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हम हिन्दीवाले (व्यंग्य ) - दिलीप कुमार

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अपने कुनबे में हमने ही ये नई विधा ईजाद की है । एकदम "परफेक्शनिस्ट", नहीं, नहीं भाई कम्युनिस्ट मत समझिये। भई कम्युनिस्ट से जब जनता ...

अपने कुनबे में हमने ही ये नई विधा ईजाद की है । एकदम "परफेक्शनिस्ट",

नहीं, नहीं भाई कम्युनिस्ट मत समझिये। भई कम्युनिस्ट से जब जनता का वोट और सहयोग कम होता जा रहा है तब हम जैसा जनता के सरोकारों से जुड़ा साहित्यकार कैसे उनसे आसक्ति रख सकता है । एक उस्ताद शायर फरमा गये हैं -

"अपनी मर्ज़ी से कब कहाँ किधर के हम हैं

रुख हवाओं का जिधर है ,उधर के हम हैं "।

फिर हम उन चुनिंदा बंगाली बुद्धिजीवियों जैसे थोड़े ना हैं, जिनके समक्ष विश्व उत्थान का मुद्दा दिवास्वप्न की मानिंद उपस्थित रहता है और दिल में सोवियत संघ के बिखर जाने का स्थायी दुःख साथ में ये स्थायी टीस भी , कि काश एक बार सरकारी खर्चे पर क्रांति को समझने के लिये सोवियत देशों की यात्रा हो पाती।

हम तो हिंदी क्षेत्र के खाये -अघाये साहित्यकार हैं । हम सीना ठोंक के हिंदी के उत्थान का झंडा ठसक से उठाते हैं। हिंदी के उत्थान के लिये लात -मुक्का ,घूंसा खाने -चलाने से लेकर आत्मदाह का प्रयास करने तक को तैयार बैठे हैं,बस एक बार हमारे संगठन के चुनाव तो हो जाने दीजिये।

वैसे भी हमें हिन्दीतर भाषी राज्य में पैदा ना होने का अफ़सोस बहुत है । वहाँ देखिये हिंदी विभाग में  "हिंदी डे" मनाकर अंग्रेजी दां लोग विभाग का माल पानी ऐसे उड़ा ले जाते हैं कि किसी हिंदी प्रेमी को भनक तक ना लगने पाती है। हिंदी सेवा के लिए हम कुछ ख़ास ना कर पाते तब भी कोई एनजीओ वगैरह बनाकर वार्षिक या द्विवार्षिक पत्रिका ही निकालते। ये कम पड़ता तो हिंदी सेवा के नाम सरकारी खर्चे पर देश के कोने-कोने या विदेश की यात्रा ही कर डालते और पूरी फैमिली की छुट्टियों का इंतजाम मुफ्त में हो जाता और हिंदी सेवा भी। इसके अलावा अनुवाद और सम्वाद के नाम पर कमाई के तमाम जरिये निकल सकते थे।

सुना है,सारे कमीशन संगठित है वहाँ हमारे अधिकांश राज्यों के विकास के सिरमौर ठेकेदारों ने बताया। सुदूर हिंदी के विरोध का गढ़ बने एक हिन्दीतर राज्य में तो बाकयदा एक्सेल शीट पर ऐसे कार्यक्रमों के कमीशन की एक संस्था से रिपोर्ट लीक हुई थी।

वैसे तो हिंदी के नाम पर हो रहे खेल में सर्वत्र कुशल-मंगल है और भारत और चीन की सीमाओं की तरह स्थाई शान्ति है। ऑडिट-वादिट का कतई कोई बड़ा लफड़ा नहीं है वहाँ। तभी तो हिंदी सप्ताह के पूर्व ही लोग "आई लव हिंदी " का मंत्रोच्चार करना शुरू कर देते हैं जिससे वो तमाम नकदी और प्रोत्साहन की योजनाएं हथियाने में सफल हो जाते हैं ।

जबकि हिंदी पट्टी के राज्यों में कितनी गला काट प्रतियोगिता है । किसी बन्दे को पांच हजार का पुरस्कार मिल जाए तो पांच सौ पेज के सवाल हिंदी की पत्रिकाओं में छप जाते हैं । अखाड़ा सा बना हुआ है इस हिंदी बेल्ट में। अब अगर मोहल्ले स्तर की किसी संस्था ने भूले-भटके कोई पेन,फाइल कवर या सौ रूपये वाली शाल हमको ओढ़ा दी तो भाई लोग जलकर आग भभूका हो जाते हैं।

