तुओं का प्रचार-प्रसार किया जाए, जिससे इनकी उपयोगिता बढ़े और धन कमाया जा सके। कक्षा ७वीं के बाद बालिकाएँ गृहोपयोगी विषय गृह विज्ञान ले सकती हैं। पाठशालाओं में धार्मिक शिक्षा न दी जाए। बुनियादी शिक्षा पाठ्यक्रम में बागवानी, कृषि, चमड़े का काम, कताई बुनाई आदि को सम्मिलित किया जाए। डॉ. जाकिर हुसैन के सभापतित्व में एक समिति का गठन किया गया जो बेसिक राष्ट्रीय शिक्षा योजना के नाम से प्रसिद्ध है।


बुनियादी तालीम एक कम खर्च वाली शिक्षा पद्धति है। देश-विदेश के कई शिक्षा शास्त्रियों ने इसे ससम्मान महत्वपूर्ण प्रतिपादित किया। इन शिक्षा शास्त्रियों में रूसो, पेस्टालॉजी, फाबेल, हरबर्ट, ड्यूवी आदि प्रसिद्ध हैं। गाँधीजी का कथन है कि बालक क्रिया द्वारा सीखता है। राष्ट्रपिता का व्यक्तित्व और कृतित्व आदर्शवादी रहा है। वे विश्व में एक समाज सुधारक के रूप में जाने जाते हैं। सामाजिक उन्नति हेतु शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान होता है। उनका मानना था कि मेरे प्रिय भारत में बच्चों को ३एच की शिक्षा अर्थात हेड, हैंड, हार्ट की शिक्षा दी जाए। इससे देश स्वावलंबी बनेगा और विश्व में नाम रोशन करेगा।


गाँधीजी की शिक्षा का मूल उद्देश्य मानव के स्वभाव की विषमताओं और विकृतियों को दूर करना था। बहुत से विषयों का ज्ञान दे देना तथा साक्षर बनाना ही शिक्षा का उद्देश्य नहीं है। आर्थिक शिक्षण अर्थात रोजगार मूलक शिक्षा ही सर्वोपरि शिक्षा है। अंग्रेजी सीखने वाले बच्चे अपने घर में भी विदेशी हो जाते हैं। मातृभाषा में बात करने वाले बच्चे मेधावी होते हैं। दक्षिण अफ्रीका से वापसी के बाद गाँधीजी ने अपना भाषण हिन्दी में दिया। उन्होंने कहा कि हिन्दी भाषा के शब्द भंडार को बढ़ाने के लिए संस्कृत भाषा तथा अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश किया जाए।
सन् १९६० में केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय की स्थापना की गई। सम्पूर्ण भारत में इसके चार क्षेत्रीय निदेशालय खोले गए। ये निदेशालय भारत तथा विदेशों में हिन्दी सीखने के लिए डिप्लोमा तथा सर्टिफिकेट कोर्स चलाते हैं। प्रतिवर्ष इसमें अहिन्दी भाषी व्यक्ति परीक्षा देकर सफलता प्राप्त करते हैं।


गाँधीजी बालक की रुचि तथा प्रकृति के आधार पर शिक्षा देना चाहते थे। बालक को आत्मनिर्भर तथा स्वावलंबी बनाना उनकी शिक्षा का मूल उद्देश्य था। मानवीय गुणों का विकास शिक्षा का सर्वोपरि लक्ष्य था। बालक में सेवा, सहानुभूति, परोपकार जैसे मानवीय गुणों का विकास हो ताकि वे आपस में मेल जोल से रहें, एक-दूसरे के धर्म का आदर करें, सभी का प्रमुख उद्देश्य अहिंसा तथा सत्य आधारित सदाचार रहे। सभी का मानसिक, शारीरिक तथा आध्यात्मिक विकास हो और सभी भारत भूमि के सच्चे सेवक व नागरिक बन सकें।
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श्रीमती उमा डॉ. नवीन मेहता
सीनि. एमआईजी-१०३, व्यास नगर, ऋषिनगर विस्तार,
उज्जैन (म.प्र.) पिनकोड- ४५६ ०१०

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