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अविनाश ब्यौहार के नवगीत, दोहे, गीत व ग़ज़लें

डॉ. रेखा श्रीवास्तव की कलाकृति

नवगीत:

जिंदगी ज्यों ज्यों
चढ़े सोपान।
उमर अपने
खोलती है कान।।

आठों पहर
संकट में घिरे।
कालिमा के हैं
अब दिन फिरे।।

ले उड़ा पल छिन
दुखों का यान।

दिन, सप्ताह,
महीने उदास।
नकुल साँप के
हुए हैं खास।।

है बदहवास
कोयल की तान।

दोहे

बवंडर आँधी आते, भरा प्रकृति में रोष।
मानव भी है खोलता, आपदाओं के कोष।।

कालेधन की होलिका, सच्चाई प्रहलाद।
इस होली में जल मरी, बहुत दिनों के बाद।।

फैशन ऐसा चल रहा, औरत दिखती नग्न।
मेहराब संकोच के, अक्सर होते भग्न।।

लोगों ने शोषण किया, न्यायालय है मौन।
दुखियारी के रुदन को, धैर्य बँधाए कौन।।

दफ्तर चिड़ियाघर हुए, म्याऊँ का है शोर।
अनुशासित इनसे अधिक, लगते डाँगर ढोर।।

एक प्रवृत्ति जाग रही, हिंसा से आकूत।
गाँधी का यह देश अब, है हिटलर का दूत।।

हिंदी ग़ज़ल

न्याय नहीं मिलता ये आलम है।
पुजी है कुटिलता ये आलम है।।

चारों ओर आँधी औ बवंडर,
पात नहीं हिलता ये आलम है।

अस्त्रों शस्त्रों की क्या बात करें,
भेद रही चिलता ये आलम है।

दूर दूर तक है दलदल फैला,
कमल नहीं खिलता ये आलम है।

जगह जगह हैं आतंकी साये ,
तंत्र की शिथिलता ये आलम है।

हिंदी ग़ज़ल

प्रेम हो- सद्भाव हो नासूत में।
हुआ अशुभ है वर्तमान- भूत में।।

मद, लोभ, माया, मोह में आसक्ति,
देखने को मिल रही अवधूत में।

अपनों के दर से मायूस लौटे,
चाहा जो भी मिला अनाहूत में।

मूल्य जिंदगी के इतने गिर चुके,
अब करें हम क्या भरोसा दूत में।

आज भ्रष्टाचार तो फैशन बना,
अन्तर क्या है काली करतूत में।

मतलबी से जिंदगी में बेरुखी,
हुई नैतिक नीचता आकूत में।

सियासत में खोटे सिक्के चलते,
लायक होते फेल गुण कपूत में।

हिंदी ग़ज़ल

भेड़ बकरी सी रिआया है।
मुल्क सियासत ने खाया है।।

हम गए हैं मदद के वास्ते,
किन्तु हम पर कहर ढाया है।

इंसानियत हाशिए पर है,
उनके जीवन में सरमाया है।

पहने तमगा शिष्ट व्यक्ति का,
घूम रहा अब चौपाया है।

सत्तासीन है अराजकता,
यही अय्यार की माया है।

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अविनाश ब्यौहार
रायल एस्टेट कटंगी रोड
माढ़ोताल जबलपुर

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