वैसे भी इस तमाशे में भूले से भी नकदी का कोई नामोनिशान नहीं होता। अलबत्ता मेरे अभिनन्दन के नाम पर मुझसे ही चाय -समोसा खाते हुए सैकड़ों रुपयों का बिल मुझे ही थमा जाते हैं। फिर अखबार में स्वयं चर्चा पाने के लिये मेरे नाम का बधाई संदेश छपवाते हैं ,हमारे खबरनवीस भी बधाई देने वाले का नाम तो बोल्ड अक्षरों में छापते हैं ,मगर पुरस्कार पाने वाले का नाम बहुत छोटे अक्षरों में प्रकाशित करने की परंपरा का पालन बड़ी मुस्तैदी से करते हैं। किसी अखबार ने हमारा नाम छापा तो तखल्लुस भूल गया और किसी ने हमारा तखल्लुस शाया किया तो नाम बदल गया । मुझे तो ये उन लोगों की अज्ञानता कम और शरारत ज्यादा लगती है । एक साहब से मैंने इसकी वजह पूछी तो वो शेक्सपियर का हवाला देते हुए हँस कर बोले -

"व्हाट इज इन ए नेम "

अब इन दिलजलों को कौन समझाये कि साहित्यकार की आधी पहचान उसके मूल नाम से और बाकी की पहचान खुद को स्वयंभू बनाकर दी गयी पहचान के नाम यानी तखल्लुस से होती है । मेरे यश की हकतल्फी यकीनन मेरे शहर के साहित्यकारों की दीर्घकालिक योजनाओं की परिणिती है जिससे कि मेरी प्रंशसा मेरे पाठकों तक छितरा-छितरा तक पहुंचे ,इकट्ठे नहीं।

लेकिन हम भी क्या करें ,साहित्य के इस अखाड़े में अगर बने रहना है तो हमको भी इस नूरा -कुश्ती का हिस्सा बनना ही पड़ेगा। आखिर हम भी तो इस खेल के माहिर खिलाड़ी हैं। बरसों से इस खेल को खेलते आ रहे हैं । किसी को बना भले ना पाये हों ,मगर ना जाने कितने पहलवानों को नेस्तानाबूद कर दिया इस साहित्य के अखाड़े में। उन सबकी फेहरिस्त बहुत लंबी है । ले दे कर ये कम्बख्त उम्र ही धोखा दे जाती है। हमारे मोहल्ले में अभी युवा और वृद्ध के बीच साहित्यकारों की कोई पूछ नहीं होती और हम ठहरे मंझदार वाले। युवा हमें लिफ्ट नहीं देते और वृद्धों को तो उत्साह से लबरेज युवाओं की ही जरूरत रहती है ।

हमारी हिंदी में लेखक को बूढ़े होने का इंतजार करते रहते हैं ,क्योंकि हमारे यहाँ वरिष्ठ लेखक का तमगा उम्र से ही मिलता है ,पढ़ने -लिखने से नहीं । दुनिया में किसी अन्य क्षेत्र में कोई जल्दी बूढ़ा नहीं होना चाहता मगर हिंदी साहित्य में "साठा वो पाठा "की कहावत चरितार्थ होती है। यानी जी साठ का हुआ वो बुद्धिमान और पढ़ाकू माना जाने लगा। भले ही उसकी जिंदगी वरिष्ठों की चापलूसी में गुजरी हो । वो कृपापात्रता के बदौलत और जेबें ढीली करके ही छपा हो मगर अब वो स्वयं वरिष्ठ है और ये सब खुद दुबारा दुगनी रफ्तार से करेगा।

हिंदी साहित्य में वरिष्ठ होने के लाभों की गणना करना ऐसे ही है, जैसे किसी साधारण लेखिका के बारे में ये पता लगते ही ,कि ये किसी उच्च अधिकारी की पत्नी हैं ,जो मलाईदार विभाग में हैं। हमारे आलोचक उनकी साहित्यिक महानतायें गिनना शुरू कर देते हैं। हमने लाख जतन किये मगर हमारे लेखन को महिला और दलित लेखन के देखे -भोगे यथार्थ के समतुल्य भी ना माना गया। हमने तमाम लेखक संघों की सशुल्क सदस्यताएं लीं ,अपने किराये भाड़े पर उनके सम्मेलन में भी गये ,मगर वहां भी हमें प्रमुख हस्ताक्षर नहीं माना गया। और तो और हमने दल और विचारधारा बदलकर एक संघ से दूसरे संघ में पदार्पण किया मगर हमारे इस परिवर्तन को भी तवज्जो नहीं दी गयी । आलोचकों ने स्वर्णिम चुप्पी को ओढ़े रखा और ये बताने से गुरेज किया कि हमारे जाने से फलां संघ को कितना नुकसान हुआ और फलां संघ को कितना फायदा ?

