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नाथ गोरखपुरी की कविताएँ

डॉ. रेखा श्रीवास्तव की कलाकृति

01

#प्रेमद्वंद: "#हृदय_की_अनकही_बातें"

जब आंखों में सपने बसते हैं,
तब तो नींद नहीं आती !!
जब ख्वाब सुनहरे सजते हैं,
तब तो नींद नहीं आती !!

तेरे हर खामोशी को,
हृदय सहन कर जाता है !
ग़र शाम गली से गुजरते हो तुम,
फिर तब तो नींद नहीं आती !!

अक्सर मेरा दिल मुझसे पूछे;
तेरा मेरा रिश्ता क्या है?
क्यों जब भी दिल तेरा तड़पे ,
फिर क्यों मुझको नींद नहीं आती ?

जिस दिन तेरी सूरत देखुं,
हृदय तड़प सा जाता हैं !!
सूरत ना देंखु जिस दिन,
फिर तो नींद नहीं आती !!

हृदय हमारा हलचल करता,
हरदम तुमको पाने को !
बिछड़न को ये जब भी सोचे,
फिर तो नींद नही आती !!

साथ तुम्हारे जीवन बीते,
सो जाउं तेरी बांहो में !
पर दूर हो जाऊगाँ,
जब भी दिल डरता!
फिर तो नींद नही आती !!

तेरा दिल पत्थर हो शायद
ना मेरे लिये तड़पता हो
मेरे तड़पन का यह आलम है
सांसे अक्सर रूक जाती

अक्सर रातें सपने देखुं
सपने में तुम दिखती हो
जब सपने में तुम दिखती हो
फिर तो नींद नहीं आती !

मैं सोता हूँ , मैं रोता हूँ!
मैं पाता हूँ, मैं खोता हूँ !
हृदय मेरा जब तुमको ढुंढ़े ,
क्या तुमको भी नींद नहीं आती ???

तेरी चाहत में दिल मेरा तड़पे
तेरी आहट पे दिल मेरा धड़के
पर जब मैं भी तेरी गली से गुजरूँ
क्या तुमको भी नींद नहीं आती ??

02
शिवजी हँ बनले दुल्हवा सखी
  देखा चललें हिमाचल के द्वार

गौरा निहारें ली रहिया बइठि
मन सोचेली बतिया हजार

अइहें बलम घरे आजु के रतिया
आजु के रतिया हो
आजु के रतिया
चाहे नयनवा के करि सखी हम
जल्दी से उनकर दीदार

शिवजी हँ बनले दुल्हवा सखी देखा चललें हिमाचल के द्वार

03
हम जो सोचे हैं वही सत्य है इसी सोच से ये जग भ्रमित है

हम जो चाहें वही क्रिया हो इसी क्रिया से सभी व्यथित हैं

बाह्य पक्ष को करे प्रचारित अंतरमन तो अभी शंकित है

ईश्वर को स्वीकार करे ना अपनी दुनिया खुद ही रचित है

सत्य तथ्य से है वो अपरिचित मानव जीवन ही कल्पित है

इच्छाओं का अंत नहीं है इच्छाएं तो खुद अगणित हैं

मानव मन मनमानी करता मानव तो मन से ही चलित है

नाथ बनो सतकर्मी मानव इस जग में बस वही फलित है


04

आज योग्यता फिर हारी है, पुन: पुराना खेल हुआ
मातु शारदे मंदिर में फिर ,लक्ष्मी जी का मेल हुआ

सत्यज्ञान का दामन पकड़े ,फिर वे दीनदयाल हुये
उनकी शरण स्थली में ,फिर कैसे-कैसे कमाल हुये

देखो विपुल चंचला ने कैसे जग को खींच लिया
कमला आज निराश हुई, मुट्ठी को है भींच लिया

शिष्य ने गुरु कल्पना की थी सत्यज्ञान कराएंगे
नहीं पता था लक्ष्मी वाहक गुरु रूप धर आएंगे

ज्ञान से जिन्हें अनुराग नहीं,लक्ष्मी जिनकी थाती है
वो गुरु कहां बन सकता,शिष्य का भला संघाती है

ऐसी ज्ञानस्थली जग में,बीज जहर का बोती है
उल्लू जहां राज हैं करते, वहीं योग्यता रोती है

05
चौपाई छंद

जु परिवार में समता बाड़े।
तो परिवार क क्षमता बाढ़े ।।
कमला विमला दौ चलि आई।
जु परिवार में बसे भलाई।।

मातु पिता संग घर में वासा।
तेहिं घर कबहु रहे नु निराशा।।
संपत्ति सकल तेहिं घर आवै।
जु भाई मिलि घर को बसावै।।

06

मेरे कृष्णा

बच्चा है तू नादानी में
सच्चा है तू जवानी में
तुझ में सब जी लेते हैं
तूं ही सब की कहानी में

कान्हा है चंचलता में
कृष्णा है विह्वलता में
स्वरूप ही तेरे मोहित हैं
मोहन है कोमलता में

चित्त में रास रचैया है
नेत्र में मुरली बजैया है
स्वांग में बना है माखनचोर
विश्व का तू ही कन्हैया है

कहीं गोवर्धन धारी है
कहीं सुदर्शन धारी है
कहीं है छलिया बन जाता
कहीं बना तू मुरारी है

07
हरकतें कुछ लोगों की वाहियात बाकी हैं
शायद अभी भी उनमें वही ज़ात बाकी है

सबसे मिला करते हैं बड़े गुरुर ओ गर्व से
अभी भी उनकी खुद से मुलाक़ात बाकी है

अभी चूर हैं वो खुद के बनाये उसूलों पर
कभी अंत होगा इनका कायनात बाकी है

कल रो रहे थे घर में ,अकेले इस कदर
लगता था इनमें जैसे जज़्बात बाकी है

मेरे हार पर जश्न ऐसे ,मनाओ नहीं सनम
क़यामत वाली आखिरी ,अभी रात बाकी है

08
आदमी का दोहरा चरित्र,
दिखावे की पवित्रता,
आंतरिक प्रवृति राक्षसी,
हर दूसरा व्यक्ति इसी सांचे में ढला है

बातों में तो,
बांस से लंबे लंबे ऊँचे विचारों वाला,
पर गिरी हुई ओछी हरकतों से पूर्ण,
मन में कामुकता धारण किये,
मर्यादाओं की मीठी जुबाँ पर मनचला है,

चेहरे पर मासूमियत लपेटे
ख़तरनाक इरादों को
समाजसेवा के आड़ में छुपाकर
दौलत कमाने की मानसिकता ले पला है

अरंडी के वृक्ष की भाँति
मजबुती का चादर ओढ़े
अपने बनावटी उसूलों पर
बत्तीसी दिखाकर अपनी पीठ थपथपाने चला है

अपनी झूठी दुनियां के
झूठे लोगों से जी हुजूरी कराके
मगन हो रहा है
मानो जीत ली है सोने की लंका
और उसमें विद्यमान हो,
सकूँ चैन सत्य ईमान जीने की मानो सारी कला

भीमकाय शरीर में नहीं है,
चींटी के मानिंद भी दया,
जोंक की कर्म को धारण किये,
अपनों से ही चिपककर,
रक्तिम मुखड़े को,
रक्त की धार प्रतिदिन प्रदान करता,
जी रहा है आदमी...


- नाथ गोरखपुरी

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