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कागज का दर्द - राजेश गोसाईं की कविताएँ

1......हम.....

गोले आग के बन जाते हैं हम
जब देश की आबरू खतरे में हो
बारूदी शोले बन कर फिर
दुश्मनों से लड़ जाते हैं हम

आँख कोई विषधर उठाये जो इधर
प्रलयंकर बन ताण्डव कर जातें हैं हम
सिंहों के देश में लेकर सो सो जन्म
माँ भारती की आन बान शान में
नागों को कुचल आगे बढ़ जाते हैं हम

उफान लहू का ले दिल में
सरहद पे तूफान बन जाते हैं हम

पहन शांति की टोपी और बांध
सुभाष आजाद की साफी
काले घन देश पे आये तो
चक्रधारी घनश्याम बन जाते हैं  हम

नागफनी के कांटों को कुचलना
आता है हमें ...मगर ..देशहित में
बागवानी के फूल बन जाते हैं हम

फिर भी आये यदि कोई संकट
माँ भारती की लाज पर
रणभूमि में रणचण्डी बन जाते हैं हम

जन्म इस गोद में लिया है तो
स्वर्ग से सुन्दर इस धरती पे
ओढं के तिरंगा सो जाते हैं हम
और रह जाये खुली कहीं आँख अगर
वतन में शान से तिरंगा लहरा जाते हैं हम

खुशहाल रहे देश मेरा युगों युगों तक
नया सवेरा दे के अमन की गंगा
बहा जाते हैं हम
राजेश गोसाईं
******
2....मुकुट....

बना के रखा था नरक जिन्होंने
सुन्दर जन्नत ये
उन जयचन्दों को अब
उठने नहीं देंगे
वतन की आबरू है जो
केसर घाटी
चौहान बन के हम यहीं
उनको कुचल देंगे
उठ गये.. वतन की मूरत हैं जो हम
माँ भारती का मुकुट कहीँ
झुकने नहीं देंगे
राजेश गोसाईं
*******
.3.....प्रण.....

बन सकते हैं नेहरू गांधी हम
वतन के रखवाले सुभाष आजाद भी हम
बस लेना होगा एक ही प्रण
माँ भारती के चरणों के सिवा
कहीं भी झुकेंगे ना हम
राजेश गोसाईं
*******

.4....अंगारा 370....

अब लिखी है कशमीर की नयी तकदीर
धारा 370 चीर के बना दी है नयी तस्वीर

केसर का तिलक लगेगा
माँ भारती का मुकुट सजेगा
बहेगा अमृत बन कर डल झील का नीर
अब लिखी है कश्मीर की नयी तकदीर

चमचम चोटियां चमकेंगी चाँदी सम
ऐक तिरंगा ऐक नियम होगा सब सम
विकास की धारा से होगा नया कश्मीर
धारा 370 चीर के बना दी है नयी तस्वीर


झूमेगी लहरायेगी अब केसर घाटी
नवयुग में प्रवेश कर चौड़ी होगी छाती
स्वर्ग से सुन्दर होगी फिर से अपनी माटी
तोड़ के हर जंजीर बना दी है नयी तस्वीर

धधक रहा था धारा 370 का अंगारा
बहा कर अमन चैन की धारा
सबसे प्यारा और सुन्दर होगा कश्मीर
तोड़ के हर जंजीर बना दी है नयी तस्वीर
राजेश गोसाई
*****