हमारे लेखन और साहित्यिक निष्ठाओं के विचलन पर बड़े -बड़ों को तो छोड़िये ,छुटभैये आलोचकों ने ऐसी चुप्पी साधी कि पूछिये मत ?उनके दिल में ये डर घर कर गया कि अगर भूले से भी उन्होंने मेरा नाम नकारात्मक स्वर में भी ले लिया तो हो सकता है कि कहीं  -

"बदनाम गर होंगे तो फिर नाम ना होगा "

वाली कहावत चरितार्थ ना हो जाये, सो वो चुप ही रहे।

हालाँकि मैंने विपन्न साहित्यकारों को मिलने वाली पेंशन की उम्मीद अभी त्यागी नहीं है और बिना प्रकाशक के प्रस्ताव के ही अपनी मसालेदार आत्मकथा अभी से लिखने बैठ गया हूँ।

क्या पता,कब कहां टाँका फिट हो जाये और मुझे अपने कपोल कल्पित प्रेम संबंधों पर पूरी सीरीज लिखनी पड़ जाए।

वैसे भी शोक -संतप्त और मृत्यु के बाद लेखकों की महानता के लेखों को लिख लिख कर मेरा जी ऊब गया है । अब आप भी अब गये हों तो ये सब पंवारा छोड़िये और मेरी उस ख़ास विधा के बारे में सुनिये। वो विधा ये है कि किसी ख़ास पुरस्कार के ठुकराए जाने पर उस पर विशिष्टता लिया हुआ लेखन । हाल ही में एक मशहूर अंग्रेजी लेखिका की मशहूर किताब का हिंदी अनुवाद करने वाले एक जाने-माने लेखक ने भारतीय साहित्य का सबसे जाना -माना और मलाईदार पुरस्कार ठुकरा दिया। मैंने तुरंत ही इस अवसर को लपक लिया था। ये और बात है कि मैंने कुछ समय पहले उस अंग्रेजी लेखिका के इस देसी और मलाईदार पुरस्कार के ठुकराए जाने पर भी लिखा था। हालांकि तवज्जो तब भी नहीं मिली थी मगर तब की बात अलग थी क्योंकि तब हिंदी साहित्य में इतने पुरस्कार ठुकराये नहीं जाते थे।

मगर अब हिंदी साहित्य में तमाम मठाधीशों के नाम ,निष्ठा और लोकेशन बदल चुके हैं।

मगर इस बार मैंने पूरी तैयारी की है,ठुकराये जाने वाले पुरस्कारों और उनके समर्थन के फायदों का व्यापक अध्ययन कर लिया है । अब हिंदी के साथ इस मामले पर अंग्रेजी पर भी लिखूंगा ,लिपि भले ही बदले ,आखिर सेवा तो हिंदी की ही होगी। भले ही ऐसे कंटेंट का अनुवाद मैं कॉन्वेंट में पढ़ने वाले अपने भतीजे से करवाऊंगा। अब इसे आप मेरा प्रोफेशनलिज्म कहिये कि इसके लिये मैंने इश्तहार छपवाने को भी सोचा है ,जिसका मजमून कुछ यूँ होगा

"उपलब्ध है एक हिंदी का उत्कृष्ट साहित्यकार(नोट-अंग्रेजी में भी अनुवादित ) जो सिर्फ पुरस्कार ठुकराये जाने पर लिखता है । हिंदी की बड़ी पत्रिकाएं मानदेय सहित या बिना मानदेय लेखन हेतु तथा छोटी-मोटी पत्रिकाएं प्रस्तावित मानदेय राशि के साथ नीचे लिखे पते पर सम्पर्क करें ,मगर पहचान गोपनीय रखने की गारंटी के साथ -

नाम ,,,,अजी छोड़िये, व्हाट इज इन ए नेम (नाम में क्या रखा है )।

बस ये लिंक क्लिक कीजिये,,,,,,,,,,,,

दिलीप कुमार ।

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रचनाकार: हम हिन्दीवाले (व्यंग्य ) - दिलीप कुमार
हम हिन्दीवाले (व्यंग्य ) - दिलीप कुमार
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