5...कुसुम क्यारी

हमें रख लेना
अपने वट वृक्ष की छाँव में
हम अभी नये हैं
तुम्हारे साहित्य के गाँव में
इस गुल को भी
खिलने दो अपने गुलिस्तां में
लिखता है दिल की कलम से
अलफाज राजेश
रख देना अपनी
कुसुम क्यारी में
बड़ी खुशबु है रचना तुम्हारी में
ना जाने क्या क्या लिख देता हूँ
पर आ पहुँचा हूँ उम्मीदों की
वाह वाह में
राजेश गोसाईं
*****
6..... कागज का दर्द
इक दिन कागज मुझसे बोला
क्यों बना रहे हो मेरा गोला
कचरा कर के दिखा रहे हो शोला
लिखना तो खुद को आता नहीं
और गुस्सा मेरे पे उतार रहे हो
उठा कर कलम के चाकू
सीना मेरा चीरे जा रहे हो
उस पर भी मार के
शब्दों के पत्थर मुझे
घायल किये जा रहे हो
कभी विचारों की आँधियों में
मेरे टुकड़े उड़ा रहे हो
कल्पनाओं के सागर में मेरी
कश्तियां बहा रहे हो
अपनी रचनाओं के साम्राज्य पर
विजय प्राप्त करने के लिये
मेरी ही धरती पर विश्व युद्ध
बना रहे हो
इतिहास साक्षी है
पुरानी लिखावटों तले मेरी
लिखावट आज भी दबा रहे हो
मैं तो तुम्हारा प्रिय मित्र हूँ
हर भले बुरे का प्रमाण पत्र हूँ
जीवन की बगिया में मैं
तुम्हारा कुसुम इत्र हूँ
फिर भी तुमने मेरी कद्र न जानी
मेरे ऊपर की मनमानी
मैं तो तुम्हारा प्रतिबिम्ब हूँ न
पर तुम अपने दिल और दिमाग के
द्वंद में शब्दों के कंकर मार
मेरा आईना तोड़े जा रहे हो
कागज ने यह दर्द अपना
रोशनाई में घोल कर
मुझे झकझोर दिया
मेरी कलम से मेरा ही अंतर मन तोड़
दिया
रचना : राजेश गोसाईं
******
7.... जन जन में कोई राम नहीं.......

जन जन में कोई राम नहीं
मार सके जो भ्रष्टाचार के दानव
इस वन में कोई राम नहीं
सरकारी दफ्तर में ईमान नहीं
बनते जनता के काम नहीं
रिश्वत की ताड़का करती
अट्टहास
विश्वामित्र के तप में आज कहीं
जो खत्म करे ये असुर शक्ति
इंसानों के उपवन में कोई राम नहीं
आँसू मिलते द्रौपदी के आम यहीं
सीता के यहाँ राम नहीं
कलयुग के इस शोक वन में
अर्जुन कृष्ण और राम नहीं
और
कहनी है इक बात
हर देश के वीर इंसानों से
उठो- जागो खत्म कर दो
लालच के संग्राम कहीं
धनुष-मटकी कितने भी तोडो़
देश तोड़ना तुम्हारा काम नहीं
तुम ही अर्जुन कृष्ण बन के
भुजबल से रच दो
अयोध्या धाम कहीं
राजेश गोसाईं
*****
8.....काफिले...

शब्दों के काफीले में
उलझ कर रह गया हूं मैं
कागज के पथ पर
कल्पना के रथ पर
कलम के अश्व की
लगाम पकड़ कर
रह गया हूं मैं
कभी माथे की राह पर
कभी कागज की धरा पर
धीमी गति से आते हैं
कलम के पांव
दिल की आवाज से
मिल कर रह गया हूं मैं
जच्चा के दर्द की भांति
दिमाग के गर्भ में आती
कोई शिशु रचना बन जाती
प्रसूति काल में बेचैन सी
रहा पर ठहर गया हूं मैं
साहित्य के गाँव में
रचना की छाँव में
लिख कर ये पंक्तियां
कागज की चौपाल पर
ठहर गया हूं मैं
राजेश गोसाईं
*****
9...केसर घाटी में

अब बारूद की फसल ना होगी
केसर घाटी में
धारा 370 का परमाणु फटा है
केसर घाटी में
अमन चैन जो लूटा था
कुछ दहशतगर्दों ने
अब आतंकी नसल ना रहेगी
केसर घाटी में

झूम उठेगा सारा हिन्दुस्तान
जब धारा विकास की बहेगी
केसर घाटी में
सबसे सुन्दर बनेगी तस्वीर
होगा सबसे प्यारा कश्मीर
नवयुग में स्वर्णिम आभा होगी
केसर घाटी में
राजेश गोसाईं
*****


10....तमन्ना...

अब सोच लिया इस तिरंगे को
लहरा दूँ तुम्हारी कराची में
यही सपना है अब इक अपना
फहरा दूँ तुम्हारी छाती पे

चाहे पिण्डी की गलियां हो
चाहे लाहौर का मुझे शहर मिले
अपनी तो तमन्ना ऐक यही
लहराता तिरंगा पाकिस्तान में मिले


मैं लगा दूँ सारी गलियों में
बस एक यही तमन्ना है मेरी
जहाँ लहराये तिरंगा मेरा
वहाँ जय हिन्द का शोर मिले
राजेश गोसाईं

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